12th के टॉपर ने अचानक क्यों ली पूरे परिवार की जान?

25 साल का एक लड़का जिसका दिमाग इतना तेज था कि उसने 12वीं क्लास में शानदार मार्क्स हासिल किए। उम्मीदें जागी कि लड़का सरकारी नौकरी के एग्जाम्स निकाल कर ऊंचे पद पर पहुंचेगा। लड़का इम्तिहानों की तैयारी करता रहा। एक नहीं कई बार अलग-अलग परीक्षाएं देता रहा। मगर हर बार शिकस्त हाथ लगती। नाकामयाबी का यह दौर बहुत जल्द उसके दिमाग पर गहरा असर डालने लगा था। कुछ इस तरह कि जो स्टूडेंट स्कूल में इतना ब्राइट था वो मानसिक रूप से अस्थिर हो गया।

इतना अस्थिर कि जो परिवार अपने बेटे के तेज दिमाग पर नाज किया करता था उसके लिए सरकारी नौकरी हासिल करने के ख्वाब देखा करता था उसी परिवार को इस लड़के ने बेरहमी से कर डाला। मां, भाई, पिता सबको। घर पर मौजूद बिल्ली तक को नहीं बख्शा। जब पुलिस उसे लेकर गई तो आरोपी ने ऐसी हरकतें की कि उसे बड़े जेल के स्पेशल सेल भेजना पड़ गया।

यह रूह कंपाने वाला मामला मध्य प्रदेश के बैतूल से सामने आया है। बैतूल का सावगा गांव जहां आरोप है कि एक 12th क्लास टॉपर अपने परिवार का ही हत्यारा बन गया। आरोपी का नाम है दीपक धुर्वे। दीपक के परिजन बताते हैं कि वह बहुत ही ब्राइट स्टूडेंट था। 12th क्लास में उसने बोर्ड एग्जाम्स ऐसे पास किए कि पूरे परिवार का नाम रोशन हो गया। नाम रोशन होता है तो परिवार की उम्मीदें और खुद के ख्वाब भी बढ़ जाते हैं। सो वैसा ही कुछ दीपक के साथ भी हुआ। वो अलग-अलग सरकारी नौकरियों के एग्जाम्स की तैयारी करने लगा। फौज में जाने की भी ख्वाब देखने लगा। जो भी एग्जाम उसे ठीक लगते वो उनके फॉर्म भरता और उन्हें क्वालीफाई करने की पुरजोर कोशिश करता। मगर एक के बाद एक फेलियर ने उसे खुद पर सवाल करने पर मजबूर कर दिया। वो टूटने लगा और इसी के साथ बिगड़ने लगा उसका मानसिक संतुलन।

इंडिया टुडे से जुड़े पत्रकार राजेश भाटिया की रिपोर्ट के मुताबिक बीते दो सालों से दीपक को दिमाग के दौरे भी पड़ने शुरू हो गए थे। दीपक के जीजा सुखचंद परते ने बताया कि कभी-कभी वो यह दावा करता था कि उसके अंदर एक शैतान घुस आया है। परिवार चिंतित हुआ तो पहला ध्यान झाड़फूंक पर गया। इसके लिए वो दीपक को छिंदवाड़ा के जाम सांवली हनुमान मंदिर ले गए। वहीं पर पहले उसके साथ उसका छोटा भाई रहता था। फिर उसके पिता कुछ दिन दीपक के साथ मंदिर में रहे। रिपोर्ट है कि परिवार बाद में दीपक धुर्वे को डॉक्टर के पास भी ले गया। ट्रीटमेंट बेहतर हो इसलिए अच्छे इलाज के लिए मशहूर जिले नागपुर को चुना। फिर परिवार घर लौट जाता है। घर पर 25 साल के दीपक धुरवे के साथ-साथ उसका छोटा भाई दिलीप धुरवे भी था। जिसकी उम्र 20 साल थी। 55 साल के पिता राजू उर्फ हंसू धुरवे और 40 साल की मां कमलती धुरवे भी घर पर ही थे। 5 साल का भांजा प्रशांत परते था। एक बिल्ली भी थी। फिर आती है 18 फरवरी 2026 की रात। घर पर खाना बनाने की तैयारी चल रही होती है।

इतने में दीपक का झगड़ा उसके छोटे भाई दिलीप से होने लगता है। दीपक ने और सबबल उठाकर अपने भाई दिलीप को बर्बरता से शुरू कर दिया। पिता राजू धुरवे अपने छोटे बेटे को बचाने पहुंचे। वो अपने छोटे बेटे के ऊपर लेट गए ताकि यह देखकर बेटे दीपक के हाथ रुक जाए। लेकिन दीपक नहीं रुका। उसने अपने पिता को भी उसी सबल से शुरू कर दिया। बीच में मां आई तो मां को भी उसी बेरहमी से दीपक लगा। इतना मारा, इतना मारा कि तीनों की मौके पर ही निधन हो गई।

