सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार दी इच्छा मृत्यु की इजाजत।

सुप्रीम कोर्ट ने इन्हें इच्छा मृत्यु की इजाजत दे दी है। हरीश राणा पिछले करीब 13 सालों से कोमा में हैं। मशीन और दवाइयों से केवल सांसे चल रही हैं। माता-पिता कोर्ट के चक्कर काट रहे थे कि उनके बेटे को इच्छा मृत्यु दे दी जाए। कोर्ट ने तमाम कागज देखे, पढ़े, मामले को समझा और देश के इतिहास में दर्ज होने वाला एक बड़ा फैसला सुनाया।

सुप्रीम कोर्ट ने 13 साल से कोमा में पड़े हरीश राणा को इच्छा मृत्यु की इजाजत दे दी है। फैसला लेना मुश्किल था। जज भावुक हो गए। विलियम शेक्सपियर के नाटक हैमलेट का प्रसिद्ध कथन टू बी और नॉट टू बी को पढ़ा। इसका मतलब है जीवन में इतने संघर्ष होते हैं कि तय करना मुश्किल हो जाता है। जीवन को ऐसे ही जिया जाए या इसका अंत कर दिया जाए। खबर का मोटा-मोटी निष्कर्ष यह है कि जस्टिस जेवी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने 32 साल के हरीश राणा को इच्छा मृत्यु की इजाजत दे दी है।

देश में इच्छा मृत्यु का यह पहला केस है जिसे मंजूरी मिली है। आगे जानेंगे मामले का बैकग्राउंड क्या है? कोर्ट ने अपने स्टेटमेंट में क्या कहा और यूथनेसिया क्या होता है। आज से 13 साल पहले यानी साल 2013 में हरीश राणा बिल्डिंग की चौथी फ्लोर से गिर गए थे। उस वक्त उनकी उम्र 20 साल थी। गिरने की वजह से उनके पूरे शरीर में पैरालिसिस हो गया था। कोमा में चले गए।

उनके शरीर ने हिलना डुलना बंद कर दिया था। कोर्ट में जो मेडिकल रिपोर्ट्स पेश की गई उनके मुताबिक पिछले 13 सालों से एक ट्यूब के माध्यम से उन्हें पोषण तत्व दिए जा रहे हैं। क्योंकि लंबे समय से बेड पर हैं इसलिए उनके शरीर में घाव हो गए हैं। हरीश की सेहत में कोई सुधार नहीं हो रहा ना ही आगे किसी सुधार की उम्मीद है। इसीलिए उनका परिवार सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। बेटे की इच्छा मृत्यु की याचिका डाली।

याचिका पर सुनवाई करते हुए जज ने कहा कि इच्छा मृत्यु की प्रक्रिया इस तरह से की जानी चाहिए कि मरीज की डिग्निटी यानी गरिमा बनी रहे। इंडिया टुडे से जुड़ी अनीषा की रिपोर्ट के मुताबिक फैसला सुनाते हुए जस्टिस जेवी परदीवाला भावुक हो गए थे।

बेंच ने अपने फैसले में क्या कहा इसे पॉइंट्स में समझते हैं। कोर्ट ने कहा, आज हमारा फैसला तर्क नहीं बल्कि प्रेम, दवाओं और विज्ञान को देखते हुए लिया गया है। रिपोर्ट बेहद दुखद है। हमारे लिए फैसला लेना मुश्किल था। हरीश के माता-पिता ने कभी उनका साथ नहीं छोड़ा। हम इस केस से जुड़े वकीलों की भी प्रशंसा करते हैं जिन्होंने संजीदगी से इसे संभाला।

मरीज को एम्स दिल्ली में भर्ती किया जाए। मेडिकल ट्रीटमेंट वापस लिया जाए ताकि हरीश सिर्फ प्राकृतिक रूप से सांस ले सकें। निश्चित किया जाना चाहिए कि मृत्यु की प्रक्रिया गरिमा के साथ पूरी हो। अब सुनिए हरीश राणा के पेरेंट्स के वकील का बयान। राइट टू डाई का राइट हरीश राणा को दे दिया गया है। अगले एक हफ्ते के बीच में एम्स में पहुंच जाएगा हरीश राणा। वहां उसकी सारी जो ट्यूब्स वगैरह सब रिमूव कर दी जाएंगी और जैसे वो ट्यूब रिमूव होगी नेचुरल स्टेट में होगा और नेचुरल जैसे भी उसकी डेथ हो सकती होगी होगा। तो मतलब कोई कोई छेड़खानी नहीं होगी। सब कुछ नेचुरल होगा।

अब समझते हैं कि यूथनेजिया क्या होता है। इच्छा मृत्यु को ही अंग्रेजी में यूथनेजिया कहते हैं। इसके दो तरीके होते हैं। एक्टिव यूथनेजिया और पैसिव यूथनेजिया। एक्टिव यूथनेजिया में डायरेक्टली ऐसे एक्शन लिए जाते हैं जिससे मरीज की मौत हो जाती है। यह एक अपराध है। दूसरी तरफ पैसिव यूथनेजिया वो प्रक्रिया होती है जिसमें मरीज के मेडिकल सपोर्ट सिस्टम को हटा लिया जाता है ताकि मरीज की मृत्यु प्राकृतिक रूप से हो सके। इसमें फीडिंग ट्यूब, वेंटिलेटर सिस्टम और सीपीआर वगैरह को हटा लिया जाता है। पैसिफनेसिया मरीज के परिवार और मेडिकल बोर्ड की रजामंदी के बाद लिया जाता है। इसे लागू करने के लिए सख्त नियम होते हैं।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि साल 2018 में भी ऐसा ही एक केस सामने आया था। उस केस के नियम हरीश राणा वाले केस में भी फॉलो किए गए हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक साल 2018 में कॉमन कॉज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया केस में एक ऐतिहासिक फैसला लिया गया था। जिसने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी थी। हालांकि पैसिव को कब लागू किया जा सकता है इसे लेकर कॉमन कॉज मामले में साफ निर्देश नहीं दिए गए थे। कॉमन कॉज में गाइडलाइन बनाई गई थी कि अगर पैेटिव स्टेट में है कोई 100% नॉन मूवमेंट में है तो उसको कैसे ट्रीट किया जा सकता है?

कैसे उसके साथ बिहेव किया जाएगा? क्या डायरेक्शंस थे? वो गाइडलाइन दी गई थी। यानी कि एक्टिव यूथनेशिया नहीं था। पैसिव यूथनेशिया तब भी पैसिव ही था। पूरी दुनिया में भी एक्टिव बहुत ज्यादा पॉपुलर नहीं है। ही है और वह भी बहुत थोड़ा सा। उसमें से आज छोटी सी किरण भारत में भी निकली है और सारे देश के सीएमओस को डायरेक्शन दे दिया गया है कि अपने यहां भी प्राइमरी और सेकेंडरी बोर्ड बना के रखें और उसकी समय-समय पर रिपोर्ट अपने मंत्रालय को करते रहें।

फैसले के दौरान बेंच ने स्पष्ट किया कि इस फैसले को डिग्निटी के साथ लागू किया जाना चाहिए। जस्टिस विश्वनाथन ने संस्कृत का एक श्लोक पढ़ा जिसमें चिंता और चिता यानी मृत्यु का विश्लेषण है। अमेरिकी दार्शनिक हेनरी व बीचर के शब्दों को याद करते हुए कहा ईश्वर किसी से यह नहीं पूछता कि उसे जीवन चाहिए या नहीं। इसमें कोई विकल्प नहीं होता।

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