यह खबर सुनकर आज हर सिनेमा प्रेमी का दिल बैठ गया। हमारे जमाने के अंग्रेजों के जमाने के जेलर यानी दिग्गज अभिनेता गोवर्धन असरानी अब हमारे बीच नहीं रहे। बॉलीवुड के इस महान हंसाने वाले कलाकार ने आज 84 साल की उम्र में मुंबई में अंतिम सांस ली। और सोचिए यह और भी ज्यादा इमोशनल कर देता है कि इस दुखद खबर से महज कुछ घंटे पहले ही उन्होंने अपने फैंस को सोशल मीडिया पर हैप्पी दिवाली विश किया था।
त्यौहार के मौके पर आया यह अलविदा फिल्म इंडस्ट्री के लिए एक बहुत बड़ा झटका है। यह कहानी है एक ऐसे कलाकार की जिसने गरीबी और संघर्ष के बीच से रास्ता निकाला। जो गणित में कमजोर था, लेकिन जिसने एक्टिंग में पूरे बॉलीवुड का गणित बदल दिया। उनका नाम था गोवर्धन असरानी। लेकिन दुनिया उन्हें सिर्फ असरानी के नाम से जानती थी। उनका जन्म 1 जनवरी को हुआ था। उनके जन्म की तारीख भले ही 1940 या 1941 को लेकर थोड़ी कंफ्यूजन हो लेकिन जगह थी जयपुर राजस्थान जहां उनका पालन पोषण एक मध्यमवर्गीय सिंधी हिंदू परिवार में हुआ था। इनके पिता की वहां कारपेट की दुकान थी।
पिता भी चाहते थे कि बेटा भी धंधे में हाथ बटाए क्योंकि गणित में उनका मन नहीं लगता था। लेकिन असरानी साहब का दिल तो दुकान में नहीं बल्कि सिनेमा की अंधेरी दुनिया में लगता था। फिल्मी दुनिया के लिए उनका जुनून इतना ज्यादा था कि वो स्कूल से भागकर सिनेमा देखने जाया करते थे। घरवालों ने उन पर पाबंदी लगाने की कोशिश की। पिता चाहते थे कि वह सरकारी नौकरी करें। लेकिन असरानी साहब के मन में तो एक्टिंग बस चुकी थी। इसी जुनून के चलते उन्होंने बिना किसी को कुछ बताए गुरदासपुर से मुंबई की ट्रेन पकड़ ली।
यहां आकर उन्होंने म्यूजिक डायरेक्टर नौशाद से मदद मांगी लेकिन बात नहीं बनी। यहां तक कि उन्होंने उस दौर में अपने एफटीआईआई सर्टिफिकेट को दिखाकर काम मांगा। तो लोग मजाक उड़ाते और कहते तुमको क्या लगता है? एक्टिंग के लिए सर्टिफिकेट लगता है? बड़े स्टार्स के पास नहीं है। तुम निकलो यहां से। 2 साल के संघर्ष के बाद वह थक गए तो वापस जयपुर आए। घर पर पिता के काम में हाथ बटाने लगे लेकिन मन नहीं माना। इसी दौरान उन्होंने 1960 में शुरू हुए पुणे के एफडीआईआई फिल्म इंस्टट्यूट के एक्टिंग कोर्स का विज्ञापन देखा। वहां एडमिशन लिया और पहले ही बैच जो कि 1964 और 1966 में शुरू हुआ था उसमें एक्टिंग का कोर्स पूरा किया। डिप्लोमा में हाथ था लेकिन काम फिर भी मुश्किल से मिलता था।
उन्होंने अपनी पहली गुजराती फिल्म में बतौर हीरो का काम किया था और हिंदी में भी हीरे कांच की चूड़ियां में काम मिला लेकिन काम बहुत छोटा था। जब उनके घरवाले ने उन्हें फिल्म सीमा के एक गाने में देखा तो वे सीधे मुंबई आए और उन्हें खींच कर वापस घर ले गए। किसी तरह मनाकर वे फिर मुंबई लौटे। गुजारा करने के लिए उन्होंने उसी एफटीआईआई में एक्टिंग टीचर का काम शुरू किया। 6 साल तक वह हर शुक्रवार ₹6 और आठ आने का टिकट लेकर डेक्कन क्वीन से पुणे से मुंबई आते जाते और काम खोजते। इसी दौरान उनकी मुलाकात ऋषिकेश मुखर्जी से हुई।
जिन्हें वह पहले भी काम देने के लिए कह चुके थे। ऋषिकेश दा ने मजाक में कहा, पहले यह बताओ जया बहादुरी कौन है? जया उस समय उनकी स्टूडेंट थी। ऋषिकेश दा ने उन्हें गुड्डी के लिए चुना। असरानी ने हिम्मत करके फिर काम मांगा तो ऋषिकेश दा ने कहा तुम्हारा कुछ नहीं जब चिट्ठी भेजूंगा तब आना। और किस्मत देखिए 3 महीने बाद चिट्ठी आई भी लेकिन वो जया बहादुरी के लिए।
