एक ऐसी अभिनेत्री और चाइल्ड आर्टिस्ट की जिसने हिंदी सिनेमा में अपने अभिनय के दम पर खड़ी की कामयाबी की वो दीवार जिस पर लिखा गया इस महान और खूबसूरत अभिनेत्री का नाम हमेशा हमेशा के लिए स्वर्णिम अक्षरों में। अल्लाह तेरा लाख-लाख शुक्र है। तूने मेरी मुराद पूरी कर दी। तूने मेरी बरसों की दुआ सुनी। इस खूबसूरत और प्रतिभाशाली अभिनेत्री का हिंदी सिनेमा में अभिनय का वो शोर था कि इनको उस वक्त सिनेमा का बड़े से बड़ा फिल्म निर्माता और अभिनेता बनाना चाहता था अपनी फिल्म की हीरोइन। नींद उड़ जाए तेरी चैन से सोने वाली।
लेकिन दोस्तों क्या आप जानते हैं कि 4 साल की बाल अवस्था में हिंदी सिनेमा की सीढ़ी पर कदम रखने वाली यह अभिनेत्री क्यों बचपन से ही अपने घर में झेलती रही अपने मां-बाप की वो मारपिटाई दुख दर्द जिसकी वजह से 10 साल की नाबालिक उम्र में ही इस अभिनेत्री ने खुद की जिंदगी को हमेशा हमेशा के के खत्म करने के लिए लगा दी गहरे कुएं के अंदर छलांग। छोटी सी जान मेरी मुझे गम से दोस्तों और क्या आप यह भी जानते हैं कि अपनी जिंदगी में बदनसीबी की मार झेल रही इस अभिनेत्री को क्यों इनकी मां ने इनको मारने के लिए विदेश से मंगवाए खतरनाक कुत्ते।
किस्मत मेरी किस्मत मेरी है रूठी और क्यों आगे चलकर यह खतरनाक कुत्ते खा गए इस मासूम सी अदाकारा को तो वहीं इनकी मां ने दिए वो गहरे जख्म और दर्द जिनको ये अदाकारा अपनी अंतिम सांस तक नहीं भर पाई। मुझ में भक्ति है या नहीं मैं नहीं जानती। पर तुझे मेरी लाज रखनी पड़ेगी प्रभु दोस्तों और क्या आप यह भी जानते हैं कि यह छोटी सी बच्ची अपने बचपन से ही अपनी खलनायक और क्रूर मां के लालच के चलते कभी स्कूल नहीं जा पाई। याद आया? चल ठीक जाके। और सुन जाके बर्तन उठा के मार। जहां बड़े-बड़े अभिनेता अपनी फिल्मों की शूटिंग सिर्फ एक शिफ्ट में करते थे। तो वहीं पैसों के लालच में इस अभिनेत्री की मां इस मासूम और लाचार बच्ची से कराती थी। चार-चार शिफ्ट में फिल्मों में काम।मुझे भूख लगी है। भोला को भोला भोला भोला मुझे भूख लगी। दोस्तों जिंदगी में जुल्मो सितम और दुखों के सागर में आंसू बहाती इस अभिनेत्री की मां ने क्यों इनके पिता को अधेड़ उम्र में घर से बाहर निकालकर कर ली दूसरी शादी? और कैसे आगे चलकर उनके उसी सौतेले पिता ने उनकी उसी खलनायक मां को उतार दिया मौत के घाट। दुनिया के इस चमन में अब हम किसे दोस्तों ये अदाकारा हिंदी सिनेमा की पहली ऐसी अभिनेत्री थी जिनके अंदर एक्ट्रेस बनने की वो सभी खूबियां होने के बावजूद यह लड़की कभी नहीं बन पाई टॉप मोस्ट हीरोइन।
यह अभिनेत्री कभी दुनिया के सामने अपना सर ही नहीं उठा पाई। अपनी जिंदगी के हर दुख तकलीफ को खुशी-खुशी झेलने वाली यह अदाकारा पूरी दुनिया में पहचानी गई सलमा बेग यानी के चाइल्ड आर्टिस्ट बेबी नाज़ के नाम से। हमें बता दो ऐसा काम कोई नहीं करे बदनाम। हमें बताता कौन थी सलमा बेग? कैसे यह बन गई बेबी नाज़? क्या है बेबी नाज़ का इतिहास? यह सब मैं आपको बताऊंगी। लेकिन उससे पहले आइए एक नजर डाल लेते हैं बेबी नाज़ के शुरुआती जीवन, पढ़ाई लिखाई और उनके परिवार पर। आई बहार मेरे अंगना में आई।
