यह कहानी सिर्फ एक बेटे की नहीं है। यह एक पिता की सांसों में अटकी हुई उम्मीद की कहानी है। यह 13 साल तक ना टूटने वाले इंतजार की कहानी है। और आखिर में एक ऐसी खामोशी की जो हर दिल को अंदर तक हिला दे। वो सुबह शायद हर सुबह जैसी थी। लेकिन अशोक राणा के लिए नहीं।
आज उनके आंगन से सिर्फ एक बेटा नहीं 13 साल से जिंदा रखी गई उम्मीदों का जनाजा उठना था। कोई रोए ना। पिता ने कांपते हुए दिल से कहा बस मेरा बेटा जहां भी जन्म ले खुश रहे लेकिन ये शब्द जितने मजबूत थे अंदर से उतने ही टूटे भी भगवान शरीरक्षिक भगवान का हरीश राणा एक सपना एक उम्मीद एक इंजीनियर बनने की चाह लेकर घर से निकला था।
मां-बाप की आंखों ने जो भविष्य देखा था, वह अचानक 2013 की एक दर्दनाक शाम में बिखर गया। हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरना और फिर जिंदगी का 13 साल लंबा सन्नाटा, ना कोई आवाज, ना कोई हरकत। बस मशीनों की बीप और माता-पिता की धड़कनों में बसी उम्मीद। हर दिन एक सवाल लेकर आता था कि शायद आज आंखें खुल जाए। लेकिन वो दिन कभी नहीं आया। 13 साल। सोचिए 13 साल तक एक मां अपने बेटे के जागने का इंतजार करती रही।
एक पिता हर सुबह अपने बेटे का चेहरा देखकर यही सोचता रहा कि शायद आज चमत्कार हो जाए लेकिन वक्त कभी उनके पक्ष में नहीं आया। उम्मीद धीरे-धीरे दर्द में बदलती गई और दर्द एक अंतहीन इंतजार में। फिर आया वो दिन जब एक पिता को सबसे कठिन फैसला लेना पड़ा। 11 मार्च 2026 जब सुप्रीम कोर्ट ने इच्छा मृत्यु की अनुमति दी। यह फैसला कागज पर जितना छोटा था एक पिता के दिल में उतना ही भारी। यह हार नहीं थी।
यह अपने बेटे को दर्द से आजाद करने की आखिरी कोशिश थी। एम्स के उस कमरे में जहां डॉक्टर्स की टीम हर पल साथ थी। वहां एक पिता अपने बेटे को आखिरी बार देख रहा था। ना कोई शिकायत ना कोई सवाल। बस एक खामोश दुआ कि अब इसे दर्द मत देना। धीरे-धीरे लाइफ सपोर्ट हटाया गया। और एक जिंदगी जो पिछले 13 साल से रुकी हुई थी। आखिरकार थम गई।
मंगलवार का दिन जब हरीश ने आखिरी सांस ली और पिता ने WhatsApp पर सिर्फ इतना लिखा कि सुबह 9:00 बजे अंतिम संस्कार। ओम शांति। इतना छोटा सा मैसेज लेकिन उसके पीछे छुपा था 13 साल का दर्द। 13 साल का इंतजार और एक पिता का टूटा दिल। श्मशान में भी अशोक राणा बार-बार यही कह रहे थे कि कोई रोए ना। लेकिन वहां मौजूद हर आंख नम थी। क्योंकि सब जानते थे कि आज सिर्फ एक बेटा नहीं गया। आज एक पिता की पूरी दुनिया चली गई।
कुछ कहानियां खत्म नहीं होती। वो बस खामोशी से बदल जाती हैं। हरीश चला गया। लेकिन अपने पीछे छोड़ गया एक सवाल कि क्या उम्मीद कभी मरती है या फिर आखिरी सांस तक जिंदा रहती है?
