होर्मुज से हारे ट्रंप, IRGCका खेल।

अमेरिका और ईरान की के हालात क्या हैं? अगर आप इसे ट्रंप के बयानों से समझने की कोशिश करेंगे तो दिमाग घूम जाएगा। ट्रंप एक ही दिन में सारे मूड स्विंग्स दिखा देते हैं। सुबह उठकर सोशल पर पोस्ट करते हैं कि बस खत्म ही समझिए। शांति आने को है। चाय खत्म होते-होते उनका मूड बदल जाता है और कहने लगते हैं अभी और मारेंगे।

ईरान को तो नक्शे से मिटा देंगे। दोपहर में खबर आती है कि बातचीत शानदार चल रही है और शाम को जब कोई रिपोर्टर पूछ ले तो कह देते हैं बातचीत वहां कोई बातचीत के लिए बचा तो हो और मुज स्ट्रेट पर तो अलग ही कंफ्यूजन चल रहा है। कभी कहते हैं कि ईरान इसे खोले नहीं तो खूब हमले करेंगे। फिर कहते हैं अंगूर खट्टे हैं और मुझ बंद रहे तो रहे हमें क्या? अब हालात यह है कि समझ नहीं आ रहा कि अमेरिका इस में आखिर चाहता क्या है? उधर ईरान कोने में बैठा मुस्कुरा रहा है। वह समझ गया है कि दुनिया की दुखती रग यानी तेल की सप्लाई अब उसके हाथ में है। वो हॉर्नस के गेट पर ताला लगाकर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को नचा सकता है। ऊपर से उसके तेल पर लगे प्रतिबंध भी अब ढीले पड़ रहे हैं। तो क्या ट्रंप के हमले ईरान के इस समुद्री ताले के आगे फीके पड़ जाएंगे?

क्या यूरोप के पसीने सिर्फ गर्मी से नहीं बल्कि ट्रंप की हॉर्मोस वाली घुड़की से छूट रहे हैं? और क्या यह जंग किसी समझौते पर रुकेगी या हॉर्मोस का यह जाम पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था का इंजन सील कर देगा? इन सारे सवालों पर आज बात करेंगे। नमस्ते और स्वागत। मैं हूं अभिषेक और यह है लल्लन टॉप का अंतरराष्ट्रीय प्रसंगों से जुड़ा रोजाना का कार्यक्रम दुनियादारी। अमेरिका इजराइल और ईरान के बीच जंग का आज 35वां दिन है। दो दिन पहले 1 अप्रैल को अपनी स्पीच में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने कहा था कि अगले दो-तीन हफ्ते वो ईरान पर बड़े हमले करेंगे। इसके बाद 2 अप्रैल को अमेरिकी मिलिट्री ने ईरान का सबसे ऊंचा B1 ब्रिज तबाह कर दिया। हमले के बाद ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर इसका वीडियो शेयर किया।

इसमें ब्रिज दो हिस्सों में टूटा नजर आ रहा है। ट्रंप ने लिखा ईरान का सबसे बड़ा ब्रिज ठहर चुका है। अब यह दोबारा इस्तेमाल नहीं हो पाएगा। आगे ऐसे और हमले होंगे। अगर ईरान ने अब डील नहीं की तो बहुत देर हो जाएगी और वहां देश कहलाने जैसा कुछ भी नहीं बचेगा। B1 ब्रिज ईरान के सबसे बड़े ब्रिज में से एक है। यह राजधानी तेहरान को कराज़ शहर से जोड़ता है। जिससे वहां ट्रैफिक डायवर्ट करने में काफी मदद मिलती है।

