सोचिए आप सोशल मीडिया स्क्रॉल कर रहे हैं और अचानक आपको एक ऐसे इंसान की पोस्ट दिखती है जिसके बारे में आपको पता है कि उसकी कुछ घंटे पहले ही निधन हो चुकी है और उस पोस्ट में लिखा है कि अगर यह शब्द आप तक पहुंच रहे हैं तो समझ लेना कि वो मुझे में कामयाब हो गए हैं। रोंगटे खड़े हो गए ना? यह किसी फिल्म की कहानी नहीं बल्कि हकीकत है। यह कहानी है अलजजीरा के 28 साल के पत्रकार अनस अल शरीफ की। जिन्होंने मरने से पहले अपनी ही निधन की खबर दुनिया को दी। लेकिन कहानी में एक बहुत बड़ा ट्विस्ट है।
एक तरफ जहां दुनिया अनस को एक शहीद पत्रकार मान रही है, वहीं दूसरी तरफ इजराइल की सेना ने उन्हें एक खतरनाक बदमाश बताया है। तो सच क्या है? क्या अनस अल शरीफ एक हीरो थे जो सच दिखाते हुए मारे गए या वो पत्रकारिता की आड़ में एक बदमाश थे? आज हम इसी पहेली की परतें खोलेंगे। गाज़ा के उस पत्रकार की जिसकी निधन ने दुनिया भर में एक नई बहस छेड़ दी है। यह हैं अनस अल शरीफ अलजजीरा के लिए काम करने वाले एक पत्रकार। हाल ही में गाजा सिटी के अलशिफा अस्पताल के पास हुए एक इजराइली हवाई वार में चार और पत्रकारों के साथ अनस की भी निशान हो गई। लेकिन उनकी निधन के कुछ ही घंटों बाद उनके सोशल मीडिया अकाउंट पर एक लंबी पोस्ट आती है।
यह पोस्ट उनके एक दोस्त ने की थी और इसमें अनस का आखिरी मैसेज उनकी आखिरी वसीयत थी। अनस ने लिखा यह मेरी आखिरी वसीयत है। मेरा आखिरी पैगाम। अगर मेरे यह शब्द आप तक पहुंच रहे हैं तो जान लेना कि इजराइल मुझे मारने और मेरी आवाज को चुप कराने में कामयाब हो गया है। उन्होंने आगे लिखा मैंने अपनी पूरी ताकत से अपने लोगों की आवाज बनने की कोशिश की। मैंने दर्द को करीब से जिया है। लेकिन सच को दिखाने से कभी पीछे नहीं हटा। अल्लाह उन लोगों के खिलाफ गवाह बने जो चुप रहे जिन्होंने हमारे कत्ल को स्वीकार किया। इस मैसेज में अनस ने अपने परिवार का ख्याल रखने की गुजारिश भी की।
अपनी बेटी जिसे उन्होंने अभी ठीक से बड़ा होते हुए भी नहीं देखा था। अपने बेटे, अपनी पत्नी और अपनी मां के लिए और आखिर में उन्होंने लिखा गाजा को मत भूलना और मुझे अपनी दुआओं में मत भूलना। पूरी दुनिया में खासकर पत्रकार समुदाय में इस वार की निंदा हुई। फिलिस्तीनी पत्रकार संघ ने इसे एक खूनी अपराध और सीधी-सीधी हत्या करार दिया। यहां तक तो कहानी एक बहादुर पत्रकार की शहादत की लगती है।
लेकिन अब आता है कहानी में वो मोड़ जो सब कुछ बदल देता है। इस हमले के कुछ ही देर बाद इजराइली डिफेंस फोर्सेस यानी आईडीएफ का एक बयान आता है और यह बयान चौंकाने वाला था। आईडीएफ ने ना सिर्फ हमले की जिम्मेदारी ली बल्कि यह भी कहा कि उन्होंने जिसे मारा वो पत्रकार नहीं था। आईडीएफ ने अपने ऑफिशियल एक्स हैंडल पर लिखा कि हमास का अनस अल शरीफ जो खुद को अलजजीरा का पत्रकार बताता था असल में हमास के एक टेररिस्ट सेल का हेड था। वो इजराइली नागरिकों और हमारे सैनिकों पर रॉकेट हमले करवाता था। आईडीएफ ने दावा किया कि उनके पास गाजा से मिले खुफिया दस्तावेज, आतंकियों की ट्रेनिंग लिस्ट और सैलरी रिकॉर्ड है जो यह साबित करते हैं कि अनस हमास का एक ऑपरेटिव था जिसे अलजजीरा में प्लांट किया गया था।
अब आप सोचिए मामला कितना उलझ गया है। एक तरफ एक पत्रकार की आखिरी इमोशनल चिट्ठी है जिसमें वह अपने लोगों की आवाज बनने की बात कर रहा है। अपने परिवार को याद कर रहा है और दूसरी तरफ दुनिया की सबसे ताकतवर सेनाओं में से एक का दावा है कि यह शख्स पत्रकारिता का नकाब पहने एक आतंकवादी था जो रॉकेट हमले करवाता था। तो सवाल यह उठता है कि सच क्या है? क्या इजराइल एक पत्रकार को के अपने एक्शन को सही ठहराने के लिए कहानी बना रहा है या फिर अनस अल शरीफ वाकई एक डबल लाइफ जी रहे थे। यह सवाल शायद हमेशा एक सवाल ही बनकर रह जाए। युद्ध के धुंध में सच अक्सर कहीं खो जाता है। लेकिन यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि लड़ाई में सबसे पहली कैजुएल्टी सच की ही होती है। इस हमले में अनस के साथ चार और पत्रकार मारे गए। मोहम्मद क्रेके, इब्राहिम जाहर, मोमिन अलीवा और मोहम्मद नोफल।
यह दिखाता है कि जंग को कवर करना कितना खतरनाक काम है। अनस अल शरीफ की कहानी बिल्कुल दो अलग नैरेटिव पेश करती है। एक नैरेटिव उन्हें हीरो और शहीद बनाता है और दूसरा उन्हें विलेन और । आप किस पर यकीन करेंगे, यह मैं आप पर छोड़ता हूं। लेकिन एक बात तय है। एक इंसान की जान गई है। एक परिवार ने अपना बेटा, अपना पति और अपना पिता खोया है। और गाजा में सच और झूठ की लड़ाई अभी भी जारी है।
