यु!द्ध के बीच भारत का बड़ा मास्टरस्ट्रोक, इस नई जगह से आएगा ‘LPG – पेट्रोल।

एक तरफ युद्ध का माहौल है। दूसरी तरफ बाजार में हलचल है और तीसरी तरफ वो बड़ा खेल चल रहा है जो चुपचाप पूरी दुनिया की दिशा बदल सकता है। एक तरफ स्ट्रेट ऑफ हरमूज है जहां से दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल गुजरता है और जो अभी भी पूरी तरह नॉर्मल नहीं हो पाया है।

ईरान ने अपने कुछ दोस्त देशों को वहां से निकलने की परमिशन जरूर दी है लेकिन सप्लाई पहले जैसी नहीं रही। ऐसे वक्त में जब एक बड़ा रास्ता संकट में है। ठीक उसी वक्त हजारों किलोमीटर दूर एक नया खेल शुरू हो चुका है और वो जगह है मेक्सिको की खाड़ी जिसे अब अमेरिका दुनिया का नया मिडिल ईस्ट बनाने की तैयारी में जुट गया है। अब सवाल यह है कि क्या सच में मिडिल ईस्ट का दबदबा खत्म हो सकता है और क्या मेक्सिको की खाड़ी दुनिया का नया ऊर्जा केंद्र बन सकती है?

अमेरिका और ईरान के बीच टकराव का सीधा असर स्ट्रेट ऑफ हॉर्म पर पड़ा है जो दुनिया के करीब 20% तेल की सप्लाई का रास्ता है। लेकिन जहां संकट होता है, वहीं अवसर भी पैदा होता है और इसी मौके को अमेरिका ने भांप दिया है। अब थोड़ा गौर करना होगा मेक्सिको की खाड़ी पर जहां समुद्र की गहराइयों में तेल और गैस का बड़ा भंडार मौजूद है। यहां एक अल्ट्रा डीप वाटर प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है। जिसमें दुनिया की सबसे बड़ी ऊर्जा कंपनियां निवेश करने के लिए तैयार हैं।

टोटल एनर्जीes शेल बीपी और रेप्सोल जैसी दिग्गज कंपनियां इस प्रोजेक्ट में हिस्सेदारी खरीदने की दौड़ में शामिल हैं। यह कंपनियां सिर्फ बिजनेस नहीं करती बल्कि दुनिया की ऊर्जा स्ट्रेटजी को भी इफेक्ट करती हैं और जब यह किसी जगह पर दांव लगाती है तो उसका मतलब होता है कि वहां भविष्य में बड़ा बदलाव आने वाला है। इस पूरे खेल का केंद्र है शिनडो ऑयल फील्ड जो समंदर की करीब 300 फीट गहराई में स्थित है। इतनी गहराई में पहुंचना और वहां से तेल निकालना किसी चुनौती से कम नहीं है क्योंकि वहां का प्रेशर करीब 20,000 पीएसआई तक पहुंच जाता है जो नॉर्मल परिस्थितियों से कई गुना ज्यादा है। इसके बावजूद यहां से उत्पादन शुरू हो चुका है और हर दिन करीब 1 लाख बैरल तेल निकाला जा रहा है।

यह सिर्फ शुरुआत है और अगर उत्पादन अपनी पूरी क्षमता तक पहुंचता है तो यह आंकड़ा और भी बढ़ सकता है। इसी वजह से इस प्रोजेक्ट के मौजूदा मालिक अपनी 51% हिस्सेदारी बेचने की तैयारी में है और इसके लिए जल्द ही बड़ी बोली लग सकती है जिसमें मिडिल ईस्ट और एशिया के बड़े खिलाड़ी भी शामिल हो सकते हैं। अब अगर इसे पूरे घटनाक्रम को ग्लोबल पॉलिटिक्स से जोड़कर देखें तो तस्वीर और क्लियर हो जाती है। मिडिल ईस्ट लंबे वक्त से दुनिया का सबसे बड़ा तेल केंद्र रहा है।

लेकिन वहां हमेशा एक जोखिम बना रहता है। चाहे वो युद्ध का हो, राजनीतिक तनाव का हो या क्षेत्रीय या अस्थिरता का। ऐसे में जब स्ट्रेट ऑफ हॉर्मोस जैसे अहम रास्ते पर संकट दिखा तो दुनिया को यह महसूस हुआ कि ऊर्जा सप्लाई के लिए वैकल्पिक रास्ते जरूरी है और यही मौका अमेरिका के लिए सबसे बड़ा अवसर बन गया। मेक्सिको की खाड़ी एक ऐसा क्षेत्र है जो युद्ध से दूर है जहां राजनीतिक स्थिरता है और जहां मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद है। अब बात भारत की करें तो यह पूरी कहानी भारत के लिए काफी इंपॉर्टेंट है।

भारत दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते ऊर्जा उपभोक्ताओं में से एक है और उसे लगातार बड़ी मात्रा में तेल और गैस की जरूरत होती है। ऐसे में अगर भारत को एक ऐसा सप्लायर मिलता है जो स्थिर हो जहां से सप्लाई बिना रुकावट के मिल सके और जहां कीमतों में ज्यादा उतार-चढ़ाव ना हो तो यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बहुत बड़ा फायदा हो सकता है। अगर मेक्सिको की खाड़ी से बड़े पैमाने पर तेल और गैस की सप्लाई शुरू होती है तो भारत अपनी मिडिल ईस्ट पर निर्भरता को कम कर सकता है और अपने आयात के स्रोतों को वैरियस बना सकता है।

जिससे फ्यूचर में किसी भी संकट का असर कम होगा। इस कहानी में एक और खास बात है इन्वेस्टमेंट और टेक्नोलॉजी की। इतनी गहराई में जाकर तेल निकालना आसान नहीं है और इसके लिए अत्याधुनिक तकनीक की जरूरत होती है। साथ ही इस सेक्टर में अरबों डॉलर का निवेश आने की संभावना है जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। हालांकि इस पूरे मामले में जोखिम भी कम नहीं है।

इतनी गहराई में ड्रिलिंग करना एनवायरमेंट के लिहाज से खतरनाक हो सकता है और अगर कोई दुर्घटना होती है तो उसका असर बहुत बड़े क्षेत्र पर पड़ सकता है। इसके अलावा अगर मिडिल ईस्ट में हालात सुधर जाते हैं तो वहां से सस्ता तेल फिर से बाजार में आ सकता है जिससे अमेरिका के इस प्रोजेक्ट को कंपटीशन का सामना करना पड़ सकता है।

तो एक तरफ संकट है और दूसरी तरफ अवसर है और इन दोनों के बीच पूरी दुनिया का फ्यूचर कनेक्ट है। तो देखना होगा कि क्या मेक्सिको की खाड़ी सच में नया मिडिल ईस्ट बन पाती है और क्या भारत जैसे देश इस बदलाव का सबसे ज्यादा फायदा उठा पाते हैं

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