इजराइल और यूएस ने जब से ईरान के नाम यह शुरू की है और तीनों मुल्क जब से आपस में लड़ रहे हैं तब से एक नाम बार-बार आ रहा है। खबरों में हो, सुर्खियों में हो या बातचीत आम सोशल मीडिया की चर्चाओं में हो। वो नाम है शाहिद का जो ईरान का है। क्यों? क्योंकि उस के जरिए ईरान ने इस तरह हमला किया चाहे वो यूएस बेससेस हो, चाहे वो इजराइल का मुल्क हो, वहां के जो स्टेशंस हैं उनको हो।
तो वहां पर इस तरह से उस के इस्तेमाल से हमला किया है ईरान ने जो काबिले तारीफ माना जा रहा है एनलिस्ट की नजर में क्योंकि उन ड्रोन की कीमत उतनी कुछ खास है नहीं और वोकि आत्मघाती हैं तो वो जाकर वहां पर फट जाते हैं और लेकिन उनको जब इंटरसेप्ट करना रहता है उनको रोकना रहता है तो डिफेंस में काफी ज्यादा खर्चा आता है और उसमें फिर आप जानते हैं कि प्रसीजन जो है सटीकता वो कभी 100% हो नहीं सकती तो कई बार उनके हमले सक्सेसफुल हो भी जाते हैं और जो नुकसान पहुंचाना चाहता है ईरान उन जगहों पर उन टारगेट्स पर वो पहुंच जाता है।
लेकिन इसी शाहिद के लिए अब बदले में अमेरिका ने भी टेक्नोलॉजी कॉपी करके एक अपना ड्रोन ला लिया है जिसका नाम है ल्यूकस। अब इस ड्रोन में क्या खासियत है और दोनों ड्रोंस के बीच में डिफरेंस क्या है और किस तरह से अमेरिका ने इसको डेवलप किया। क्या इसी युद्ध के दौरान ये ड्रोन डेवलप हुआ या पहले से इसका डेवलपमेंट और रिसर्च चल रहा था। वो पर काफी दिलचस्पी रखते हैं और उनकी जो डिटेल्स हैं वो हम तक पहुंचाएंगे। तो सबसे पहले तो मैं जानना चाहूंगा ये जो नाम है वो कहां से आया और बल्कि इससे पहले भी हम इस पे बात कर सकते हैं कि इसकी रिसर्च एंड डेवलपमेंट कब से शुरू होती है? देखिए ये प्रेसिडेंट जो बाइडन जब यूएस के प्रेसिडेंट थे तो उस समय से इसकी डेवलपमेंट शुरू होती है।
वहां से इसके ट्रेसेस मिलते हैं और लकस मतलब इसका पूरा एक फुल फॉर्म है। लो कॉस्ट अनक्रड कॉम्बैट अटैक सिस्टम। तो इसी को शॉर्ट फॉर्म में लकस कहा जाता है और अमेरिका देखिए रिवर्स इंजीनियरिंग एक शब्द होता है नाविद मिलिट्री में। हालांकि देखिए रिवर्स इंजीनियरिंग कुछ होता नहीं है। चोरी को अगर बहुत डिग्निफाइड तरीके से बहुत सम्मानित तरीके से चोरी को कोई नाम देंगे तो वो रिवर्स इंजीनियरिंग देंगे।
चाइना इसमें बड़ा माहिर है। चाइना ने खूब सारे मतलब नो डाउट उन्होंने बड़े अच्छे बनाए हैं। लेकिन वो अधिकतर रिवर्स इंजीनियरिंग करके बनाए। अमेरिका ने इस बार हम कह सकते हैं कि ईरान का चुरा लिया है और ड्रोन चुरा के भी लेकिन वो किफायत के मामले में उन तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। मैं जब दोनों को कंपेयर कर रहा था तो मैं एक चीज देख रहा था कि कीमत के मामले में अभी भी कम से कम $00 का डिफरेंस है। सबसे नीचे भी अगर आप आएंगे सबसे कम वॉर हेड जो बारूद जो होता है सबसे कम एक्सप्लोसिव इस्तेमाल करेंगे तब भी लकस कम से कम $10 महंगा है।
