भारत की सबसे अंतर्मुखी और रहस्यमई अभिनेत्रियों की बात की जाए तो कल्पना कार्तिक का नाम सबसे ऊपर आएगा। पिछले 60 सालों में इस अभिनेत्री ने खुद को दुनिया से पूरी तरह काट लिया है। इसी वजह से दर्शकों के मन में एक अजीब सा संकोच और जिज्ञासा है। यह संकोच उनके व्यक्तित्व और उनके चेहरे के लिए भी है। आज के दौर में कल्पना कार्तिक कैसी दिखाई देती हैं? यह सवाल हमारे मन में आज भी ताजा है। इसी जिज्ञासा का फायदा उठाकर अलग-अलग वेबसाइट और YouTube चैनल किसी और बुजुर्ग महिला की तस्वीर दिखाकर लोगों को गुमराह करते हैं। स्क्रीन पर अक्सर जो तस्वीरें कल्पना कार्तिक के नाम पर फैलाई जाती हैं, वह उनकी नहीं है। इस वीडियो में हम आपको कल्पना कार्तिक की असली तस्वीर दिखाएंगे और उस रहस्य से भी पर्दा उठाएंगे कि आखिर एक सुपरस्टार की पत्नी ने खुद को दुनिया से क्यों छिपा लिया। लेकिन इस कहानी को शुरू करने से पहले एक बहुत दिलचस्प किस्सा सुनाना जरूरी है जो देवानंद के एक करीबी ने लिखा था। यह किस्सा उस दौर का है जब वह शख्स अपनी एमए की पढ़ाई कर रहा था और अपने प्रोफेसर एस रंगास्वामी को उनकी पीएचडी थीसिस में मदद करता था। उस काम के बदले उसे दिन का सिर्फ ₹1 और लंच में एक मसाला डोसा मिलता था और कभी-कभी जब प्रोफेसर का मूड अच्छा होता तो कॉफी मिल जाती थी। वह शख्स अक्सर लाइब्रेरी में बैठकर लड़कियों को देखता और कविताएं लिखता था। उसी शख्स ने अपनी पूरी जिंदगी में कल्पना कार्तिक को सिर्फ एक बार देखा था। वह भी उनकी बेटी देवीना की शादी के रिसेप्शन में। यह किस्सा यह बताने के लिए जरूरी है कि कल्पना कार्तिक उस दौर में भी कितनी दुर्लभ थी और लोगों के लिए एक पहेली बनी हुई थी। देवानंद की जिंदगी में कल्पना के आने से पहले एक बहुत बड़ा और दर्दनाक अध्याय था। जिसे जाने बिना यह कहानी अधूरी है। यह अध्याय था सुरैया का। देवानंद और सुरैया का प्यार 1948 से 1951 तक परवान चढ़ा। यह इश्क तब शुरू हुआ जब फिल्म विद्या की शूटिंग के दौरान नाव पलट गई थी और देवानंद ने अपनी जान पर खेलकर सुरैया को डूबने से बचाया था। प्यार इतना गहरा था कि उन्होंने एक दूसरे को निकनेम दिए हुए थे। सुरैया देव साहब को प्यार से स्टीव बुलाती थी। यह नाम उन्होंने एक किताब के किरदार से चुना था जो देव साहब ने उन्हें गिफ्ट की थी। बदले में देव साहब उन्हें नोजी या सुरयाना कहते थे। लेकिन इस प्यार के दुश्मन बहुत थे। सुरैया की नानी को यह रिश्ता और दूसरे धर्म का लड़का कतई मंजूर नहीं था। वह उन पर इतनी सख्त पहरेदारी करती थी कि देवानंद और सुरैया को सीधे बात करने की भी इजाजत नहीं थी। उनकी मदद उस दौर की मशहूर अभिनेत्रियां दुर्गा खोटे और कामिनी कौशल करती थी। यह दोनों देवानंद और सुरैया की चिट्ठियां चोरी छिपे एक दूसरे तक पहुंचाती थी। देवानंद ने अपने प्यार का इजहार करने के लिए सुरैया को ₹3000 की एक बेशकीमती हीरे