अक्षय खन्ना को वो रुतबा क्यों नहीं मिला, जिसके वो हक़दार हैं?

अक्षय खन्ना लाइमलाइट से दूर रहने वाला वो कलाकार जिसका काम बोलता है। इस साल उनकी खूब चर्चा हुई। उनकी छावा में दी गई परफॉर्मेंस के बाद उनकी पॉपुलरिटी का ग्राफ रातोंरात बढ़ गया। हालांकि ऐसा पहली बार नहीं था जब उन्होंने एक इंटेंस और इंपैक्टफुल परफॉर्मेंस दी हो। उनके करियर में कई बार ऐसा हो चुका है। आइए इस वर्ल्ड स्टाइल एक्टर के करियर पर नजर दौड़ाते हैं जिससे उसका ड्यू मिलने में शायद बहुत वक्त लग गया। अक्षय का जन्म 28 मार्च 1973 को मुंबई में हुआ था।

पिता विनोद खन्ना उस वक्त बॉलीवुड के बड़े नामों में से एक थे। मेरा गांव मेरा देश पूर्व और पश्चिम अमर अकबर एंथनी कुर्बानी दयावान जैसी दर्जनों हिट फिल्में देने वाले एक्टर अक्षय की मां गीतांजलि वकीलों और व्यापारियों के पारसी खानदान से बिलोंग करती थी। इन दोनों के दो बेटे हुए। बड़ा वाला राहुल और छोटा वाला अक्षय। पिता सुपरस्टार थे तो जाहिर है घर में सिनेमा कल्चर होना ही था। दोनों बच्चों को सिनेमा की विरासत मिली।

हालांकि जब अक्षय 12 साल के थे तब उनके माता-पिता का डिवोर्स हो गया था। अक्षय का बचपन बाकी स्टार किड्स के मुकाबले बिल्कुल अलग था। हां वो एक सुपरस्टार के बेटे थे लेकिन जब उनके पिता ने करियर के पीक पर सब त्याग दिया और ओशो आश्रम चले गए तो घर में स्ट्रगल का दौर आया।

मां गीतांजलि ने अपने दोनों बेटों को बहुत ग्राउंडेड तरीके से पाला। अक्षय की स्कूलिंग बॉम्बे इंटरनेशनल स्कूल में हुई। फिर 11वीं 12वीं के लिए वो लॉरेंस स्कूल ऊटी गए। अपने इंटरव्यूज में अक्षय कई बार यह मान चुके हैं कि वो पढ़ाई से ज्यादा स्पोर्ट्स में अच्छे थे। अक्षय के करियर की असली तैयारी शुरू हुई किशोर नमित कपूर एक्टिंग इंस्टट्यूट से। वही इंस्टट्यूट जहां से कई बड़े स्टार्स निकले हैं। ट्रेनिंग के बाद अब बारी थी एग्जीक्यूशन की। 1997 में अक्षय खन्ना की पहली फिल्म आई। नाम था हिमालय पुत्र। इसे विनोद खन्ना ने खुद प्रोड्यूस किया था और डायरेक्टर थे पंकज पराशर। अक्षय के अपोजिट अंजला जवेरी को साइन किया गया। उनका भी यह डेब्यू ही था।

विनोद खन्ना ने खुद भी इस फिल्म में काम किया था और हेमा मालिनी और डैनी जैसे एक्टर्स भी थे। हिमालय पुत्र को रिलीज तो बड़े जोर शोर से किया गया था। लेकिन यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कोई बड़ा कमाल नहीं कर पाई। अक्षय खन्ना का डेब्यू महा फ्लॉप रहा। लेकिन फिर 2 महीने बाद ही बॉर्डर आई और सब कुछ बदल गया। बॉर्डर 1971 के भारतपाकिस्तान पर आधारित फिल्म थी जिसमें बहुत लंबी चौड़ी स्टार कास्ट थी। जेपी दत्ता ने अक्षय को सेकंड लेफ्टिनेंट धर्मवीर सिंह का एक छोटा सा रोल ऑफर किया। अक्षय ने यह मौका छोड़ा नहीं। बॉर्डर रिलीज हुई और ब्लॉकबस्टर साबित हुई। अक्षय खन्ना इतनी भीड़ में भी सबको याद रह गई। इस रोल की खास बात यह थी कि यह कोई माचो वाला पार्ट नहीं था। इसमें नरमी भी थी, इमोशन भी थे, डर भी और हिम्मत भी।

