कि इजराइल, ईरान और अमेरिका के के बीच में दो बड़े वेसल्स या फिर दो ऑयल टैंकर्स इंडिया में पधारे। इन टैंकर्स का नाम था शिवालिक और नंदा देवी। अब उस टैंकर्स के आने के बाद यह कहा गया कि यह इंडियन डिप्लोमेटिक सक्सेस या फिर इंडिया जिस तरीके के बात ईरान के साथ कर रहा था, उसी वजह से यह दोनों टैंकर्स एलपीजी का एक बड़ा साठा लेकर या फिर एलपीजी की एक बड़ी मात्रा लेकर इंडिया में पधारे।
लेकिन आपको यह बता दें कि अब इंडिया के एक्सटर्नल अफेयर्स मंत्री या फिर विदेश मंत्री ने कहा है कि यह ईरान के साथ कोई स्पेशल समझौता नहीं है। अभी भी एक-एक इंडिविजुअल केसेस को देखते हुए ही एक-एक शिप भारत में आ रही है। इसका मतलब यही है कि जिस तरीके का एक बड़ा प्रचार किया गया कि यह दोनों शिप्स इसी वजह से स्टेट ऑफ हरमूस से भारत आ पाई क्योंकि मोदी गवर्नमेंट ने कुछ एक अलग डिप्लोमेसी सामने रखकर या फिर ईरान के साथ कुछ समझौता कर कर उनका रास्ता क्लियर किया था। हालांकि ऐसा नहीं है। मैं आपको बताना चाहता हूं कि ये पूरे युद्ध के बीच में स्टेट ऑफ हार्मोस एक बड़ी मात्रा में इंपॉर्टेंट हो चुका है ना सिर्फ भारत के लिए लेकिन पूरी दुनिया के लिए।
लेकिन आज की जो असलियत है या फिर सत्य है वो यही है कि देश में एक अलग पैमाने का एलपीजी का पैनिकिक शुरू हो चुका है। वो पैनिकिक हमें यह बताता है कि भारत में एलपीजी की कमतरता जो है वो दिखाई तो दे रही है लेकिन दो शिप्स से आने से या फिर दो शिप्स भारत के पोर्ट्स पे आने से वो खत्म नहीं होने वाली। हालांकि इन दो शिप्स ने लगभग 92,700 मेट्रिक टन का एलपीजी लाया। उसमें से एक शिप जो शिप थी वो मुंद्रा पोर्ट गई तो दूसरी कंडला पोर्ट जाके रुकेगी। लेकिन स्टेट ऑफ हरमूस अभी भी भारत की सारी शिप्स के लिए बंद ही है। या फिर हर एक शिप एक-एक केस अपना खुद का क्लीयरेंस करके सामने आ रही है। तो इंडियन डिप्लोमेसी का जो एक बड़ी जीत मानी जा रही थी, यह अर्थ असत्य था। यह पूरी सत्यता नहीं थी। लेकिन अब ये एक इंपॉर्टेंट बात हो जाती है कि कोई एक ब्लैंकेट एग्रीमेंट नहीं है ईरान के साथ जिस तरीके का होना चाहिए था।
और आपका अगला सवाल यही होगा कि ऐसा क्यों नहीं है? तो देखिए जयशंकर ने खुद ही अपने वर्ड्स में कहा है कि हर एक शिप की जो मूवमेंट है वो अभी अपने खुद की हैपनिंग है या फिर खुद के वजह से हो रही है। कोई एक सिस्टमैटिक अभी तक जो सफलता मिलनी चाहिए थी वो वहां पर नहीं है। तो ये टेंपरेरी तो है कि कहीं ना कहीं ये क्षणिक है लेकिन यह आगे इससे ज्यादा भी हो सकता है क्योंकि भारत के लिए भारत का जो एलपीजी का पूरा एक तरीके से सप्लाई है वो दो शिप से होने नहीं वाला है। हालांकि यह कयास लगाए जा रहे थे कि जो भी देश वहां पर युद्ध लड़ रहे हैं चाहे वह ईरान हो या फिर अमेरिका हो या फिर इजराइल हो सभी के साथ भारत के अच्छे संबंध तो है ही। तो ऐसा क्यों है कि अभी तक हमने यह देखा था कि रशिया और यूक्रेन के युद्ध के बीच में मोदी सरकार मोदी गवर्नमेंट उन्होंने अपना समझौता कर कर अपने लोगों को वहां से बाहर निकाला था। लेकिन यह युद्ध थोड़ा अलग है और खासतौर पर तब अलग है जब युद्ध के सिर्फ 48 घंटों पहले तक भारत के पंतप्रधान इजराइल के दौरे पर थे।
हमने जब ईरान के सर्वोच्च नेता खमेनी मारे गए उसके बाद भी जितने जल्दी एक तरीके से अपना स्टेटमेंट जारी करना चाहिए था वो नहीं हुआ था। इन सारी चीजों की वजह से ईरान के साथ जो संबंध भारत के थे उन्हें कहीं ना कहीं ठोस पहुंची है और वो जो ठोस पहुंची थी उसी का एक तरीके से खामियाजा हमें स्टेट ऑफ हार्मूस से आने वाली शिप्स जो इंडिया के लिए आ रही है उनको भुगतना पड़ रहा है। ईरान किन चीजों की वजह से नाखुश है? तो देखिए पीएम मोदी की जो अभी विजिट हुई थी इजराइल की वो ईरान के लिए काफी बड़ा कंसर्न था। दूसरी बात कि इजराइल का गाजा के रिलेटेड, इजराइल का पैलेस्तीन के रिलेटेड या फिर पूरे वेस्ट एशिया रीजन में जो रवैया था उसकी खुली हुई आलोचना तो नहीं लेकिन इजराइल के फेवर में कहीं ना कहीं हमारी चुप्पी की वजह से हमारा वो पोजीशन या फिर स्टैंड था वो भी ईरान को कहीं ना कहीं खला है।
