हम इस्लाम के लिए का हर खतरा देने से बाज नहीं आएंगे यह शब्द आज से 50 साल पहले 1974 में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने लाहौर में दुनिया भर के इस्लामिक नेताओं के सामने कहे थे एक ऐसा वादा एक ऐसा संकल्प जो सुनकर लगे कि अब इस्लाम के नाम पर फस्तीन के नाम पर दुनिया के सारे मुस्लिम देश एक साथ चट्टान की तरह खड़े हो जाएंगे लेकिन आज 50 साल बाद तस्वीर क्या है.
आज इस्लामिक देश एक दूसरे से ही लड़ रहे हैं सऊदी अरब और ईरान की दुश्मनी जगजाहिर है यूएई बहरीन मोरक्को जैसे देश इजराइल से दोस्ती कर चुके हैं और पाकिस्तान जो कल तक इस्लाम का सिपाही बनने का दावा कर रहा था आज खुद अपनी मुश्किलों में फंसा हुआ है तो सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या हुआ इस्लामिक देशों के लिए इजराइल के खिलाफ एकजुट होना इतना मुश्किल क्यों है क्या यह सिर्फ कहने की बातें हैं या इसके पीछे कोई गहरा जिओपॉलिटिकल खेल चल रहा है.
कहानी को समझने के लिए हमें 1974 के उस दौर में वापस चलना होगा तब माहौल अलग था मिस्र जॉर्डन यूएई ने इजराइल को मान्यता नहीं दी थी ईरान में इस्लामिक क्रांति नहीं हुई थी तद्दाम हुसैन इराक में थे एक उम्मीद थी कि ओआईसी यानी ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कॉपोरेशन एक मजबूत आवाज बनेगा भुट्टो का भाषण उसी उम्मीद का प्रतीक था लेकिन फिर वक्त बदला और हालात बदले एक-एक करके वो सारी गांठे लगनी शुरू हुई जो आज तक नहीं सुलझ पाई 1979 ईरान में हुई इस्लामिक क्रांति ईरान अब एक शिया इस्लामिक रिपब्लिक बन गया 1979 उसी साल सुन्नी देश मिस्र ने इजराइल को मान्यता दे दी यह इस्लामिक एकता पर पहला बड़ा झटका था 1980 से 88 ईरान और इराक के बीच 8 साल लंबी लड़ाई दो मुस्लिम देश एक दूसरे का खून बहा रहे थे 1994 जॉर्डन ने भी इजराइल से शांति समझौता कर लिया 2020 अब्राहम एक्ट यूएई बहरीन मोरक्को और सूडान ने भी इजराइल से डिप्लोमेटिक संबंध बना लिए यह तो हुई टाइमलाइन अब समझते हैं असली वजह कि यह देश एक क्यों नहीं हो पाते कारण नंबर एक सऊदी अरब बनाम ईरान लीडर कौन इस्लामिक दुनिया में सबसे बड़ी दरार है सऊदी अरब और ईरान के बीच लोग इसे सिर्फ सुन्नी बनाम शिया की लड़ाई समझते हैं लेकिन यह उससे कहीं ज्यादा है यह लड़ाई है क्षेत्रीय दबदबे की लीडरशिप की एक तरफ है सऊदी अरब जो सुन्नी इस्लाम का केंद्र है और एक राजशाही है दूसरी तरफ है ईरान जो शिया इस्लाम का झंडाबरदार है और एक इस्लामिक क्रांति से बना देश है ईरान सऊदी अरब की राजशाही को इस्लाम के लिए सही नहीं मानता और अपने मॉडल को एक्सपोर्ट करना चाहता है वहीं।
सऊदी अरब को ईरान के बढ़ते प्रभाव से डर लगता है यह दुश्मनी यमन सीरिया इराक जैसे कई देशों में प्रॉप्सी वॉर यानी छद्म युद्ध की शक्ल ले चुकी है जब दो बड़े मुस्लिम देश ही एक दूसरे के खिलाफ हों तो बाकी देश किसके साथ खड़े हो एकता कैसे बनेगी कारण नंबर दो हर देश का अपना नेशनल इंटरेस्ट कहते हैं जिओपॉलिटिक्स में कोई स्थाई दोस्त या दुश्मन नहीं होता सिर्फ स्थाई हित होते हैं और मुस्लिम देशों पर यह बात 100% लागू होती है इसका सबसे बड़ा उदाहरण है तुर्की तुर्की के राष्ट्रपति इर्दवान आज फिलिस्तीन के सबसे बड़े हिमायती बनते हैं वो यूएई और बहरीन की आलोचना करते हैं कि उन्होंने इजराइल से रिश्ते क्यों बनाए लेकिन मजे की बात यह है कि तुर्की वो पहला मुस्लिम बहुल देश था जिसने 1949 में ही इजराइल को मान्यता दे दी थी आज भी दोनों देशों के बीच अरबों डॉलर का व्यापार होता है।
2005 में तो अर्दन खुद इजराइल गए थे और कहा था कि ईरान का कार्यक्रम पूरी दुनिया के लिए खतरा है इसे कहते हैं दोहरे मापदंड यही हाल बाकी देशों का है अज़र-बैजान एक शिया देश होने के बावजूद इजराइल का करीबी दोस्त है क्योंकि उसे ईरान से खतरा महसूस होता है हर देश इस्लामिक भाईचारे से पहले अपने देश का आर्थिक और रणनीतिक फायदा देखता है कारण नंबर तीन बिग बॉस अमेरिका का फैक्टर इसे समझिए खाड़ी के लगभग हर बड़े देश में सऊदी अरब कतर बहरीन यूएई में अमेरिका के सैन्य अड्डे हैं करीब 70 हजार अमेरिकी सैनिक वहां तैनात हैं इन देशों की सुरक्षा काफी हद तक अमेरिका पर निर्भर है और अमेरिका किसका सबसे बड़ा दोस्त है इजराइल का तो जाहिर है यह अरब देश अमेरिका को नाराज करने का जोखिम नहीं उठा सकते जैसा कि एक्सपर्ट तलमीज अहमद कहते हैं जब इजराइल का ड्रोन ईरान पर हमला करने जाता है तो वह जॉर्डन के ऊपर से होकर गुजरता है क्या जॉर्डन उसे रोक सकता है नहीं क्योंकि यह सब एक बड़ी स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप का हिस्सा है यह देश ईरान से तो डरते हैं लेकिन अमेरिका पर भरोसा करते हैं अब आते हैं पाकिस्तान पर पाकिस्तान बार-बार इस्लामिक एकता की बात क्यों करता है एक्सपर्ट्स का मानना है कि पाकिस्तान दुनिया में अपनी अहमियत बनाए रखने के लिए इस्लामिक कार्ड खेलता है वो खुद को इस्लामिक दुनिया की एकमात्र परमाणु शक्ति के तौर पर पेश करना चाहता है।