लेकिन आखिरकार असरानी को ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म गुड्डी में एक रोल मिला। एक ऐसे लड़के का जो हीरो बनने आता है लेकिन जूनियर आर्टिस्ट बन जाता है। इस रोल के लिए ऋषिकेश दा ने उन्हें पुणे से मुंबई फर्स्ट क्लास में आने के लिए पैसे भी दिए। इसके बाद सत्य काम मेरे अपने बावर्ची नमक हराम चुपके-चुपके मिली, आलाप, तपस्या उनकी फिल्मों की लंबी लिस्ट हो गई।
उनका रिश्ता ऋषिकेश दा के साथ इतना गहरा था कि जब ऋषिकेश दा हॉस्पिटल में थे तो उन्होंने कागज पर लिखकर दिया था असरानी मुखर्जी जिसका मतलब था तुम मेरे बेटे जैसे हो। असरानी उन छंद कलाकारों में से एक थे जिन्होंने दो बड़े सुपरस्टार्स का उदय और पतन बहुत करीब से देखा। वो राजेश खन्ना के करीबी दोस्त में से एक थे और उन्होंने काका के साथ 25 से ज्यादा फिल्में की। असरानी ने खुद देखा था कि कैसे राजेश खन्ना के प्रीमियर पर भीड़ बेकाबू हो जाती। लाठी चार्ज हो जाता और लोग उन्हें भगवान जैसा समझते थे। उन्होंने यह भी बताया था कि आराधना में राजेश खन्ना के दोस्त का रोल सिर्फ इसलिए उनके हाथ से निकल गया था क्योंकि वह काका के सामने कद में छोटे लगते थे।
फिर आया वह दौर जब अमिताभ बच्चन का स्टारम शुरू हुआ। नमक हराम के सेट पर इन दोनों सुपरस्टार्स के बीच का टेंशन असरानी ने महसूस किया था। राजेश खन्ना को सुपरिटी कॉम्प्लेक्स था। उन्हें लगता था कोई उन्हें हिला नहीं सकता। जबकि अमिताभ बच्चन फ्लॉप दे रहे थे। ऋषिकेश दा ने दोनों से पूछा था। एक रोल में मरता है एक लड़ता है। कौन सा चाहिए? उन दिनों पर्दे पर मरने वाले एक्टर को ज्यादा तारीफ मिलती थी। इसलिए राजेश खरना ने मरने वाले रोल को चुना। लेकिन आखिरी दिन अमिताभ बच्चन ने शॉट देने से मना कर दिया। वो चाहते थे कि क्लाइमेक्स बदल जाए। ऋषिकेश दा ने नाराज होकर कहा या तो शूट करो नहीं तो मैं राजेश की फोटो भी हटा दूंगा और फिल्म बंद कर दूंगा। अमिताभ ने शूट किया लेकिन जब फिल्म रिलीज हुई और क्लाइमेक्स में अमिताभ बच्चन ने गुस्से में पूछा किसने मारा? तो सिनेमा हॉल में तालियां बजी और यहीं से एंग्री यंग मैन की शुरुआत हुई। असरानी ने यह खुद महसूस किया कि इसी फिल्म के बाद राजेश खन्ना का डाउनफॉल शुरू हो गया था।
लेकिन असरानी का करियर तब अमर हुआ जब उन्होंने फिल्म शोले जो कि 1975 में आई थी। इस फिल्म में वह किरदार निभाया जिसके बिना यह फिल्म अधूरी है। जेलर का रोल। हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं। यह डायलॉग आज भी उनकी पहचान है। इस किरदार की तैयारी के किस्से भी बहुत शानदार हैं।
लेखकों सलीम जावेद ने उन्हें हिटलर की अनसीन फोटोग्राफ्स दिखाई और कहा कि वो एक ऐसा लुक चुने। हिटलर अपनी हर स्पीच से पहले रिहर्सल करता था और जेलर की आवाज में जो ठहराव और उतार-चढ़ाव है वो हिटलर की टोन से प्रेरित था। उनके टीचर रोशन तनेजा ने भी हिटलर की वॉइस मॉड्यूलेशन को सिखाया और डायलॉग के बाद का मशहूर हाहा उन्होंने हॉलीवुड के एक्टर जैक लेमन की फिल्म द ग्रेट रेस से लिया था।
यह डायलॉग इतना हिट हुआ कि आज भी चुनावों में प्रचार के दौरान लोग उनसे यह लाइनें बुलवाने के लिए कहते थे। उन्होंने कॉमेडी के अलावा कौशिश, चैताली जैसी फिल्मों में नेगेटिव और खून पसीना में गंभीर भूमिकाएं भी निभाई। उन्होंने अपने नाम एक रिकॉर्ड किया। 70 के दशक में 101 फिल्में और 80 के दशक में 107 फिल्में। वो 25 साल तक लगातार राजेश खन्ना, बी आर चोपड़ा, शक्ति सामंता, मनमोहन देसाई और बासू चटर्जी जैसे दिग्गजों के साथ काम करते रहे।
