उस समय तो सलमान भी फ्लॉप हीरो था। मैं मानता हूं सलमान की जगह इरफान खान होते जिनके साथ ओरिजिनली सोची थी या बूढ़ा होते जिनके साथ उसके बाद सोची और बेहतर फिल्म बनती। सलमान ने उस फिल्म को सिर्फ बिगाड़ा है। दबंग टू, दबंग 3 जैसी फिल्मों में मेरा नाम डालना पड़ेगा इन्हें। मुझसे अनुमति, मुझसे कंसेंट लेटर लेना पड़ेगा। मुझसे एनओसी लेना पड़ेगा। देखो हर एक्टर ना यह दोगला होता है।
तो जब इनके पास काम नहीं होता तो ये बहुत ऐसे ही रोते हुए आते हैं। पांव पे पड़ जाते हैं। कहते हैं सर मेरे साथ काम करो और जब काम शुरू हो जाता है तो फिर आ जाते हैं अपने असली चेहरे पे। पूरी मनमानी करवाते हैं और प्रोड्यूसर को इस्तेमाल करके फेंक देते हैं। वो मरता है तो मरे क्योंकि एक्टर्स की वजह से फिल्में चलती हैं। ऐसा नहीं है। फिल्में कंटेंट पे चलती हैं। अभिनव जी आपके साथ जो कुछ इंडस्ट्री में हुआ है उससे आपने जो सीखा है आप किस तरह से लोगों को बताना चाहेंगे कि अगर कोई नया फिल्म मेकर इस इंडस्ट्री में अपनी एक कहानी लेकर आता है और वो चाहता है कि कोई अच्छा एक्टर उसकी फिल्म का हिस्सा बने और वो कहानी उसकी ही रहे। किस तरह से वो आगे कदम बढ़ाएं। इसमें दो बातें हैं। मैं निजी तौर पर पिछले कई सालों में मैंने बहुत सारे राइटर्स को मेंटर किया है बच्चों को। तो उनको कैसे पेश आना चाहिए? इंडस्ट्री से कैसे डील करना चाहिए? मैं उनको सिखाता रहता हूं। यह कोई पब्लिक प्लेटफार्म पे बोलने वाली चीज नहीं है। पर हां, पब्लिक प्लेटफार्म में मैं यह जरूर बोल सकता हूं कि फिल्म इंडस्ट्री को अगर वापस रिस्टार्ट होना है, तो हमारे यहां फंडामेंटल बहुत सारे चेंजेस होने की जरूरत है। जिस तरह से हम काम करते हैं। तो उसी प्रक्रिया में राइटिंग में राइटर को क्रेडिट मिलना बहुत जरूरी है। क्योंकि फिर वो जिम्मेदारी लेगा। अभी तमाम लोग कहते रहते हैं। सलीम खान खुद कहते हैं कि अच्छे राइटर्स नहीं है। अच्छे राइटर सब हैं यहां पे। पर उनको ना इज्जत मिलनी है ना पैसे मिलने हैं तो वो मेहनत क्यों करेगा भाई?
तो ये गवर्नमेंट लेवल पे ना एक एक तो ये जो आईपीआर की ट्रेडिंग होती है यहां पे इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स हमने खरीद लिए किसी के। हां क्या होता है? आईपीआर में क्या-क्या चीजें आती है वो थोड़ा अगर आप समझा आईपीआर में कुछ नहीं है। एक रचयिता का नाम होता है भाई आपने कोई आविष्कार किया आप पेटेंट कर लेते हो। अब पेटेंट क्या होता है? आप इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स कि ये मैं मेरा आईडिया है। और ये हमेशा इस आईडिया के साथ मेरा नाम जुड़ा रहेगा। जैसे बच्चे के साथ हमेशा उसकी मां का नाम जुड़ा रहता है। मां से तो कोई अलग नहीं कर सकता। बच्चे के मन से कोई मां को इरेज नहीं कर सकता। वैसे किसी भी क्रिएटर को उसके क्रिएटिविटी से अलग नहीं करना चाहिए। यहां पे क्या होता है कि लोग कहते हैं कि इतने पैसे लो और सारा आईपीआर मुझे ट्रांसफर करो। आई थिंक ऑलरेडी लॉ है पर इंप्लीमेंट नहीं हुआ है कि आईपीआर शुड बी अ नॉन ट्रांसफरेबल आइटम। कि आप कर ही नहीं सकते ट्रांसफर।