1000 मीटर लंबा और 132 मीटर ऊंचा यह ब्रिज ईरान के सबसे मॉडर्न इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट में से एक है। साथ ही देश के उत्तरी इलाकों से कनेक्टिविटी भी यह ब्रिज बेहतर बनाता है। ईरान के स्टेट मीडिया के मुताबिक इस हमले में आठ लोगों की हुई। लगभग 100 लोग घायल हैं। हमले के बाद से ईरान पलटवार की प्लानिंग कर रहा है और निशाने पर एक बार फिर होंगे खाड़ी देश। ईरानी सेना आईआरजीसी से जुड़ी फर्स न्यूज़ एजेंसी ने बताया कि ईरान गल्फ में ऐसे ही सात आठ ब्रिज ढूंढ रहा है जिस पर अब वो हमला कर सके। लिस्ट में है कुवैत का शेख जाबेर अल अहमद अल सवा सी ब्रिज। सऊदी अरब और बहरीन को जोड़ने वाला किंग फहद कॉजवे। यूएई में मौजूद शेख जायद और शेख खलीफा ब्रिज, इजराइल और जॉर्डन के बीच मौजूद किंग हुसैन और दामिया ब्रिज और आखिरी है जॉर्डन का ही अबदांब ब्रिज। ईरान यह हमले कब प्लान कर सकता है इसकी जानकारी अभी सामने नहीं आई है।

इसके अलावा 3 अप्रैल को ईरान ने अमेरिका के F35 फाइटर जेट को गिराने का बड़ा दावा किया। रटस ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने सेंट्रल ईरान में एक F35 जेट मार गिराने की बात कही है। उन्होंने आशंका जताई है कि हमले में पायलट भी मारा गया है। हालांकि अमेरिका ने इस तरह की खबरों को खारिज करा है। वहां के सेंट्रल कमान ने कहा है कि हमारे सारे जहाज सुरक्षित हैं। अब बात उस सककरे रास्ते की जो इस जंग में जीत के लिए तुरुप का इक्का बनता जा रहा है। यानी जिसका कब्जा इस रास्ते का होगा वही विजेता बनकर उभरेगा स्टेट ऑफ हॉर्मोस जहां से दुनिया की 20% तेल की सप्लाई होती है। जंग शुरू होने के बाद से ईरान ने इस रास्ते पर ताला मार रखा है।

2 अप्रैल को खाड़ी देश बहरीन ने इस रास्ते को खोलने के लिए यूएन सिक्योरिटी काउंसिल में एक प्रस्ताव पेश किया। कई हफ्तों की मीटिंग के बाद फाइनल हुए इस प्रस्ताव के ड्राफ्ट में एक ऐसा क्लॉज़ है जिस पर ईरान की बाहें चढ़ गई हैं। लिखा है यूएससी हॉर्मोस को खोलने के लिए मिलिट्री एक्शन की इजाजत देता है। हॉर्मोस के बंद होने से जिन देशों पर असर पड़ रहा है उनकी नेवी अकेले या एक साथ मिलकर ईरान के खिलाफ कोई ऑपरेशन चला सकती है। वो स्टेट खोलने के लिए पूरा दमखम लगा सकते हैं। बस यूएससी को पहले नोटिस देना होगा। प्रस्ताव पर 3 अप्रैल यानी आज वोटिंग होनी थी। लेकिन इससे पहले यूएसए के परमानेंट मेंबर्स रशिया, चीन और फ्रांस ने इसका विरोध किया। उन्होंने कहा कि वो ऐसे किसी भी कदम को एक्सेप्ट नहीं करेंगे जिसमें ताकत के इस्तेमाल की बात हो। परमानेंट सदस्य होने के नाते रशिया, चीन और फ्रांस के पास यह हक भी है कि वो इस रेोल्यूशन पर वीटो कर सकें। लेकिन इसकी नौबत आती इससे पहले ही प्रस्ताव पर वोटिंग पोस्टपोन हो गई। 3 अप्रैल को फ्राइडे है। यूएन में गुड फ्राइडे मनाया जा रहा है। लिहाजा सब छुट्टी पर है।

