ईरान पर हमले को लेकर अमेरिका और इसराइल की रणनीति जो भी रही हो लेकिन ईरान की आवाम के बारे में उनके सारे गुणागणित फेल हो गए हैं। ईरानी मीडिया प्रेस टीवी के जरिए इसे जारी किया गया है। जिसमें एक बेहद बुजुर्ग खातून ईरान का परचम हाथ में लिए लकड़ी टेकते हुए धीरे-धीरे चली जा रही हैं। इन्होंने ईरान का कौमी लिबास पहना है और कमर झुकी हुई है।
लेकिन तेहरान की सड़कों पर बाकी लोगों का साथ देने इस्लामिक रेवोल्यूशन के समर्थन में वह भी उतर आई हैं। देखने से लगता है बुजुर्ग महिला की उम्र काफी होगी। लेकिन इनकी उम्र पर इनकाजज्बा हावी हुआ जाता है। यही वो जज्बा है जिसने ईरान को पिछले 17 दिनों से जमा के रखा हुआ है। कोई भी देश भले ही कितनी मजबूत फौजी ताकत रखता हो लेकिन जब तक आवाम का साथ उसे उसी तरह ना मिले तो लड़ना उसे आगे बढ़ाना बेहद मुश्किल हो जाता है। जनवरी 2026 में जब ईरान में जेंजी यानी नौजवान महंगाई को लेकर अपनी हुकूमत के खिलाफ सड़कों पर उतरे थे तो अमेरिका और इसराइल ने इसे अवसर बना लिया।
उन्हें लगा कि वैसा ही गुस्सा जनता हमले के बाद भी दिखाएगी इस्लामिक रेवोल्यूशन को लेकर। इमाम आयतुल्ला अली खामई को मारने से जनतापूरी तरह से रिजीम के खिलाफ हो जाएगी। लेकिन यहां गच्चा खा गया अमेरिका या यूं कहें कि लेने के देने पड़ गए। जब यह बूढ़ी दादी ईरान के लाखों लोगों की हर दिन निकलने वाली रैलियों के साथ सड़क पर निकलती हैं परचम थामे, तो पता चलता है कि 3,000 साल पुरानी सभ्यता को कभी जीता क्यों नहीं जा सका।
एक्सपर्ट कहते हैं कि ईरान को समझने के लिए यह बुजुर्ग खातून ही काफी हैं। जो किसी भी हमलावर देश के लिए सीधा पैगाम है कि ईरान को ना तो कब्जाया जा सकता है और ना ही इसे अपने इशारों पर चलाया जा सकता है। फौजी ताकत और हथियारों के जोर पर इस देशसे निपटना कितना मुश्किल है यह तो दुनिया देख ही रही है। लेकिन 9 करोड़ की जनता को अपने पक्ष में लाना उससे भी बड़ा चैलेंज है।
हालात यह हैं कि अमेरिका इस से जैसे तैसे निकलने की फिराक में है और इस्लामिक रेवोल्यूशन को बदलने का उसका ख्वाब अब ख्वाब ही रह जाएगा ऐसा लगने लगा है क्योंकि ईरान की आवाम मिसाइलों और बमों के बीच भी बेखौफ सड़कों पर है। महिलाएं हो या पुरुष हर कोई अमेरिकी जुर्रत के आगे डट कर खड़ा है।
जानकार कहते हैं कि अमेरिका और इसराइल हार चुके हैं और ईरान हमले झेल कर अपने सुप्रीम लीडर को गवा कर भी जीत कीतरफ है। बस ऐलान होना बाकी है। मिडिल ईस्ट में जारी जंग अब और ज्यादा भयानक मोड़ लेने की तरफ बढ़ती दिख रही है। पिछले 17 दिनों से चल रहे भीषण संघर्ष के बीच ईरान ने एक ऐसा दावा किया है जिसने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। ईरान का कहना है कि अमेरिका और इजराइल के खिलाफ इस जंग में उसे रूस और चीन से भी सैन्य सहयोग मिल रहा है। अगर यह दावा सही साबित होता है तो यह संघर्ष केवल क्षेत्रीय युद्ध में ना रहकर बली वैश्विक शक्तियों के टकराव में बदल सकता है।