दोनों मैं बनी फूलों नमस्कार आप सभी का स्वागत है बॉलीवुड नवेल के इस एपिसोड में जॉन चाचा तुम कितने अच्छे तुम्हें प्यार करते सब बच्चे जॉन चाचा तुम कितने बेबी नास उर्फ सलमा बेग का जन्म 20 अगस्त साल 1944 को मुंबई शहर में हुआ जो उस वक्त मुंबई कहा जाता था। यह अपने माता-पिता की इकलौती बेटी थी। इनके अब्बा मिर्जा दाऊद बेग एक राइटर थे। उन्होंने बहुत सारी फिल्मों की कहानियां लिखकर रखी हुई थी। यह सोचकर कि कभी कोई भोला भटका फिल्म प्रोड्यूसर आ जाए और मेरी कहानी खरीद ले। और हाथ में कुछ पैसे आ जाए। लेकिन अफसोस कि ऐसा कभी नहीं हुआ। वो हमेशा एक-एक पाई के लिए मोहताज रहे और इनके घर की माली हालत भी खराब रही।
रुपया मिला? नहीं। जिमीदार साहब ने साफ इंकार कर दिया। तुम्हारी बकाया तनख्वाह तक नहीं दी? नहीं। अब क्या करोगे? बेबी नास की मां स्वभाव से बेहद मतलबी और खुदगर्ज महिला हुआ करती थी। बेबी नास को बाल्यावस्था से डांस बहुत अच्छा लगता था। इसीलिए वो फिल्मी पर्दे के सुपरस्टार्स को देखती और उनके डांस की नकल किया करती और लोग उनके इस डांस को देखकर उनकी तारीफ करते। बस फिर क्या था? बेबी नाज़ की खुदगर्ज मां को सुझाव आया कि क्यों ना बेबी नाज़ को डांस स्टेज पर नचवाया जाए। फिर क्या था? उनकी मां ने लालच की दृष्टि से मात्र 4 साल की अपनी बेटी को स्टेज पर डांस के लिए उतार दिया। जिसका नतीजा यह हुआ कि इस डांस से उस वक्त बेबी नाज को लगभग ₹100 की कमाई हो जाती थ और सारी कमाई जाती थी उनकी मां की जेब में।
हालांकि शुरुआत में इस डांस में बेबी नाज को अच्छा लगता था। लेकिन कुछ समय बाद इनकी मां ने इस डांस को अपनी कमाई का जरिया ही बना लिया और बेबी नाज़ की मजबूरी और धीरे-धीरे मासूम सी बच्ची के कंधों पर घर चलाने की भारी भरकम जिम्मेदारी रख दी गई और अब उनकी मां उनकी मर्जी के खिलाफ उनसे जबरदस्ती डांस कराने लगी। बेबी नाज़ जब लगभग 8 साल की हुई तो एक बार उनको एक स्टेज डांस परफॉर्मेंस के दौरान फिल्म निर्माता लेखराज भागनी ने देख लिया था। बेबी नाज़ को देखकर लेखराज इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने उनको एक फिल्म का ऑफर कर दिया। लेकिन परिवार ने शुरुआत में इस फिल्म के ऑफर को ठुकरा दिया।
