प्रयागराज के शैलेंद्र कुमार सिंह गौर ने एक ऐसी खोज की है कि जो बाइक 175 कि.मी. 1 लीटर में चलती है। जी ये अपने एक बाइक बनाई है जो 175 कि.मी. 1 लीटर में चलती है। कितने दिनों तक आपने इसकी खोज की है और क्या-क्या इसमें लगाया है? 2007 में मैंने काम शुरू किया था इसमें। 2006 में मेरे पास कांसेप्ट आ गया था। पहले मुझे लगा कि इसमें जो यहां पर इंस्टट्यूट्स मौजूद हैं वो कुछ करेंगे जैसे आईआईटी है। तो 2007 दिसंबर में मैं T मोटर्स में गया था। मेरा प्रेजेंटेशन था मिस्टर रिचंड के साथ में जो उनके यूके ब्रांच के हेड थे। उन्होंने कहा ये नहीं हो सकता है। ये रिजल्ट नहीं आ सकते हैं.
मैंने कहा सर आएंगे। कहने लगे आप इसका प्रोटोटाइप बना के लाइए। मैंने वह प्रोटोटाइप बनाया जो 120 का रिजल्ट देता है। तो उसमें पार्ट डिजाइन है। पूरा पार्ट नहीं लगे उस समय उतना मैनेज करना संभव नहीं था। उन्होंने कुछ नहीं किया। T मोटर्स में मैंने भेजा। उस समय जो लोग थे उन्होंने उसको एक्सेप्ट नहीं किया। फिर मैं आईआईटी कानपुर में दौड़ भाग के। मैंने वहां गया मिला। उस समय पुंडीर सर वहां पर थे। उन्होंने उल्टा लिख के दे दिया कि नहीं यह हो ही नहीं सकता है। तो जो मुझे यहां से स्पोंसर करना चाहते थे सच सर जो इसमें पार्वती के सामने रहते हैं हॉस्पिटल के सामने वो भी विड्रा हो गए कि नहीं जब आईआईटीए कह रहा है तो नहीं हो सकता है। जब मैंने प्रोटोटाइप बना लिया तो पुंड सर को लिखा कि सर मैंने बना लिया। आप उसको देख करके टेस्ट करके जैसे भी चाहे जो चाहे वो कह दीजिए। कह अब मैं कुछ नहीं कर सकता। मैं 2 महीने बाद रिटायर होने वाला हूं।
फिर मैं आईटी दिल्ली गया। वहां पर एलम दास थे और सुब्रमण्यम सर शायद उनके हेड थे मैकेनिकल के और एलम दास ऑटोमोबाइल में थे। लोगों ने कहा कि उनसे मिल लीजिए। मैं उनके घर पे ढूंढते-ढूंढते पहुंचा और उन्होंने कहा मैं क्या कर सकता हूं इसमें? लेकिन मेरे अंदर एक जिद थी कि मैं जो जानता हूं वो 100% सच है। तो मैंने फिर यह फैसला किया कि मैं इसे खुद बनाऊंगा। ये आईडिया कहां से आया आपको? मेरा स्कूटर रिपेयर हो रहा था। उसका क्रैंक खोला गया था। पहले मेरे पास स्कूटर शिफ्ट था। तो उसका क्रैंक खोला गया था। उसकी पोजीशनिंग देख के मुझे लगा यह तो ब्लंडर चल रहा है। ऐसा होना ही नहीं चाहिए। ब्लंडर अगर आप समझना चाहें तो यह इंजन है। यह कन्वेंशनल है और यह मेरा इंजन है। इस इंजन में जब यहां पर प्रेशर होता है तो सारा प्रेशर क्रैंक बैरिंग पर जाता है सेंटर पर। यह इसको घुमा नहीं सकता है। मेरा इंजन यह है। जब इसमें प्रेशर आता है तो यह मैक्सिमम थ्रस्ट क्रिएट करता है। इसको अगर रियल टर्म्स में समझेंगे तो यह है डिज़ाइन। 60° से हमारी टीडीसी 60° पर शिफ्ट हो गई जो 0° होती थी। 60° से हम इसे स्टार्ट करते हैं और पहली 30 35° में यह इतना बड़ा थ्रस्ट जनरेट करती है कि वो माइलेज कम हो जाता है।
अगर इसको आप और देखना चाहें। यह हमारे दो पेटेंट हैं। एक पेटेंट यह है। यह हमें ग्रांट हो चुका है। एक यह मिल चुका है और कहीं इसी में है। लेकिन हमारे वाले में बहुत ज्यादा थ्रस्ट पैदा होता है क्योंकि हम 60° शुरू करते हैं। ये पूरी डिजाइन का उसका फॉर्मेट दिया है। और एक दूसरी फाइल है। उसमें बाकी डिटेल है। मैं आईआईटी बीएचयू में गया। छ महीने वहां काम किया। उनके यहां एक यह रवि रफ्तार एग्री बिनेस कुछ चल रहा था आर केवी यूआई लेकिन वहां भी कोई मुझे सहयोग नहीं मिला और यह मोतीलाल नेहरू इंजीनियरिंग कॉलेज ने मेरा टेस्ट किया था इसमें मेरे रिजल्ट सड़क पर इसके 120 मैंने सैकड़ों बार टेस्ट किए हुए थे वो बहुत ज्यादा 98 तक का मुझे दे पाए और जब निराश हो गया तो मैंने फिर अपना जो कुछ था वो सब इसमें लगा दिया। इस समय मेरे पास कोई चीज नहीं है। कितना समय लगा इस खोज में?