इससे पहले भी और इसके बाद भी खलने वाला है। इसी इन्हीं सारी चीजों की वजह से एक तरीके से भारत और ईरान के बीच में जो चबारहार पोर्ट ईरान के ऑयल इंपोर्ट इन सारी की वजह से जो एक अच्छे नाते थे उनमें कहीं ना कहीं ठोस पहुंची और इसी वजह से अभी के दौर में जब हमारे शिप्स आ जाने चाहिए थे वहां से वो नहीं आ पा रहे। दूसरी तरफ हमारे नेबर्स को हम देखते हैं जो हमारे पड़ोसी है चाइना बांग्लादेश इनको एक स्पेशल प्रिविलेज या फिर एक स्पेशल उनकी डील जो है ईरान के साथ हो चुकी है जिसकी वजह से उनकी शिप्स को काफी क्लीयरेंस स्टेट ऑफ हार्मू से मिल रहा है।
मतलब एक तरफ जिस पड़ोसी देश जिसको एक तरीके से भारत भी अपना ऑयल या फिर सब कुछ दे रहा है उसने ईरान के साथ बात कर कर खुद की शिप्स का मार्ग जो है वो क्लियर कर लिया है। देखिए सबसे इंपॉर्टेंट बात यही होता है कि ईरान और इंडिया के बीच डिप्लोमेटिक टॉक्स चल रहे हैं। भारत में जो क्राइसिस एलपीजी का बोला जा रहा है वो उतना बड़ा क्राइसिस है नहीं।
ऐसा सरकार का कहना है कि अभी जो डिप्लोमेटिक सक्सेस अगर नहीं मिला हो या फिर जिस तरीके की उम्मीद थी वो अगर नहीं हुआ हो लेकिन भारत में अभी उस तरीके का एक बड़ा विनाशकारी समय भी नहीं आया है और एलपीजी का इनफ साठा अभी के टाइम पर भारत में जरूर है। बस सरकार का यही कहना है कि पैनिकिक में ज्यादा एलपीजी ऑर्डर मत करिए। एलपीजी को खुद के घरों में खुद की जगहों पर संभाल के मत रखिए क्योंकि जिसको ज्यादा जरूरत होगी उसके लिए यह एलपीजी अभी के टाइम पर जरूरी है। इन द पास्ट फ्यू डेज वी हैव नॉट कट डाउन एनीवेयर इन इन टर्म्स ऑफ यू नो द डोमेस्टिक सप्लाई। कमर्शियल पे हमने कटा कट किया है। लेकिन डोमेस्टिक सप्लाई आर कंटिन्यूड एंड एंड वी विल कंटिन्यू मेकिंग दैट। हमें आपको यह भी बता दें कि लगभग 50% जो भारत का ऑयल है और जो गैस है वो स्टेट ऑफ फार्मू से बहता है और इसी वजह से एक मेजर चंक ऑफ जो एलपीजी है वो उसी रीजन से आता है। जब ये रीजन बंद हो जाता है तो भारत की ऑइल और एलपीजी पर बड़े क्वेश्चन मार्क या फिर प्रश्न चिन्ह जो है वो खड़े हो जाते हैं। अब से सबसे इंपॉर्टेंट बात अगर इसकी अब बात हम करें कि भारत में क्या हो रहा है? भारत में एलपीजी बुकिंग्स में 7% से भी बड़ी मात्रा में उछाल देखा गया है। और हमने देखा कि किस तरीके से बड़ी एक तरीके से लाइंस हमें दिखाई दे रही है एलपीजी ऑफिसिसेस के बाहर और उसके बाद गवर्नमेंट को सामने आके यह कहना पड़ा कि पैनिकिक करने की कोई जरूरत नहीं है।
हाउसहोल्ड जो एलपीजी है या फिर आपके और मेरे घरों में जो एलपीजी यूज़ हुआ जाता है होता है उसका जो प्रोडक्शन है वो बढ़ा दिया गया है। 50 लाख से भी ज़्यादा सिलडर्स डेली अह मात्रा में रोज़ वहां पे दिए जा रहे हैं। लगभग अह 25 दिनों का वेटिंग पीरियड शहरों में है। 45 दिनों का गांव में है। वो इसी वजह से कि उसकी होर्डिंग ना हो। लोग एलपीजी अननेसेसरी अपने घरों में संभाल के ना रखें। जिसको ज्यादा जरूरत है उसकी तरफ ये जाए।
लेकिन यहां पर सवाल यही उठता है कि भारत और जो न्यूट्रल रहने वाला भारत है जिसके ईरान के साथ इतने अच्छे संबंध थे वो ईरान आज भारत को फ्री पास या फिर जिस तरीके का एक अनइरप्टेड एक्सेस देना चाहिए था स्टेट ऑफ कोर्नूस से वो क्यों नहीं दे रहा है शायद इसमें हमारी इजराइल और अमेरिका के साथ जो बढ़ती नजदीकियां थी वो भी इसके लिए जिम्मेदार है और जियोपॉलिटिक्स या फिर अंतरराष्ट्रीय जो राजनीति होती है संबंध होते हैं ये इसी तरीके का कोई खेल है कि जहां पर आपको लगता है कि यह दो सबसे स्ट्रांग प्रतिस्पर्धी है उनकी तरफ हमें जाना चाहिए।