लेकिन जब इनकी मां को इसमें लालच नजर आया तो उन्होंने इस ऑफर को स्वीकार कर लिया और इसके बाद साल 1952 में रिलीज हुई फिल्म रेशम से अपना बॉलीवुड डेब्यू किया बेबी नाज़ ने। इसी फिल्म से इनका नाम सलमा बेग से बदलकर बेबी नाज़ रखा गया और आगे चलकर यह आज तक बेबी नाज़ के ही नाम से जानी गई। इस फिल्म के बाद बेबी नाज़ को और कई फिल्मों में बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट के लिए ऑफर्स मिलने लगे। बेबी नाज़ स्टारडस्ट मैगजीन को दिए गए इंटरव्यू में बताती हैं कि उनकी लालची मां लालच में एक के बाद एक फिल्म ऑफर को कबूल करती चली गई। नाज़ की मां के दिल को पैसों की दीवानगी ने ऐसा पत्थर दिल कर दिया था कि उनको यह एहसास भी नहीं होता था कि इस नन्ही सी बच्ची पर कितना बोझ डाला जाएगा। वो कितनी मेहनत करेगी और इसी जबरदस्ती के चलते बेबी नाज़ हमेशा काम करती रहती थी
हाथ में होगी झोली खाली मुंह में दुआएं। याद आया? चल ठीक जाके। और सुन जाके बर्तन उठा के मार। जिसका नतीजा यह हुआ कि बेबी नाज़ कभी भी स्कूल ठीक से नहीं जा पाए। उनको काम के चलते स्कूल जाने का वक्त ही नहीं मिलता था। जिसका परिणाम यह हुआ कि स्कूल वालों ने बेबी नाज़ को स्कूल से निकाल दिया। जिसका बेबी नाज़ को बहुत दुख हुआ लेकिन उनकी लालची मां को तनिक भर भी अफसोस नहीं था। मासूम सी बच्ची बेबी नाज़ की एक ना चली। आ गई चुड़ैल भुलवा कहां है? तुम लोगों से कहा था ना 12:00 बजे से पहले राशन लेके लौट आना।
कहां है राशन? इसके बाद साल 1954 में बेबी नाज़ की राज कपूर द्वारा बनाई गई फिल्म बूट पॉलिश आई। आने वाली दुनिया का सपना सजा है। आने वाली दुनिया का सपना यह फिल्म आज तक के हिंदी सिनेमा की सुपर डुपर हिट फिल्म कही जाती है और इस फिल्म ने बेबी नाज़ को असली स्टार बना दिया था। यह पहली ऐसी भारतीय चाइल्ड आर्टिस्ट बनी थी जिनको कैंस फिल्म फेस्टिवल में वहां आए अतिथि और चीफ गेस्टों ने खड़े होकर तालियां बजाकर उनको सम्मान दिया था। उस वक्त यह सम्मान बेबी नाज़ के साथ-साथ भारतीय हिंदी सिनेमा के लिए गर्व की बात थी। भीख में जो मोती मिलने लोगे या ना लोगे जिंदगी के आंसुओं का बोलो क्या बेबी नाज़ के द्वारा इस फिल्म में निभाए गए अभिनय के अवार्ड से उन्हें नवाजा गया बेबी नाज़ ने इस फिल्म में ऐसी एक्टिंग की थी कि बड़े-बड़े लोग सोच में पड़ गए कि कैसे मात्र 9-10 साल की छोटी सी लड़की ने इतनी गंभीर और सहज एक्टिंग आखिर कैसे कर ली। इस फिल्म की देश विदेश में अपार कामयाबी के चलते बेबी नाज़ की किस्मत ही बदल गई। मुठी में है
तकदीर हमारी हमने किस्मत को बस में किया है। इनके पास मानो नई-नई फिल्मों में काम करने को लेकर जैसे फिल्मों की बार आ गई हो। उस दौर का आलम यह हो गया कि चाइल्ड आर्टिस्ट के नाम पर सिर्फ और सिर्फ बेबी नाज का ही नाम गूंज रहा था। इनके बिना कोई फिल्म पूरी नहीं मानी जाती थी। रूठ जाए रे रूठ जाए रे गुजरिया ना बोले रे। 