बहुत सारे क्रिटिक्स ने उसी वक्त कह दिया था कि यह लड़का सिर्फ हीरो नहीं एक्टर बन सकता है। मॉर्डर के बाद अक्षय ने रोमांटिक ड्रामा और म्यूजिक जॉन्रा में लगातार काम किया। उनकी माधुरी के साथ आई मोहब्बत कुछ खास नहीं चली। ऐसा ही हाल डोली सजा के रखना कुदरत और लावारिस का भी हुआ। 1999 की शुरुआत में उन्होंने आ अब लौट चलने में काम किया। ऋषि कपूर के डायरेक्शन में बनी इकलौती फिल्म। इसमें अक्षय ने एक ऐसे लड़के का रोल किया जो बेहतर लाइफ की तलाश में अमेरिका जाता है और वहां प्यार और पहचान दोनों खोजता है। उनके साथ ऐश्वर्या राय थी। फिल्म इंडिया में एवरेज रही लेकिन ओवरसीज में ठीक-ठाक चली। फिर आई वो फिल्म जिसने अक्षय खन्ना को एक सीरियस एक्टर के रूप में एस्टैब्लिश कर दिया। ताल ताल सुभाष ग की म्यूजिक ब्लॉकबस्टर थी जिसमें उनकी फिर एक बार ऐश्वर्या के साथ पेयरिंग हुई। अक्षय ने मानव का रोल किया जो एक अमीर लेकिन दिल से साफ लड़का है जो प्यार के लिए अपने पिता के अहंकार से लड़ता है।

यह फिल्म उस साल की सबसे बड़ी हिट्स में से एक बनी और अक्षय खन्ना की क्रेडिबिलिटी में और इजाफा हुआ। ताल के बाद आई दहक कुछ खास नहीं चली। हालांकि ये बहुत अच्छी फिल्म थी। सांप्रदायिकता पर तीखी टिप्पणी करने वाली थी। ये वही फिल्म है जिसमें सावन बरसे तरसे दिल जैसा कमाल गाना था। यह वो दौर था जब अक्षय अलग-अलग तरह के रोल्स ट्राई कर रहे थे। रोमांटिक हीरो, इंटेंस लवर, सोल्जर हर किरदार में वो अपना सब कुछ झोंक देते थे।

फिर 2001 में आई वो फिल्म जो अक्षय के करियर का टर्निंग पॉइंट बनी। फरहान अख्तर की दिल चाहता है। आज ये कल्ट क्लासिक मानी जाती है। तीन दोस्तों की ये स्टोरी उस वक्त की बोल्ड, मॉडर्न और रिलेटेबल स्क्रिप्ट्स में से एक थी। इस फिल्म में अक्षय ने निभाया सिद्धार्थ उर्फ़ सिड का किरदार। एक शांत इंट्रोवर्ट संवेदनशील लड़का जो अपनी उम्र से बड़े लोगों को ज्यादा अच्छे से समझता है। एक उम्रदराज अकेली आर्टिस्ट से प्यार भी कर बैठता है। दिलचस्प बात यह है कि शुरू में अक्षय को आमिर वाला रोल ऑफर हुआ था लेकिन बाद में कुछ रिशफल हुआ और अक्षय को सिड का किरदार मिला। आज लोग कहते हैं कि यह रोल शायद उन्हीं के लिए लिखा गया था। सिडके किरदार ने साबित किया कि अक्षय के पास माइक्रो एक्टिंग की एक अलग ही स्किल है। वो अपनी आंखों, हल्की सी मुस्कान और छोटी-छोटी चुप्पियों से पूरा सीन पकड़ लेते हैं। इस फिल्म के लिए उन्हें बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का फिल्मफेयर अवार्ड मिला।

बहुत से क्रिटिक्स मानते हैं कि दिल चाहता है के बाद अक्षय उस लीग में आ गए जहां उन्हें सीरियस परफॉर्मर के रूप में जाना जाने लगा। 2002 से 2004 के बीच अक्षय ने साबित किया कि वो सिर्फ रोमांटिक हीरो या सेंसिटिव सीड ही नहीं है। वो विलनिस स्पेस और कॉमेडी में भी कमाल कर सकते हैं। 2002 की हमराज एक रोमांटिक थ्रिलर थी जिसे अब्बास मस्तान ने बनाया था। इसमें अक्षय ने करण मल्होत्रा नाम के एक कॉर्न आर्टिस्ट का रोल किया। फिल्म बॉक्स ऑफिस पर हिट रही और अक्षय को इस नेगेटिव रोल के लिए आईफा अवार्ड मिला। उसी साल आई अनीस बजमी की दीवानगी जहां वो एक लॉयर बने।