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने एक अहम इंटरव्यू में कहाकि चीन और रूस ईरान के रणनीतिक साझेदार हैं और मौजूदा संघर्ष में सहयोग कर रहे हैं। दोनों देशों के साथ ईरान का राजनीतिक और आर्थिक सहयोग तो पहले से है लेकिन इस युद्ध के दौरान सैन्य स्तर पर भी समर्थन मिल रहा है। हालांकि उन्होंने इस सहयोग से जुड़ी कोई विस्तृत जानकारी साझा करने से साफ तौर पर इंकार कर दिया। अरेची ने कहा कि मौजूदा हालात में ईरान अपने सहयोगी देशों के साथ लगातार संपर्क में है और यह सहयोग कई स्तरों पर जारी है। उनके इस बयान के बाद मिडिल ईस्ट में चल रहे संघर्ष को लेकर कई चिंताएं पैदा हो गई हैं क्योंकिअमेरिका पहले से ही रूस और चीन को अपनी प्रमुख रणनीतिक प्रतिद्वंदी मानता रहा है।
इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बयान में संकेत दिया था कि रूस शायद इस युद्ध में ईरान की मदद कर रहा है। ट्रंप ने कहा था कि रूसी राष्ट्रपति व्लादमीर पुतिन संदा थोड़ी बहुत मदद कर रहे होंगे। यह बयान उन रिपोर्ट्स के बाद सामने आया था जिसमें दावा किया गया था कि रूस ईरान को अमेरिकी सैनिक ठिकानों से जुड़ी खुफिया जानकारी दे रहा है।
इसी बीच ईरान ने साफ कर दिया है कि फिलहाल किसी भी तरह की बातचीत या समझौते की संभावना नहींहै। अरागची के मुताबिक युद्ध का अंत तभी संभव है जब इस बात की ठोस गारंटी दी जाए कि भविष्य में ईरान पर इस तरह के हमले दोबारा नहीं किए जाएंगे। उन्होंने यह भी कहा कि संघर्ष के दौरान हुए नुकसान के लिए मुआवजा दिया जाना चाहिए।
ईरानी विदेश मंत्री ने क्षेत्रीय देशों के साथ मिलकर एक संयुक्त जांच समिति बनाने का प्रस्ताव भी रखा है जो हाल ही में हुए हमलों की विस्तृत जांच कर सके। उनका कहना है कि इससे स्पष्ट हो सकेगा कि किन-किन ठिकानों को निशाना बनाया गया और इसके पीछे कौन जिम्मेदार है। अराची ने यह भी बात जोर देकर कही कि ईरान की सैनिक कार्रवाई केवलक्षेत्र में मौजूद अमेरिकी ठिकानों और हितों तक सीमित रही है।
उन्होंने इस आरोप को भी खारिज किया है कि ईरान ने पड़ोसी देशों के नागरिक इलाकों को निशाना बनाया है। उनके मुताबिक कुछ अरब देशों में नागरिक ठिकानों पर हुए हमलों के पीछे इजराइल का हाथ हो सकता है। जिसका मकसद सिर्फ ईरान और अरब देशों के बीच रिश्तों में दरार पैदा करना है। उन्होंने एक और बड़ा आरोप लगाते हुए कहा कि अमेरिका ने ईरान के शाहिद ड्रोन की तर्ज पर लुकास नाम का यह ड्रोन तैयार किया है।
जिसका इस्तेमाल अरब देशों में हमलों के लिए किया गया है। साथ ही साथ अरागची ने चेतावनी दीहै कि अगर ईरान के ऊर्जा केंद्रों या फिर तेल सुविधाओं को निशाना बनाया गया तो तेहरान इसका कड़ा जवाब देगा और क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी कंपनियों के ठिकानों को भी निशाना बनाया जा सकता है।
ईरान के इन बयानों ने पहले से ही तनावपूर्ण माहौल को और ज्यादा गंभीर बना दिया है। अगर रूस और चीन का नाम इस युद्ध में खुलकर सामने आता है तो यह टकराव पश्चिम एशिया की सीमाओं से निकलकर वैश्विक शक्ति संघर्ष का रूप ले सकता है। इसलिए अब पूरी दुनिया की नजर इस जंग पर टिकी हुई है कि आगे हालात किस दिशा में जाते हैं।