50 के दशक से लेकर 80 के दशक तक बेबी नाज़ ने लगभग 200 फिल्मों में काम कर डाला। बेबी नाज को मिल रही कामयाबी से लोगों को लगने लगा था कि बेबी नाज से खुशनसीब कोई नहीं है। लेकिन शायद जैसा दुनिया सोच रही थी असल में उसकी असलियत अंदर से कुछ और ही थी। अपने एक इंटरव्यू में बेबी नाज बताती हैं कि उनका बचपन और जिंदगी उनकी मां के स्वार्थ, लालच और खुदग्रजी के तले कुचला जा रहा था। रौंदा जा रहा था। पैसों के लालच में इनकी मां इतनी अंधी हो गई थी कि बेबी नाज को क्या नुकसान हो रहा है, क्या दर्द हो रहा है, वह बिल्कुल भी नहीं देख रही थी। बेबी नाज़ आगे बताती हैं कि उनके स्टार बनने के बाद जिस स्कूल से नाज़ को निकाला गया था, वो स्कूल नाज़ को दोबारा पढ़ाई करने का मौका देना चाहता था। इस बात से नन्ही सी नाज बहुत खुश हुई क्योंकि वह सच में पढ़ना लिखना चाहती थी लेकिन इनकी मां ने ऐसा कतई नहीं होने दिया और उन्हें स्कूल नहीं जाने दिया क्योंकि उनकी मां को पता था कि अगर बेबी नाज़ स्कूल चली गई तो उनके लालच के लिए पैसों के लिए शूटिंग कौन करेगा? घर की जिम्मेदारी कैसे पूरी होगी? क्योंकि बेबी नाज़ के पिता और क्रूर मां तो बेबी नाज़ को पैसों की मशीन मान बैठे थे। तब मैं छोटी थी इसलिए अब मैं समझदार हो गई हूं। क्योंकि बेबी नाज़ के पैसों पर ही तो इनके अब्बू और अम्मी पूरी ऐश करते थे। लेकिन बेबी नाज़ को कभी उन पैसों का कोई भी सुख नहीं मिला।
बेबी नाज़ के दौर में जहां बड़े-बड़े अभिनेता और अभिनेत्री फिल्मों की शूटिंग एक शिफ्ट में करते थे। लेकिन बेबी नाज़ उस छोटी सी उम्र में चार-चार शिफ्टों में काम किया करती। शरीर को तोड़ देने वाली मेहनत करने के बाद जब बेबी नाज़ रात को घर जाती थकी हारी तो वह देखती कि इनके अब्बा और अम्मी दोनों आपस में लड़ रहे हैं और यह दोनों अपनी-अपनी लड़ाई में बेबी नाज़ की परवाह ही नहीं कर रहे हैं। उनसे एक गिलास पानी तक के लिए नहीं पूछा जाता था और इसी सब में लाचार बेबस बेबी नाज़ बिना खाए भूखे पेट ही आंसू बहा कर सो जाया करती थी। बेबी नाज़ के करीब ना तो मां की ममता थी ना ही बाप का प्यार, ना कोई स्कूल, ना कोई खेल, ना किसी दोस्त का साथ। अगर कुछ था तो वह था घंटोंघंटों कैमरे के सामने खड़े रहना, जोर जबरदस्ती के साथ मारपीट के साथ फिल्मों के डायलॉग्स बोलना और इसी सब के चलते बेबीनाज़ बहुत अकेली और डिप्रेशन में जाने लगी। मासूम और फूल सी यह बच्ची गमगीन रहने लगी और इसी दुख दर्द और तकलीफ में एक छोटी सी लड़की ने कुछ ऐसा कदम उठा लिया जिसकी शायद कोई भी कल्पना नहीं कर सकता था। खार डंडा बाजार जहां बेबी नाज़ रहा करती थी।
वहां एक बहुत बड़ा गहरा पानी का भरा हुआ कुआं था जिसको अक्सर नाज़ देखा करती थी। और एक दिन वो नाजुक पल भी आ गया जब बेबी नाज़ ने भी अपनी जिंदगी के हर दुख दर्द को दूर करने का फैसला लिया। अब मैं यहां कभी नहीं आऊंगी। कभी नहीं आऊंगी भगवान कभी नहीं। वो घर से निकली और उस कुएं के पास पहुंची और उसने छलांग लगा दी। लेकिन संयोग से उनकी एक परिचित बूढ़ी आया ने यह सब देख लिया और सूझबूझ के साथ उनकी जान बचा ली। कैसा विचित्र वक्त था कि 10 वर्ष की बच्ची अपनी जिंदगी को खत्म करना चाहती थी। यह सोचकर ही किसी भी इंसान का दिल हिल