इसमें उनके साथ अजय देवगन और उर्मिला मातोड़कर थे। यह फिल्म भी कामयाब रही और क्रिटिक्स ने अक्षय की परफॉर्मेंस को मजबूत कहा। फिर आया अक्षय का कॉमेडी फेस। 2003 की हंगामा वो फिल्म थी जहां दुनिया ने अक्षय की कॉमिक टाइमिंग का जलवा देखा। परेश रावल के साथ उनकी मुठभेड़ को जनता ने खूब एंजॉय किया। अक्षय का किरदार जीतू एक गुस्सैल लेकिन प्यारा सा सेल्समैन है। आज भी यह फिल्म टीवी पर आती है तो लोग देखने बैठ जाते हैं। प्रियदर्शन की हलचल में अक्षय ने फिर से कॉमेडी का जलवा दिखाया।

इस बार उनके अपोजिट करीना कपूर थी। यह भी बॉक्स ऑफिस पर हिट रही। इसके बीच में वो एलओसी कारगिल और दीवार जैसी वॉर और एक्शन ड्रामा फिल्मों में भी नजर आए। जहां उन्होंने आर्मी ऑफिसर और इंटेंस ड्यूटी ड्रिवर कैरेक्टर्स निभाए। शादी के पहले और आपकी खातिर जैसी उनकी फिल्में फ्लॉप रहीं। वहीं अब्बास मस्तान ने 36 चाइना टाउन और नकार जैसी फिल्मों में उन्हें रिपीट किया। केवलें पसंद भी की गई। 2007 में आई गांधी माय फादर ने यह बात पक्के तौर पर साबित कर दी कि अक्षय खन्ना के पास कमाल की एक्टिंग रेंज है। ये अक्षय के करियर की सबसे मुश्किल और पावरफुल परफॉर्मेंस मानी जाती है। इसमें उन्होंने महात्मा गांधी के बड़े बेटे हरीलाल गांधी का रोल किया जो अपने पिता की विरासत और अपनी नाकामियों के बीच पिसता रहता है। फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बहुत नहीं चली लेकिन क्रिटिक्स ने अक्षय की एक्टिंग को हार्ट रेंचिंग कहा। उनके ब्रेकडाउन सीन आज भी बहुत से एक्टिंग स्कूल्स में रेफरेंस के तौर पर दिखाए जाते हैं। इस फिल्म के बाद उनकी अगली दो फिल्में थी आजा नचले और रेस। पहली तो अच्छी फिल्म होने के बावजूद नहीं चली लेकिन दूसरी ब्लॉकबस्टर रही। यहां अक्षय ने निभाया राजीव सिंह का किरदार।

एक , चालाक, डबल गेम खेलने वाला भाई जो पैसों और विरासत के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। ट्विस्ट पर ट्विस्ट पेश करने वाली यह थ्रिलर फिल्म जमकर चली। लेकिन इसके बाद अक्षय खन्ना के करियर का ग्राफ धीमा पड़ने लगा। रेस के बाद के अगले कुछ साल अक्षय खन्ना के लिए खराब रहे। 2008 से 2015 तक का दौर अक्षय के करियर का सबसे मुश्किल फेस था। मेरे बाप पहले आप शॉर्टकट, आक्रोश, नो प्रॉब्लम, तीस मार खान और गली-गली चोर है जैसी फिल्में की उन्होंने। इनमें से कुछ फिल्में ठीक चली लेकिन ज्यादातर नाकाम ही रही।

