दोस्तों गुजरात शहर की गलियों में एक ऑटो वाला हर दिन एक भिखारी बुजुर्ग को खाना खिलाता था। लेकिन 15वें दिन उस बुजुर्ग ने कुछ ऐसा कहा कि मनोहर की दुनिया ही हिल गई। क्या था वो राज और क्यों उसकी आंखें फटी की फटी रह गई जब सच्चाई सामने आई। दोस्तों इस रहस्य को जानने के लिए वीडियो के अंत तक बने रह। दोस्तों गुजरात के एक छोटे शहर में एक साधारण सा परिवार रहता था। जिसके दिलों में प्यार भरा था लेकिन जेबें खाली थी। इस परिवार में मनोहर, उसकी पत्नी कामिनी और उनके दो प्यारे बच्चे शीतल और मुकेश रहते थे।
मनोहर दिन रात ऑटो चलाकर अपने परिवार का पेट पालता था। सुबह जब सूरज की पहली किरणें उसकी झोपड़ी पर पड़ती, वह अपने ऑटो को चमकाता और सवारियों की तलाश में निकल पड़ता। कामिनी घर संभालती। छोटे-छोटे पैसों को जोड़कर बच्चों की पढ़ाई का इंतजाम करती। भले ही गरीबी थी, लेकिन उनके घर में हंसीखुशी का माहौल हमेशा रहता।
शीतल जो परिवार की बड़ी बेटी थी, दसवीं कक्षा में पढ़ती थी। उसका सपना था कि वह एक दिन बड़ा डॉक्टर बने और अपने माता-पिता की हर तकलीफ को दूर कर दे। वह अक्सर अपने पापा से कहती, पापा मैं बहुत पढूंगी और एक दिन आपको बड़ा गर्व होगा। मनोहर उसकी बात सुनकर मुस्कुराता लेकिन दिल में एक टीस उठती। वो चाहता था कि उसके बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़े। लेकिन पैसों की तंगी की वजह से उसे उन्हें साधारण स्कूल में ही भेजना पड़ता। फिर भी वो अपने बच्चों के सपनों को टूटने नहीं देना चाहता था
छोटा बेटा मुकेश जो छठी कक्षा में था हमेशा शरारतें करता और घर में हंसी का माहौल बनाए रखता। एक दिन की बात है मनोहर एक सवारी को लेकर शहर के एक कोने में गया। वहां पहुंचते-पहुंचते दोपहर हो गई थी। भूख लग रही थी तो उसने अपना ऑटो सड़क के किनारे खड़ा किया और डिग्गी से टिफिन निकाल कर खाना शुरू किया। पास ही एक पेड़ की छाव में एक बुजुर्ग बैठा था। उसके कपड़े फटे पुराने थे। चेहरा मैला और बाल बिखरे हुए। देखने में वह बिल्कुल भिखारी जैसा लग रहा था। मनोहर की नजर उस पर पड़ी और उसने देखा कि वो बुजुर्ग भूखी नजरों से उसे देख रहा था। मनोहर का दिल पसीज गया।
उसने जोर से पुकारा बाबा क्या आप भी खाना खाएंगे? बुजुर्ग ने धीरे से सिर हिलाया। मनोहर ने अपने टिफिन से आधा खाना निकाला और उसे दे दिया। लो बाबा खा लो। कोई दिक्कत नहीं। उसने अपनी पानी की बोतल भी उसे थमा दी। बुजुर्ग ने चुपचाप खाना खाया। लेकिन उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक थी। खाना खाने के बाद मनोहर ने उससे पूछा, बाबा आप कौन है? यहां क्या कर रहे हैं? बुजुर्ग ने धीमी आवाज में कहा, बेटा मैं मुंबई का रहने वाला हूं। पता नहीं कैसे यहां आ गया। मुझे कुछ याद नहीं। उसकी बात सुनकर मनोहर को लगा कि शायद इस बाबा का दिमाग थोड़ा खराब है। फिर भी उसने थोड़ी देर और बात की। बुजुर्ग उलटपुलट बातें करता रहा।