जाए। इसके बाद जब इस घटना की जानकारी उनकी खलनायक मां को पता चली तो उन्होंने अपनी बच्ची को ना तो अपने सीने से लगाया ना बच्ची के आंसू पोंछे बल्कि उनकी उस क्रूर मां ने ऐसी हालत में बेबी नाज़ को जानवरों की तरह खूब और मारा और कहा कि आज के बाद उनके कानों में ऐसी कोई भी हरकत उन तक नहीं आनी चाहिए जो नास पहले से ही तकलीफ में थी। ऊपर से उनकी मां का यह रूप उनके दिल में अपनी मां के लिए नफरत पैदा कर रहा था। लेकिन इन सबके बाद भी ना तो बेबी नाज़ की तकलीफ खत्म हुई ना बेबी नाज़ की मां का लालच। लिहाजा फिर से एक बार वही नाजुक मोड़ पर नाज़ खड़ी हो गई और फिर से अपनी जिंदगी को खत्म करने की चाह में फिर से कुएं में कूद गई।
लेकिन इस बार फिर से भगवान रूपी आया ने इनको बचा लिया। शायद अभी नाज़ की किस्मत में नहीं लिखी थी। लेकिन इस बार बेबी नाज़ की मां को जैसे ही यह सब कुछ पता चला उसने वो किया जिसको जानकर किसी की भी रूह अंदर तक कांप जाए। नाज़ की मां ने नाज़ के ही पैसों से एक बहुत ही महंगा कुत्ता पाला था। बेबी नाज़ को सबक सिखाने और दर्द देने के लिए उनको सजा देने के लिए वो बेहद खतरनाक कुत्ता बेबी नाज़ के ऊपर छोड़ दिया गया। बेबी नाज़ उस कुत्ते के डर से बेसुद हालत में इधर से उधर भागने लगी। खुद को बचाने के लिए। लेकिन विदेशी नस्ल के शिकारी कुत्ते के आगे मासूम सी नन्ही सी बच्ची आखिर कब तक बच सकती थी? और बेचारी बेबी नाज़ को उस कुत्ते ने नोचना शुरू कर दिया। उनको काटना शुरू कर दिया। बेबी नाज़ दर्द से छटपटा रही थी।
बचाने की गुहार लगा रही थी और उनकी बेरहम जल्लाद मां यह सब देख रही थी। कुछ देर के बाद उनकी मां ने उस कुत्ते को दूर किया और बेबी नास को हॉस्पिटल लेकर चली गई जहां उनका इलाज चला और उसी इलाज और दर्द की हालत में बेबी नाज़ को खूब डराया और गया। बेबी ना स्टार्डर्स मैगजीन को दिए गए इंटरव्यू में बताती हैं कि इस घटना के बाद वह अच्छे से समझ गई थी कि उनकी मां को उनसे कोई लगाव नहीं है। बस उनको पैसे से ही प्यार है। नाज़ कहती हैं उसी दिन के बाद से उन्होंने अपने लिए अपनी मां को मरा हुआ मान लिया था। फरियाद मेरी सुन ले सुन बेबी नाज जब 13 साल की थी तो तब उनके सामने एक बहुत बड़ा खुलासा हुआ। उनको पहली बार पता चला कि उनके अब्बा जान और अम्मी के बीच इतनी लड़ाई क्यों होती थी। दरअसल बेबी नाज़ की मां एक राजेंद्र मालोनी नाम के एक कैमरामैन से प्यार करने लग गई थी और वह नाज़ के अब्बू से तलाक चाहती थी और जब तलाक हुआ तो नाज़ की नजरों के सामने ही उनके अब्बू को उनकी मां ने घर से बाहर निकाल फेंका। अब मुझे कौन संभालेगा भगवान? मैं किसके सहारे जिऊंगी? नाज़ को बहुत दुख था। उनको अपने अब्बू से प्यार था, लगाव था क्योंकि उनके अब्बू भी नाज़ की मां के हाथों कहीं ना कहीं पीड़ित थे। भगवान ये तूने क्या कर दिया भगवान? मेरे बाबा को क्यों छीन लिया है मुझसे?