यानी रिवर्स इंजीनियरिंग करने के बाद भी कॉपी। अच्छा इससे मेरे को याद आया कि अब अगर कोई कॉपी करता है, अगर कहीं से कोई चीज़ चुराई है उसी को अगर हम Lindin स्किल्स में डालेंगे तो उसमें हम रिवर्स इंजीनियरिंग लिख कर डालेंगे Lindin वाली भाषा में। ये आपने अमेरिका ने उसमें किया है। जी आपने बताया कि $10,000 का फर्क अभी भी आ रहा है। इसके अलावा और क्या-क्या फर्क है इसमें? क्योंकि $10,000 महंगा है तो क्या उसमें कोई और खासियत हमें मिल रही है? देखिए दोनों ड्रोंस को अगर आप देखेंगे चाहे लूकस हो यूएस का चाहे शाहिद 1336 हो ईरान का दोनों देखने में बिल्कुल एक जैसे लगते हैं।
हां कलर का फर्क आप कह सकते हैं कि ईरान वाले ड्रोन अधिकतर ब्लैक कलर के होते हैं। हां लेकिन ऐसे दोनों देखने में शेप और लगभग लगभग साइज एक ही बराबर है। हां ईरान का जो ड्रोन है वो थोड़ा सा आप कह सकते हैं कि साइज में बड़ा है। तो इस हिसाब से उसमें वॉर हेड ज्यादा लगता है। लेकिन हां ईरान ने जो कंपोनेंट्स यूज़ किए हैं जो प्रोपेलर आप देखेंगे उसमें पीछे एक पंखी की तरह घूमता रहता है उस ड्रोन में और लॉन्च के समय उसमें से वो आफ्टर बर्नर जहाज की तरह आग निकलती है।
उसके बाद वो अपना धीरे धीरे धीरेधीरे वो अपने टारगेट की ओर बढ़ता है। तो जो कॉस्टिंग इस वजह से है जो कॉस्ट कटिंग की है ईरान ने वो इस वजह से कि उन्होंने बहुत सिंपल सा एक जीपीएस आईएएस सिस्टम होता है इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम वहां पे आप लोकेशन फीड करते हैं जहां उनको टारगेट करना है। फिर वो ड्रोन वन वे अटैक हो जाता है। एक बार वो गया तो वो वापस नहीं आएगा। वो इसमें जान माल का खतरा नहीं होता। हम बहुत कम खर्चे में बन जाते हैं। कम इंडियन करेंसी में देखें तो ईरान के ड्रोन 18 से 20 लाख में बन जाते हैं। मतलब हथियारों के मद्देनजर ये कम है। ये कम है। और क्रूज मिसाइल उनसे जो एक लेवल ऊपर का हथियार है अगर आप कितना भी कम जाएंगे तो कम से कम आपको करोड़ रुपए तो खर्च करने ही पड़ेंगे क्रूज के लिए।
अमेरिका का जो लकस ड्रोन है वो साइज में लगभग आधा मीटर छोटा है। मतलब कोई बहुत अंतर नहीं है आपका। स्पीड में भी वो कम है। अब यहां इन ड्रोंस में जब एयर डिफेंस को आप देखा ना कि छका रहे थे ये आयरन डोम को ये परेशान करके रख दिया इन्होंने थर्ड पेट्रियट सबको। इनकी स्पीड उस मामले में एक बहुत बड़ा मतलब डिसाइडिंग फैक्टर थी और 100 न्स के आसपास इनकी स्पीड है और 74 न्स के आसपास 74 से 75 मतलब न्स के आसपास ये अमेरिकन के लकस की स्पीड यानी लगभग 26% का डिफरेंस हो सकता है लगभग और यही डिफरेंस देखिए एक-ए जब आप सोचिए कि अगर आप गोली चलाते हैं अगर यहां से आप आधा सेंटीमीटर डिफ्लेक्ट होते हैं तो वो गोली अपने टारगेट तक पहुंचते-पहुंचते हो सकता है 100 मीटर दूर चली जाए। इतना अंतर पड़ जाता है। तो बैलेस्टिक जो कहते हैं की दुनिया में या या की दुनिया में मतलब थोड़ी सी भी रफ्तार बहुत मायने रखती है। और इस लिहाज से अमेरिका ने जो भी कॉपी की हालांकि उन्होंने कोशिश बहुत अच्छी की है।