की अंगूठी दी थी। उस जमाने में ₹3000 की कीमत बहुत बड़ी होती थी। लेकिन सुरैया की नानी का दिल नहीं पसीजा। उन्होंने उस हीरे की अंगूठी को लिया और सबके सामने निर्दयता से गहरे समंदर में फेंक दिया था। यह देवानंद के लिए किसी गहरे सदमे से कम नहीं था। हालात इतने बिगड़ गए थे कि उनकी मुलाकातें मुमकिन नहीं थी। आर्टिकल्स और पुराने किस्से बताते हैं कि एक रात देवानंद सुरैया से मिलने उनकी छत पर गए। खतरा इतना था कि वह अकेले नहीं गए बल्कि अपने साथ एक पुलिस इंस्पेक्टर दोस्त को लेकर गए थे। उस इंस्पेक्टर के पास एक लोडेड रिवाल्वर और हाथ में दो टॉर्च थी। वह छत की मुंडेर पर बैठा था और यह तय हुआ था कि अगर कोई खतरा दिखा तो वह टॉर्च जलाकर इशारा कर देगा।
उस रात छत पर दो प्यार करने वाले मिले लेकिन सिर्फ रोने और हमेशा के लिए अलग होने के लिए। उस रात के बाद देवानंद पूरी तरह टूट गए थे। वो अपने गम को भुलाने के लिए पागलों की तरह काम करने लगे। ठीक इसी नाजुक मोड़ पर उनकी जिंदगी में एंट्री होती है एक नई रोशनी की जिसका नाम था मोना सिंधा और यहीं से शुरू होती है वह दास्तान जिसने बॉलीवुड को एक नई जोड़ी दी। देवानंद की टूटी हुई दुनिया में मोना सिंघा का आना किसी चमत्कार से कम नहीं था। मोना का जन्म 19 अगस्त 1931 को लाहौर के एक पंजाबी क्रिश्चियन परिवार में हुआ था। उनके पिता गुरदासपुर के बटाला में तहसीलदार थे और सात भाई-बहनों में मोना सबसे छोटी थी। बटवारे के बाद उनका परिवार शिमला आ गया था। वह पढ़ाई में बेहद होनहार थी, और सेंट बीट्स कॉलेज में पढ़ती थी। कॉलेज के दिनों में ही उनकी खूबसूरती ने उन्हें मिस शिमला का खिताब दिला दिया था। किस्मत का खेल देखिए। उस वक्त मशहूर फिल्मकार चेतन आनंद अपनी पत्नी उमा आनंद के साथ शिमला की वादियों में छुट्टियां मनाने गए थे। इत्तेफाक से उमा आनंद की मां और मोना आपस में कजिन यानी बहने लगती थी। जब चेतन आनंद ने मिस शिमला बनी मोना को देखा, तो उन्हें अपनी अगली फिल्म बाद के लिए हीरोइन मिल गई। उन्होंने मोना के रूढ़िवादी परिवारों को मनाया और उन्हें मुंबई ले आए। यहीं उनका नाम बदलकर कल्पना कार्तिक रखा गया। फिल्म इतिहासकार और समीक्षक मानते हैं कि कल्पना कार्तिक की कहानी में टैलेंट से ज्यादा उनकी तकदीर का हाथ था।
एक मशहूर फिल्म विशेषक ने लिखा है कि कल्पना कार्तिक सही वक्त पर सही जगह मौजूद थी। वो शायद हिंदी सिनेमा की इकलौती ऐसी अभिनेत्री हैं जिन्होंने सिर्फ छह फिल्मों में काम किया लेकिन उनका म्यूजिक रिकॉर्ड किसी भी सुपरस्टार से बड़ा है। आलोचक कहते हैं कि उनकी एक्टिंग बहुत साधारण थी लेकिन उनकी किस्मत बहुत खास थी। वो अकेली ऐसी हीरोइन थी जिन पर फिल्माए गए गानों में सरोद के उस्ताद अली अकबर खान ने संगीत दिया था। उनके हिस्से में एसडी बर्मन और साहिल लुधियावी के बेहतरीन गाने आए। लोग कहते हैं कि वी शांताराम की फिल्मों में संध्या और चेतन आनंद की फिल्मों में प्रिया राजवंश को जो रुतबा मिला था वही रुतबा बिना किसी खास एक्टिंग टैलेंट के कल्पना कार्तिक को मिल गया था। 