ईरान की लड़ाई में 5 देश मालामाल, भारत को नुकसान।

विनाश का दूसरा नाम है। कहीं मातम होता है तो कहीं शहर मलवे में तब्दील हो जाते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जब दुनिया के एक हिस्से में बरस रहे होते हैं तो कुछ देशों की तिजोरियां भर रही होती हैं।

जी हां, मिडिल ईस्ट में ईरान और उसके विरोधियों के बीच बढ़ता तनाव वैश्विक अर्थव्यवस्था का चेहरा बदल रहा है। आज हम बात करेंगे उन देशों की जिन्होंने ईरान के संघर्ष और जैसी स्थितियों का फायदा उठाकर अरबों डॉलर कमाए हैंलिस्ट में पहला नाम है रूस। अब आप सोचेंगे कि रूस तो खुद यूक्रेन के साथ में फंसा है तो वह कैसे फायदा कमा रहा है?

सीधा सा गणित है कि ईरान दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादकों में से एक है। जब से ईरान की शुरुआत हुई है, ब्रेंड क्रूड यानी कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगी हैं।कि ईरान पर प्रतिबंध लगे हैं। दुनिया को वैकल्पिक तेल की जरूरत होती है। अमेरिका ने भी रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत समेत कई देशों को छूट दे दी है।

रूस जो पहले से ही सस्ते दामों पर तेल बेच रहा है। ऐसे समय में अपनी सप्लाई बढ़ा चुका है। जब रूसी तेल $0 से बढ़कर $ प्रति बैरल पहुंच चुका है तो रूस की अर्थव्यवस्था को हर रोज करोड़ों डॉलर का अतिरिक्त मुनाफा हो रहा है।

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट ने बताया कि मिडिल ईस्ट में चल रहे संघर्ष के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति में कमी आने से शुक्रवार को भारतीय बंदरगाहों पर पहुंचने वाले रूस के यूराल्स कच्चे तेल की कीमत रिकॉर्ड 98.93 प्रति बैरल तक पहुंच गई है।

यानी ईरान की आग रूस के लिए सोने की बारिश बन चुकी है। ईरान युद्ध से रूस को एक और फायदा यह हुआ है कि लोगों का ध्यान यूक्रेन से काफी हद तक हट चुका है और रूस की छवि में भी सुधार देखने को मिल रही है। [संगीत] दूसरा देश है अमेरिका। अमेरिका के लिए युद्ध सिर्फ राजनीतिक नहीं बल्कि एक मल्टी बिलियन डॉलर बिजनेस है। जब ईरान का खतरा बढ़ता है तो खाड़ी देश जैसे सऊदी अरब, यूएई और क़तर अपनी सुरक्षा के लिए डर जाते हैं।

इस डर का भरपूर फायदा उठाती है अमेरिका की डिफेंस कंपनियां। इनमें लॉकड मार्टिन और रेथन के नाम भी शामिल हैं। पिछले कुछ सालों में ईरान के साथ तनाव के चलते इन देशों ने अमेरिका से अरबों डॉलर के डिफेंस सिस्टम, [संगीत] फाइटर जेट्स और रडार खरीदे हैं। सरल शब्दों में कहें तो ईरान जितना ताकतवर दिखेगा, अमेरिका के हथियारों की बिक्री उतनी ही ज्यादा होगी। इसके साथ ही अमेरिका ने महंगे दरों में तेल और गैस भी बेची हैं। यानी अमेरिका इस युद्ध से पूरी तरह से मालामाल हो रहा है।

[संगीत] तीसरा नाम सुनकर शायद आप चौंक जाएं और यह नाम है चीन का। चीन युद्ध नहीं लड़ता। वह सिर्फ व्यापार देखता है। ईरान पर लगे कड़े प्रतिबंधों की वजह से दुनिया के ज्यादातर देश उससे तेल खरीदने से कतराते हैं। लेकिन चीन ने ऐसा नहीं किया। इस के बीच चीन ने ईरान से बहुत ही भारी डिस्काउंट पर ब्लैक मार्केट और गुप्त रास्तों से तेल खरीदा है। यह खरीद अभी भी निरंतर जारी है।

जहां दुनिया प्रति बैरल तेल के लिए 90 से $ दे रही है, वहीं चीन इसे ईरान से मात्र 50 से $ में खरीद रहा है। इस सस्ते तेल की बदौलत चीन की मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट काफी कम हो गई है। चीन पूरी दुनिया में बाजारों पर अपना कब्जा बनाए रखने के लिए और भी मजबूती से प्रयासरत है। ईरान की मजबूरी चीन की सबसे बड़ी मजबूती बन गई है।

चौथा देश है कतर। ईरान और क़तर दुनिया के सबसे बड़े प्राकृतिक गैस फील्ड यानी साउथ पार्स को साझा करते हैं। इस समय ईरान और प्रतिबंधों में उलझा हुआ है। उसकी गैस सप्लाई लगातार बाधित हो रही है। ऐसे में यूरोप और एशिया के पास सिर्फ एक ही ऑप्शन बचा हुआ है और यह है क़तर का। क़तर ने ईरान की अस्थिरता का फायदा उठाकर खुद को दुनिया के सबसे बड़े एलएनजी एक्सपोर्टर के रूप में स्थापित कर लिया है। आज कतर की अमीरी के पीछे कहीं ना कहीं ईरान का पिछड़ना भी एक बड़ी वजह है। हालांकि ईरान के द्वारा स्टेट ऑफ हॉर्मोस को ब्लॉक किया जाना उसके लिए एक बड़ी चुनौती जरूर है।

बावजूद इसके वो बड़े स्तर पर बढ़ी हुई प्राइस के साथ गैस सप्लाई कर रहा है। जानकारों की मानें तो ईरान युद्ध से भारत को फिलहाल नहीं तो कोई बहुत बड़ा फायदा होता हुआ दिखाई पड़ रहा है और ना ही बहुत ही ज्यादा नुकसान। यूक्रेन युद्ध शुरू होने पर भारत ने रूस और दूसरे देशों से कच्चा तेल खरीदा। उसे रिफाइन किया और फिर उसे उन देशों को बेचा जो तेल की किल्लत झेल रहे थे। इससे देश को विदेशी मुद्रा का बड़ा फायदा हुआ था। भारत फिर से इस रोल का फायदा उठा सकता है।

फिलहाल तो इस से भारत पर गहरा असर पड़ने की संभावना है। इसमें कच्चे तेल और एलपीजी की कीमतों में तेजी, 20 से 25% तक जरूरी सामान की महंगाई और आपूर्ति श्रृंखला में बाधा शामिल है। जिससे स्टील और हॉस्पिटिटी जैसे उद्योगों को झटका लग सकता है। दोस्तों, सच तो यह है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कोई किसी का स्थाई दोस्त या दुश्मन नहीं होता। जहां एक तरफ मासूम लोग युद्ध की विभीषिका झेलते हैं,

वहीं दूसरी तरफ यह पावरफुल देश अपनी अर्थव्यवस्था के पहहिए घुमाते रहते हैं। ईरान का संघर्ष केवल एक देश की लड़ाई नहीं बल्कि एक ग्लोबल बिजनेस बन चुका है।

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