तो आप आईपीआर के मोनेटाइजेशन राइट्स ट्रांसफर करो कि भाई इस आईपीआर के आधार पर पैसे कमाने का हक मैं आपको देता हूं। पर आईपीआर आप ट्रांसफर नहीं कर सकते। अगर आईपीआर ट्रांसफर नहीं हो पाएगा तो क्या होगा कि दबंग टू दबंग थ्री जैसी फिल्मों में मेरा नाम डालना पड़ेगा इन्हें। मुझसे अनुमति मुझसे कंसेंट लेटर लेना पड़ेगा। मुझसे एनओसी लेना पड़ेगा। तो जब यह मेरे से एनओसी लेने आएंगे और मैं बोलूंगा कि भाई ये स्क्रिप्ट अच्छी नहीं है। मैं अप्रूव नहीं करता। मेरे आईपीआर पे आप घटिया फिल्म नहीं बना सकते तो यह ज्यादती नहीं हो पाएगी जो हुई मेरे साथ। तो आईपीआर शुड बी नॉन ट्रांसफरेबल। एक ये होना चाहिए। मुझे एक चीज नहीं समझ में आती फिल्म इंडस्ट्री में कि स्क्रिप्ट राइटर्स एसोसिएशन में स्क्रिप्ट्स रजिस्टर हो जाती हैं। पर फिल्मों के टाइटल वगैरह ये प्रोड्यूसर एसोसिएशन में क्यों रजिस्टर होते हैं? प्रोड्यूसर्स का टाइटल से क्या लेना देना? स्क्रिप्ट का होता है तो मेरे ख्याल से टाइटल रजिस्ट्रेशन भी स्क्रिप्ट राइटर्स एसोसिएशन में शिफ्ट होना चाहिए और चार-चार प्रोड्यूसर एसोसिएशन है तो उसमें धांधली चलती रहती है। उसके अलावा मतलब यह तो छोटी सी प्रॉब्लम है जिसको अगर गवर्नमेंट ट्राई करेगी आईपीआर प्रोटेक्शन का तो हो जाएगी अह सॉल्व हो जाएगा और फिर एक रॉयल्टी स्ट्रक्चर होगा जिसमें हर राइटर को अच्छा काम करने का इंसेंटिव मिलेगा क्योंकि रॉयल्टी मिलेगी जिंदगी भर उसको जैसे लिरिसिस्ट को मिलती है जावेद अख्तर ने जो अच्छे गीत लिखे हैं 80 के दशक में 90 के दशक में उसकी रॉयल्टी आज भी कहीं बचते हैं तो उसके पैसे आते हैं जावेद साहब को म्यूजिक डायरेक्टर्स को रॉयल्टी मिलती है लिरिसिस्ट को मिलती ऐसे ही स्क्रिप्ट राइटर्स को भी मिलनी चाहिए। एक अच्छी स्क्रिप्ट की लिखने के लिए इंसेंटिव मिलेगा।
तो बहुत अच्छी-अच्छी स्क्रिप्ट्स हैं। बहुत अच्छी-अच्छी कहानियां हैं। पर ये होता नहीं है। यहां पे सब चोरी करते आपका एक आईडिया लिया। उसमें चार चीजें बदल दी। मतलब वो आपके सलाद पे नींबू निचोड़ के बोला कि ये मेरा सलाद है। यहां ये सब हरकतें बहुत होती है। तो ये चोरी बंद करने की जरूरत है। पर मेन जैसे अगर आप पूछ रही हैं कि फिल्म इंडस्ट्री में क्या सुधार होने चाहिए? मेन दर्द इस हमारे एंटरटेनमेंट सेक्टर को ना एक्टर्स से है। सुपरस्टार्स से। ये सबसे बड़े दर्द का कारण है। आधी मतलब 90% समस्याओं की जड़ ये लोग हैं। इसमें सबसे बड़ी इंडस्ट्री का है कि एक्टर्स के स्टाफ का खर्चा। ये बहुत सिंपल है। पूरे