12 फरवरी का दिन भारतीय टेलीविजन के इतिहास में एक गहरे सन्नाटे की तरह दर्ज हो गया। इस दिन हमने उस आवाज को हमेशा के लिए खो दिया जो 80 और 90 के दशक में हर भारतीय घर का हिस्सा हुआ करती थी। दूरदर्शन की दिग्गज समाचार वाचिका सरला महेश्वरी अब हमारे बीच नहीं रही। 71 वर्ष की उम्र में उन्होंने दिल्ली में अपनी अंतिम सांसे ली। उनके जाने से सिर्फ एक एंकर नहीं गई बल्कि हमारे बचपन का एक बहुतबड़ा हिस्सा हमारे हाथ से छूट गया। इस कहानी को समझने के लिए हमें आज के दौर से निकल कर थोड़ा पीछे जाना होगा।
याद करिए वो 80 और 90 का दौर जब हमारे घरों में वो शटर वाले ब्लैक एंड वाइट टीवी हुआ करते थे। छतों पर एंटीना ठीक करने के लिए एक आदमी नीचे खड़े होकर चिल्लाता था और दूसरा ऊपर एंटीना घुमाता था। शाम होते ही मोहल्ले की गलियां शांत हो जाती थी। ठीक 8:00 बजते ही दूरदर्शन का वह सिग्नेचर संगीत गूंजता था और स्क्रीन पर एक घूमता हुआ लोगो आता था। उस संगीत के खत्म होते ही स्क्रीन पर एक चेहरा उभरता था।
माथे पर बड़ी सी बिंदी, सलीके से पहनी हुई साड़ी और चेहरे पर एक ऐसी सौम्यता जिसे देखकर दिनभर की थकान उतर जाए। वो चेहरा था सरला माहेश्वरी का। आज की पीढ़ी शायद यह ना समझ पाए कि सरला माहेश्वरी होना क्या मायने रखता था। वो सिर्फ खबरें नहीं पढ़ती थी। वह भरोसा बांटती थी और उस दौर में जब इंटरनेट नहीं था, मोबाइल नहीं था तब दुनिया में क्या हो रहा है यह जानने का एकमात्र जरिया सरला जी की आवाज थी। उनकी हिंदी इतनी शुद्ध और स्पष्ट थी कि कई घरों में माता-पिता अपने बच्चों को कहते थे कि अगर हिंदी सीखनी है तो सरला माहेश्वरी को सुनो। उनके बोलने में एक ऐसा ठहराव था कि बड़ी से बड़ी खबर भी घबराहट नहीं पैदा करती थी बल्कि एक सूचना की तरह हम तक पहुंचती थी।
लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि न्यूज़ की दुनिया में आने से पहले सरला जी का रास्ता कुछ और ही था। उनका पहला प्यार कैमरा नहीं बल्कि किताबें थी। वह दिल्ली यूनिवर्सिटी से पीएचडी कर रही थी और साथ ही साथ वहां के मशहूर हंसराज कॉलेज में लेक्चरर थी। पढ़ाना उनका जुनून था। वो क्लास रूम में खड़ी होकर छात्रों को साहित्य और जिंदगी का पाठ पढ़ाती थी। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।
1976 में जब दूरदर्शन को नए चेहरे की तलाश थी तो सरला जी ने भी किस्मत आजमाने के लिए ऑडिशन दिया। जब वह ऑडिशन देने गई तो वहां सैकड़ों लोग थे। लेकिन जैसे ही उन्होंने कैमरे के सामने बोलना शुरू किया, वहां मौजूद हर शख्स को समझ आ गया कि यह आवाज आम नहीं है। उनकी आवाज में एक भारीपन था। लेकिन साथ ही एक मखमली एहसास भी चयनकर्ताओं ने तुरंत उन्हें चुन लिया। 1976 से लेकर 1984 तक वो लगातार दूरदर्शन का चेहरा बनी रही। यह वो दौर था जब शम्मी नारंग, सलमा सुल्तान और रेनी साइमन जैसे दिग्गजों के साथ सल्ला माहेश्वरी का नाम लिया जाता था। लेकिन उनकी कहानी में एक बहुत दिलचस्प मोड़ तब आया जब वह अचानक स्क्रीन से गायब हो गई। दर्शकों को लगा कि शायद उन्होंने न्यूज़ पढ़ना छोड़ दिया है। चिट्ठियां लिखी जाने लगी कि सरला जी कहां है?