कभी कहता कि वह दिल्ली का है तो कभी कोलकाता का। मनोहर ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया और अपने ऑटो में सवारियां ढूंढने निकल गया। लेकिन उस रात जब मनोहर घर लौटा उस बुजुर्ग का चेहरा उसके दिमाग में बार-बार आ रहा था। उसकी आंखों में कुछ ऐसा था जो मनोहर को बेचैन कर रहा था। उसे लग रहा था कि उस चेहरे के पीछे कोई बड़ा राज छुपा है। अगली सुबह उसने कामिनी से कहा, सुनो आज मेरे लिए थोड़ा ज्यादा खाना रख देना। एक बुजुर्ग बाबा मिले हैं। उन्हें भी खाना खिला दूंगा। कामिनी ने हैरानी से पूछा, “कौन बाबा? कहां मिले?” लेकिन मनोहर ने हंसते हुए कहा, बस एक गरीब बुजुर्ग है। भूखे प्यासे दिखे तो दिल में दया आ गई। कामिनी कुछ कहने वाली थी। लेकिन मनोहर की नेकदिली देखकर चुप रह गई।
उसने टिफिन में अतिरिक्त खाना रख दिया। उस दिन जब लंच का समय हुआ मनोहर अपने ऑटो को लेकर उसी जगह पहुंचा जहां उसे बुजुर्ग मिला था। वहां पहुंचकर उसने देखा कि बाबा थोड़ी दूर एक दूसरे पेड़ के नीचे बैठे हैं। मनोहर ने ऑटो रोका और उनके पास गया। बाबा खाना खाएंगे? उसने फिर से पूछा। बुजुर्ग ने फिर सिर हिलाया। मनोहर ने खाना निकाला और उनके साथ बैठकर खाने लगा। इस बार उसने बाबा से ज्यादा बात नहीं की बल्कि अपने दिल की बातें शेयर की। बाबा मेरा परिवार बहुत गरीब है। मैं दिन रात मेहनत करता हूं। लेकिन बच्चों को अच्छी पढ़ाई नहीं करवा पाता। मेरी बेटी शीतल डॉक्टर बनना चाहती है। लेकिन मैं उसे अच्छा स्कूल भी नहीं दे पा रहा। मनोहर की आंखें नम हो गई। बुजुर्ग चुपचाप सुनता रहा। लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया। यह सिलसिला अब रोज का हो गया। मनोहर हर दिन उस बुजुर्ग को खाना खिलाने जाता। धीरे-धीरे बाबा उसे पहचानने लगे। मनोहर को भी उनकी संगत अच्छी लगने लगी। वो सोचता शायद बाबा का कोई नहीं है। अगर मैं इन्हें खाना ना दूं तो यह भूखे मर जाएंगे। उसका दिल दया और करुणा से भर गया। 15 दिन बीत गए। हर दिन मनोहर बाबा को खाना देता। उनके साथ बैठता और अपने दिल की बातें कहता। बाबा ज्यादातर चुप रहते। लेकिन उनकी आंखों में एक गहरी उदासी दिखती। फिर एक दिन कुछ ऐसा हुआ जिसने मनोहर को हक्का बक्का कर दिया। उस दिन जब मनोहर खाना लेकर बाबा के पास पहुंचा तो बाबा ने पहली बार उससे खुद बात शुरू की। बेटा मनोहर तू कैसा है? सब ठीक है ना? उनकी आवाज में एक अजीब सी गर्मजशी थी। मनोहर चौंक गया। आज तक तो वो खुद ही बाबा से बात शुरू करता था। लेकिन आज बाबा ने उसका नाम लेकर हालचाल पूछा। उसने हंसते हुए कहा, बाबा मैं तो ठीक हूं। आप बताओ आप कैसे हैं? बाबा ने मुस्कुरा कर कहा, बेटा मैं भी ठीक हूं। खाना लाया मेरे लिए? मनोहर ने खुशी-खुशी खाना निकाला और बाबा को दे दिया।
दोनों साथ बैठकर खाने लगे। लेकिन आज बाबा का व्यवहार कुछ बदला बदला सा था। खाना खाने के बाद उन्होंने अचानक कहा, बेटा तू मेरे बारे में क्या जानता है? मनोहर हंस पड़ा। बाबा आपने तो कभी कुछ सही सही बताया ही नहीं। कभी कहते हो कि आप मुंबई के हैं, कभी दिल्ली के तो कभी कोलकाता के। आप तो कहते हैं कि कोलकाता में आपका बड़ा मकान है। बुजुर्ग ने गहरी सांस ली और कहा, बेटा आज मैं तुझे अपने बारे में सब