वोटिंग को एक दिन के लिए टाल दिया गया। दूसरी तरफ न्यूयॉर्क में यूएससी के ऑफिस में भले ही मीटिंग नहीं हो पाई लेकिन 2 अप्रैल को स्टेट ऑफ हॉर्मोस पर एक मीटिंग ब्रिटेन ने करवाई। लगभग 40 देशों के विदेश मंत्री अपने-अपने लैपटॉप के जरिए मीटिंग में जुड़े हॉर्मोस को खोलने के लिए एक जॉइंट एक्शन प्लान पर चर्चा की। ब्रिटेन के विदेश मंत्री यवेट कूपर ने स्टेट को ब्लॉक करने की ईरान के फैसले को लापरवाही बताया। कहा कि इसका असर दुनिया के हर कोने में घरों और कारोबारों पर पड़ सकता है। यूरोपीय अधिकारियों ने बताया कि मीटिंग में मोटा-मोटी तीन बातों पर चर्चा हुई। पहली, कौन-कौन से देश स्टेट को खोलने के लिए बन रहे गठबंधन में शामिल होने के लिए तैयार हैं। दूसरी, ईरान पर दबाव कैसे बनाया जाए ताकि वह हॉर्मोस को खोल दें और तीसरी, हॉर्मोन्स को खोलने के लिए कौन से मिलिट्री एसेट्स इस्तेमाल किए जा सकते हैं? हवा और समुद्री रास्ते के साथ-साथ इंटेलिजेंस के जरिए तालमेल कैसे बैठाया जाएगा। इस बैठक में भारत भी शामिल हुआ। मीटिंग में विदेश सचिव विक्रम मिस्त्री ने कहा कि भारत इकलौता ऐसा देश है जिसने जंग के बीच जहाजों पर हमले में अपने तीन मैनर्स यानी नाविकों को खोया है। ऑलमोस्ट बंद होने से भारत की एनर्जी सिक्योरिटी पर भी असर पड़ रहा है। उन्होंने अमेरिका और ईरान के बीच मसले को कूटनीति के जरिए सुलझाने की बात दोहराई।

अब अगले हफ्ते ब्रिटेन मिलिट्री प्लानर्स की एक मीटिंग रखेगा जिसमें आगे के प्लान पर चर्चा होगी। हॉलमोज बंद होने से सबसे ज्यादा त्रस्त यूरोपीय देश मीटिंग कर रहे हैं। यह तो समझ आता है, लेकिन यह मीटिंग अब अचानक से क्यों हो रही है, यह थोड़ा कंफ्यूज करता है। अभी कुछ दिन पहले ही ट्रंप ने नेटो और बाकी देशों से हॉर्मूस खोलने के लिए मदद मांगी थी। उनसे अपने वॉरशिप भेजने के लिए भी कहा था। तब तो लगभग सारे यूरोपीय देशों ने हाथ पीछे खींच लिए थे। कह दिया था कि आग आपने लगाई है तो अब आप ही बुझाओ। इसके बाद ट्रंप ने भी हाथ बांध लिए। कह दिया कि हमें हॉर्मोस की जरूरत ही नहीं है। जिसे है वह खुद जाकर तेल ले, खुद रास्ता खुलवाए।

