हरीश राणा की बीमारी का कारण क्या है और कैसे होती है ये?

डीएसपी हरीश राणा इन्हें 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने इच्छा मृत्यु की इजाजत दे दी। हरीश पिछले 13 सालों से वेजिटेटिव स्टेट में हैं। यानी वह जिंदा तो हैं लेकिन उन्हें पता नहीं कि उनके आसपास क्या चल रहा है। अब तक वह सिर्फ मशीन और दवाइयों के सहारे जिंदा है। हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए थे। इसके बाद उनका काफी इलाज कराया गया। लेकिन सेहत में कोई सुधार नहीं हुआ। ना ही आगे सुधार की उम्मीद थी। बेटे को इस हालत में देख परिवार ने उनके लिए इच्छा मांगी। सुप्रीम कोर्ट में कई मेडिकल रिपोर्ट्स पेश हुई। जिसके बाद जस्टिस जेवी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने 32 साल के हरीश को इच्छा की इजाजत दे दी। देश में इच्छा मृत्यु का यह पहला केस है जिसे मंजूरी मिली है। हरीश को इच्छा मृत्यु के लिए 13 मार्च को दिल्ली एम्स में शिफ्ट किया गया है। उन्हें धीरे-धीरे लाइफ सपोर्ट सिस्टम से अलग किया जा रहा है। वेजिटेटिव स्टेट में रहने के अलावा हरीश को क्वाड्रिप्लेजिया नाम की एक गंभीर कंडीशन भी थी।

हरीश की बीमारी पर ही बात करेंगे। डॉक्टर से जानेंगे कि क्या है? यह क्यों होता है? इसका शरीर पर क्या असर पड़ता है? और में फर्क क्या है? और क्या का इलाज मुमकिन है? सुनिए। देखिए है जब शरीर के जो चारों अंग दोनों हाथ पांव यदि काम नहीं कर रहे हैं दोनों बाजुएं और दोनों टांगे यदि काम नहीं कर रही हैं तो चारों अंग के ना काम करने को ही कहा जाता है। आजकल एक सिचुएशन है जो हम काफी कॉमन देख रहे हैं क्योंकि हाई स्पीड व्हीकल के एक्सीडेंट होते हैं। गर्दन पे चोट लगती है। और जैसा आप देखेंगे गर्दन में जो हमारे स्पाइनल कॉर्ड है जो दिमाग से सारी नसें हाथों और पांव को चलाने की हमारे गर्दन के थ्रू शरीर के अंगों में जा रही हैं। तो स्पाइनल कॉर्ड में जब गर्दन में चोट लगती है तो चारों जो हमारी एक्सटमिटीज हैं दोनों बाजुओं दोनों टांगों की सारी चलाने की शक्ति वाली नसें उसमें खत्म हो जाती हैं। तो गर्दन की चोट में जिसको सर्वाइकल स्पाइनल कॉर्ड इंजरी कहते हैं उसमें कॉड्रिप्लीजिया देखा जाता है। सो एक तो हमने बताया हाई स्पीड मोटर व्हीकल एक्सीडेंट ऊंचाई से गिरना।

तो ये सारे चोट लगने के कारण है। चोट के अलावा स्पाइनल कॉर्ड के अंदर हो सकता है। स्पाइनल कॉर्ड के अंदर अगर नसों का गुच्छा है तो उसमें के कारण भी हो सकता है। यदि स्पाइनल कॉर्ड के एरिया में हैवी डोज़ की दी गई हो तो के साइड इफेक्ट से भी रेयरली यह हो सकता है। पर मेन जो मुख्य कारण है वह चोट लगना किसी भी प्रकार की इसके अंदर होना या इसके अंदर होना। कई नसों की बीमारियां होती हैं। जैसे मल्टीपल हो गया या हो गया। ऐसी नसों की, सूजन की और इंफेक्शन की बीमारियां भी होती हैं जिसमें बाजू और टांगे की नसे बेकार हो जाती हैं और मरीज हो जाता है। तो देखो जो मेन असर है कि पेशेंट चल नहीं सकते। अपनी एक्टिविटीज नहीं कर सकते हैं क्योंकि दोनों बाजुएं और दोनों टांगे बेकार हैं।