हालांकि तीस मार खान में उनका निभाया किरदार आतिश कपूर आगे चलकर मशहूर हो गया। मीम कल्चर का हिस्सा बना। 2012 के बाद अक्षय अचानक गायब हो गए। 4 साल का लंबा गैप। बाद में एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि वो कुछ पर्सनल इश्यूज सुलझा रहे थे इसलिए काम से दूरी बनानी पड़ी। चार साल के ब्रेक के बाद 2016 में अक्षय वापस आते हैं रोहित धवन की डिश के साथ। यहां वो मेन मिलन वाघा बने जो एक बुकी है और इंडिया के टॉप बल्लेबाज को किडनैप करा देता है। फिल्म ने अच्छा बिजनेस किया और लोगों ने नोटिस किया कि अक्षय अभी भी स्क्रीन पर वही इंटेंस प्रेजेंस लेकर आते हैं। 2017 उनके कमबैक को पक्का करने वाला साल साबित हुआ। श्रीदेवी की क्राइम ड्रामा मॉम में अक्षय ने सीबीआई ऑफिसर मैथ्यू की भूमिका निभाई। किरदार बहुत फ्लैशी नहीं था लेकिन उनकी शांत ऑब्जर्व बॉडी लैंग्वेज ने रोल को वजन दिया। अगली फिल्म इत्तेफाक में भी वो इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर बने। 2019 में उन्होंने दो एकदम अलग रोल किए। द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर में उन्होंने संजय बारू का किरदार निभाया जो फिल्म के नैरेटर भी है और सेक्शन 375 में वो बने डिफेंस लॉयर तरुण सलूजा। बेहद शार्प थोड़ा सिनिकल लेकिन लॉ का हर लूप होल जानने वाला वकील। इसके बाद सबकुशल मंगल नाम की फिल्म और स्टेट ऑफ सीज नाम के सीरीज में काम किया। लेकिन ये कब आई कब गई पता ही नहीं चला।

फिर 2022 में उन्हें फिर से नोटिस किया गया दृश्यम 2 में। इस सुपरहिट क्राइम थ्रिलर में अक्षय ने आईजी तरुण अहलावत का रोल किया। एक ठंडे दिमाग वाला तेज लगभग शरलॉक होम जैसा पुलिस ऑफिसर जो विजय सलगांवकर के गेम को एक्सपोज करने आया है। क्रिटिक्स और ऑडियंस दोनों ने माना कि अक्षय की एंट्री ने फ्रेंचाइज को बिल्कुल नया लेवल दिया था और फिर आया औरंगजेब। 2025 में अक्षय खन्ना ने अपने करियर की सबसे बड़ी हिट फिल्म में काम किया। लक्ष्मण उदयकर की छावा में। अक्षय खन्ना यहां बने मुगल बादशाह औरंगजेब जो छत्रपति संभाजी महाराज के अपोजिट खड़ा है। फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर धमाका कर दिया। 2025 की दूसरी सबसे ज्यादा कमाई करने वाली इंडियन फिल्म और साल की सबसे बड़ी हिंदी फिल्म बनी। कई क्रिटिक्स ने लिखा कि अक्षय की काली ठंडी नजरों और उनके पॉजेस ने इस किरदार की इंटेंसिटी को कई कई गुना बढ़ा दिया। इस रोल ने एक बार फिर साबित किया कि नेगेटिव शेड्स में अक्षय खन्ना किसी और ही लेवल पर काम करते हैं। लेट करियर में मिला यह रोल अक्षय के लिए एक तरह से क्राउनिंग मोमेंट जैसा है। उन्होंने औरंगजेब को सिर्फ एक क्रूर बादशाह नहीं बल्कि कॉम्प्लेक्स पॉलिटिकल और भीतर से टकराव भरा इंसान भी दिखाया और अब आ रही है धुरंधर जिसमें उनका निभाया रहमान डकैत का किरदार रिलीज से पहले ही सुर्खियां बटोर रहा है। जल्दी हम इस रहमान डकैत की लाइफ स्टोरी पर भी एक वीडियो बनाएंगे। बहरहाल अक्षय खन्ना की जर्नी एक क्लासिक स्टार किड स्टोरी नहीं है। जहां सब कुछ आसान मिला।

हां उन्हें अपॉर्चुनिटी जरूर मिली लेकिन जिन लोगों ने हिमालय पुत्र से लेकर छावा तक उनका सफर देखा है वो जानते हैं कि उन्होंने हर 101 साल में खुद को रीइन्वेंट किया है। कभी सेंसिटिव सीड बनकर, कभी ग्रे शेड्स वाला कौन आर्टिस्ट, कभी शातिर वकील बनकर तो कभी खामोश लेकिन खतरनाक बादशाह। वो भीड़ से दूर रहते हैं। लेकिन जब भी स्क्रीन पर आते हैं तो भीड़ की नजर सबसे पहले उन्हीं पर टिकती है। शायद इसीलिए आज भी इंडस्ट्री का एक बड़ा हिस्सा उन्हें एक लाइन में परिभाषित करता है। अक्षय खन्ना बॉलीवुड का सबसे अंडर रेटेड लेकिन सबसे भरोसेमंद एक्टर।

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