सोशल मीडिया पर इस वक्त ध्रुव राठी के एक पडकास्ट क्लिप ने तूफान मचा दिया है। जहां यूबर ध्रुव राठी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर ऐसा बयान दे दिया जिसके बाद लोग गुस्से में हैं। शॉक्ड हैं और सवाल उठा रहे हैं कि क्या क्रिटिसिज्म के नाम पर इतनी घटिया भाषा इस्तेमाल करना सही है? और इस विवाद में अब केके क्रिएट्स यानी काव्या कर्नाटक भी ट्रोल हो रही हैं।
जिनका इस बयान से डायरेक्ट कनेक्शन नहीं लेकिन प्लेटफार्म उन्हीं का था। यह मामला शुरू हुआ लर्न बाय केके क्रिएट्स [संगीत] पडकास्ट से। इस पडकास्ट में ध्रुव राठी गेस्ट थे। पडकास्ट का एक क्लिप वायरल हो गया जिसमें ध्रुव राठी ने पीएम मोदी के लिए कहा कि मोदी की जगह कोई गधाभी पीएम होता तो बेहतर होता। बस फिर क्या था?
क्लिप वायरल हुआ और सोशल मीडिया दो हिस्सों में बंट गया। अब यहां समझना जरूरी है कि केके क्रिएट चैनल चलाती हैं काव्या कर्नाटक। काव्या खुद बताती हैं कि वह मीडिया एंड कल्चर स्टडीज में मास्टर कर चुकी हैं और उनके वीडियोस का मकसद भारत की अलग-अलग संस्कृतियों को समझाना और दिखाना है। वह भारत के हर डिस्ट्रिक्ट पर वीडियो बनाने का सपना भी रखती हैं। यानी उनका कंटेंट मोस्टली कल्चर, ट्रैवल और इंडिया एक्सप्लोरेशन पर बेस्ड है। अब सवाल है कि काव्या ट्रोल क्यों हो रही हैं? क्योंकि लोगों का कहना है कि जब आप एथिक्स कल्चर और समाज की बात करते हैं तो आपको अपने प्लेटफार्म पर भी ध्यान रखना चाहिए कि वहां कैसी बातें हो रही हैं। कुछ लोग उन्हें फीमेल ध्रुव राठी तक बोल रहे हैं और कह रहे हैं कि उन्होंने यह बयान अलऊ क्यों किया। एक यूजर ने लिखा मेल एंड फीमेल जर्मन शेफर्ड। वहीं गिरजा ने लिखा देसी विद जर्मन शेफर्ड व्हाट अ कॉम्बो। वही गॉड ने लिखा आई थिंक शी गॉट फंडेड फ्रॉम पाकिस्तान। वही गॉड ने लिखते हैं आजकल सच्चाई लोगों को चुभती है। वी रिस्पेक्ट केके क्रिएट एंड ध्रुव ब्राइटटी सर। मेज लिखा बोथ आर कुकिंग भक्त्स एंड देयर कंटेंट। मेगाज़ लिखते हैं टू ऑफ़ द मोस्ट इन्फ्लुएंशियल घटिया लोग इन द फ्रेम। इसके अलावा भी लोगों ने दोनों को काफी ट्रोल किया। किसी ने लिखा के क्रिएट ध्रुव राठी। मेज ने लिखा ध्रुव राठी का फीमेल वर्जन। लेकिन दोस्तों असली मुद्दा यह नहीं कि ध्रुव राठी ने पीएम मोदी की आलोचना की क्योंकि आलोचना करना लोकतंत्र में बिल्कुल नॉर्मल है। लेकिन असली मुद्दा है भाषा का स्तर। क्रिटिसिज्म और इंसल्ट में फर्क होता है। आप पॉलिसीज पर सवाल उठाइए। आप काम पर बहस करिए। आप आंकड़े दिखाइए। लेकिन किसी देश के पीएम को गधा बोल देना यह क्रिटिसिज्म नहीं है। यह इंसल्ट है। अब सोचिए आज का यूथ सोशल मीडिया से सीखता है। अगर बड़े क्रिएटर्स ऐसे शब्द बोलेंगे तो फॉलोअर्स भी वही लैंग्वेज कॉपी करेंगे और फिर सोसाइटी में डिस्कशन खत्म होकर सिर्फ गाली गलौज शुरू हो जाएगी। आज आप पीएम के लिए यह बोलेंगे कल कोई आपके पिता, आपकी मां या आपके रिलीजन के लिए भी वही बोलेगा। फिर हम कहेंगे यार समाज में रिस्पेक्ट खत्म हो गई। रिस्पेक्ट खत्म होती नहीं।
रिस्पेक्ट हम खुद खत्म करते हैं। साफ बोले तो अगर आपको लगता है कि पीएम मोदी गलत डिसीजंस लेते हैं तो आप उस डिसीजन को गलत साबित करें। लेकिन किसी व्यक्ति को जानवर से कंपेयर करना यह सिर्फ हेट फैलाता है और सबसे बड़ी बात आप खुद को एजुकेट और रैशन दिखाते हैं तो फिर भाषा भी उसी लेवल की होनी चाहिए। अब बात आती है काव्या की। देखिए काव्या ने वह शब्द [संगीत] नहीं बोले लेकिन यह भी सच है कि पॉडकास्ट उनके प्लेटफार्म पर था। तो एक होस्ट होने के नाते उनकी रिस्पांसिबिलिटी बनतीहै कि वह कन्वर्सेशन को कंट्रोल करें। मतलब यह नहीं कि उन्हें भी अपराधी बना दिया जाए लेकिन ट्रोलिंग करना भी गलत है। अगर गलती है तो पोलाइटली सवाल पूछिए। ऐसी भाषा अलव क्यों हुई? लेकिन किसी महिला क्रिएटर को कैरेक्टर अससिनेशन करना उसे फीमेल ध्रुव राठी बोलना यह भी चीप मेंटालिटी है। और यहां एक और बात जो लोग ध्रुव राठी को गाली देने लगे वो भी उसी लैंग्वेज में उतर आए।
मतलब आप इंसल्ट को गलत बता रहे हो और जवाब में खुद इंसल्ट कर रहे हो। तो फर्क क्या रह गया। आज ध्रुव राठी ने यह स्टेटमेंट दिया कल कोई और देगा और और धीरे-धीरे पॉलिटिकल डिस्कशंस नहीं सर्कस बन जाएगी। अगर आपको लगता है कि पीएम मोदी गलत है तो आर्गुमेंट दो। अगर आपको लगता है ध्रुव राठी गलत है तो लॉजिक दो क्योंकि डेमोक्रेसी डिबेट से चलती है बेइज्जती से नहीं और क्रिएटर्स का काम सिर्फ व्यूज लेना नहीं समाज को सोच देना भी है।