नास भी अपने अब्बू के साथ उस घर से निकल जाना चाहती थी। लेकिन लालची मां ने बेबी नाज़ को जबरदस्ती रोक लिया। क्योंकि अगर बेबी नास चली जाती तो उनकी अय्याशी ऐशो आराम कैसे पूरे होते। लिहाजा कुछ समय बाद बेबी नास की मां ने अपने प्रेमी से दूसरी शादी कर ली। जबकि इनके दूसरे पति पहले से ही शादीशुदा थे और तीन बच्चों के पिता थे। बेबी नाज़ की मां पूरी तरह से अपने प्रेमी जो कि अब पति थे उनके कंट्रोल में थी और वह जैसा कहता बेबी नाज़ की मां वही करती। वो बेबी नाज़ के पैसों को हड़प लेता। अपने शौक पूरे करता और बेबी नाज़ को इसके एवज में वो बहुत परेशान करता था। बेबी नाज़ को यह सब झेलना पड़ रहा था। उनको यह बिल्कुल भी पसंद नहीं था कि उनकी मेहनत की कमाई पर अय्याशी और ऐशो आराम किया जाए। वह अपने दूसरे पिता से नफरत करती थी। ठीक अपनी मां के बराबर। लेकिन एक दिन जब इन सब चीजों की इंतहा हो गई, पानी सर के ऊपर से चला गया तो नाज़ ने अपनी मां से कह दिया कि वह अपने सौतेले पिता के साथ अब नहीं रहेंगी। उन्होंने बेबी नाज़ से कहा कि वह राजेंद्र के साथ दूसरे घर में रह लेंगी। लिहाजा दिन में नाज़ अपनी मां की निगरानी में रहती और रात में उनकी मां उनको अकेला छोड़कर अपने पति के पास चली जाती और इस तरह छोटी सी बच्ची की रातें अकेले कटने लगी। जिसका नतीजा ये हुआ कि उनको घर से निकाले गए अपने अब्बू की याद सताने लगी और एक दिन इसी चिंता में वो अपने अब्बू को मुंबई की सड़कों पर ढूंढने निकल पड़े।
इतने बड़े शहर में उनको ढूंढना मुश्किल था। इतने बड़े शहर में उनको ढूंढना नाज़ के लिए मुश्किल था। लेकिन नाज़ की अच्छी किस्मत रही कि एक दिन बेबी नाज़ को उनके पिता कूड़े के ढेर में बेहोशी की हालत में पड़े हुए मिले। वो अपने पिता की हालत देखकर दर्द से टूट गई। वो अपने अब्बू को घर लेकर आई। पिता की हालत और दर्द देखकर बेबी नाज़ का गुस्सा फूट पड़ा और इसी गुस्से में बेबी नाज़ ने अपनी लालची मां को घर से निकल जाने के लिए कह दिया। जिस वक्त यह सब हो रहा था, उस वक्त बेबी नाज़ लगभग 16 साल की हो चली थी। जहां बेबी नाज़ ने मां को घर से बाहर कर दिया, तो वहीं उनकी मां को उनके पति ने भी घर में घुसने नहीं दिया। जिसके बाद बेबी नाज़ के पास वो वापस आई और दोबारा उसी घर में रहने की गुजारिश करने लगी। लेकिन लालची मां को बेबी नाज़ ने नहीं रखा। जिसके बाद वह फिर से पति के घर गई मिन्नतें करते हुए।
बेबी नाज़ की मां को घर तो मिला लेकिन अब उनका पति ही बेबी नाज़ की मां पर जुल्म करने लगा। और इस जुल्म की वजह यह थी कि राजेंद्र मालोनी ने दूसरी शादी इसीलिए की थी ताकि उनको बेबी नाज़ के पैसे मिलते रहे। लेकिन जब बेबी नाज़ ने ही अपनी मां को बाहर निकाल दिया तो सारे रिश्ते खत्म कर दिए। तो अब उनकी मां का उनकी जिंदगी में कोई काम नहीं बचा। स्टार्ट मैगजीीन को दिए गए अपने इंटरव्यू में नाज़ बताती हैं कि कुछ दिनों के बाद पति के जरूरत से ज्यादा जुल्मों के कारण उनकी मां की मौत हो गई। बेबी नाज़ की किस्मत भी बड़ी गजब की थी और अजब थी उनकी मनोस्थिति। उनकी लालची मां की दुनिया से विदाई हो गई थी। लेकिन बेबी नाज़ को रत्ती भर भी दुख ना था। कुछ दिन गुजरे और अब उनके अब्बा भी इस दुनिया को छोड़कर चले गए। लेकिन नाज़ को अपने अब्बू के चले जाने का बहुत दुख था और जिंदगी में चल रहे.