1951 में फिल्म बाजी के सेट पर जब देवानंद ने इस नई हीरोइन को देखा तो उन्हें एक अलग ही ताजगी महसूस हुई। कल्पना सुरैया की तरह नहीं थी। वो मॉडर्न थी, पढ़ी लिखी थी, थोड़ी नटखट थी और ईसाई धर्म से थी। देवानंद ने खुद एक बार कहा था कि कल्पना बहुत खूबसूरत, चुलबुली और नटखट थी। बाजी फिल्म सुपरहिट साबित हुई और देवानंद जो सुरैया के गम को भुलाने के लिए पागलों की तरह काम कर रहे थे। धीरे-धीरे कल्पना की सादगी में अपना सुकून ढूंढने लगे। 4 साल बीत चुके थे। दोनों एक दूसरे को समझने लगे थे। लेकिन शादी की कोई तारीख तय नहीं हो पा रही थी। देवानंद को अंदर ही अंदर डर था कि कहीं सुरैया की तरह कल्पना भी उनकी जिंदगी से चली ना जाए और फिर आया साल 1954 फिल्म टैक्सी ड्राइवर का सेट। यहीं पर वो घटना घटी जिसने बॉलीवुड को चौंका दिया। देवानंद और कल्पना कार्तिक के रिश्ते की सबसे रोमांचक बात यह थी कि उनकी शादी किसी फिल्मी सीन से कम नहीं थी। टैक्सी ड्राइवर की शूटिंग चल रही थी। देवानंद की जेब में एक अंगूठी रखी हुई थी और उन्होंने पहले से ही एक रजिस्ट्रार को सेट पर बुला रखा था।
जैसे ही लंच ब्रेक हुआ और लाइटमैन लाइट्स ठीक करने लगे। देव साहब ने कल्पना को एक हल्का सा इशारा किया। दोनों चुपचाप सेट के पास वाले डिपार्टमेंटल रूम में गए। वहां साइन किया। एक दूसरे को अंगूठी पहनाई और पति-पत्नी बन गए। लेकिन असली ड्रामा तब शुरू हुआ जब वह वापस शॉट देने आए। कैमरामैन की नजर देवानंद की उंगली पर गई। उसे नहीं पता था कि बीच में शादी हो चुकी है। उसने चिल्लाकर कहा कि कट देव साहब यह अंगूठी उतारिए। यह पिछले शॉट में नहीं थी। इससे फिल्म की कंटिन्यूटी खराब हो जाएगी। देव साहब मुस्कुराए और उसे डांटते हुए कहा कि चुप रहो इस बारे में बात मत करो। चलो पहले शॉट लेते हैं। कैमरामैन को तब समझ आया कि लंच ब्रेक में दुनिया बदल चुकी है। उन्होंने शादी तो कर ली लेकिन रिसेप्शन बाद में देकर पूरी दुनिया को चौंका दिया।
शादी के बाद भी कल्पना ने कुछ फिल्में की लेकिन उनका मन अब भी फिल्मी दुनिया की चकाचौंध से भर चुका था। 1957 में फिल्म 911 की शूटिंग खत्म होने के बाद उन्होंने अपनी पर्सनल डायरी में एक बहुत छोटी मगर गहरी बात लिखी थी। उन्होंने लिखा था कि फिनिश्ड माय लास्ट फिल्म यानी मेरी आखिरी फिल्म पूरी हुई। यह सिर्फ एक डायरी की लाइन नहीं थी। यह एक पत्थर की लकीर थी। इसके बाद वो कभी बतौर एक्ट्रेस कैमरे के सामने नहीं आई। उन्होंने अपनी शोहरत को उसी वक्त छोड़ दिया जब वो शिखर पर थी। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि वो फिल्म इंडस्ट्री से पूरी तरह गायब नहीं हुई। देववानंद की बाद की सुपरहिट फिल्में जैसे तेरे घर के सामने ज्वेल थीफ, प्रेम पुजारी और हीरापन्ना में उनका नाम बतौर एसोसिएट प्रोड्यूसर आता रहा। उस दौर के जानकार और फिल्म समीक्षक अक्सर चुटकी लेते हुए कहते थे कि शायद एसोसिएट प्रोड्यूसर बनना तो बस एक बहाना था। असल वजह यह थी कि देवानंद की इमेज हमेशा एक रोमांटिक हीरो की रही थी। इसलिए कल्पना शायद उन पर नजर रखना चाहती थी। यह इंडस्ट्री में दबी जुबान में चलने वाली गसिप थी। लेकिन इसने उनके रिश्ते को एक नया नजरिया दिया और यहीं से वह दौर शुरू हुआ जब इन दोनों के अलग होने की अफवाहें उड़ने लगी। 70 के दशक में जब देवानंद ने ज़ीनत अमान को लॉन्च किया और हरे नामा हरे कृष्णा बनी तो उनके अफेयर की चर्चा हर जुबान पर थी। रिपोर्ट्स बताती है कि उस दौरान देव साहब अपने घर आयरिस पार्क को छोड़कर जूहू के सन एंड सैंड होटल के स्वीट नंबर 339 में रहने चले गए। वह वहां करीब 20 साल रहे। इसी वजह से लोगों को लगा कि इनका तलाक हो जाएगा। लेकिन कल्पना कार्तिक ने उस मुश्किल वक्त में भी अपने रिश्ते को टूटने नहीं दिया। वह एक चट्टान की तरह खड़ी रही। उन्होंने अपना पूरा ध्यान बच्चों, सुनील और देवीना की परवरिश और ईश्वर की भक्ति में लगा दिया। वो ईसाई धर्म की बहुत गहरी अनुयाई बन गई और अक्सर प्रार्थनाओं में लीन रहने लगी। देव साहब भले ही होटल में रहते थे लेकिन वो अपनी हर छोटी बड़ी बात कल्पना से शेयर करते थे। वह कहते थे कि मोना मेरी परिवार की रीड है और जब भी वह घर से निकलते थे उनकी आदत थी कि वह हमेशा आवाज लगाते थे कि मोना मैं जा रहा हूं। देव साहब के उस करीबी दोस्त जिसने ₹1 वाली बात बताई थी।
उसने एक भावुक किस्सा लिखा है। वह कहते हैं कि जब मैं कुछ दिन पहले आरिस पार्क बंगले के पास से गुजरा तो वहां एक अजीब सा अंधेरा और सन्नाटा था। वहां मौजूद एक अकेला नारियल का पेड़ मानो उदासी से कह रहा था कि मोना मैडम प्रार्थना कर रही हैं। उन्हें परेशान मत करो। व ह भगवान से बातें कर रही हैं। जब से देव साहब गए तब से इस घर की रौनक और जिंदगी भी उनके साथ चली गई।
कल्पना कार्तिक का अनुशासन इतना सख्त था कि 1957 के बाद वह सिर्फ तीन बार पब्लिक या मीडिया के सामने दिखाई दी। एक बार अपनी बेटी देवीना की शादी में दूसरी बार अपने बेटे सुनील के जन्मदिन पर और आखिरी बार तब जब देव साहब का देहांत हुआ। आज 90 साल से ज्यादा की उम्र में कल्पना कार्तिक पूरी तरह एकांत में रहती हैं। वह सुबह जल्दी उठती हैं, अपनी बाइबल पढ़ती हैं और आज भी उतने ही ग्रेसफुल हैं। इंटरनेट पर जो झुर्रियों वाली किसी और महिला की तस्वीर वायरल होती है, वह उनकी नहीं है। असली कल्पना कार्तिक आज भी वही मिस शिमला वाली गरिमा लिए हुए हैं।
वह कहती हैं कि उन्हें आज भी यकीन नहीं होता कि दीप साहब इस दुनिया में नहीं है। क्योंकि उस घर के हर कोने में उनकी यादें बसी हैं। यही थी कहानी उस एक्ट्रेस की जिसने शोहरत के शिखर पर पहुंचकर भी खामोशी को चुना।