2007 से 2025 तक 18 साल किया मैंने काम क्योंकि काफी टाइम गजा जाता था पैसे मैनेज करने में। इसमें कुछ करना है तो उसके लिए पैसे चाहिए और जब छोटा काम आप कराने जाइए तो जो जॉब वर्कर हैं वो आपको ख्याल नहीं करते हैं। उसे कराने के लिए आपको बहुत मेहनत करनी पड़ती है। वो टाइम बहुत लेते हैं। पैसे जो मनाया कह दिया देना है दे जाइए क्योंकि आपको एक बार आना है उनके पास। तो लगभग 18 साल तो हो ही गए 70 छोड़। 18 सालों में कितना पैसा खर्च किया आपने? वो पैसे कहां से लाए आप? मैंने अपनी सारी प्रॉपर्टी भेजी। कोई ऐसा दुनिया में मेरा सगा नहीं जिससे मैंने उधार ना लिया हो। जरा भी परिचित मित्र थे। पहले शुरू में सहयोग किया। फिर उन्हें लगा कि नहीं सहयोग करना ठीक नहीं है। तो उन्होंने फोन उठाने बंद कर दिए। इस समय जहां मैं बैठा हूं मेरे मकान मालिक का लगभग 15 महीने किराया बाकी है। 15,000 इस जगह किराया है और उनको उन्होंने सहयोग किया कि 15 महीने मुझे बिना किराए के रहने दिया।
तो यहां तक पहुंच गया। जो पैसा आया मैंने सभी सिम लगा दिया। मित्रों से उधार लिया, ससुराल से उधार लिया। सब किया। जो कुछ कर सकता था मैक्स ट्राई कर दिया। लेकिन आपको अब अंत अंतगत सफलता मिल गई है। क्या कहेंगे? मुझे लगता है कि अगर चाह है तो राह बनेगी। मैं उसी पे विश्वास करता था और सुबह 7:00 बजे बैठता था। रात में 9:00 तो बज ही जाता था। हम और हमारी बड़ी वाली बेटी एक ही काम करते थे कि आज इंजन स्टार्ट करना कल करना है। रोज किया स्टार्ट किया। पता चला। उसमें थोड़ी सी एक प्रॉब्लम थी जो मैं उस समय नहीं जानता था। बाद में मुझे जीपीडी चार्ट से वो पता चला। इसके पार्ट्स ई एन 31 में बनते हैं। उनमें रस्ट रोकने की क्षमता नहीं होती है। जैसे कानपुर से टपर हो के आए दो-ती दिन यहां रखे रहे। फिर मैंने लगाया फिर उसको स्टार्ट किया। तो उनके अंदर रस्टिंग शुरू हो जाती थी। जो माइक्रो होल्स होते थे। वो इतने करीब होते हैं कि पूरे को डैमेज कर डालते थे। जीपी रिचेड ने कहा कि इसको 200° गर्म कीजिए और मोबिल में डुबो दीजिए। 50° मोबिल का टेंपरेचर होना चाहिए। मैंने वो किया तो यह चल गया। यही पार्ट्स जो इसमें लगे हुए हैं, मैंने कम से कम 15 16 बार ट्राई किए। एक बार करने में 1ढ़ महीना दो महीना लग जाता है। तो जोड़ लीजिए इतना टाइम तो ऐसे ही चला गया। फिर फंड्स मैनेज करने में फिर पहले यह बनाई 126 का एवरेज देती है।
वो 120 का देती है। लग रहा है तो कोई ले ले तो मुझे इतनी मेहनत ना करनी पड़े। मेरे पास उस तरह का टूल्स नहीं, कोई हेल्पिंग हैंड नहीं। नहीं मिला तो फिर जिद पकड़ ली कि नहीं? मैं करके दिखाऊंगा। आम लोगों के लिए अभी आपकी तकनीक कब यहां पर आम लोगों के लिए पहुंचेगी सर जी अगर कंपनी इसको एक्सेप्ट कर लेती है या गवर्नमेंट इसमें पहल करती है तो यह 23 पेट्रोल बचाएगी जो भी आपका कंजमशन है वो डीजल हो पेट्रोल हो एथनॉल हो सीएनजी हो और आप 23 ही इंपोर्ट करते हैं इंपोर्ट बिल खत्म हो जाएगा केवल आपको बाहर से रॉयल्टी एक्स्ट्रा मिलेगी और 8 लाख करोड़ का जो आप इंपोर्ट करते हैं कुछ उसमें एक्सपोर्ट हो जाता होगा लेकिन जो आपका कंजमशन है वह बिल्कुल जितना आप पैदा करते हैं उसी में होने लगेगा।
18 सालों तक आपने मेहनत किया है। अब 1 लीटर में 175 कि.मी. चलने वाली बाइक इन्होंने बना के रखी है। तो बिल्कुल कहा जा सकता है कि सपने उन्हीं के सच होते हैं जिनके सपनों में जान होती है। पंख से कुछ नहीं होता। हौसले से उड़ान होती है।.
