अब दो नहीं तीन लोग मिलकर पैदा करेंगे बच्चे। दरअसल एक ऐसा मामला सामने आया है जहां पर वैज्ञानिकों ने तीन लोगों के डीएनए का उपयोग करके आठ बच्चों को जन्म दिया है। इनमें चार लड़कियां, चार लड़के शामिल हैं। इनमें समान जुड़वा बच्चे भी शामिल हैं। इस तकनीक को थ्री पर्सन इनविट्रो फर्टिलाइजेशन नाम दिया गया है।
न्यू इंग्लैंड जनरल ऑफ मेडिसिन में प्रजनन उपचार पर प्रकाशित दो शोध पत्रों के मुताबिक सरकार से अनुमति मिलने के बाद इसका प्रयोग 22 महिलाओं के डीएनए के लिए किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक यह वो महिलाएं थी जिनका जीन परेशानी खड़े करनेवाला था। यानी इनके जीन को लेकर अगर बच्चा पैदा होता तो वह गंभीर आनुवांशिक विकारों के साथ जन्मजात विकलांगता के साथ पैदा होता।
इन महिलाओं के जीन में लेह भी उपस्थित था। न्यूकेसल यूनिवर्सिटी की टीम द्वारा विकसित एक क्रांतिकारी तकनीक फिर चर्चा में है। जिसमें तीन लोगों के डीएनए से मिलकर एक भ्रूण तैयार किया गया है। इस प्रक्रिया में माता-पिता के न्यूक्लियर डीएनए के साथ-साथ एक डोनर महिला के स्वस्थ डीएनए का उपयोग किया गया। गौरतलब है कि माइटोकांड्रिया जिसे सेल का पावर हाउस भी कहा जाता है। मूल रूप से मां से बच्चे में स्थानांतरित होता है। ऐसे में यदि किसी मां को माइट्रोकांड्रियल बीमारी है तो उसका प्रभाव बच्चे पर भी पड़ सकता है। इसी समस्या के समाधान के तौर पर वैज्ञानिकों ने तीसरी महिला के अंडाणु से स्वस्थ लेकर उसे माता-पिता के डीएनए के साथ मिलाकर भ्रूण का निर्माण किया। लेकिन अब सवाल उठता है कि आखिर माइट्रोकांड्रियल बीमारी क्या होती है? दरअसल माइटोकांड्रिया को कोशिका का पावर हाउस कहा जाता है। यह शरीर की कोशिकाओं में मौजूद सूक्ष्म अंग होता है। माइटोकांड्रिया भोजन और ऑक्सीजन को ऊर्जा में बदलते हैं जिससे शरीर ईंधन की तरह उपयोग करता है। माइटोकांड्रिया के खराब काम करने पर शरीर में ऊर्जा की कमी हो जाती है।
यह दिल की धड़कन, मस्तिष्क की कार्यप्रणाली और मांसपेशियों को प्रभावित करता है। इसके कारण दौरे, अंधापन, अंगों का फेल होना और मृत्यु तक की स्थिति आ सकती है। कुछ माता-पिता ने इन बीमारियों की वजह से अपने बच्चों को भी खोया है। माइट्रोकांड्रिया केवल मां से बच्चे को मिलते हैं। यदि मां के माइट्रोकांड्रिया में गड़बड़ी हो तो वह बीमारी बच्चे में भी आ सकती है। यह तकनीक 2015 में ब्रिटिश संसद में जोरदार बहस का विषय बनी थी। तब इसे नैतिक और वैज्ञानिक पहलुओं पर कई सवालउठे थे। हालांकि बाद में इसे संसद की मंजूरी मिल गई और इसे एक वैज्ञानिक उपलब्धि के तौर पर जाने जाने लगा। अब जबकि यह रिपोर्ट सामने आ चुकी है, ब्रिटिश मीडिया में इस तकनीक को लेकर कई सवाल खड़े हुए हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह कि यह तकनीक सफल रही तो इसके परिणामों को अब तक सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया था? खासतौर पर तब जब इसमें सार्वजनिक फंडिंग का भी उपयोग किया गया। इस पूरे मामले ने एक बार फिर जीन थेरेपी और बायोटेक्नोलॉजी की पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर बहस छेड़ दी है।