असल में वह एक नई उड़ान भरने के लिए लंदन चली गई थी। वहां उन्होंने बीबीसी के साथ काम किया और अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता को करीब से समझा। अगर हम सरला महेश्वरी और आज के टीवी एंकर्स की तुलना करें तो यह जमीन और आसमान के फर्क के जैसा है। आज जब हम न्यूज़ चैनल लगाते हैं तो स्क्रीन पर चीखते हुए एंकर्स, लाल रंग की चमकती हुई ब्रेकिंग न्यूज़ की पट्टियां और डरावना संगीत सुनाई देता है।
आज के एंकर्स का पूरा जोर इस बात पर होता है कि वह कितनी तेज और कितनी ऊंची आवाज में बोल सकते हैं। उनका मकसद खबर देना नहीं बल्कि खबर से सनसनी पैदा करना लगता है। उन्हें देखकर अक्सर ऐसा लगता है कि दुनिया खत्म होने वाली है। इसके ठीक उलट सरला माहेश्वरी का दौर ठहराव का दौर था।
जब वह स्क्रीन पर आती थी तो उनके चेहरे पर एक सौ में मुस्कान और गजब का आत्मविश्वास होता था। वह खबरों को बेचती नहीं थी बल्कि उसे सुनती थी। उनकी आवाज में ना तो कोई हड़बड़ाहट होती थी और ना ही कोई डराने का अंदाज। वो कैमरे की आंखों में आंखें डालकर ऐसे बात करती थी जैसे वह आपके घर के ड्राइंग रूम में बैठकर [संगीत] परिवार के किसी सदस्य की तरह आपसे बात कर रही हो। उन्हें आज के एंकर्स की तरह टेलीप्र्टर पर लिखी लाइनों को पढ़ने की जल्दी नहीं होती थी।
उनके उच्चारण इतने साफ और स्पष्ट होते थे कि हिंदी सीखने वाले छात्र और यूपीएससी की तैयारी करने वाले विद्यार्थी भी उन्हें सुनकर अपनी भाषा सुधारते थे। इस संयम और गरिमा का सबसे बड़ा और सबसे मुश्किल इम्तिहा हमें 21 मई 1991 की उस काली रात को देखने को मिला था। यह वह तारीख थी जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की तमिलनाडु के श्रीपेर बंधु में एक आत्मघाती बम धमाके में कर दी गई थी। यह खबर इतनी भयानक और संवेदनशील थी कि किसी भी एंकर के हाथ-पांव फूल सकते थे। पूरा देश सन्न्य था और दंगे भड़कने का डर था। लेकिन उस मुश्किल घड़ी में भी दूरदर्शन पर सरला महेश्वरी ने ही देश को यह दुखद समाचार सुनाया था। जरा सोचिए कि आज के दौर में अगर ऐसी कोई घटना होती तो न्यूज़ रूम में कितना शोर और हंगामा होता। एंकर्स चीख रहे होते। ग्राफिक प्लेट्स घूम रही होती और बैकग्राउंड में डरावना संगीत बज रहा होता। लेकिन सरला जी ने उस रात अपनी भावनाओं पर काबू रखते हुए बिना आवाज लड़खड़ाए और पूरे संयम के साथ देश को बताया कि राजीव गांधी अब हमारे बीच नहीं रहे।
उनकी आंखों में गहरा दुख जरूर दिखाई दे रहा था लेकिन उनकी जुबान पर जरा भी लड़खड़ाहट नहीं थी। उन्होंने देश को पैनिक नहीं किया बल्कि सच से रूबरू कराया। यही वह फर्क है जो उन्हें आज के दौर के एंकर्स से मीलों आगे खड़ा करता है। सरला जी मानती थी कि एंकर का काम पुल बनाना है यानी घटना और दर्शक के बीच का माध्यम ना कि खुद तमाशा बन जाना। उनकी सादगी ही उनका सबसे बड़ा गहना थी। उनकी साड़ी पहनने का सलीका, माथे की वह बड़ी बिंदी, और बालों में लगा वो सादगी भरा गजरा। यह सब मिलकर एक ऐसी गरिमा पैदा करते थे जो आज के टीआरपी की दौड़ में कहीं खो गई है।
उस जमाने में लोग घड़ी मिलाकर रात की खबरें सिर्फ खबरें जानने के लिए नहीं बल्कि सरला जी की और सलमा सुल्तान जैसे एंकर्स की नज़ाकत और तहजीब को देखने के लिए लगाते थे। वो दौर ही अलग था जब खबरें शोर नहीं मचाती थी बल्कि दस्तक देती थी। ओम ओम