देखिए समय-समय के साथ नवेद ये होता है ना कि डिफेंस की दुनिया में वॉारफेयर इवॉल्व हो रहा है। हम आज देख रहे हैं कि जब ईरान पे अटैक किया, पहला अटैक जो था ऑपरेशन एपिक फ्यूरी जो यूएस ने जब स्टार्ट किया, पहले अटैक के साथ ही उन्होंने पहले ऐसा कहा जाता है कि तेहरान के ट्रैफिक सिग्नल्स को पहले हैक किया। जी। उन्होंने ट्रैफिक कैमरास को हैक किया और वो देख रहे थे लगातार कि वो सारे लीडर्स कहां है और ऑन ग्राउंड उनके एजेंट्स तो रहे ही होंगे इसमें।
लेकिन बावजूद उसके तमाम तरीके की ना जो टेक इंटेलिजेंस जिसको कहते हैं वो भी वहां पे थी। तो एक वॉरफेयर का हम नया किस्म का वॉरफेयर देख रहे हैं इस बार जिसमें ना सिर्फ ह्यूमन इंटेलिजेंस ना सिर्फ हथियार बल्कि वो दिमाग और एक साइकोलॉजिकल प्रेशर बनाने की भी कोशिश है। ड्रोंस इस मामले में मतलब वो भविष्य के एकदम डिसाइडिंग फैक्टर होने वाले हैं। हमारा जब पाकिस्तान से क्लैश चल रहे थे भारत के तो हमने देखा था कि मतलब जिस संख्या में पाकिस्तान हालांकि हम तो उनको गिरा दे रहे थे। हमारे पास बहुत बेसिक सिस्टम्स हैं। हमारे पास हैंड हेल्ड वो बंदूके हैं बड़ी-बड़ी गोलियों वाली तो जो ड्रोनस को मार के वहीं पे गिरा गिरा दे रही थी। लेकिन क्योंकि यह ऐसे देश हैं ईरान हुआ, यूएई हुआ।
यहां पे आपको बॉर्डर से लेके और मेन रिहाइश तक बहुत ज्यादा दूरी नहीं बहुत दूरी नहीं है। तो जैसे ही ये जहाज स्टेट ऑफ होमोस का इलाका पार करते हैं। ये जो ड्रोन है जैसे ही पार करते हैं तो वो पहुंच जाते हैं दुबई की सुंदर-सुंदर इमारतों के पास और वहां पे देखेंगे आप कि बहरीन में ऊपर से सेंट कॉम जो क़तर में मतलब तमाम जगहों पे इसीलिए अमेरिका ये ईरान ने अटैक कर दिया। अमेरिका का जो ड्रोन है उसकी एक अच्छी चीज है। उसकी एक अच्छी चीज है कि उसका गाइडेंस सिस्टम बहुत अच्छा है। सटीकता के मामले में वोकि अमेरिकन है। उनके पास तमाम स्टेट ऑफ द आर्ट तरह-तरह के इक्विपमेंट्स हैं। तो उसका इस्तेमाल उन्होंने किया। लेकिन हां यही वजह है आपको में कॉस्टिंग का बहुत ध्यान रखना होता है।
कब आपका खर्चा 5 बिलियन डॉलर पहुंच गया अमेरिका का। अमेरिका को खुद नहीं पता चला। और ये बहुत छोटे-छोटे खर्चे थे। अभी तो उन्होंने टॉम हॉक के अलावा कोई ऐसी मिसाइल तक नहीं चलाई। अभी बहुत बड़ा हथियार अपना और अमेरिका का नेविगेशन सिस्टम अच्छा है। अह उसकी प्रसीजन अच्छी है। बावजूद उसके जो ईरानियन ड्रोंस हैं वो 20 पड़ रहे हैं। इसलिए पढ़ रहे हैं क्योंकि ईरान एक स्वर में एक शब्द होता है एसडब्ल्यू ए आर एम स्वर झुंड में ड्रोन झुंड में ड्रोन भेज रहा है वो। और वो झुंड में भेजने से दिक्कत ये होती है कि जो आपका एयर डिफेंस है वो डिटेक्ट तो सबको करेगा। लेकिन उसमें इंगेजमेंट करने के लिए उसको रोकने के लिए लिमिटेड लेवल के इंटरसेप्टर्स होते हैं और उन अब वो एयर डिफेंस समझ नहीं पाता कि आप किस किस ड्रोन को रोकोगे किस ड्रोन को छोड़ोगे और आजकल एआई इनेबल्ड जिस तरह से मधुमक्खियां अटैक करती हैं आप खुद को बचा नहीं पाते किससे बचना है ये शब्द भी वहीं से आया सोम ऑफ बीस कहते हैं तो वहीं से सोम ऑफ ड्रोंस वो उसी तरह से आते हैं और इससे ना एयर डिफेंस कंफ्यूज होता है वो समझ नहीं पाता है।