घर पर पांच साल का भांजा यह सब देख रहा था। दीपक ने उसे भी उसी से मारा। बच्चा घबराकर बेहोश हो गया तो दीपक ने उसे मृत समझकर छोड़ दिया। इतनी कि घर पर जो बिल्ली थी उसे भी इसी हमले में दीपक ने मार डाला। घर पर निधन का यह कोहराम मचाने के बाद दीपक वहीं बैठा रहा। फिर अगले दिन जब घर का दरवाजा नहीं खुला तो गांव वालों ने खिड़की से झांक कर देखा। दीपक दिखाई दिया और दिखाई दी उसके परिवार वालों की लाशें। डरे हुए पड़ोसियों ने तुरंत पुलिस को बुलाया। दीपक के जीजा सुखचंद परते को भी बुलाया गया।

मौके पर पहुंचकर उन्होंने यह बातें बताई। पहले बहुत अच्छा था। यानी 12वीं क्लास का टॉपर रहा। मिक्स सब्जेक्ट रहा उनका। बहुत अच्छे रहे। पर अभी वो आर्मी में सिलेक्शन होने के कारण पहले में कुछ समस्या रहा उस उस बीच में से वो कुछ उनको दौरे आते थे ऐसा मतलब हल्काफुल्का उस बीच फिर पता नहीं क्या हुआ कब से बीमार थे कब से ये लगभग दो साल के आसपास से तो फिर कहां इलाज चला इनका क्या ये इनका तो फिर इलाज इधर ही ऐसे डॉक्टर वॉक्टरों के पास इधर-उधर चला अभी बीच में फिर जामसावरी लेके जामसवरी से नागपुर ले गया था नागपुर पे इलाज कराया उनका फिर वह रिजल्ट पे पता नहीं क्या चला यह नहीं पता इसलिए कि वो उनके पापा जी साथ में गए थे। पापा जी की भी जान हो गई। तो 12वीं में अच्छा किया था। अच्छा खासा टॉपर था।

मैक्स सब्जेक्ट रहा। अच्छा फिर कहां-कहां उसने नौकरी के लिए प्रयास किया? नौकरी के लिए तो काफी बहुत प्रयास किया क्योंकि मैं भी बहुत दूर रहता हूं यहां से बैतूल से कम ज्यादा 70 कि.मी. दूरी पे तो डेली अपना भी आना जाना होता नहीं था। अपन भी काम धंधे वाले मजदूरी करने वाले तो ज्यादा संपर्क में नहीं आते थे। लेकिन फिर भी फोन पान के संपर्क में जैसा रहते इन्हीं सुखचंद का 5 साल का बेटा अब इस केस का प्राइम विटनेस है। बच्चे ने इस केस के बारे में क्या बताया है वो भी उसके पिता से सुन लेते हैं। बेटे ने ये बताया कि पहले शुरुआत में छोटे मामा को बड़े मामा ने मारा और मेरे सिर्फ मेरे ने गाल पे पैर रख दिया तो वो जैसे के होते बस उन्होंने उतना ही देखा। उसके आगे कुछ नहीं देखा। कैसे मार रहा था कुछ बताएं?

बस ये मारा उसने पहले मोबाइल तोड़ा और बस मारा। यानी डंडे से मारा। डंडे से मारा उसके बाद उसने कुछ नहीं देखा। उसको भी मतलब पैर से दबा दिया था। तो उन्होंने कुछ कैसा है आपका बेटा अभी? नहीं अभी तो ठीक है। बोलचाल रहा है। हां बोलचाल रहा है। लेकिन थोड़ा घबराहट टाइप है उसमें क्योंकि वो काफी दो साल की उम्र से उनके पास रहा। अभी 5 साल की उम्र होते आ गए। तो मतलब ढाई साल के लगभग लगभग वो उनके साथ में रहा। ढाई साल के उम्र। सुखचंद का कहना है कि उनका बच्चा अभी सदमे में है। जब वह थोड़ा शांत होगा तो मुमकिन है वह कुछ और बातें बताएं।

उसकी बातें इस केस की तहकीकात में बेहद जरूरी होंगी और पुलिस की मदद करेंगी। पुलिस ने भी इस मामले पर कुछ जानकारियां दी है। उसमें आरोपी को हमने कल ही अभिरक्षा में ले लिया था। उससे पूछताछ करके पूछताछ के बाद उसने एक्सेप्ट भी किया है कि मैंने मारा था और जो बच्चा कल जीवित बच गया था।

उससे हमने बाद में पूछताछ की तो उसने बताया है कि ये सबसे पहले अपने छोटे भाई को मार पा रहा था उसको बचाने के लिए उसके पिता आए उसके ऊपर लेटे भी हुए थे तो उसी समय फिर हमको परिस्थिति जन साक्षी अनुसार लग भी वैसे ही रहा है कि पहले अपने भाई को मार रहा था फिर उसको बचाने के लिए उसकी मां और पिता आए तो उन दोनों को भी उसने मारा है आरोपी को अग्रेसिव में था तो उसको हमने हॉस्पिटल में रखा है अंडर ट्रीटमेंट में भी और कुछ देर माननीय न्यायालय में हम पेश करें। कारण बताया उसने कारण वो बता नहीं रहा है। उससे पूछताछ कर रहा तो उसने बोला कि हां मैंने मार दिया है और पर मार क्यों दिया यह मैं नहीं मालूम। सर ये इसके बारे में कुछ पता चला। पढ़ा लिखा क्या?

