जो 65 साल से भी ज्यादा पुराना रहा। यह कहानी है उस आदमी की जिसने हुस्न और मर्दानगी के उस बेमिसाल संगम धर्मेंद्र को दुनिया के सामने हीरो बनाकर पेश किया। यह है निर्देशक, निर्माता और अभिनेता अर्जुन हिंगोरानी। आप भी पीजिए और गम गलत कीजिए मेम साहब। अभी क्या गम गलत करेगा? जाने को पैसा नहीं है। मेम साहब को बोलेगा तो वो वो मारेगा। तो मेम साहब को भी पिलाना गुस्सा काफूर हो जाएगा।
तुम काहे को खाली पीली मस्करी करता हमारे साथ? अरे हम क्या मस्करी करेगा? मस्करी तो ऊपर वाले हवलदार ने ऐसी की है कि 8 घंटे इस कड़कती धूप में जमीन और आसमान के बेचैन बांसो पे खड़े रहना पड़ता है। काहे को? अभी तुम भगवान को हवलदार बोला? जी हां, हम ऊपर वाले को हवलदार बोलते हैं। ये नीचे वाला हवलदार रात को ठीक से सोने नहीं देता और ऊपर वाला ठीक से खाने को नहीं देता।
बात तो मजे की करता है तू। बात तो मजे की करता हूं। पर लोग समझते किधर हैं? पर हम तो समझता है। आपके पास जाने के लिए पैसे नहीं है। मुझसे ले लीजिए। तुम देना। अच्छा लाओ पर कल वापस देके जाएगा। हां। धर्मेंद्र जी ने खुद कहा था अर्जुन हिंानी मेरे लिए 65 साल से ज्यादा समय तक मेरे अपने भाई जैसे रहे। उनका जाना मेरे लिए सचमुच एक युग का अंत है। यह सिर्फ एक बयान नहीं। यह उस गहरे बंधन का प्रमाण है जिसकी शुरुआत ₹51 के एक साइनिंग अमाउंट से हुई थी। अर्जुन हिंगुरानी जी का जन्म 15 नवंबर 1926 को मथुरा में हुआ। वह शुरू से ही दर्शकों की नब्ज़ को समझने वाले सच्चे मेन स्ट्रीम फिल्म मेकर माने जाते थे। उनका करियर तीन दशक से ज्यादा चला और उन्होंने दो बड़े मील के पत्थर स्थापित किए। पहला उन्होंने 1958 में भारत की पहली बड़ी सिंधी भाषा फिल्म अपना बनाई जिसके गाने आज भी सिंधी समुदाय को याद है और दूसरा उन्होंने धर्मेंद्र को लॉन्च किया। लेकिन धर्मेंद्र को लॉन्च करने का यह किस्सा इतना सीधा नहीं था। धर्मेंद्र उस वक्त पंजाब से मुंबई आए एक अकेले आदमी थे।
आंखों में बड़े-बड़े सपने थे और जेब में पैसे नहीं। वो विमल रॉय जैसे महान निर्देशक की फिल्म बंदिनी साइन कर चुके थे। लेकिन विमल रॉय, ऋषिकेश मुखर्जी या राज कपूर जैसे निर्देशकों का काम वक्त लेता था। धर्मेंद्र इंतजार कर रहे थे कि यह बंदनी कब शुरू होगी। तभी उनकी मुलाकात अर्जुन हिंगोरानी से हुई। धर्मेंद्र ने बाद में याद किया कि वह नहीं जानते थे कि हिंगोरानी कौन थे और जब उन्हें विमल रॉय जैसे बड़े निर्देशक से साइन कर लिया तो वह किसी अनजान आदमी के साथ काम क्यों करें। पर अर्जुन हिंगोरानी जिद पर अड़े रहे। वह बार-बार कहते मैं तुम्हें साइन करूंगा। धर्मेंद्र के मन में 5000 की फीस मिलने की उम्मीद थी। पर हिंो रानी ने उनसे कहा मैं तुझे हीरो बनाऊंगा। धर्मेंद्र ने भी मजाक में कह दिया चल बना। और बस यहीं से कहानी शुरू हो गई। 1960 में अर्जुन हिंगोरानी ने अपनी फिल्म दिल भी तेरा हम भी तेरे में धर्मेंद्र को लॉन्च कर दिया।
एक बार धर्मेंद्र ने सलमान खान के गेम शो पर बताया था कि जब वह प्रोड्यूसर के ऑफिस में बैठे थे तो उन्हें उम्मीद थी कि कम से कम ₹5000 मिलेंगे। पर उन्हें साइनिंग अमाउंट के तौर पर सिर्फ ₹51 दिए गए। लेकिन धर्मेंद्र ने अपनी विनम्रता और बड़े दिल का परिचय देते हुए उस 51 से भी अपने दोस्त के साथ जश्न मनाया। यह फिल्म जिसमें धर्मेंद्र स्टील्स पर खड़े होकर सिगरेट बेचने वाले एक गरीब युवक अशोक का किरदार निभा रहे थे। बॉक्स ऑफिस पर ज्यादा नहीं चली पर इसका संगीत कल्याण जी आनंद जी ने ऐसा दिया कि वह हिट हो गया। खासकर गाना मुझको इस रात की तन्हाई में आवाज ना दो। आज भी यादगार है। मुझको इस रात की तन्हाई में आवा। इस तरह भले ही फिल्म फ्लॉप हुई हो, पर धर्मेंद्र का ईमानदार आकर्षण दर्शकों की नजरों में आ गया, और उनके लिए इंडस्ट्री के दरवाजे खुल गए।