टेक्नशियन और पूरे इन्वेस्टर जगत को साथ आना पड़ेगा और बोलना पड़ेगा कि भाई एक्टर से जो भी प्राइस फी नेगोशिएट हो उसमें उनके स्टाफ का ऑल इंक्लूसिव हो। बाकी सेट्स पे प्रोड्यूसर खाना देता ही है। हां, मेकअप वैन, फैसिलिटी सब कुछ फैसिलिटी जेनेरिक रहती है सेट्स पे। या आप वो यूज़ करिए और आपको अपना पर्सनल स्टाफ लाना है तो लेकर आइए उनको। आप घर से पैसे दीजिए। आपके घर के नौकर हैं वो। हां, जितने देने हैं दीजिए, कम देने हैं कम दीजिए। उनका ट्रैवल तमाम पैसे टिकट में खर्च होते हैं। एयर टिकट्स में फिर उनका होटल स्टे वो सब एक्टर के पैसे से काटो। और एक्टर को बोलो इन सबका मिला के भाई आप अपनी फीस नेगोशिएट करो। इट्स ऑल इंक्लूसिव।
तो बहुत सही हो जाएगा। बजट्स कंट्रोल आ जाएंगे क्योंकि ये जो एक्टर्स का पर्सनल स्टाफ होता है यही बकवास बजट बिगाड़ देता है। पहली चीज ये दूसरी मैं मुझे लगता है इन्हें सुपरस्टार्स को ये जो यू नो 100 करोड़ 150 करोड़ अनाप शनाप फीस मिलती है और ये लोग शूटिंग पे नहीं आते। बहुत रायता फैलाते हैं। बहुत कॉस्ट बढ़ जाती है इन लोगों की वजह से। बदतमीजी इनकी फरमाइशें इसको कम करने का एक ही तरीका है। आप जो भी जिसकी भी फीस आप एक अमाउंट तय कर लो कि 1 करोड़ से ऊपर है जिस एक्टर की फीस उसको बोलो फीस फिल्म बनने के बाद मिलेगी और फिल्म करने के लिए इनसे इनकी फीस का 25% डिपॉजिट रखो।
तो अगर जिस एक्टर को 100 करोड़ मिलने हैं उसको 25 करोड़ वो डिपॉजिट दे तब वो 100 करोड़ के लायक है। हां और उसी के डिपॉजिट से बनाओ फिल्म ताकि यह लेट आना बंद हो जाए। हां। और अगर कुछ भी यह बदतमीजी करे, कॉन्ट्रैक्ट को ब्रीच करे, इसके पैसे काटो। और यह सिस्टम अगर इंप्लीमेंट हो जाए ना, तो यह सारे एक्टर्स की बदतमीज़ियां, ज्यादतियां बंद हो जाएंगी। जब कोई एक्टर इस तरह की चीजें करते हैं तो प्रोड्यूसर, डायरेक्टर और क्रू मेंबर्स किस तरह से सफर करते हैं? या प्रोड्यूसर फंस चुका होता है। देखो हर एक्टर ना ये ये दोगला होता है। हर एक्टर इसके मल्टीपल चेहरे होते हैं। दोगला मतलब ये नहीं कि सिर्फ दो चेहरे मल्टीपल होते। यह जब तक फिल्म हाथ में नहीं आ जाती, शूटिंग शुरू नहीं हो जाती तब तक बहुत मीठा बोलते हैं। इतना अच्छा बोलते हैं आप सोचोगे कितने महान लोग हैं। यह तो डिर्व करते हैं इतना पैसा और रिस्पेक्ट और एक बार शूटिंग शुरू हो जाती है तब प्रोड्यूसर के पैसे लग जाते हैं। क्योंकि पूरी यूनिट आना शुरू हो जाती है। सबको पैसे जाते हैं। शूटिंग का खर्चा।