हालांकि आजकल के एयर डिफेंस में बहुत मॉडर्न है। वो एआई से वो ये तय करते हैं प्रायोरिटी कौन सा टारगेट है? किस टारगेट से नुकसान ज्यादा हो सकता है? एक रियल टाइम सिनेरियो और ये पलक झपकते होती है चीजें। तो लेकिन कई बार वो एआईबी फेल हो जाता है, टेक्नोलॉजी फेल हो जाती है।
तो वहां ह्यूमन वो काम आती है इंसान का दिमाग कि हमें उसको पहले गिराना है। जो दूसरा वाला दिख रहा है हम उसको नहीं गिराएंगे। क्योंकि दूसरा वाला शायद अभी टाइम लगे। तो ये चीजें हैं। तो अमेरिका का ड्रोन सटीक है। थोड़ा महंगा है। लेकिन अभी तक ऐसा कोई बहुत बड़ा इंपैक्ट किया हो लूकस ने यह भी हमें देखने को नहीं मिल रहा। कई ड्रोंस को डाउन भी किया है ईरान ने अपने एयर स्पेस में स्टेट ऑफ़ फोरमस के इलाके में। मतलब इसका इस्तेमाल भी शुरू हो चुका है। हां, इसका इस्तेमाल सेंट कॉम ने खुद जानकारी दी है कि इसका इस्तेमाल शुरू हो चुका है। और बावजूद इसके लेकिन अमेरिका के ड्रोनस पता नहीं क्यों मतलब शायद वो उस लेवल पे डिप्लॉय नहीं कर रहे या देखिए ईरान का तो मुख्य और उसकी मिसाइल्स हैं। अमेरिका का मुख्य हथियार उसकी और नहीं है। उसका सबसे बड़ा हथियार उसकी एयरफोर्स है। इसीलिए अभी भी इसको वो प्राइमरी हथियार के तौर पे नहीं इस्तेमाल।
इस्तेमाल नहीं कर रहे। अच्छा इसमें मैं आपसे कहूंगा कि शाही ड्रोन और लकस ड्रोन को अगर शॉर्ट में हम दोनों का कंपैरिजन बचा बताना चाहे पॉइंट वाइज पॉइंट तो क्या होगा? देखिए एक जो लेंथ होती है आप सामने से लेके पीछे तक अगर आप लंबाई देखें तो लकस 3 मीटर का है। 3 मीटर से कुछ कम है उसकी लंबाई। लेकिन हां ईरान वाला जो है वो 3.5 यानी 3.5 मीटर का है। वहीं अगर विंग स्पैन जिसको कहते हैं जो डने जो पंख होते हैं इसके वो 2 मीटर के हैं लेकिन इसके 2.5 मीटर के हैं ईरान वाले के। इसके अलावा 74 न्स की स्पीड है लकस की जहां वहीं पे 100 न्स की स्पीड है और सबसे बड़ी कामयाबी की वजह शायद कि यही 100 नट्स की इसकी स्पीड है।
इसके अलावा जब पेलोड जब बारूद की बात हम करते हैं कि कितना तबाही मचाएगा एक ड्रोन। तो करीब-करीब 44 से 45 पाउंड और कभी-कभी 50 पाउंड भी कुछ केसेस में इनमें वॉरहेड ले जा सकते हैं लोकस में। लेकिन वहीं ईरान का जो शाह ड्रोन है इसका दुगना पेलोड ले जा रहा है। इसीलिए आप देख रहे हैं कि जहां भी वो इंपैक्ट कर रहा है वो एक मिसाइल के बराबर लगभग लगभग क्योंकि 88 पाउंड बहुत एक अच्छा खासा अमाउंट होता है का। अब कीमत पे आते हैं नावेद तो कीमत पे देखेंगे तो $00 से शुरू होती है लकस की कीमत और ये जाने को $0000 तक पहुंचती है। वहीं जो ईरान का जो शाहिद है उसकी $2000 से शुरू हो जाती है। सब कुछ मैन्युफैक्चरिंग करने के बाद ये मैं फाइनल आउटपुट की कॉस्ट बता रहा हूं और जाने को मतलब आखिरी दाम जो जाएगा वो जाएगा 500 तक। तो यह अपर लिमिट और लोअर लिमिट जो है ना वह ईरान इस मामले में सही है। पेलोड के मामले में अच्छा है।