इसके अलावा उनकी हाथ बाजुओं और टांगों की सेंसेशन भी आमतौर पे खत्म हो जाती है और अगर कोई चोट लगी लग जाए तो उसको उनको पेशेंट को एहसास भी नहीं होता है। तो जरूरी बात है ऐसे पेशेंट की केयर में हम बहुत इस बारे में अटेंशन पे करते हैं कि कोई नुकीली चीज या कोई ऐसी चीज उनको चोट पहुंचाने वाली उनके पास में ना रखी हो। क्योंकि उनको ऐसी चीज के चुभने या उसके शरीर पर लगने का दर्द भी महसूस नहीं होगा।

आमतौर पे क्वाड्रप्लीजिया में का और इवन पखाने का स्टूल पास करने का भी जो सेंसेशन है वो खत्म हो जाता है और पेशेंट इनकॉन्टिनेंट हो जाते हैं। आमतौर पे अपने आप निकलता रहता है। मोशन अपने आप निकलता रहता है। तो ऐसे पेशेंट्स को केयर चाहिए होती है कि यूरिन के रास्ते में ट्यूब डाली जाए और मोशन यदि पास हो रहा है तो वहां पे या तो डायपर लगाया जाए या वहां पे पीरियडिकली उस एरिया को क्लीन किया जाए। इसके अलावा जो बहुत जरूरी केयर होती है ऐसे पेशेंट्स की कि इनको दो-द घंटे में टर्न करना होता है क्योंकि अदरवाइज ऐसे पेशेंट्स को बेड सोर बन जाते हैं। का मतलब है केवल दोनों टांगे बेकार हैं। दोनों बाजू काम कर रहे हैं। इसको कहा जाता है पैराप्लीजिया। पैराप्लीजिया कब होता है? तो आप समझ सकते हैं बहुत सिंपल सी बात है। यदि रीड की हड्डी की चोट गर्दन पे लगे तो बाजुए या टांगे सारों की नसें अफेक्ट हो जाती है। खराब हो जाती है। बट वही स्पाइनल कॉर्ड की चोट अगर धड़ में या थोरेसिक रीजन में लगे तो केवल टांगों की नसें उसमें अफेक्ट होती है और पेशेंट को होता है। सो जिस तरह के कारण हमने के लिए बताए लगभग उसी तरह के कारण पैराप्लीजिया के लिए भी सही है। सच है। अब पैराप्लीजिया और कॉड्रप्लीजिया वाले पेशेंट्स की केयर में उनकी नीट क्लीनलीनेस हाइजीन मेंटेन करना उनको अच्छे अमाउंट में प्रोटीन देना उनको फिजियोथरेपी करना ये सब जनरल केयर है। उनके के रास्ते में आमतौर पे पाइप डालनी पड़ती है।

उनका मोशन पास हो जाता है तो उसको क्लीन रखना पड़ता है। हाइजीन और पेशेंट को दो-द घंटे में टर्न करना। यह तो जनरल सपोर्टिव केयर है। बट जो मेन बात है जिस वजह से पेशेंट को कॉड्रिप्लीजिया या पैराप्लीजिया हुआ है उस चीज का इलाज बहुत जरूरी है। कई केसेस में स्पाइनल कॉर्ड इंजरी के बाद ऑपरेशन से जो नस पे आघात पहुंच रहा है उसमें कुछ रिकवरी के भी चांसेस होते हैं। पर जो स्पाइनल कॉर्ड इंजरी खराब वाली होती है। कई बार उसमें अगर हम हड्डी को जोड़ दें तब भी जो नस की चोट है लगी अंदर उसके कारण कई बार इंप्रूवमेंट नहीं होती।