ये सब प्रोड्यूसर भरता है। तो इसको बोलते हैं कंटिन्यूटी में फंसना। ये फिल्म बनना एक ऐसी ट्रेन है जो एक बार चल गई फिर उसको आप रोकेंगे तो बहुत नुकसान होगा। यस। तो जब ये तीन चार पांच दिन की शूटिंग हो जाती है और एक्टर का चेहरा फंस जाता है कंटिन्यूटी में अब आप अब एक्टर बदतमीजी शुरू करता है। अनापशनाप डिमांड्स तब शुरू होती हैं। लेट आना तब शुरू होता है क्योंकि उसको मालूम है अब प्रोड्यूसर फिल्म रुकने नहीं देगा क्योंकि उसके ₹3 करोड़ खर्च हो चुके हैं। अब वह ₹3 करोड़ अपनी रिकवर करने के चक्कर में ₹ करोड़ 5 करोड़ और खर्च करेगा और जितना ज्यादा प्रोड्यूसर का खर्च पैसे लगते जाते हैं एक्टर्स की बदतमीजियां उतनी ज्यादा बढ़ती जाती है और ये इसी को आर्म ट्विस्टिंग बोलते हैं और इस तरह से कर के पूरी मनमानी करवाते हैं और प्रोड्यूसर को इस्तेमाल करके फेंक देते हैं। वो मरता है तो मरे और वो उनको कोई लेना देना नहीं। एक्टर को पैसे भी सबसे ज्यादा मिल गए। सबसे कम काम भी किया।
सारी फरमाइशें भी पूरी हो गई उनकी। उनके घर के खर्चे आपने कितने सुने होंगे एक्टर्स फिल्म की कॉस्ट्यूम उठा के घर ले जाते हैं। प्रोड्यूसर से कुछ अच्छा लगा। प्रोड्यूसर की कार ही अच्छी लगी तो ले जाते हैं उठा के। प्रोड्यूसर बेचारा दयनीय हालत में आ जाता है उस समय कि वो करें क्या? अगर एक्टर नाराज हो गया तो इनके सारे पैसे डूब गए। और एक्टर का चेहरा है। डायरेक्टर बदतमीजी करे तो डायरेक्टर बदला बदला जा सकता है। है ना? कैमरामैन बदतमीजी करे उसको बदल देते हैं। कोई भी कैमरे के पीछे का कोई भी आदमी और कई बार छोटा एक्टर जिसने एक सीन शूट भी कर लिया हो पर उसकी आगे की डेट मैच नहीं हो रही। लोग रिप्लेस कर देते हैं। एक ही सीन थोड़ा ही लॉस है। पर हीरो जिसको आप 100 करोड़ की फीस दे रहे हो।
वो शूटिंग पे नहीं आए तो आप 2025 करोड़ ऑलरेडी दे चुके हो उस पे और 5-10 करोड़ खर्च कर चुके हो। फिर प्रोड्यूसर के हाथपांव ठंडे पड़ जाते हैं। फिर उसको हर जाती सहनी पड़ती है। इस चक्कर में फिल्म बर्बाद और एक्टर्स ये बात जानते हैं। इसलिए बहुत मीठा बोलते हैं। जब तक इनको फिल्म नहीं मिल जाती। अभी वो सुनील दर्शन जी आए थे। उन्हीं के पडकास्ट में सुन रहा था कैसे अक्षय कुमार रोता हुआ आया और बोला कि किसी प्रोड्यूसर ने बड़ी बदतमीजी से बात की। तो जब इनके पास काम नहीं होता तो ये बहुत ऐसे ही रोते हुए आते हैं। पांव पे पड़ जाते हैं। कहते हैं सर मेरे साथ काम करो। ये और जब काम शुरू हो जाता है तो फिर आ जाते हैं अपने असली चेहरे पे। तो ये सुपरस्टार्स ना ये बहुत ही बड़ी दोगली कौम है और इनको कसने की बहुत जरूरी है। बहुत जरूरत है और उसको कसने का तरीका यही है कि इनसे डिपॉजिट लिया जाए। आप घर लेती हैं मुंबई में किराए पे तो डिपॉजिट रखती है ना लैंड लॉर्ड के पास कि अगर पंखा खराब कर दिया दीवार तोड़ दी तो लैंड लॉर्ड पैसे काटेगा। ऐसे ही हर एक्टर को भी इतने पैसे उसके जो भी फीस तय होगी उसके 25% डिपॉजिट रखना चाहिए। लेकिन प्रैक्टिकली अगर हम इस चीज को इंप्लीमेंट करने जाए तो आपको लगता है सलमान और शाहरुख जैसे सुपरस्टार्स अपनी फीस का 25% डिपॉजिट के रूप में देंगे?