इसी उतार-चढ़ाव, दुख, तकलीफ का इनकी प्रोफेशनल लाइफ पर बहुत बुरा असर पड़ रहा था। अपने इंटरव्यू में नाज आगे बताती हैं कि उनके स्टारडम के समय में लोग तरह-तरह की बातें करते ना से कई सारी उम्मीदें लगाते थे कि बेबी नाज़ बड़े होकर हिंदी सिनेमा की सबसे खूबसूरत मधुबाला और मीना कुमारी से ऊपर जाएंगी। उनके सारे रिकॉर्ड्स तोड़ देंगी। लेकिन असल जिंदगी में रिकॉर्ड तोड़ना तो बहुत दूर की बात थी। बेबी नाज़ अपनी निजी जिंदगी की वजह से इन महान अभिनेत्रियों की लोकप्रियता के रत्ती भर भी करीब नहीं पहुंच पाई। दाता तेरे घर देर है अंधेर नहीं। नाज़ ने लगभग 40 फिल्मों में बतौर एक अभिनेत्री काम किया। लेकिन इतना काम करने के बाद भी बेबी नाज़ की पहचान कहीं अधूरी और अंधकार में रह गई। चाइल्ड आर्टिस्ट के तौर पर अपने स्टारडम और मैच्योर एक्ट्रेस के नाते यह आगे काम नहीं कर पाई और इनका पूरा करियर चौपट और बर्बाद हो गया। दुनिया करे सवाल तुम बेबी नाज़ ने स्टारडस्ट को अपना यह इंटरव्यू साल 1982 में दिया थ
और इस वक्त नाज़ के अब्बू और अम्मी अलविदा हो चुके थे। लेकिन उनका सौतेला पिता अभी तक जिंदा था और वो बेबी नाज़ से किसी ना किसी तरह से मिलने की कोशिशें किया करता था। लेकिन नाकामी हाथ लगती। बेबी राजेंद्र को ही अपनी जिंदगी का असली विलेन समझती थी। क्योंकि एक उसी इंसान की वजह से उनके अब्बू और अम्मी का तलाक हुआ था। घर टूट कर बिखर गया था। इतने दुख दर्द नसीब में आए, निजी जिंदगी में आए और फिल्मी सफर बर्बाद हो गया। तो ऐसे इंसान से नाज़ भला कैसे मिल सकती थी। इसीलिए वो हमेशा सौतेले पिता की काली लालची परछाई से भी दूर रहती थी।
समय गुजरा और बेबी नाज़ जिंदगी के कड़वे सच का खून का घूंट पीकर जीने लगी। एक दिन अचानक बेबी नाज़ के पेट में दर्द उठा। तकलीफ असहनीय थी। लिहाजा उन्हें अस्पताल ले जाया गया। जांच करने पर पता चला कि उनको लीवर कैंसर हो गया है। जिंदगी भर दुख दर्द झेलती आ रही बेबी नास को भगवान ने भी कहीं भी कोई भी सुख नहीं दिया। बस बेबी नाज़ के नसीब में लिख दिए थे गम, कैंसर का दर्द और हफ्तों तक कोमा में रहने के बाद। एक दिन आखिरकार 19 अक्टूबर साल 1995 को वो वक्त भी आया जब इसी तकलीफ में बेबी नाज़ ने इस दुनिया को ही छोड़ दिया। उनका दर्दनाक अंत हो गया। बेबी नास के शरीर को बेशक इस दर्द से निजात मिल गई हो लेकिन इनकी मौत पर भारतीय हिंदी सिनेमा के किसी भी अभिनेता या अभिनेत्री फिल्म निर्माता ने कोई भी शिरकत नहीं की या यूं कहिए कि बेबी नाज़ की मौत गुमनाम होकर ही रह गई। लोगों को पता ही नहीं चला कि हिंदी सिनेमा के गोल्डन एरा का एक बेशकीमती एक चमकता सितारा हमेशा हमेशा के लिए ना जाने कब डूब गया। देर ना करना कहीं ये आंसू टूट जाए सांस छूट जाए। दोस्तों, बेबी नाज़ आज हमारे बीच नहीं है। लेकिन यह बात बड़ी हैरान कर देने वाली है कि बेबी नाज़ के अंदर वो सारी खूबियां थी जो एक टॉप मोस्ट अदाकारा के अंदर होती है।