अगर बहुत खराब चोट होती है तो फर्स्ट चीज है अगर स्पाइल कॉर्ड इंजरी है और उसमें रीड की हड्डी अनस्टेबल है क्योंकि हड्डियां दो अलग-अलग पड़ी हैं तो उनको जोड़ने का ऑपरेशन करना बहुत जरूरी है क्योंकि अदरवाइज हम पेशेंट को बिठा नहीं पाएंगे या खड़ा नहीं करा पाएंगे या प्रॉपर उनकी फिजियोथरेपी नहीं हो पाएगी। दूसरा है अगर चोट का केस नहीं है, कोई ट्यूमर है या कोई इनफेक्शन है या कोई ब्लीडिंग है तो उसका प्रॉपर इलाज दवाई से या ऑपरेशन से किया जाना चाहिए जिससे कि स्पाइनल कॉर्ड में हम रिकवरी का मैक्सिमम चांस दें। क्वाड्रिप्लेजिया का इलाज पूरी तरह मुमकिन है या नहीं। यह इस बात पर निर्भर करता है कि स्पाइनल कॉर्ड में चोट कितनी गंभीर है और नसों को कितना नुकसान पहुंचा है।

अगर स्पाइनल कॉर्ड की चोट हल्की है तो सही इलाज से कुछ हद तक सुधार हो सकता है। लेकिन अगर स्पाइनल कॉर्ड हमेशा के लिए डैमेज हो जाए तो मरीज का ठीक होना मुश्किल हो जाता है। अब बढ़ते हैं सेहत के अगले सेगमेंट की तरफ। तन की बात। हमारे देश में ज्यादातर वैक्सीन बचपन में ही लग जाती है। लेकिन बड़े होने के बाद भी कुछ वैक्सीन लगवाना जरूरी है। यह वैक्सीन कई गंभीर वायरस और बीमारियों से बचाती है। इन्हें लगाने से लंबे वक्त तक सुरक्षा मिलती है। कौन सी तीन वैक्सीन एडल्ट्स को जरूर लगवानी चाहिए और क्यों? यह हमने पूछा रिजेंसी हेल्थ लखनऊ में इंटरनल मेडिसिन डिपार्टमेंट की कंसलटेंट डॉक्टर आकांक्षा गुप्ता से। डॉक्टर आकांक्षा कहती हैं कि पहली वैक्सीन है फ्लू की। फ्लू एक वायरल इंफेक्शन है। यह इन्फ्लुएंजा वायरस की वजह से होता है। फ्लू की वैक्सीन हर साल लगवानी चाहिए। यह वैक्सीन शरीर में एंटीबॉडीज बनाने में मदद करती हैं। करीब दो हफ्ते में शरीर में एंटीबॉडीज बनना शुरू हो जाती हैं। ये एंटीबॉडीज आपको फ्लू से बचाती हैं।

फ्लू की वैक्सीन 70 से 90% तक असरदार होती है। यानी वैक्सीन लगने के बाद आपको गंभीर फ्लू नहीं होगा। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि फ्लू बिल्कुल ही नहीं होगा। बस वैक्सीन से फ्लू होने का चांस घट जाता है। अगर फ्लू होता भी है तो लक्षण गंभीर नहीं होते। जिन लोगों को बार-बार फ्लू हो जाता है जिनकी इम्यूनिटी कमजोर है और जो बुजुर्ग हैं उन्हें हर साल शॉट लेना चाहिए।

