65 साल पहले गुम हुई ‘लड़की’ अचानक पहुंची घर, यूपी में इतने साल क्या हुआ?

65 साल पहले कुछ बदमाश ने 15 साल की एक लड़की को अगवा कर कर अपने साथ ले गए। परिवार ढूंढता रहा मगर वो नहीं मिली। एक-एक कर परिवार के सभी इस दुनिया को अलविदा कह गए। लेकिन उस लड़की का अब तक कोई पता नहीं चला। लेकिन अचानक उसी घर में 80 साल की एक बुजुर्ग महिला आती है और कहती है मेरा नाम मिठनी है। वही मिठनी जिसे 65 साल पहले अगवा किया गया था। जितना हैरान आप इस खबर को सुनकर हो रहे हैं उतनी ही हैरानी उस घर के लोगों को भी हुई जब उन्होंने मिठनी को देखा। किसी को यकीन नहीं हो रहा था कि मिठनी अब भी जिंदा है।

तो उन्होंने बैठा कही हम पहचान नहीं पाओ कहां रहती है। तो कही पूरे आईडिया बताओ माता जी तब हम पहचानेंगे तो इनने अपना आईडिया बताओ कि हमें ऐसेसे हम से उठ ही गए थे पुरवा सेरे कहती थी मैया सब उठाई ले गए थे मैं तो बहू हमारी जाने गई पहले बता दे थे तो जान गई फिर इन्हें घर का ले आई कौन है आपकी और कितने साल बाद आप लोग ये आई है ये हमारी ननंद है और आई 50 साल बाद हम तो देखो नहीं तो भैया क्या क्या खुशी है आप लोगों को? खुशी तो है ही बहुत देख के बहुत खुशी भाई। मामला यूपी के हरदोई का है। जहां टोलवा आठ गांव की रहने वाली मिठनी कि साल 196162 की एक काली रात को करीब 100 डकैतों ने उनके गांव पर धावा बोलकर उसे कर लिया था। मिठनी की तब उम्र महज 15 साल थी और कुछ ही दिन पहले उनका विवाह हुआ था। गौना होने से पहले बदमाश मिटनी को उनके पिता बलदेव और भाई शिवलाल को घायल कर अगवा कर ले गए।

मेरे बाप ने शादी करी शादी की लगुन को वो करो तैयारी तो शादी के हां हां तो शादी तो शादी के पीछे भाई मोह जानकारी नहीं कछु मैं ना जाने हमें ना जानते ना कछु फिर कहां आप पहुंच गई थी यहां हम पहुंच गए अब हमें बात पता नहीं कहां ले गए वो कहां पहुंचे उन गांव में पहुंचे हमें हमें इन बातों को याद नहीं आई। फिर आज यहां आप कितने सालों बाद आई और कैसे जो है क्या कहती थी आप? यहां कितने सालों बाद वापस आई और क्या कहती थी घर में आप?

घर में ये कहता है कि लली हम हमारे वहां परिवार है वहां मेला जूते हमारे जहां हम छोटे मेला को जाओ करते लली और देखो कान्हा हमारे ऐसेसे चली घर आदमी बहुत हुए 100 200 आदमी है आई घर पे चढ़ाई करी और लेकिन हमें उठाए लाए पकड़ लाए हाथन में थे छीन लाए और छीन के और मेरो मुंह बांध दिया कस के और ले गए मारो मारो हम मारो मारो और संग संग चार छ दिन राखे और ले गए वहां ले गए हमें जी तो इतनी याद ना आई कि कहां कौन से धाम में फिर कैसे यहां कैसे आई पहुंची यहां कहां पर हरदोई यहां कैसे आई कौन-कौन आपके परिवार यहां क्या बताती थी जो यहां आप पहुंचे अब जहां परिवार में हम पे तो कोई पहचानो ना जहां परिवार में यहां क्या बताती थी जो यहां के आने के लिए क्या बताती थी बताते के लली हां ऐसेसे वहां पर रहेंगे मेला आए वहां पर हम लली जन को मरो जन को जियो तो बिटिया ले आई आप हां बिटिया हमारी ले आई आपको के मम्मी चलो तुम्हारे मन है तो हम तुम्हें ढुला लाए। ये बात है।

