अगर आपने कर्बला का इतिहास पढ़ा होता, तो शायद यह सवाल नहीं पूछते कि भारत के शिया मुसलमान क्यों रो रहे हैं? कर्बला सिर्फ एक जंग नहीं थी। यह सच और सत्ता के टकराव की एक मिसाल थी। 680 ईसवी में इमाम हुसैन ने जुल्म के आगे झुकने से इंकार किया और अपने छोटे से काफिले के साथ शहादत कबूल की।
लेकिन समझौता नहीं किया। अब के दौर में जब लोगों को लगता है कि कहीं अन्याय हो रहा है, कहीं बेगुनाह मारे जा रहे हैं तो उन्हें कर्बला की याद आती है। क्योंकि कर्बला सिर्फ 1400 साल पुरानी घटना नहीं थी। एक जिंदा एहसास है। इसी सोच, सत्य और सब्र और प्रतिरोध को आगे बढ़ाने की बात अली खामन बार-बार करते रहे। उनके समर्थक मानते हैं कि उन्होंने सार्वजनिक तौर पर अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने को कर्बला की रूह से जोड़ा।
इसलिए जो लोग इमाम हुसैन की विचारधारा को मानते हैं वो जब किसी ऐसे नेता को देखते हैं जो प्रीतकात्मक भाषा सच के साथ जुड़ा रहा हो और सच से जुड़ने की बात करता हो तो भावनात्मक जुड़ाव बनता है। यही वजह है कि मुस्लिम समुदाय उनकी शहादत की खबर पर दुख व्यक्त कर रहे हैं। उन्हें लगा कि एक ऐसी आवाज चली गई है जो कर्बला के संदेश की याद दिलाती थी। मैं फिर साफ कहना चाहती हूं कि भारत के मुसलमान अली खामन के जाने पर इसलिए आंसू नहीं बहा रहे हैं कि इससे उन्हें कोई राजनीतिक लाभ मिलेगा।
इसका भारत की चुनावी या सत्ता की राजनीति से कोई लेना देना नहीं है। समझने की जरूरत यह है कि शिया मुसलमानों के लिए वो केवल एक राजनेता नहीं थे बल्कि एक रहबर थे। तमाम मुसलमान उनके जाने पर दुख मना रहे हैं। एक धार्मिक मार्गदर्शक के जैसे उन्हें वह देखते थे। जैसे हिंदू समाज में कोई गुरु, शंकराचार्य या अत्याधिक आचार्य होता है। जिनके विचारों को लोग अपने जीवन का मार्ग मानते हैं। उसी तरह शियाओं के लिए उनका स्थान था। कर्बला की लड़ाई सिर्फ एक ऐतिहासिक घटना नहीं थी बल्कि अन्याय के खिलाफ खड़े होने की मिसाल मानी जाती है। महात्मा गांधी ने कहा था कि उन्होंने अन्याय के खिलाफ संघर्ष की प्रेरणा इमाम हुसैन से ली है।
देश के पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भी कर्बला को इंसाफ और बलिदान की प्रतीक घटना बताया। हाल के वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी मुहर्रम के अवसर पर इमाम हुसैन के बलिदान को याद करते हुए कहा कि उनका संदेश इंसानियत त्याग और सच्चाई के लिए खड़े होने का है। इसी विचारधारा को कई मुस्लिम समुदाय अपने उसूल के रूप में देखते हैं कि सत्ता से बड़ा सच है और ताकत से बड़ा न्याय। इसी संदर्भ में बहुत से लोग मानते हैं कि खामनी साहब खुद को उसी राह का पैरोकार बताते थे।
अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की राह। यही वजह है कि जो लोग इमाम हुसैन और कर्बला को सिर्फ एक धार्मिक प्रसंग नहीं बल्कि रेसिस्टेंट और सैक्रिफाइस की आईडियोलॉजी से मानते हैं। वो खामने के जाने पर दुख व्यक्त कर रहे हैं। अगर कर्बला की फिलॉसफी, उसके हिस्टोरिकल रेफरेंसेस और उन नेताओं के स्टेटमेंट्स को समझा जाए जिन्होंने इमाम हुसैन को एक यूनिवर्सल सिंबल माना तो शायद यह सवाल ही ना उठे कि कुछ लोग शो क्यों मना रहे हैं। यह सिर्फ राजनीति का विषय नहीं है। ये बिलीफ हिस्ट्री और आइडेंटिटी से जुड़ा हुआ भावनात्मक और वैचारिक प्रश्न है।