दूसरी है की। की एक बीमारी है। इसमें लिवर में सूजन आ जाती है। जब लिवर की सूजन किसी खास वायरस की वजह से होती है तो इसे वायरल हेपेटाइटिस कहते हैं। बी वायरल हेपेटाइटिस का ही प्रकार है। बिना लक्षणों के सालों तक शरीर में रह सकता है। यह चुपचाप लिवर को नुकसान पहुंचाता रहता है। इसीलिए इसकी वैक्सीन लगवाना बहुत जरूरी है। खासकर उन लोगों के लिए जो हेल्थ केयर सेक्टर में है। जैसे डॉक्टर्स, नर्स, लैब टेक्नशियन और अस्पताल का स्टाफ जिन्हें है, लिवर की कोई बीमारी है, जो डायलिसिस पर हैं या फिर जिनके परिवार में किसी को उन्हें भी यह लगवानी चाहिए। की आमतौर पर तीन डोज में दी जाती है। इसमें दूसरी डोज़ पहली डोज़ लगने के 1 महीने बाद लगती है। वहीं तीसरी डोज़ 6 महीने बाद दी जाती है। तीनों डोज़ लगवाने के बाद शरीर में वायरस के खिलाफ मजबूत इम्यूनिटी बन जाती है जो कई सालों तक सुरक्षा देती है। तीसरी वैक्सीन है की। यानी वायरस। यह कई तरह के से बचाती है। जैसे महिलाओं को वहीं पुरुषों को एनल कैंसर से, से और से। 10 से 26 साल की उम्र में लगवाने की सलाह दी जाती है। वैसे तो इसे 45 साल तक लगवाया जा सकता है। हालांकि सबसे सटीक उम्र 10 से 15 साल है। जिनके परिवार में खासकर की हिस्ट्री है, उन्हें जरूर लगवानी चाहिए। इस की डोज उम्र के हिसाब से तय होती है। 9 से 14 साल के बच्चों और किशोरों को आमतौर पर दो डोज़ दी जाती है। पहली डोज़ के बाद दूसरी डोज़ 6 से 12 महीने में लगती है। वहीं 15 साल या उससे ज्यादा उम्र के लोगों के लिए आमतौर पर तीन डोज़ की सलाह दी जाती है। पहली डोज़ के बाद दूसरी डोज़ 2 महीने में और तीसरी डोज़ छ महीने में लगाई जाती है। समझे? अब बारी है सेहत के आखिरी सेगमेंट की।

खुराक यानी एक झटका सी हेल्थ टिप। जिम जाने वाले कई लोग प्रोटीन पाउडर लेते हैं। इससे मसल्स बनाने में मदद मिलती है। अब कुछ लोग एक्सरसाइज से पहले प्रोटीन पाउडर लेते हैं तो कुछ एक्सरसाइज के बाद। और यही होती है कंफ्यूजन। बॉडी बनानी हो तो प्रोटीन पाउडर कब लें? वर्कआउट से पहले या फिर वर्कआउट के बाद? यह हमने पूछा एनी टाइम फिटनेस साकेत में फिटनेस ट्रेनर मोहित मिश्रा से। फिटनेस ट्रेनर मोहित कहते हैं कि प्रोटीन पाउडर लेने का सबसे अच्छा समय पोस्ट वर्कआउट है। यानी जिम से आने के बाद एक्सरसाइज के बाद मांसपेशियों में हल्का नुकसान होता है। इसे ठीक करने के लिए प्रोटीन की जरूरत होती है। इस वक्त प्रोटीन पाउडर लेने से शरीर इसका जल्दी इस्तेमाल करता है। जिससे मांसपेशियों की रिकवरी तेज होती है और मसल ग्रोथ में मदद मिलती है। वर्कआउट के बाद शरीर को पोषक तत्वों की ज्यादा जरूरत होती है। इस वक्त प्रोटीन पाउडर लेने से मांसपेशियों को जल्दी अमीनो एसिड्स मिलते हैं जो उनकी मरम्मत और विकास में मदद करते हैं।

इससे थकान कम होती है। रिकवरी तेज होती है और धीरे-धीरे शरीर की ताकत व सहनशक्ति बढ़ती जाती है। प्रोटीन पाउडर एक्सरसाइज खत्म होने के 20 से 30 मिनट के अंदर ले लेना चाहिए। लेकिन अगर आप वर्कआउट से पहले प्रोटीन पाउडर लेना चाहते हैं तो जिम जाने के आधा पौना घंटा पहले ले लें। और यह ध्यान रखें कि बॉडी सिर्फ प्रोटीन पाउडर से नहीं बनेगी। आपकी डाइट भी हेल्दी हो। साथ ही रोज दो से 3 लीटर पानी पिए और हमेशा वही प्रोटीन पाउडर लें जो डॉक्टर या डाइटिशियन ने बताया हो।

एक्सपर्ट्स पहले देखते हैं कि आपके शरीर को प्रोटीन की कितनी जरूरत है। तभी प्रोटीन पाउडर देते हैं। प्रोटीन पाउडर के डिब्बे पर एफएसएसएआई का सर्टिफिकेट जरूर देखें। उसकी वेबसाइट पर भी जाकर चेक करें कि उसमें क्या-क्या मिला है।

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