इस रिकॉर्ड के लिए उन्हें आज की ताजा खबर और बालिका वधू के लिए बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का फिल्म फेयर अवार्ड भी मिल चुका है। इसके अलावा अनहोनी के लिए उन्हें शमा सुषमा अवार्ड भी मिल चुका था। एक्टिंग के अलावा असरानी ने फिल्में डायरेक्ट भी की। उनकी पहली गुजराती फिल्म अहमदाबाद में रिक्शा वालों जो कि 1974 में आई थी, इसके टाइटल ट्रैक को किशोर कुमार ने गाया था। उन्होंने खुद की जिंदगी से प्रेरित होकर हिंदी फिल्म चलना मुरारी हीरो बनने डायरेक्ट की। इस फिल्म को अच्छी क्रिटिक रेटिंग मिली लेकिन हीरो वाला कॉम्प्लेक्स ना होने के कारण कोई बड़ा एक्टर उनकी फिल्म में काम नहीं करना चाहता था। उन्हें एक निर्माता ने सलाह भी दी थी कि जिस दिन तुम खुद को डायरेक्टर अनाउंस करोगे एक्टर के तौर पर तुम्हारी विश्वसनीयता कम हो जाएगी।
लेकिन फिर भी उन्होंने फिल्में बनाई जैसे सलाम मेम साहब हम नहीं सुधरेंगे दिल ही तो है और उनकी आखिरी डायरेक्टरल फिल्म उड़ान जो कि 1997 में आई थी। उनकी निजी जिंदगी भी बहुत खूबसूरत रही। उनकी मुलाकात एक्ट्रेस मंजू बंसल से आज की ताजा खबर और नमक हराम के सेट पर हुई थी। यहीं दोस्ती हुई जो प्यार में बदली और दोनों ने शादी कर ली। मंजू बंसल ने भी दीवानगी, उधार का सिंदूर जैसे 10 से ज्यादा फिल्मों में काम किया है। इस कपल ने तपस्या, चांदी सोना, नालायक, चोर सिपाही समेत कई फिल्मों में एक साथ काम किया और खुद असरानी ने ही मंजू के साथ अपनी होम प्रोडक्शन फिल्म हम नहीं सुधरेंगे डायरेक्ट की। उनका एक बेटा है नवीन असरानी जो अहमदाबाद में डेंटिस्ट है और एक बेटी है लवीना असरानी।
80 और 90 के दशक में जब एक्शन फिल्मों का दौर आया और कॉमेडियन का रोल कम होने लगा तो असरानी ने हार नहीं मानी। उन्होंने डेविड धवन की मसाला कॉमेडी जैसे घरवाली बाहर वाली बड़े मियां छोटे मियां में काम किया और फिर प्रियदर्शन की कॉमेडी जैसे हेराफेरी गरम मसाला भागमभाग चुप-छुप के मालामाल विकली में अपनी जगह बनाए रखी। उन्होंने रोहित शेट्टी की गोलमाल सीरीज और बोल बच्चन जैसी फिल्मों में भी काम किया। हाल ही में वह पॉपुलर वेब सीरीज, परमानेंट रूममेट्स और टीवी शो पार्टनर्स ट्रबल हो गई डबल में भी नजर आए थे। यहां तक कि उन्होंने 2024 में रिलीज हुई एक बघेली फिल्म कुंवरपुर में भी काम किया था। असरानी साहब ने हमेशा कहा कि उन्हें प्रोफेशनल रहना पसंद है।
उनका मानना था कि सेट पर सब साथ हैं तो काम के बाद बेवजह पार्टी करके गसिप करने से अपनी क्रिएटिव एनर्जी वेस्ट होती है। यह दुनिया बहुत कठोर है। इसलिए सिर्फ काम पर ध्यान देना जरूरी है। वो अपने परोपकारी कार्यों के लिए भी जाने जाते थे, और विनम्रता में यकीन रखते थे। आज 84 साल की उम्र में इस महान कलाकार ने अपनी एक्टिंग की इतनी बड़ी विरासत छोड़ दी है।
एक ऐसा कलाकार जिसने एक गली के कारपेट शॉप से निकल कर बॉलीवुड के पर्दे पर राज किया जिसने कॉमेडी के मायने बदले और जिसने दो पीढ़ियों को हंसाया। आज जब वह नहीं रहे तो हमें उनका वो डायलॉग याद आता है जो हमें हमेशा हंसाएगा। हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं।
