खबर है कि ईरान ने ऐसा एयर डिफेंस सिस्टम तैयार कर लिया है जो अमेरिका और इजराइल के करोड़ों के हथियारों का सफाया कर देगा। लेकिन सोचने वाली बात है कि ईरान जब खुद में इतना ताकतवर है तो जंग के समय में रूस और चीन ने उसका साथ क्यों छोड़ दिया है?
यह डिफेंस सिस्टम क्या है और रूस और चीन ईरान के साथ क्यों नहीं खड़े हैं? जानेंगे इस वीडियो में। आप देख रहे हैं N 18 का डिजिटल प्लेटफार्म ईरान का नेटवर्क बिना रडार सिग्नल के भी दुश्मन के को ट्रैक और नष्ट कर सकता है। यह सीधे दुश्मन के लड़ाकू विमानों की मॉनिटरिंग कैपेसिटी को कमजोर करता है। इस सिस्टम के सेंटर में ईरान की खास इंटरसेप्टर 358 है। यह जेट इंजन से चलने वाली एक लोटिंग इंटरसेप्टर मिसाइल है जो हवा में गश्त करते हुए दुश्मन के ड्रोन को खुद पहचान कर हमला कर सकती है।
यह मिसाइल करीब मैक 0.6 यानी लगभग 740 कि.मी./ घंटे की रफ्तार से उड़ सकती है। इसे अमेरिकी एमq9 रीपर और इजराइली हर्म्स 900 जैसे ड्रोन के लिए खतरा माना जा रहा है। मिसाइल में लगे सेंसर और एआई एल्गोरिदम ड्रोन के हीट सिग्नेचर, इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल को पहचान सकते हैं। टारगेट की पहचान होते ही मिसाइल खुद टर्मिनल गाइडेंस मोड में जाकर ड्रोन की ओर बढ़ती है। रडार का यूज नहीं होता है। इसलिए ड्रोन ऑपरेटर को हमले का पहले से पता नहीं चलता। ईरान सेल्फ इक्विप्ड तो है लेकिन इस जंग ने ईरान को यह जरूर बता दिया है कि कौन उसके साथ है और कौन नहीं। रूस और चीन ने ईरान पर हमलों की आलोचना तो की है और सुरक्षा परिषद की तुरंत बैठक बुलाने की मांग भी की है। लेकिन अभी तक ईरान को सैन्य मदद देने से दूरी बनाए रखी है।
इसके पीछे की वजहों पर जाएं तो हो यह सकता है कि रूस ने कदम इसलिए पीछे कर लिए क्योंकि वह सीधे जंग में नहीं कूदना चाहता। रूस पर ईरान की रक्षा करने की कानूनी बाध्यता नहीं है। रूस फिलहाल सीधे टकराव से बचना चाहता है और खुद को मध्यस्थ की भूमिका में दिखाने की कोशिश कर रहा है। दूसरी तरफ चीन ईरान का बड़ा ऑयल इंपोर्टर है। लेकिन उसके सऊदी और यूएई जैसे अन्य खाड़ी देशों से भी आर्थिक रिश्ते हैं। चीन किसी एक का फेवर लेने से बच रहा है।
अगर रूस और चीन सीधे तौर पर ईरान की सैन्य मदद करते हैं तो वह अमेरिका से सीधे दुश्मनी मोल ले लेंगे। चीन और रूस दोनों की कोशिश है कि वे ईरान और उसके विरोधी देशों के साथ संतुलन बनाए रखें।
अगर ईरान का खुला समर्थन करते हैं तो दूसरे पार्टनर्स नाराज हो सकते हैं। रूस ने गुरुवार को कहा कि ईरान ने में हमसे हथियार भेजने का कोई अनुरोध नहीं किया है। रूसी राष्ट्रपति के दफ्तर के प्रवक्ता ने कहा कि इस मामले में ईरान से कोई मांग नहीं आई है।
वहीं चीनी एक्सपर्ट्स का ईरान को लेकर कहना है कि जो भी लीडरशिप सामने आएगी चीन उसके साथ काम करने को तैयार है। बशर्ते वह तेल के फ्लो को बचाएं और साझा आर्थिक हितों को प्राथमिकता दें। फिलहाल के लिए इतना ही।
