मिडिल ईस्ट जं!ग के बीच किम जोंग ने चल दिया बड़ा दांव!

जब पूरी दुनिया की सांसे मिडिल ईस्ट में अटकी हुई हैं। जब हर कोई यह देख रहा है कि ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच अगला धमाका कहां होगा। ठीक उसी वक्त दुनिया के दूसरे कोने में एक और तानाशाह ने महाविनाश की तैयारी तेज कर दी है।

उत्तर कोरिया के सुप्रीम लीडर किम जोंग उन ने एक ऐसा कदम उठाया है जिसने ग्लोबल सिक्योरिटी के साथ समीकरणों को उलझा दिया है। पोंगयोंग ने इस हफ्ते एक या दो नहीं बल्कि इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेपन सिस्टम एंटी एयरक्राफ्ट और क्लस्टर से लैस का धुआंधार परीक्षण किया है। यह महज रूटीन टेस्ट नहीं है बल्कि यह उन नई की तैयारी है जिसमें दुश्मन को संभलने का मौका तक नहीं मिलेगा।

सबसे डराने वाली बात इन हथियारों की तकनीक है जो बिना किसी बड़े धमाके के पूरे के पूरे देश को ब्लैकउ करने की ताकत रखती है। इन परीक्षणों में सबसे ज्यादा चर्चा इलेक्ट्रोमैग्नेटिक यानी ईएमपी और कार्बन फाइबर की हो रही है

अब सवाल यह है कि यह इतने खतरनाक क्यों हैं? दरअसल यह पारंपरिक विस्फोटकों की तरह सिर्फ इमारतों को नहीं गिराते बल्कि ये इलेक्ट्रोमैग्नेटिक एनर्जी का इस्तेमाल करके दुश्मन के पूरे इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को एक झटके में डेथ कर सकते हैं। सोचिए ना इंटरनेट चलेगा ना काम करेगा और ना ही बिजली की सप्लाई बचेगी। बिना एक भी गोली चले पूरा सिस्टम नेस्तनाबूत हो जाएगा।

इसके साथ ही किम जोंग उन ने क्लस्टर वॉर हेड का भी टेस्ट लिया है। यह वो हैं जो हवा में फटकर सैकड़ों छोटे बमों में बदल जाते हैं और करीब 7 हेक्टेयर के इलाके में जो कुछ भी है उसे राख बना देते हैं। जानकार मानते हैं कि किम जोंग उन ने इन के परीक्षण के लिए जो टाइमिंग चुनी है वो बहुत ही सोची समझी रणनीति का हिस्सा है। इस वक्त अमेरिका का पूरा ध्यान ईरान और इजराइल पर टिका है।

उसे हॉर्मोस की खाड़ी में अपने भेजने पड़ रहे हैं। जिससे एशिया प्रशांत क्षेत्र में उसकी पकड़ थोड़ी ढीली पड़ी है। उत्तर कोरिया इसी अनुपस्थिति का फायदा उठा रहा है। किमजों ने रूस यूक्रेन युद्ध से भी बड़ा सबक लिया है। यूक्रेन का दावा है कि उत्तर कोरिया ने रूस को जो हंगसंग 11 सप्लाई की थी। अब इन्हीं के एडवांस वर्जन को पियोयांग खुद अपनी ताकत बनाने में जुटा है। यानी रूस और ईरान के अनुभवों को अब उत्तर कोरिया अपने [संगीत] लैब में की शक्ल दे रहा है। उत्तर कोरिया की यह बढ़ती ताकत सिर्फ उसकी अपनी नहीं है। इस खेल के पीछे चीन और रूस की परछाई भी साफ दिखाई दे रही है।

पिछले 6 सालों में पहली बार चीन के विदेश मंत्री वोंगी का उत्तर कोरिया दौरा इस बात का सबूत है कि बिजिंग और पियंग्यायांग के रिश्ते अब एक नई ऊंचाई पर है। वहीं रूस को हजारों सैनिक और भेजकर किम जोंग उन ने पुतिन का भरोसा भी जीत लिया है। आज उत्तर कोरिया वही असमित यानी कम लागत वाली रणनीति अपना रहा है। जिसका इस्तेमाल ईरान ने मिडिल ईस्ट में अमेरिका के खिलाफ किया है। संयुक्त राष्ट्र के कड़े प्रतिबंधों के बावजूद किम जोंग उन का यह दुस्साहस यह बताने के लिए काफी है कि आने वाले वक्त अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण होने वाला है। सवाल अब यह है कि क्या अमेरिका दो मोर्चों पर एक साथ लड़ पाएगा? [घंटी की आवाज़]

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