सच बताना चाहता हूं। अगर तू मदद करे तो मुझे मेरे घर तक पहुंचा दे। मैं इस तरह भिखारी जैसा नहीं जी सकता। शायद मुझे कुछ हो गया था। इसलिए मेरी ऐसी हालत हुई। मनोहर को लगा कि बाबा फिर कोई कहानी सुना रहे हैं। लेकिन आज उनकी आंखों में एक गहरी सच्चाई थी। उसने पूछा बाबा सच में बताओ आप कौन है? बुजुर्ग ने कहा, “मेरा नाम मदन लाल है। मैं फलाने गांव का रहने वाला हूं।” उन्होंने जिस गांव का नाम लिया, वह मनोहर के शहर से करीब 40 कि.मी. दूर था। मनोहर को उस गांव के बारे में थोड़ा बहुत पता था। उसने हैरानी से पूछा, बाबा आप मजाक तो नहीं कर रहे? रोज तो आप कुछ ना कुछ नया बोलते हैं।
मदन लाल ने गंभीर होकर कहा, नहीं बेटा, इस बार मैं सच बोल रहा हूं। अगर तुझे यकीन नहीं तो मेरे साथ मेरे गांव चल। वहां मेरा बड़ा घर है। ढेर सारी जमीन है। मनोहर के लिए यह बात किसी सपने जैसी थी। उसने कहा बाबा सच में ठीक है मैं आपको ले चलूंगा। मदन लाल ने कहा बेटा मुझे अपने ऑटो में बिठा और मेरे घर ले चल। वहां पहुंचकर मैं तुझे किराया भी दूंगा। यह सुनकर मनोहर और चौंक गया। आज तक बाबा ने कभी किराए की बात नहीं की थी। उसने कहा बाबा अभी दिन में मुझे काम करना है। रात को सफर करना ठीक नहीं। मैं ऐसा करता हूं। आप शाम को यहीं मिलना। मैं आपको अपने घर ले जाऊंगा और सुबह हम आपके गांव चलेंगे। मदन लाल ने सिर हिलाया और कहा ठीक है बेटा मैं यही तेरा इंतजार करूंगा।
मनोहर अपने ऑटो में सवारियां ढूंढने निकल गया। लेकिन उसका दिमाग बाबा की बातों में उलझा रहा। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि बाबा सच बोल रहे हैं। पता नहीं फिर कोई कहानी तो नहीं बना रहे। उसने सोचा शाम हुई मनोहर जब घर जाने की तैयारी कर रहा था। उसे अचानक मदन लाल की याद आई। उसने सोचा चलो एक बार जाकर देख लेता हूं। शायद वहां हो भी ना। वह अपने ऑटो को लेकर उसी जगह पहुंचा। लेकिन वहां का नजारा देखकर वह दम रह गया। मदन लाल सचमुच उसका इंतजार कर रहे थे। जैसे ही मनोहर का ऑटो दिखा, वह तेजी से सड़क पर आ गए। मनोहर ने उन्हें ऑटो में बिठाया और अपने घर ले गया। घर पहुंचते ही कामिनी ने बुजुर्ग को देखा और समझ गई कि यह वही बाबा है। जिन्हें मनोहर खाना खिलाता था। वो गुस्से में बोली, “यह क्या? इन्हें घर क्यों ले आए?” मनोहर ने धीरे से समझाया कामिनी यह बाबा कोई साधारण इंसान नहीं लगते। इन्होंने कहा है कि इनका बड़ा घर है। अगर मैं इन्हें उनके घर पहुंचा दूं तो एक इंसान की जिंदगी संवर जाएगी।
कामिनी गुस्सा तो थी लेकिन मनोहर की बात मान गई। उसने खाना बनाया और मदन लाल को खाना परोसा। खाना खाने के बाद मदन लाल ने कहा बेटा मुझे पहले नहाना है। ऐसे गंदे कपड़ों में कैसे आराम करूंगा? मनोहर ने उनके लिए नहाने का इंतजाम किया और अपने कुछ पुराने कपड़े दे दिए। नहा धोकर मदन लाल बिस्तर पर लेट गए। रात को कामिनी ने मनोहर से फिर झगड़ा किया। तुमने बिना पूछे इन्हें क्यों लाए? हमारे पास पहले ही खाने की कमी है। मनोहर ने समझाया। कामिनी मुझे लगता है कि बाबा को सब याद आ गया है। अगर वह अपने