कौन-कौन आपके परिवार में था? क्या-क्या नाम थे? कौन-कौन आपके परिवार में था? यहां जहां अब जहां तो परिवार के नाम हम भूल गए भाई साहब। आई समय हम कुछ नहीं जानते। किसी को नहीं पहचानते। कौन हो, कौन ना हो। डकैत मिठनी को कई दिनों तक जंगलों में घुमाते रहे और अंततः उन्हें अलीगढ़ के पास किसी को सौंप दिया।

इसी बीच अलीगढ़ के समेघा गांव के पहलवान सोहन लाल यादव को इसकी भनक लगी। उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर डकैतों के चंगुल से मिठनी को छुड़ाया और बाद में उनसे विवाह कर लिया। मिठनी ने वहां नई गृहस्ती शुरू की। उनके आठ बच्चे हुए। लेकिन मन में मायके की यादें हमेशा जिंदा रही। मिठनी अक्सर अपने बच्चों को सकाहा के शिव मंदिर और अपने भाइयों शिवलाल और सूबेदार के बारे में बताती थी। उनकी छोटी बेटी सीमा यादव जो नोएडा में रहती है। मां की पीड़ा देखकर भावुक हो गई।

यह घर में मतलब डकैती पड़ी थी ना मतलब हुआ था इनका अपहरण हुआ था तो यह मतलब बताती थी हम लोग को छोटे पे कि मतलब ऐसेसे मतलब हुआ है मेरे साथ तो अब इतना दिन व्यतीत हो गया तो हम जब ये बताती रही तो कि हमारा परिवार वाला पता ना कोई है भी वहां पे है कि नहीं है तो फिर मतलब यही हमने प्रयास करा कि चलो एक बार वहां पे जाके देखते हैं बताती थी कि वहां मतलब जिला हरदोई है और वहां वहां पे मतलब सकाए है.

वहां पे तो मतलब जब वहां हम लोग वहां से जब आए तो ये हरदोई आए हरदोई से सकाई के लिए आए तो वहां पर मंदिर देखा तो फिर मंदिर था वो मौजूद है तो मंदिर में अपना इन्होंने प्रसाद चढ़ाया प्रसाद चढ़ाने के बाद फिर जब गांव को हम इनका गांव कहां है तो मतलब इनको याद आया कि हां गांव इधर है तो हम लोग आए यहां पे आकर के पता निकाले कि मतलब जो हमारे मामा जी थे उनका नाम था सूबेदार तो उनका मतलब पता निकाले तो वह मतलब वह तो नहीं है.

अब लेकिन उनके बच्चे हैं यहां पर उनका परिवार है मम्मी के दो भाई थे दो बहनें थी तो मतलब उनमें से मतलब भाई भी नहीं है लेकिन पिताजी वो तो है ही नहीं है लेकिन परिवार है उनका यहां पे तो मिला है और परिवार से मिलाई हैं अब उनको सुकून है अच्छा है कि मतलब सारे नाते रिश्तेदार भी मिले हैं परिवार भी मिला है और वो खुश हैं कि हां मतलब मेरा परिवार मिला है मुझे सीमा अपनी मां को लेकर शुक्रवार को अलीगढ़ से हरदोई पहुंची सकाहा मंदिर देखते ही मिठनी की आंखों में पहचान की चमक आ गई। जब वह गांव पहुंची तो पता चला कि उनके भाई अब इस दुनिया में नहीं है। लेकिन उनके परिवार के लोग वहीं रहते हैं। मिठनी जब अपने पैतृक घर पहुंची तो उनकी भाभी और भतीजियों ने उन्हें पहचान लिया।

65 साल का लंबा इंतजार आंसुओं के रूप में बह निकला। पूरे गांव में इस मिलन को देखकर लोग भावुक हो गए। मिठनी के लिए यह किसी पुनर्जन्म से कम नहीं था और आखिरकार वे 80 साल की उम्र में अपनी जड़ों तक पहुंचने में सफल रही।

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