लेकिन फिर भी वो कभी टॉप मोस्ट हीरोइन नहीं बन सकी और शायद इसके पीछे की वजह वो अपनी मां को मानती थी क्योंकि वह पैसों के लालच में हर तरह के किरदार करती थी। अच्छे और बुरे जिसकी वजह से उनकी जिंदगी अंधकार में डूब गई। भगवान भी कितना कठोर है। जिन्हें दया चाहिए उन्हीं के साथ अन्याय करता है। बेबीनाज़ ने अपनी जिंदगी में साल 1963 में प्रेम विवाह भी किया था। उनके पति का नाम था सुबी राज जो कि हिंदी सिनेमा की फिल्मों के हीरो थे और राज कपूर के कजिन भी। बेबी नाज़ और उनके पति ने एक साथ कई फिल्मों में भी काम किया था। बहारों से पूछो मेरे प्यार को। इस शादी से बेबीनाज़ की दो संताने हुई। बेबीनाज़ को जब हिंदी सिनेमा में काम नहीं मिल रहा था तो ऐसे में बेबीनाज़ ने फिल्मों के लिए साउंड डबिंग करनी भी शुरू कर दी और उन्होंने मशहूर अभिनेत्री श्रीदेवी के लिए डबिंग की। वो कई फिल्मों में श्रीदेवी की आवाज बनी थी। बस रवि बस अब यह चुभने वाले शब्द बर्दाश्त नहीं होते। आज हमें पता चला हमारे कारण कितने गरीबों का दिल दुखा होगा। यानी चेहरा तो श्रीदेवी का और आवाज बेबी नाज़ की होती थी।क्यों री चुगलखोर? दो कौड़ी के फूल बेचने वाली हमारी शिकायत करती है।
राजू को किसने बताया कि उसके बाप से हमने फूल तोड़े। जवाब दे वरना ना काटूंगी। दोस्तों बेबी नाज़ ने भले ही 50 साल की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह दिया हो लेकिन उनके अभिनय की छाप और याद आने वाले 500 सालों तक भी मिट नहीं पाएगी। बेबीनाज़ को जिंदगी में कभी कोई सुख नहीं मिला। हमेशा दर्द ही उनकी जिंदगी को खाता चला गया। उनकी जिंदगी और किस्मत को भगवान ने भी न जाने कौन से कर्मों की सजा दी थी। आज भले ही बेबी नाज नहीं है लेकिन हम सब मिलकर पूरे सम्मान के साथ उनको भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं। दिल जुता कैद में दीवाना है मेरा। तो दोस्तों, यह था भारतीय हिंदी सिनेमा की चर्चित और बदनसीब चाइल्ड आर्टिस्ट बेबी नाज़ की जिंदगी और मौत का सफर जिसको हमने आपके सामने रखा। दोस्तों, बेबी नाज़ की जिंदगी के बारे में जानकर आप क्या कहना चाहते हैं? आपको क्या लगता है कि बेबी नाज़ की जिंदगी का गुनहगार