देखो मुझे नहीं मालूम देंगे कि नहीं देंगे। और बात सिर्फ सलमान शाहरुख की नहीं है। हां। पर क्या ये दे सकते हैं? बिल्कुल दे सकते हैं। यही लोग तो छपवाते रहते हैं कि किसकी नेटवर्थ कितनी है? 3000 करोड़, 12,000 करोड़ पता नहीं क्या-क्या है। लेकिन ये तो यह तो दे सकते हैं ना। और क्या देना चाहिए कि नहीं देना चाहिए? बिल्कुल देना चाहिए। बट ये तो कहेंगे मेरा नाम जुड़ना ही फिल्म का 25% प्रॉफिट है। आपकी फिल्म वैसे ही हिट हो गई। नहीं ये कहेंगे नहीं। ये कहते आ रहे हैं। यही नैरेटिव अभी चल रहा है। वर्तमान में इसी को तो बदलने की बात कर रहा हूं मैं। और यह सरकार के लेवल से हो सकता है। तो मैं कोशिश कर रहा हूं कि गवर्नमेंट तक ये सारे प्रपोजल्स पहुंचाऊं और अगर आईएबी मिनिस्ट्री सीरियस है कि कुछ चेंजेस देखे एंटरटेनमेंट सेक्टर में तो ये सब चेंजेस इनको इंप्लीमेंट करने चाहिए और जब सरकार के स्तर से होगा तो सबके साथ होगा। सलमान शाहरुख की क्यों? भाई, जिसको लगता है कि उसकी वर्थ 100 करोड़ फीस लेने लायक है, और वह 100 करोड़ की फीस जस्टिफाई कर सकता है, वह 25 करोड़ तो रख ही सकता है ना डिपॉज़िट। और डिपॉज़िट ही तो है। फिल्म खत्म करे टाइम से आए। हम सेट के दिए स्पेस में वो मेकअप कराए, अपना वो करे तो उसके 25 करोड़ वापस आ जाएंगे। प्लस उसके 100 आएंगे फिल्म खत्म होने पे। क्यों नहीं दे सकते? ये बिल्कुल दे सकते हैं। या क्या ये देना चाहते हैं? बिल्कुल नहीं।
इनकी नियत सिर्फ लूटने की है। यही तभी तो मैं बोलता हूं जिहादी मानसिकता के लोग हैं। ये लूटने की नियत से आते हैं। इनको सिर्फ लूटना है, बर्बाद करना है और इन्हें खुशी मिलती है प्रोड्यूसर्स को बर्बाद करके। लेकिन डायरेक्टर और उनकी भी तो जरूरत रहती है कि स्टार तो बड़ा ही चाहिए। ये स्टार चाहिए। हम तो वो उनकी शर्तों के आगे वो भी तो दबे हैं। इसीलिए कल्चर शुरू है। नहीं किसी डायरेक्टर की जरूरत नहीं होती है कि स्टार बड़ा चाहिए। यह प्रोड्यूसर्स की जरूरत होती है यह नैरेटिव सदियों से चला आ रहा है कि एक्टर्स की वजह से फिल्में चलती हैं। ऐसा नहीं है। फिल्में कंटेंट पे चलती हैं। और एक्टर्स भी उसी कंटेंट का हिस्सा हैं। और एक जमाना था एक्टर्स इतनी बदतमीजी नहीं करते थे। एक्टर्स बहुत रिस्पेक्टफुल थे और क्या कहते हैं? पूरी फिल्म इंडस्ट्री एक फैमिली की तरह ऑपरेट होती थी। बड़ा मिलजुल के काम करते थे। तो सबका एक रोल था। पर ऑब्वियसली जब फिल्म रिलीज होती है तो एक्टर्स का चेहरा दिखता है।
तो फिल्म के राइट अप होता है तो एक्टर्स की फोटोग्राफ्स लगाई जाती है। जनता एक्टर्स से आपको पहचानती है। तो एक्टर्स का हम प्रचार कराते थे। तो इसका मकसद ये नहीं था कि एक्टर्स अपना दिमाग खराब कर लें और आके सबके सर पे हगे। जो हग रहे हैं आज। दबंग में अगर सलमान नहीं होते तो क्या वो इतनी बड़ी हिट होती। क्या जाने हिट होती कि नहीं होती। अब भविष्य किसने देखा। पर दबंग में अगर सलमान नहीं होते तो मैं मानता हूं दबंग किसी और एक्टर के साथ बनती और अगर जैसा मैंने एनविज़ किया था वैसी बनती तो बहुत बेहतर फिल्म बनती। दबंग से नंबर्स डज़ नॉट मीन एनीथिंग डज़ नॉट मीन क्वालिटी ऑफ़ अ फिल्म।