लेकिन यह तो सिर्फ सामने हुई बयानबाजियां हैं। पर्दे के पीछे की कहानी अलग है। फाइनेंसियल टाइम्स की रिपोर्ट कहती है कि जब यूरोपीय देशों ने ट्रंप को मदद करने से मना कर दिया तब उन्होंने एक धमकी दी। कहा कि अगर हॉर्मोस खोलने में मदद नहीं की तो वह यूक्रेन को हथियार देना बंद कर देंगे। इसके बाद नेटो चीफ मार्क रिटेन ने फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देशों के साथ एक बैठक की। एक जॉइंट स्टेटमेंट निकाला कि हम हॉर्मोस को खोलने के लिए जरूरी कदम उठाने के लिए तैयार हैं। इन सबसे बात तो साफ है। अमेरिका के लिए जंग खींचने की बड़ी वजह है हॉर्मोस स्टेट का बंद रहना और इस इंटरनेशनल वाटर वे पर ईरान का कंट्रोल। अब अमेरिका के खिलाफ ईरान का सबसे बड़ा हथियार भी यही है। यह वही रास्ता है जहां से कभी रोज 100 से ज्यादा जहाज गुजरा करते थे। लेकिन अब हाल ये है कि हवा से थपड़े खा रहे समुद्र तट के बाई तरफ हॉर्मोस स्टेट के मुहाने पर शितज तक ऑयल टैंकर, कंटेनरशिप और बल्क कैरियर कतार में खड़े चमक रहे हैं। ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से यह सभी फारस की खाड़ी में फंसे हुए हैं। मुश्किल से कुछ एकाध जहाज ही हॉर्मोस पार कर पाए हैं। वह भी ईरान के समुद्री क्षेत्र से घूमकर लंबा रास्ता लेते हैं और अक्सर ईरानी सरकार को भारी फीस भी चुकाते हैं। लेकिन ईरान ने इस रास्ते पर अपनी पकड़ और मजबूत करने के लिए पूरी तैयारी कर रखी है। ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति एक नया कानून आगे बढ़ा चुकी है। इसके तहत होमस से गुजरने वाले जहाजों से टैक्स वसूला जाएगा। जिन देशों के ईरान से दोस्ताना रिश्ते नहीं है उनके जहाजों को फारस की खाड़ी में आगे से रोका भी जा सकता है। इस दबाव के जरिए ईरान चाहता है कि यूरोप, जापान और दूसरे देश उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंध हटा दें। साथ ही अमेरिकी नौसेना को खाड़ी से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाए। ईरानी अधिकारी स्टोल सिस्टम की तुलना स्वेज कैनाल से करते हैं जिससे मिस्र हर साल अरबों डॉलर कमाता है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानून कुछ और कहते हैं। असल में हॉर्मोस एक नेचुरल वाटर बॉडी है। यह किसी देश के क्षेत्र से गुजरने वाली इंसानों की बनाई हुई नहर नहीं है। इसका सिर्फ एक किनारा ईरान के पास है। जबकि दूसरी तरफ ओमान का क्षेत्र है। ऐसे में ईरान अकेले हॉर्मोन से गुजरने वाले जहाजों को कंट्रोल नहीं कर सकता। दूसरी तरफ ट्रंप भी मिक्स्ड सिग्नल देने में लगे हुए हैं। पहले कहते हैं कि हॉर्मोस को खोले बिना जंग कभी खत्म नहीं होगी। फिर कहते हैं कि अमेरिका का इससे कोई मतलब नहीं जैसे इस रास्ते की जरूरत हो जाए मेहनत करें। इन सबके बीच उन्होंने मिडिल ईस्ट में हजारों मरीन और सैनिक भी भेज दिए जिनका इस्तेमाल जमीन पर ऑपरेशन के लिए किया जा सकता है। अगर युद्ध जल्द खत्म हो गया और इसके बाद भी हॉर्मोस पर ईरान का कंट्रोल रहा तो यह अमेरिका और उसके साथियों के लिए बड़ा जियोपॉलिटिकल झटका होगा। अगर अमेरिका और ईरान के बीच कोई डील हो भी गई तो इस बात की संभावना कम ही लगती है कि ईरान हॉर्मोस पर किसी भी तरह अपनी पकड़ ढीली होने देगा। तो ऐसे में क्या हॉर्मोस पर कंट्रोल ही जंग में हारजीत तय करने वाला फैक्टर होगा? समझने के लिए चलते हैं एक्सपर्ट के पास। अभी लेकिन जिससे यूरोप के देश और पूरी दुनिया के देश जिससे सबसे बड़ी दिक्कत हो रही है वो है स्टेट ऑफ हार्मोस का बंद होना। और यूरोप के देश क्योंकि वो नाटो के साथी हैं। ट्रांस अटलांटिक बड़ी पार्टनरशिप उनकी है।