प्रसीजन के मामले में उतना शायद बेहतर नहीं है लकस जितना लेकिन हां ऑपरेशनल रेंज अगर देखें तो 2000 कि.मी. लगभग लगभग दोनों की है। तो दोनों एक दूसरे को टारगेट तो कर सकते हैं। लेकिन अमेरिका ने अभी इतने बड़े लेवल पे पहली चीज डिप्लॉय नहीं किए और दूसरी चीज़ उसके पास उस मात्रा में लांचर्स नहीं है। अमेरिका का जो मेन लैंड है जहां पे उसके जो देश है वो बहुत दूर है। और अब्राहम लिंकन से वो प्लेन ल्च करेंगे या ल्च करेंगे। उसके लिए फिर उनको एक डेडिकेटेड लांचर जगह बनानी होगी और मिडिल ईस्ट में आप देख रहे हैं कि जिस तरीके से हमले हो रहे हैं यूएस बेसिस पे तो एक कहीं डेडिकेटेड लांचर बनाना बहुत मुश्किल है।
शाहिद को 10 ऑन कितने देंगे? देखिए मैं तो शाहिद को 9.5 कहूंगा लकस को। लकस को मैं नाइन दूंगा। देखिए दोनों अपनी-अपनी जगह पे बेहतर हथियार हैं। लेकिन हां शाहिद जब रियल कॉम्बैट की बात आती है तो शाहिद लूकस से आगे है। आपको ये नहीं देखना होता ना कि किसी की टेक्नोलॉजी कितनी होगी। हमने एक F16 को हमारे ही देश के एक पायलट ने एक F16 को गिराया है MI2 का इस्तेमाल करके। तो ये ये कुछ-कुछ वैसे ही लड़ाई है। महारत आपकी कितनी हासिल हासिल है? अपनी जो क्राफ्ट है उसमें और स्किल्स में वो बहुत ईरान की ड्रोन टेक्नोलॉजी पूरी दुनिया मानती है क्योंकि रशिया जब ईरान के ड्रोन यूज़ कर रहा है जेरान टू नाम से तो आप समझ सकते हैं कि रूस जैसा बड़ा देश जब इस पे भरोसा कर रहा है और इतनी बड़ी जंग वो लड़ रहा है कितने सालों से उसके बावजूद अगर ये ड्रोंस कारगर साबित हो रहे हैं तो ये बहुत बड़ी चीज है और ईरान को इसके लिए बहुत मतलब तारीफें भी मिलनी चाहिए कि उन्होंने अपनी टेक्नोलॉजी खासकर मिसाइल और ड्रोंस पे ये दो चीजें उनकी तारीफ होनी चाहिए कि उन्होंने बहुत मेहनत की है और बहुत आगे ले गए हैं इस चीज को और दुनिया के सामने सामने ना वॉरफेयर की एक नई तस्वीर पेश कर दी उन्होंने कि यह देखिए आप भविष्य की लड़ाईयां ऐसे लड़ी जाएंगी। जी और टेक्नोलॉजी छोड़िए नाम तक कॉपी कर लिया है। लो कॉस्ट अनक्रड कॉम्बैट अटैक सिस्टम यानी जिस तरह से शाहिद की ब्रांडिंग चल रही है पूरी दुनिया भर में कि बहुत कम कीमत में वो ड्रोन बना लिया जाता है और उसको इस्तेमाल कर लिया जाता है। तो उसका नाम लोकस का नाम भी फुल फॉर्म वहां पे जाएगा। लो कॉस्ट अनक्रूड से ही आता है।
मतलब कम कीमत वाला है। तो नाम भी कॉपी कर लिया गया है। अब अमेरिका ल्च कर चुका है। जो ईरान के ड्रोंस हैं वो तो इस्तेमाल हो ही रहे हैं ऑलरेडी। उनको वो क्या कर सकते हैं? उन्होंने अपनी काबिलियत दिखा दी है। अब लेकिन ऐसे में जब अमेरिका भी वो टेक्नोलॉजी कॉपी कर रहा है। रिवर्स इंजीनियरिंग के नाम पे हो, किसी भी नाम पे हो। ऐसे में ईरान के लिए भी ये चुनौती सामने जरूर आ सकती है कि अब वो एयर डिफेंस सिस्टम अपना कितना मजबूत करेगा। क्योंकि अटैकिंग के लिए ड्रोंस के अटैक जो है और उसके अलावा जो उसके मिसाइल सिस्टम है वो बहुत मजबूत है। लेकिन फिर एयर डिफेंस को भी और ज्यादा मजबूत करने की और उसमें भी ज्यादा और ज्यादा इन्वेस्ट करने की जरूरत पड़ सकती है। और इससे एक चीज ये भी साफ होती है कि वॉर में आज आप जिन तरीकों का इस्तेमाल करते हुए एक स्ट्रांग हेड पा रहे हैं।
जरूरी नहीं कि कल ही वो कल भी वो चीजें फिर से आपको स्ट्रांग हैंड दिलाएं। और ईरान को ये सबक हो सकता है इस चीज से मिले।