हां ये पढ़ा लिखा है। इसकी सिस्टर बता रही है कि ये टॉपर था। पहले आर्मी की तैयारी कर रहा था और दौड़ने भी जाता था और कबड्डी भी अच्छी खेलता है। सर एक बिल्ली भी मिली है। बिल्ली वहां पर मिली है मौके पर। उसको भी चोट है उसके मुंह पर और कंजे के पास में पोस्टमार्टम उसका पोस्टमार्टम कराया पशु चिकित्सक सर इसमें और कोई भी तथ्य सामने आए होंगे अभी तथ्य में यही आया है कि ये बाहर था लगातार इसका छोटा भाई जिसकी हत्या हुई है दिल्ली जो है वो साथ में इसको लेके वहां गया हुआ था जामसावरी में जामसवरी में वो 15 दिन उसके साथ में रहा है उसके बाद इसी ने कहा कि अब तुम घर चले मेरे को ठीक लग रहा है कि घर पर है। अभी इसके पिताजी घटना के एक सप्ताह पहले साथ में गए थे। दो-तीन दिन इसके साथ रुके। फिर इसके पिताजी को खुद इसने बोला कि अब मुझे ठीक लग रहा है। मैं घर चलता हूं। तो इसके पिताजी ले इसके घटना के शायद तीन या चार दिन पहले ही घर आए हुए थे। पुलिस ने यह भी बताया कि गिरफ्तारी के बाद दीपक ने बहुत उत्पात मचाया। उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया तो उसने वहां का बेड ही तोड़ दिया। NDTV की एक रिपोर्ट के मुताबिक आरोपी दीपक का इलाज करने वाले डॉक्टर्स का कहना है कि उसकी यानी दीपक की मानसिक स्थिति बिल्कुल भी ठीक नहीं है। वो कभी भी किसी भी बात पर आवेश में आकर हिंसक हो जाता है। फिर उसे जो भी हाथ लगे वो उसी से सामने वाले व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करता है। इसी वजह से आरोपी दीपक को बैतूल जेल में रखने में दिक्कतें थी। उस जेल में मानसिक रोगी कैदियों के लिए अलग से सेल नहीं है। ऐसे में कोर्ट के आदेश पर दीपक धुर्वे को ग्वालियर जेल भेजा गया है।

जेल शिफ्टिंग के लिए भी पुलिस को उसे बेहोश करवाना पड़ा। 11 पुलिस वाले उसे लेकर गए। दीपक के दो परिजन को भी उनके साथ भेजा गया है। पुलिस अफसर बताते हैं कि आरोपी दीपक का इलाज कराया जाएगा और वह जुडिशियल कस्टडी में स्पेशल सेल में रहेगा। अगर पुलिस ने दीपक पर लगे आरोप कोर्ट में साबित कर दिए तो दीपक को बहुत गंभीर सजा हो सकती है। इस तरह उसकी जिंदगी पटरी पर वापस लौटे ना लौटे उसका परिवार अब कभी नहीं लौटेगा। भविष्य भी आज से जा चुका है।

ऐसे में जितनी डरावनी इस कहानी है, उतनी ही थॉट प्रोवोकिंग उसके पीछे की वजह भी है। कैसे एक होनहार स्टूडेंट से जुड़ी आकांक्षाएं मेरिट से शुरू होकर सरकारी नौकरी पर आकर टिक जाती हैं। फेलियर का सवाल हमेशा कोशिश जारी रखो के जवाब में टल जाया करता है। उम्मीदें जारी रहती हैं हकीकत से दूर।

इसलिए यह केस एक चेतावनी है पेरेंट्स के लिए, सिस्टम के लिए और खुद उस व्यक्ति के लिए जिसे सही वक्त पर रुकने का डिसीजन ले लेना चाहिए। सपने देखना जरूरी है लेकिन टूटते सपनों को संभालना उससे भी कहीं ज्यादा जरूरी है। वरना कभी भी टूटते सपनों की आवाज कोहराम में तब्दील हो सकती है। जिस कोहराम के बाद एक ऐसी खामोशी छा जाती है जिसका कोई अंत नहीं।

इसलिए ख्वाब टूट जाने से जिंदगी खत्म नहीं हो जाती। नए ख्वाबों के साथ पॉजिटिविटी लिए जिंदगी की उम्मीद जारी रहनी चाहिए। जिंदगी जारी रहनी चाहिए।

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