लेकिन अब उनका ये मानना है कि आपने हमसे बिना सलाह किए ये जंग शुरू की। अब उसके बाद जब अमेरिका की सबसे जो है पावरफुल नेवी अगर उसको नहीं खुलवा सकती है तो कोई दो चार 10 जहाज जो है अगर यूरोप से भी आ जाएंगे तो उससे कोई बहुत फर्क नहीं पड़ेगा। लेकिन अब वो ट्रंप साहब उनको बार-बार कह रहे हैं कि आप उसको खुलवाइए। अगर आपको तेल चाहिए हमें तो चाहिए है नहीं उसका तो उनमें क्योंकि अब क्योंकि लंबा खच गया है ये जंग तो उनको डायरेक्ट तौर से पहले थोड़ा कम उनको दिक्कतें आ रही थी क्योंकि वो तेल वहां से एशिया को ज्यादा जाता है तो यूरोप को नहीं लेकिन अभी क्योंकि कुछ पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स भी वहां पे जाते हैं और लंबा होने के बाद क्योंकि तेल के दाम बढ़ गए हैं तो उसका असर उनको क्योंकि यूरोपीय संघ की भी लगभग 50% से ज्यादा जो है वो ऊर्जा के साधन बाहर से आते हैं तो उनको अब ये दिक्कतें आनी शुरू हो गई है। लेकिन यूरोप के देश ये चाहते हैं जैसे आपने कहा कि वो यूके ने भी एक मीटिंग किया जिसमें 40 45 लोगों और उससे ज्यादा देशों ने भाग लिया। भारत के विदेश सचिव ने भी उसके अंदर भाग लिया था। तो उसमें ये है कि उनका ये मानना है कि अभी ये शुरुआत की बातें हैं। एक तो वो ये चाहते हैं कि ये पहले वहां पे कोई सीज फायर हो जाए तो वो उसके बाद ही कुछ बात कर पाएंगे। दूसरी बात वो कोई लीगल बैकिंग चाहते हैं। इसीलिए वो संयुक्त राष्ट्र संघ के सुरक्षा परिषद में भी आज इसके बारे में बातचीत होगी। लेकिन वहां पर क्या उसका नतीजा निकलेगा वो कहना मुश्किल है क्योंकि उसके अंदर रूस और चीन भी रहेंगे और उसमें भी फ्रांस और यूके के मत भी थोड़े अलग रहते हैं। क्योंकि फ्रांस का ये मानना है कि ये बात तो ठीक है कि स्ट्रेटो हार्मोस को खुलना चाहिए।

लेकिन यह जोर जबरदस्ती से वहां पर खुलवाना कोई संभव नहीं है। वह कोई फिजिएबल नहीं है। तो इस तरह की जो बातें हो रही है अब यूरोप और उसके अंदर काफी दरार तो आ गई है उन दोनों के जो संबंधों में और हर रोज वो संबंध जो है वो बिगड़ते ही जा रहे हैं दोनों तरफ से लेकिन अब बाहर की जो दुनिया है अब उनका उन्होंने तो जंग शुरू नहीं की लेकिन सबका उसका जो खामियाजा है वो भुगतना पड़ रहा है। भारत को भी पड़ना पड़ रहा है। यूरोप को भी पड़ रहा है। क्योंकि उसके तेल के दाम सबसे बड़ी चीज है और अब तो क्योंकि अमेरिका के अंदर भी तेल के दाम बढ़ गए हैं तो वहां के अंदर भी उथलपुथल मची हुई है। तो ये एक सारा जो जिस तरीके से ये युद्ध इजराइल और अमेरिका ने शुरू किया था वो अब एक नए तरह से आगे बढ़ रहा है जिसके अंदर बहुत नुकसान भी हो रहा है देशों का और पूरे खाड़ी के युद्ध उसके अंदर चपेट में आ गए हैं और पूरी दुनिया को उसके अंदर उसने दिक्कतों में ला दिया और खुद उसको निकलना भी चाहते हैं लेकिन निकल भी नहीं पा रहे हैं और दूसरों के ऊपर वो दोष दिए जा रहे हैं। इसीलिए यूरोप के देश उससे परेशान है। पहली सुर्खी 5 साल पहले तख्ता पलट करने वाले म्यांमार के पूर्व आर्मी चीफ मिन आंगाइंग अब वहां के राष्ट्रपति बन गए हैं। 3 अप्रैल को म्यांमार की पार्लियामेंट ने राष्ट्रपति के तौर पर उनके नाम पर मोहर लगाई। चार दिन पहले ही उन्होंने आर्मी चीफ के पद से इस्तीफा दिया था। अब उनके रूल को एक लेजिटसी मिल गई है। अभी तक वो हुंटा चीफ के रूप में म्यांमार का शासन चला रहे थे। हुंटा उस मिलिट्री ग्रुप को कहते हैं जो चुनी हुई सरकार को गिराकर सत्ता हथियार लेते हैं या हथियाने का प्रयास करते हैं। याद दिला दें कि म्यांमार में 2021 में मिनंगाइंग के नेतृत्व में ही सेना ने तख्ता पलट किया था।

