भारत नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अमेरिका का पिछलग्गू बन गया है क्या? ये सवाल खड़े होने लगा है। जिस जहाज को भारत के निमंत्रण पर ईरान ने अभ्यास के लिए भारत भेजा था उस जहाज को जिस जहाज को महामहिम राष्ट्रपति के सामने प्रेजेंट किया गया था। उस जहाज को अमेरिका ने लौटने के दौरान हिंद महासागर में मार गिराया।
जिन लोगों की हमारे हिंदुस्तान ने कुछ रोज पहले मेहमान नवाजी की थी, वह अमेरिका के साजिशों के शिकार होकर अपनी जान गवा बैठे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की क्रेडिबिलिटी इस स्तर पर पहुंचा दी कि अमेरिका हमारे मेहमानों को निपटाने की हिमाकत कर बैठा है और सरकार मौन है? प्रधानमंत्री बोल नहीं रहे हैं। ये कैसी नीति है? ये कैसी विदेश नीति है? ये कैसी दोस्ती है? यह सब एक संप्रभु देश होने के नाते हमारी भावनाओं से खिलवाड़ है। नरेंद्र मोदी क्या कंप्रोमाइज नीति को देश की नीति बना बैठे हैं?
ईरानी जहाज को भारत के दरवाजे पर मार गिराया गया। अमेरिकी न्यूक्लियर सबमरीन भारतीय क्षेत्र के पानी में छिपी हुई थी। युद्ध हमारे समुद्र क्षेत्र में लाया गया। भारत को अपनी चिंता और नाराजगी जाहिर करनी चाहिए। यह बात एडमिरल अरुण प्रकाश ने दो टूक शब्दों में राजदीप सरदेसाई के साथ अपनी टीवी डिबेट में कही है। एडमिरल अरुण प्रकाश ने भारत के लिए अपनी सुरक्षा चिंताओं को खुलकर सामने रखा है। उनका कहना है कि देश को इस तरह की घटनाओं पर सख्त प्रतिक्रिया देनी चाहिए ताकि साफ हो कि भारत अपनी संप्रभुता और समुद्री अधिकारों की रक्षा करेगा। लेकिन हो नहीं रहा है यह।
मतलब हम सरेंडर हो चुके हैं। ईरान के पोत आईआरआईएस देना की टुकड़ी ने भारत के न्योते पर नेवल एक्सरसाइज में भारत में हिस्सा लिया। हमारी प्रेसिडेंट भी उसमें मौजूद थी। जब यह पोत वापस लौट रहा था तब हिंद महासागर के जल क्षेत्र में उस पर अमेरिका ने हमला किया और वो डूब गया। श्रीलंका के मीडिया के मुताबिक श्रीलंकाई सेना ने 32 नाविकों को बचाया। सवाल यह है कि भारत सरकार ने कोई कदम क्यों नहीं उठाया या किसी का डर था या कोई बात है जो छुपाई जा रही है उससे गंभीर सवाल भारत के न्योते पर आया है।
ईरानी जब वापस लौट रहा था तो हिंद महासागर के क्षेत्र में अमेरिकी पनडुब्बी क्या कर रही थी और तो और यूएस पडुब्बी तमाम हथियारों से लैस थी जिसने एक गैर कारवाई से लौटते हुए युद्धपोध पर छुपकर वार किया। भारत ने कोई भी प्रतिक्रिया क्यों नहीं दी? ईरान का पोत तो आपके न्योते पर आया था। ईरानी विदेश मंत्री अग्रची कह रहे हैं कि अमेरिका ने ईरान के तट से 2000 मील दूर समुद्र में एक जघन्य अपराध किया है।
भारत की नौसेना के अतिथि लगभग 130 नाविकों के साथ लौट रहे फ्रिंग डेना पर अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में बिना किसी चेतावनी के हमला किया। ईरानी विदेश मंत्री साफ शब्दों में कह रहे हैं कि मेरी बात याद रखना अमेरिका को अपने द्वारा स्थापित इस मिसाल पर गहरा पछतावा होगा। पछतावा तो भारत को भी होना चाहिए। भारत के विदेश मंत्री को भी होना चाहिए। भारत की सरकार को भी होना चाहिए।
हम एक दोस्त को अपने हाथों से गवा रहे हैं और एक ऐसे शख्स को दोस्त बना बैठे हैं जो दुश्मन से भी ज्यादा खतरनाक है। जिसको लेकर जीडी बक्शी कहते हैं कि अमेरिका दुश्मन था दुश्मन है और दुश्मन रहेगा। एडमिरल अरुण प्रकाश कहते हैं कि आपको अपनी संप्रभदा को बचाना है तो आपको आवाज उठानी पड़ेगी। आखिर वो सबमरीन भारत के पानी के क्षेत्र के भीतर थी। तभी तो उसने हमला किया। वो वहां क्या कर रही थी? क्या इसका इनपुट नहीं था भारत सरकार के पास? भारतीय नौसेना के पास क्या इसका इनपुट नहीं था? था तो फिर कारवाई क्यों नहीं की गई? चेतावनी क्यों नहीं दी गई? वहां से हटने के लिए क्यों नहीं कहा गया? अपने मेहमान जहाज को वहां से सुरक्षित निकल जाने के लिए रास्ता क्यों नहीं बनवाया गया? और अगर खतरा था तो उसे जाने क्यों दिया गया?
यह क्यों नहीं कहा गया कि जब तक रास्ता सुरक्षित नहीं होगा हम जाने नहीं देंगे। आखिर यह बेरुखी क्यों है? वह आपके बुलावे पर आए थे। आपने धोखा किया और इस धोखे के एवज़ में दुनिया आपको क्या विश्वुरु मानेगी? आपको नोबेल प्राइज देगी, तमंगे देगी। यह बहुत गलत ट्रेंड पर हमारी विदेश नीति जाती हुई दिख रही है।
बहरहाल इस पर सरकार की प्रतिक्रिया अब तक नहीं आई है। यह बहुत बड़ी चिंता का विषय है। एक संप्रभु राष्ट्र की सीमा के पास अगर हमला हो जाए तो एक छोटा सा बयान तो आता है लेकिन वह भी नहीं आ रहा
