कौन थे अरुण खेत्रपाल?90इक्कीस की “असली कहानी” रुला देगी।

बॉलीवुड के दिग्गज दिवंगत एक्टर धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म 211 जनवरी को सिनेमाघरों में रिलीज हो रही है। इस फिल्म से अमिताभ बच्चन के नाती अगस्त्या नंदा भी अपना बिग स्क्रीन डेब्यू कर रहे हैं। कुछ दिन पहले मुंबई में फिल्म की स्पेशल स्क्रीनिंग रखी गई जिसमें बॉलीवुड की तमाम बड़ी हस्तियां पहुंची।

सलमान खान से लेकर सनी बॉबी और कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा भी इस दौरान इमोशनल होते हुए नजर आए क्योंकि यह फिल्म एक्टर धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म थी। इसके अलावा इसकी असली कहानी भी बहुत दिलचस्प है। चलिए आपको 21 फिल्म की असली कहानी के बारे में बताते हैं।

1971 के भारत-पाकिस्तान में 16 दिसंबर का दिन भारत के लिए गर्व का दिन है। इसी दिन पाकिस्तानी सेना ने भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण किया था। इस युद्ध में भारतीय सैनिकों ने अपने साहस, पराक्रम और बलिदान से दुश्मन को हराया था। जब भी इस की बात होती है, बसंतर की भीषण लड़ाई का जिक्र जरूर किया जाता है। यह लड़ाई भारतीय सेना के इतिहास की सबसे मुश्किल और भयंकर टैंक लड़ाइयों में से एक मानी जाती है। इसी युद्ध में सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण क्षेत्रपाल ने अपनीबहादुरी से का रुख बदल दिया और देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। अरुण क्षेत्रपाल का जन्म 14 अक्टूबर 1950 को महाराष्ट्र के पुणे में हुआ था। उनका परिवार मूल रूप से पाकिस्तान के सरगोधा इलाके से था।

लेकिन देश के बंटवारे के बाद उनका परिवार भारत आ गया। अरुण का परिवार पीढ़ियों से सेना से जुड़ा हुआ था। उनके परदादा सिख खालसा सेना में थे और उनके दादा ने पहले विश्व युद्ध में हिस्सा लिया था। उनके पिता ब्रिगेडियर एमएल खेत्रपाल भी भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारी थे और उन्होंने दूसरे विश्व युद्ध और 1965 के भारतपाक युद्ध में हिस्सा लिया था। ऐसे माहौल में पले पड़े अरुण के मन में बचपन से ही देश सेवा की भावना थी।

अरुण क्षेत्रपाल पढ़ाई में बहुत तेज थे। उनके पिता चाहते थे कि वह आईआईटी से इंजीनियर बने लेकिन अरुण का सपना कुछ और था। वह सेना में जाकर देश की रक्षा करना चाहते थे। उन्होंने लॉरेंस स्कूल सनावर से पढ़ाई की और फिर एनडीए की परीक्षा पास कर नेशनल डिफेंस एकेडमी में दाखिला लिया। इसके बाद उन्होंने इंडियन मिलिट्री एकेडमी से ट्रेनिंग ली। 13 जून 1971 को अरुण खेत्रपाल को पूना हॉर्स रेजीमेंट में सेकंड लेफ्टिनेंट के रूप में कमीशन मिला।

सेना की वर्दी पहनकर देश सेवा का उनका सपना पूरा हुआ। लेकिन उन्हें नहीं पता था कि जल्द ही उन्हें युद्ध के मैदान में उतरना पड़ेगा।

सेना में नौकरी शुरू किए हुए अरुण को केवल 6 महीने हुए थे कि 3 दिसंबर 1971 को भारत-पाकिस्तान युद्ध शुरू हो गया। उस वक्त अहमदनगर में यंग ऑफिसर्स कोर्स कर रहे थे। कोर्स छोड़कर वह सीधे शकरगढ़ सेक्टर पहुंचे। जहां बसंतर नदी के पास भयंकर लड़ाई चल रही थी।

यह इलाका नदियों, नालों और से भरा हुआ था। जिससे टैंकों का चलना बेहद मुश्किल था। 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी सेना ने अमेरिका पैटर्न टैंकों के साथ जोरदार हमला किया। भारतीय सेना के पास पुराने सेंचुरियन टैंक थे और संख्या भी काफी कम थी। फिर भी भारतीय जवान डटे रहे थे।

लड़ाई के दौरान अरुण खेद्रपाल ने अपनी टुकड़ी के साथ आगे बढ़कर दुश्मन के कई को नष्ट कर दिया। उनके पर लगा और वह घायल हो गए। लेकिन उन्होंने पीछे हटने से इंकार कर दिया। कमांडर के आदेश के बावजूद उन्होंने कहा कि जब तक उनका टैंक चल रहा है वो लड़ते रहेंगे। आमने-सामने की लड़ाई में उन्होंने एक और पाकिस्तानी टैंक को नष्ट किया लेकिन दुश्मन के दूसरे को उनके में लग गई और वो चल बसे।

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