नंबर इतने आते कि नहीं आते पता नहीं। उस समय तो सलमान भी फ्लॉप हीरो था। हो सकता है उससे ज्यादा बिज़नेस हो जाता। हो सकता है इससे कम होता। मुझे बिज़नेस से कोई लेना देना नहीं है। मुझे फिल्म बिज़नेस ज्यादा करे तो क्या कहते हैं एक्स्ट्रा पैसे नहीं देता कोई। अरबाज़ खान ने भी नहीं दिए। फिल्म अच्छी बनती कि नहीं? मैं मानता हूं सलमान की जगह इरफान खान होते जिनके साथ ओरिजिनली सोची थी या बूढ़ा होते जिनके साथ उसके बाद सोची और बेहतर फिल्म बनती। सलमान ने उस फिल्म को सिर्फ बिगाड़ा है। उसमें से वैल्यू सब्ट्रैक्शन किया है। एडिशन कुछ नहीं किया। आज 15 साल बाद सोचिए कि आप दबंग बना रहे होते तो किस एक्टर के साथ बनाते? यह सब आर्टिकल है। मैं इसमें नहीं जाना चाहता। आज 15 साल बाद मैं क्यों बनाऊंगा दबंग वापस? नहीं वापस नहीं। जो बच्चे अब बना रहे होते हैं 2025 में। खुशबू जी आप एक फैन की तरह बात करती हैं। आपके लिए ना फिल्म में सिर्फ एक्टर एक्टर ही इंपॉर्टेंट है। स्टार इंपॉर्टेंट है। आपके सारे सवाल उसके मेरे लिए स्क्रिप्ट स्टार होती है। हां मैं एक्टर का चेहरा नहीं देखता। जैसे क्रिकेट में बोलते हैं ना बॉल देखो, बॉलर मत देखो। मैंने सलमान खान के लिए नहीं लिखी थी फिल्म। ना किसी और के लिए लिखी थी फिल्म। मैंने फिल्म लिखी थी उसमें मुझे लगता है जो सूट करता है मैं उसके पास जाता हूं। भ दबंग में 36 की उम्र में जब फिल्म लिखी थी तब दबंग मैंने एक मुद्दे पे लिखी थी। करप्शन पे। करप्शन उस समय बहुत बड़ा मुद्दा था और उस समय अरविंद केजरीवाल नहीं आए थे। अन्ना हजारे भी नहीं हुआ था। देश में करप्शन बहुत ज्यादा था और करप्शन के मुद्दे पे मैंने फिल्म लिखी थी और सारे कैरेक्टर्स को करप्ट बनाया था। उसके बाद सोचना शुरू किया कि किसको एक्टर लेना है किसको नहीं। तो एक्टर सबसे इंपॉर्टेंट नहीं होता किसी फिल्म मेकर के लिए। ये सब फैंस इस तरह से बातें करते हैं। वो स्क्रिप्ट इंपॉर्टेंट होती है और दबंग मैं बना चुका हूं। तो अब क्यों बनाऊंगा 51 की उम्र में? अब देश के इश्यूज अलग हैं। मेरे पास और बहुत सारी स्क्रिप्ट्स हैं। बहुत सारे आइडियाज हैं। इस समय जो इशूज़ हैं।
हां। अब जो इश्यूज इस समय वर्तमान में चल रहा है पूरे देश में सब लोग जिहादियों से परेशान है। पूरी दुनिया में हां जब उसकी बात करता हूं तो आप कहते हो आप हिंदू मुस्लिम कर रहे हो। भाई जिस जब करप्शन की बात कर रहा था तो लोग कह रहे हैं क्यों बना रहे हो करप्शन पे फिल्म? सभी तो करते हैं करप्शन। तो दिक्कत यही है फिल्म मेकर कोई भी फिल्म मेकर या अच्छा पत्रकार वो होता है ना वो जो डिफिकल्ट इशूज़ हैं उनको एड्रेस करता तो आज के डिफिकल्ट इशूज़ 2025 के बहुत अलग हैं।
फिल्म इंडस्ट्री के एक से एक टैलेंटेड बच्चे हैं। आलिया भट्ट को देखिए, रणबीर कपूर को देखिए। ये तो क्या है? ये नेपोकि्स ही तो हैं। लेकिन सुप्रीम टैलेंटेड कोई कह ही नहीं सकता कि इनमें टैलेंट नहीं है।
ये अपने दम पे ऊपर आए हैं। जो बॉलीवुड के लोगों ने कार्टल बना दिया है कि हम अपने अंकल, आंटी और दूसरों के बच्चों को ही मौका देंगे और कोई बाहर वाला आएगा टैलेंटेड तो उसका या तो क्रेडिट छीन लेंगे या उसको बंधुआ मजदूर बना लेंगे स्लेव बना लेंगे गुलामी की कॉन्ट्रैक्ट साइन करा के उससे ज्यादा तो मुझे अट्रैक्शन अब मिल रहा है पडकास्ट पे आपके तो अब मुझ पे ये सवाल उठाए जा रहे हैं 15 साल बाद क्यों बोल रहे हो
