लेबनान हमले के बाद ईरान कैसे हुआ के लिए तैयार? इस्लामाबाद में शांति वार्ता। ट्रंप के दामाद की एंट्री। एक सवाल पूरी दुनिया पूछ रही है। आखिर वो कौन सा पल था जब ईरान जो लगातार के मूड में दिख रहा था, अचानक वह शांति वार्ता के लिए मान गया। कुछ दिन पहले तक हालात बिल्कुल अलग थे।
लेबनान में हुए हमलों ने पूरे मिडिल ईस्ट को हिला दिया था। ईरान का साफ रुख था। जब तक हमले बंद नहीं तब तक बातचीत नहीं। में लिबनान को भी शामिल किया जाए। तेहरान बार-बार कह रहा था कि की कोई भी बात तब तक बेकार है जब तक जमीन पर खून बह रहा है। लेकिन फिर एक तस्वीर सामने आती है जिसने पूरी दुनिया को बदल दिया। जब ईरान का हाई लेवल प्रतिनिधि मंडल इस्लामाबाद पहुंचा तो उन्होंने सिर्फ कूटनीतिक बातचीत नहीं की बल्कि एक संदेश दिया। उनके सामने रखे थे खून से सन्ने स्कूल, बैग, छोटे-छोटे जूते और उन बच्चों की तस्वीरें जो मिनाब के एक एलिममेंट्री स्कूल पर हुए अमेरिकी हमले में मारे गए थे।
यह सिर्फ श्रद्धांजलि नहीं थी। यह एक आरोप था, एक भवानात्मक दबाव था और दुनिया को दिखाने की कोशिश थी कि यह जंग सिर्फ हथियारों की नहीं इंसानों की भी है। यही वह मोड़ था जहां ईरान ने अपनी रणनीति बदली। एक तरफ अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ रहा था। दूसरी तरफ आर्थिक और सैन्य तनाव लगातार गहराता जा रहा था।
ईरान समझ रहा था कि अब भी अगर बातचीत का रास्ता नहीं चुना तो हालात और बिगड़ सकते हैं। और फिर फैसला हुआ इस्लामाबाद में शांति वार्ता। इस अहम बातचीत में अमेरिका की तरफ से उपराष्ट्रपति जे डी वेंस, मध्यपूर्व के दूत स्टे विटकॉफ और सबसे ज्यादा चर्चा में डोन्ड ट्रंप के दामाद जेड कुशनेर शामिल हैं। यही सबसे बड़ा सवाल होता है कि कुशनेर आखिर इसमें क्यों शामिल है? उनके पास कोई आधिकारिक सरकारी पद नहीं है। कोई औपचारिक कूटनीति का अनुभव नहीं है। फिर भी वह इस शांति वार्ता का हिस्सा हैं। यह पहली बार नहीं है।
पहले भी वे बातचीत में शामिल रहे हैं। लेकिन तब कोई ठोस नतीजा नहीं निकला था। कुशनेर की मौजूदगी को लेकर अमेरिका में भी सवाल उठ रहे हैं। खासतौर पर उनके इजराइल से करीबी रिश्तों को लेकर। लेकिन ट्रंप उन्हें विश्वसनीय दूत मानते हैं जो बैक चैनल बातचीत में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
वहीं ईरान की तरफ से संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबाफ और विदेश मंत्री अब्बास अराक्षी इस वार्ता में शामिल हैं। अब यह बातचीत सिर्फ एक सीज फायर की नहीं रह गई है। यह भरोसे दबाव और रणनीति की जंग बन चुकी है।
ईरान ने बातचीत के लिए हामी तो भर दी है। लेकिन साफ कर दिया है। यह अंत नहीं है। उसका संदेश अब भी वही है। अगर जरा सी भी गलती हुई तो जवाब पूरी ताकत से दिया जाएगा। इस्लामाबाद में चल रही यह वार्ता अब सिर्फ दो देशों के बीच की बातचीत नहीं है। यह पूरी दुनिया के लिए एक टेस्ट बन चुकी है। क्योंकि जहां जो फैसला होगा वह तय करेगा कि मिडिल ईस्ट में शांति आएगी या फिर एक और बड़ा टकराव शुरू होगा।
ट्रंप की कोशिश पीस डील से ज्यादा दुश्मन देशों से व्यापार डील करने की भी होती है। ट्रंप चाहते हैं कि शांति समझौते में कुछ ऐसा हो जिससे अमेरिका और उसके व्यापारियों को ज्यादा फायदा मिले। इसी तरह का डील गाज़ा में भी ट्रंप ने करवाया था। उस डील में भी कुशनेर की भूमिका थी। कुशनेर का कारोबार मिडिल ईस्ट में केंद्रित है। उनकी कंपनी एफिनिटी पार्टनर को सऊदी क़तर और यूएजी से देशों से जमकर पैसे मिलते हैं।
फोब्स पत्रिका के मुताबिक कुशनेर की संपत्ति $1 बिलियन से ज्यादा की है और यही वह कारण है कि कुशनेर भी मीटिंग्स में शामिल हो जाते हैं। दूसरे तवे पर अपनी रोटी सेकने को कुशनेर हर मीटिंग्स में पहुंचते हैं। यानी कि यहां उनका मकसद सिर्फ यह हो सकता है कि वह अपने बिजनेस पर्पस को आगे बढ़ाएं।