तत्कालीन राष्ट्रपति आंग सांगसूकी सरकार को गिरा दिया गया था और उन्हें गिरफ्तार भी कर लिया गया था। तब से ही वहां पर सिविल वॉर के हालात चल रहे हैं। इस बीच बीते दिसंबर जनवरी में देश में चुनाव कराए गए। लेकिन इन चुनावों को मात्र एक दिखावा माना गया क्योंकि इसमें ना तो कोई प्रभावी पक्ष था ना ही लोगों के पास डेमोक्रेटिक राइट्स। चुनाव के दौरान वोटिंग प्रोसेस पर सवाल उठने पर उठाने पर लोगों को सजा भी दी गई। यूएन समेत यूरोपीय देशों और ह्यूमन राइट्स ऑ्गेनाइजेशन ने भी इन चुनावों पर सवाल उठाए थे। कहा था कि यह केवल मिलिट्री रूलिंग को लेजिटसी देने की कोशिश भर है। चुनाव नतीजों में सेना समर्थित यूनियन सॉलिडेटरी एंड डेवलपमेंट पार्टी ने एक तरफा जीत हासिल की।

इसके बाद से ही मिनंग के राष्ट्रपति बनने का रास्ता साफ हो गया था। न्यूज़ एजेंसी राइटर्स के मुताबिक मीनांग हन की लंबे समय से राष्ट्रपति बनने की चाहत थी। उनका यह सपना अब जाकर पूरा हो रहा है। इस बारे में जानकारों का कहना है कि मेनांग का सेना की कमान छोड़कर राष्ट्रपति बनना एक सोची समझी स्ट्रेटजी है। इसके जरिए वो दिखाना चाहते हैं कि वह चुनकर आए हुए लीडर हैं। इसलिए दुनिया उन्हें एक वैलिड लीडर माने। साथ ही सत्ता पर भी अपनी वो मजबूत पकड़ चाहते हैं और सेना के ऑफिसर्स के हितों को भी सुरक्षित रखना चाहते हैं। यहां बात हो रही है तो यह भी जानते हुए आगे बढ़ना चाहिए कि म्यांमार के 60 साल के इतिहास में यह करीब 50 साल देश में सेना का ही शासन रहा है। अगली खबर पाकिस्तान से जहां एक बार फिर हमला हुआ है। पाकिस्तान के खैबर पख्तून खान प्रांत में बन्नू जिले में 2 अप्रैल की रात एक सुसाइड बॉम्बिंग अटैक हुआ। हमले में तीन महिलाएं और एक बच्चे समेत पांच लोगों की मौत हो गई। वहीं पांच पुलिस अधिकारी और कुछ आम लोग भी घायल हैं। उनका इलाज चल रहा है। लोकल पुलिस ने टर्किश मीडिया टीआरटी वर्ल्ड को बताया कि एक हमलावर तेज स्पीड में कार लेकर एक थाने की तरफ बढ़ रहा था। उसे रोकने के लिए की गई।

तभी कार में ब्लास्ट हो गया। पुलिस के मुताबिक इतना तेज था कि आसपास का पूरा इलाका दहल गया। धमाके की आवाज दूर तक गूंजी। इससे लोगों के बीच दहशत फैली। पुलिस का कहना है कि आतंकियों का मेन टारगेट वो थाना ही था जिसकी तरफ कार बढ़ रही थी। इस से आसपास के तमाम घरों को भी नुकसान पहुंचा है। हमले की जांच जारी है। अब तक किसी भी आतंकी संगठन ने इसकी जिम्मेदारी नहीं ली है। आज का दुनियादारी यहीं समाप्त होता है।

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