खेतारी पे सरकार जो है ऐसे कुछ नहीं कर पा रही है। सरकार यहां का निकम्मा है। उसको अपने बच्चे जैसा भाई जैसा मान के उसको फालफूस का पड़ा किया। 63स जल चुके झारखंड के संजय कुमार साहू को बेतहाशा के बीच यह तो पता होगा कि अगर समय पर दिल्ली के अस्पताल पहुंच जाऊंगा तो बच जाऊंगा।
परिवार को भी यही लगा होगा। संजय साहू को एयर एंबुलेंस से ले जा रहे पायलट और क्रू मेंबर भी इसी जल्दबाजी में होंगे कि कैसे संजय साहू को समय पर अस्पताल पहुंचा दिया जाए। उसी विमान में सवार संजय कुमार साहू की पत्नी, एक सहायक, एक और स्टाफ और डॉक्टर विकास गुप्ता भी उसअनहोनी से अनजान होंगे। संजय साऊ अपने पीछे दो बेटे छोड़कर गए हैं।
एक 17 साल का बेटा शुभम है। दूसरा 13 साल का शिवम। दोनों के सिर से माता-पिता का साया उठ गया। संजय साऊ के जाने के बाद अब उनके पूरे परिवार का जिक्र हो रहा है। संजय अपने घर में इकलौते कमाने वाले सदस्य थे। साल 2000 के दशक में जब नक्सलियों का खौफ बढ़ा तो वह लातेहार के चंदवा आकर बस गए। 2002 में घर बनाया। एक ढाबा किराए पर लेकर चलाना शुरू कर दिया। जब वह अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश कर रहे थे, तभी अचानक उनकी जिंदगी में एक बड़ा तूफान आता है।साल 2004 में उनके पिता की कर देते हैं। कड़ी मेहनत और सबसे मिलजुलकर रहने की आदत से संजय ने जल्द ही अपना एक ढाबा खोल लिया। कुछ ही दिन पहले इसी ढाबे में आग लग गई, जिसमें वह बुरी तरह से झुलस गए। पलामू में उनके लाइन होटल में शॉर्ट सर्किट हो गया था।
इस दौरान पैर फिसलने से वह आग की चपेट में आ गए। तुरंत उन्हें रांची के देवकमल अस्पताल भेजा गया। लेकिन हालात खराब होने लगे। जिसके बाद उन्हें अस्पताल ने दिल्ली रेफर कर दिया। संजय की हालत ऐसी नहीं थी कि उन्हें सड़क या ट्रेन के जरिए दिल्ली लाया जा सके या फिर रोड केजरिए लाया जा सके। इसलिए दिल्ली के कंपनी की एयर एंबुलेंस उन्होंने बुक कराई। इसके लिए उन्होंने ₹8 लाख चुकाए थे। संजय के पास इतना पैसा नहीं था और एयर एंबुलेंस के लिए करीब ₹.5 लाख कम पड़ रहे थे। इसके बाद संजय के परिजनों ने चंदवा में गांव में रिश्तेदारों से पैसे उधार लिए।
लेकिन यह एयर एंबुलेंस उड़ान भरते ही हो गया। इस हादसे ने एक पूरे परिवार को उजाड़ दिया। संजय साव पांच भाइयों में दूसरे स्थान पर थे और उनके एक छोटे भाई की मौत पहले ही गलत इलाज की वजह से हो चुकी है। अब संजय साह की मां चिंता देवी और दो बेटेइस दोहरे दुख और भारी कर्ज के बोझ तले दबे हुए हैं। संजय के परिजन कहते हैं झारखंड की सरकार निकम्मी है। यहां ठीक से इलाज नहीं होता। यहां की सरकार अक्षम है और कुछ नहीं कर रही है। सरकार से मेरा यही डिमांड है कि जो व्यवस्था है बहुत लेर है जो अगर प्राइवेट में भी अगर हम लोग जाते हैं तो वो जो जैसे सुविधा जो है से असुविधा में बदल जाती है जो आज मौत की स्थिति में बदल गया।
आज घर जो है पूरा बर्बाद हो गया है। एक घर नहीं बहुत सारे घर बर्बाद हो गए हैं। हम सरकार जो है ऐसे कुछ नहीं कर पा रही है। सरकार यहां का निकम्मा है। कुछ नहीं कर रही है।अगर ऐसा नहीं होता रांची में इलाज होता तो आज हमें दिल्ली ले जाना नहीं पड़ता। और दिल्ली ले जाने के क्रम में ऐसा हुआ कि जो है से परिवार मेरा सारा खत्म हो गया। संजय कुमार के साथ उनकी पत्नी अर्चना देवी और भतीजा भी विमान में थे जिनकी हो गई।
मेरा पिताजी भी नहीं रहे थे। जी नहीं वो नर्सिंग का पैरामेडिकल स्टाफ था। रोते-रोते उनकी आंखों से आंसू टपकने लगे और बाद में जो उन्होंने बताया वह दिल पसीजा देता है। मरीज संजय साहू के साथ विमान में सवार डॉक्टर विकास कुमार गुप्ता के पिता ने कहा कि उन्होंने अपने बेटे कीशिक्षा में अपना सब कुछ लगा दिया। सर डिमांड है सर अनाउंस हो गया सर। खेतारी के पास है सर। खेतारी के पास है सर।
दोनों बच्चों के माता-पिता की एक साथ मौत की खबर से गांव में मातम पसरा हुआ है। चंदवा के घर में जो परिजन हैं, वह रो-रो कर बुरा हाल है उनका। इसी हादसे में पैरामेडिक सचिन कुमार मिश्रा की भी हो गई। उनके बड़े भाई ने उन्हें अपना पूरा संसार कहा। कहा कि वह कम उम्र से ही कामकर रहे थे। मेरा सचिन कुमार मिश्रा छोटा भाई मेरा जीवन का सब कुछ मेरा बच्चा जैसा उसको पाले थे। मेरे पिताजी नहीं है। उसको अपने बच्चे जैसा भाई जैसा मान के उसको फाल फूस का बड़ा किया। उसको वो मेरा मेरा मेरा मेरा जीवन का सब कुछ है। मेरा सब कुछ था।
सरकार के देखा जाए सर। इस घटना के बाद राज्य के स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी ने इसे झारखंड में हुई सबसे बड़ी विमान दुर्घटना बताया। कहा दुर्घटना की पुष्टि होते ही सरकार ने तुरंत कारवाई की। झारखंड में यह सबसे बड़ा विमान हादसा है। एयर एंबुलेंस का काम जान बचाना होता है और यह बेहद चिंताजनक है कि जान बचाने के चक्कर में खुद जान गवा बैठे। कहते हैं हादसों पर किसी का नियंत्रण नहीं होता। लेकिन जिसके परिवार का सदस्य चला गया होऔर जिसके हाथ खाली हो, जिसकी उम्मीद सरकार से प्रशासन से हो, वह करें भी तो क्या करें।