घर पहुंच गए तो उनकी जिंदगी बन जाएगी। बस एक बार उनको उनके गांव ले जाऊं। अगली सुबह मनोहर ने मदन लाल को जगाया और अपने ऑटो में बिठाकर उनके गांव की ओर चल पड़ा। रास्ते में मदन लाल चुप थे। लेकिन उनके चेहरे पर एक अजीब सी खुशी थी। जैसे ही वे गांव में पहुंचे, कुछ लोग मदद लाल को देखकर चौंक गए। वे अजीब नजरों से उन्हें देखने लगे। मदन लाल ने मनोहर को एक हवेली की ओर ले गए। वो हवेली इतनी आलीशान थी कि मनोहर की आंखें फटी रह गई। बाबा, यह आपका घर है।
उसने हैरानी से पूछा। मदन लाल ने सिर हिलाया और ऑटो से उतर कर हवेली के अंदर चले गए। वहां रहने वाले लोग उन्हें देखकर चौंक गए। मदन लाल तुम कहां थे? हमने तुम्हें कितना ढूंढा? उन्होंने कहा लेकिन मदन लाल गुस्से में चिल्लाए। तुमने मुझे ढूंढा? तुमने तो मेरी हवेली पर कब्जा कर लिया। मेरे भाई होकर भी तुमने मेरा साथ नहीं दिया। मनोहर सब चुपचाप देख रहा था। उसने मदन लाल से पूछा। बाबा यह सब क्या है? आपके भाई तो हैं। इन्हें क्यों निकाल रहे हैं? मदन लाल ने गहरी सांस ली और कहा बेटा यह मेरे भाई नहीं। इन्होंने मेरे साथ बहुत गलत किया। मेरी ऐसी हालत इन्हीं की वजह से हुई थी। मनोहर ने पूछा बाबा पूरी बात बताइए। आखिर हुआ क्या था?
मदन लाल ने अपनी कहानी शुरू की। बेटा 3 साल पहले मैं अपनी बेटी के साथ इस हवेली में खुशी-खुशी रहता था। लेकिन मेरी बेटी ने किसी से प्यार कर लिया और भाग गई। मेरे भाइयों ने मुझे ताने मारने शुरू किए। देख तेरी बेटी ने तेरी नाक कटवा दी। बड़ा आया था पढ़ाने लिखाने वाला। उनकी बातें मेरे दिल को चुभती थी। मेरी बेटी मेरे लिए सब कुछ थी। जब वह चली गई तो मैं अकेला पड़ गया। धीरे-धीरे मैं डिप्रेशन में चला गया। एक दिन मैं सब छोड़कर इस हवेली से निकल गया। मैं भटकता रहा लेकिन वापस आने का मन नहीं हुआ। फिर एक दिन तू मुझे मिला। तूने मुझे खाना दिया। मेरी बातें सुनी। तेरी वजह से मेरा दिमाग ठीक हुआ। तूने मुझे फिर से जीने की वजह दी। मनोहर की आंखें नम हो गई। उसने कहा बाबा मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा कि आपके पास इतना सब कुछ है। मदन लाल ने मुस्कुरा कर कहा बेटा यह हवेली तो कुछ भी नहीं। चल तुझे अपनी जमीन दिखाता हूं। वे दोनों ऑटो में बैठकर मदन लाल की जमीन देखने गए। वहां 25 से 26 एकड़ की विशाल जमीन थी। और एक छोटा सा फार्म हाउस भी। मनोहर की आंखें फिर से फट गई। बाबा आप तो करोड़पति हैं। उसने कहा मदन लाल ने कहा बेटा मैं चाहता हूं कि तू अपने परिवार को लेकर यहां आ जा। तुझे मेरी जमीन और हवेली संभालनी होगी। मैं तुझे अपने बेटे की तरह रखूंगा। मनोहर ने पहले तो मना किया। लेकिन मदन लाल के बार-बार कहने पर वो मान गया।
अगले दिन वो अपनी पत्नी और बच्चों को लेकर हवेली में शिफ्ट हो गया। मदन लाल ने उन्हें अपने परिवार की तरह अपनाया। कामिनी हवेली में खाना बनाती। बच्चे वहां खेलते और मदन लाल दादाजी की तरह उन पर प्यार लुटाते। इस तरह एक ऑटो वाले की नेक दिली ने ना सिर्फ एक बुजुर्ग की जिंदगी बदली बल्कि अपने परिवार का भविष्य भी संवार दिया।