इसके बाद लगभग एक दशक तक हिंगो रानी ने धर्मेंद्र के साथ कोई फिल्म नहीं बनाई। उन्होंने प्रदीप कुमार के साथ सहेली 1965 बनाई, लेकिन फिर वो लौटे और 1970 में जासूसी थ्रिलर फिल्म कब, क्यों और कहां लेकर आए। दिल तो दिल है किसी दिन मचल जाएगा। एक दिन यह इरादा बदल जाएगा। हिंगू रानी इस फिल्म को लेकर बहुत आश्वस्त थे और उन्होंने धर्मेंद्र से वादा किया कि पैसा फिल्म सफल होने के बाद ही देंगे। यह फिल्म बहुत बड़ी हिट हुई और यहीं से अर्जुन हिंगोरानी के करियर की दूसरी पारी शुरू हुई। इस सफलता के बाद हिंगोरानी को लगा कि उनकी फिल्म के शीर्षक में के अक्षर का तीन बार आना उनके लिए भाग्यशाली है। यह अंधविश्वास इतना गहरा हो गया कि उनकी पत्नी कुंडा हिंगुरानी का नाम भी के से शुरू होता था और वह इसे और भी शुभ मानने लगे।
धर्मेंद्र उन्हें मजाक में कान का कच्चा भी कहते थे। इसके बाद तो दोनों ने एक के बाद एक कई फिल्मों में साथ काम किया। कहानी किस्मत की 1973 जो एक और हिट थी। इसका गाना अरे रफ्ता रफ्ता देखो आंख मेरी लड़ी है। आज तक मशहूर है। अरे रफ्ता रफ्ता देखो आंख मेरी लड़ी है। अरे आंख जिससे लड़ी इसके बाद खेल खिलाड़ी का 1977 कातिलों के कातिल 1981 कौन करे कुर्बानी 1991 जो उनकी आखिरी निर्देशित फिल्म थी। हिंगू रानी को अभिनय का भी शौक था। वो अपनी फिल्म जैसे कब, क्यों और कहां में छोटे रोल में दिखते थे और कौन करे कुर्बानी में उन्होंने मुख्य विलेन का किरदार निभाया।
भर के खुशियां मनाओ, गरीबों में मिठाई बांट दो। आज बरसों के बाद मेरा बिछड़ा हुआ यार मिला है। और मारो मुझे मार मार के इन हड्डियों का जूर बना दो। इस वन के मुखड़े मुझसे बहुत पाप कराए। धर्मेंद्र और हिंगुरानी की दोस्ती इतनी गहरी थी कि जब धर्मेंद्र ने अपना खुद का रिकॉर्डिंग स्टूडियो सनी सुपर साउंड खोला तो अर्जुन हिंगुरानी पहले व्यक्ति थे जिन्होंने वहां बुकिंग करवाई। हिंगोरानी जी ने अपने करियर में ना सिर्फ धर्मेंद्र को लॉन्च किया बल्कि साधना जैसी लोकप्रिय अभिनेत्री को भी अभना से पहचान दी। उनके भतीजे अनिल और सुनील हिंगोरानी भी निर्देशक बने। सुनील हिंगोरानी की शादी अभिनेत्री अनीता राज से हुई।
हिंगोरानी जी के बेटे अमित हिंगोरानी ने अभिनय किया और बेटी करिश्मा हिंगोरानी कॉस्ट्यूम डिजाइनर बनी। जबकि दूसरी बेटियां सुचेता, देवकी और महक है। 2005 में उन्होंने हाउ टू बी हैप्पी एंड रियलाइज योर ड्रीम्स नाम की एक सेल्फ हेल्पफ किताब भी लिखी। बाद में अर्जुन हिंोरानी जी कृष्ण भक्त बन गए और अपने अंतिम साल वृंदावन में बिताएं। 5 मई 2018 को 92 साल की उम्र में उनका निधन हो गया। उनके निधन की खबर पर धर्मेंद्र ने भावुक होते हुए ट्वीट किया अर्जुन हिंुरानी वह आदमी जिसने मुंबई में इस अकेले आदमी के कंधे पर हाथ रखा था वो हमें हमेशा के लिए छोड़कर चला गया।
मैं बहुत दुखी हूं। जी ने एक स्वस्थ और सक्रिय जीवन जिया। उनकी बेटी सुचेता ने बताया था कि निधन से एक दिन पहले उन्होंने अपना पसंदीदा मीठा गुलाब जामुन खाया था और शांतिपूक सोते हुए उनका निधन हुआ। अर्जुन हिंगोरानी सिर्फ धर्मेंद्र के निर्देशक नहीं थे। वह उनके मार्गदर्शक थे। उन्होंने सिर्फ एक अभिनेता को लॉन्च नहीं किया बल्कि हिंदी सिनेमा के एक युग को लॉन्च किया। ₹51 के उस मामूली साइनिंग अमाउंट से शुरू हुआ यह सफर आज अमर दोस्ती की मिसाल बन गया। ओम ओम
