मुस्लिम से हिन्दू धर्म अपनाना एक्ट्रेस को पड़ा मेहेंगा पड़ा, तीसरी शादी के बाद जेल जाना पड़ा।

सिनेमा की चकाचौंध के पीछे कितनी परतें होती हैं? इसका अंदाजा आप इस बात से लगाइए कि एक दौर की मशहूर हीरोइन जो स्क्रीन पर अपनी अदाओं से आग लगा देती थी। उसके बारे में मशहूर था कि वह हफ्तों में बस एक बार नहाती थी। जी हां, सिर में जुए और जिस्म से आती ऐसी बदबू कि बड़े-बड़े हीरो उनके साथ क्लोजअप सीन करने से कतराते थे। इतना ही नहीं प्यार और शादियों का ऐसा चक्कर कि एक ही वक्त पर दो-दो पति और जब पुलिस पकड़ कर ले गई तो अदालत में खड़े होकर साफ मुकर गई कि मैंने तो कभी शादी ही नहीं की।

यह दास्तान है 40 के दशक की उस सनसनीखेज अदाकारा गीता निजामी की जिसकी जिंदगी विवादों, मुकदमों और गानों पर लगे बैन की ऐसी कहानी है जिसे सुनकर आप दंग रह जाएंगे। यह कहानी शुरू होती है 1926 के लाहौर से जो उस वक्त अविवाजित भारत का हिस्सा था। एक मध्यमवर्गीय मुस्लिम परिवार में एक लड़की पैदा हुई जिसका नाम रखा गया रशीदा बेगम। रशीदा बचपन से ही बहुत महत्वाकांक्षी थी। उन्हें घरेलू चूल्हे चौके से ज्यादा पर्दे की दुनिया आकर्षित करती थी। महज 14 साल की कच्ची उम्र रही होगी जब उनकी शादी बरकत निजामी नाम के शख्स से कर दी गई। बरकत साहब उस दौर की मशहूर एक्ट्रेस मुमताज शांति के सगे चाचा थे और रशीदा उनकी दूसरी बीवी बनी। शादी तो हो गई पर रशीदा के ख्वाब तो सातवें आसमान पर थे। वो लाहौर से बॉम्बे की तरफ खींची चली आई। फिल्मों में कदम रखा तो सोचा कि नाम भी फिल्मी होना चाहिए। तो उन्होंने अपना नाम रखा मोहिनी। पर किस्मत का खेल देखिए। उस वक्त इंडस्ट्री में मोहना नाम की एक और एक्ट्रेस पहले से मौजूद थी। रशीला को लगा कि कहीं लोग उलझ ना जाएं इसलिए उन्होंने झट से अपना नाम बदला और बन गई गीता। पति का सरनेम साथ रहा तो दुनिया उन्हें गीता निजामी के नाम से जानने लगी। साल 1944 में गीता निजामी ने बतौर हीरोइन अपनी पहली फिल्म की जिसका नाम था मन की जीत। इस फिल्म ने गीता को वह शोहरत दी जो शायद रातोंरात किसी को नहीं मिलती।

फिल्म का एक गाना था मोरे जुबना का देखो उभार जिसे जोहराबाई ने गाया था और बोल लिखे थे मशहूर शायर जोश मलीहाबादी ने। इस गाने में गीता ने जो डांस किया उसने बॉम्बे के गलियारों में तहलका मचा दिया। वो एक खिलते हुए कमल के फूल से बाहर निकलती दिखाई गई और उनके जिस्मानी इशारे इतने उत्तेजक थे कि उस दौर की बॉम्बे सरकार के मुखिया मोरारजी देसाई ने इसे अश्लील करार देते हुए तुरंत बैन कर दिया। लेकिन कहते हैं ना कि जिस फल को मना किया जाए लोग उसे ही चखना चाहते हैं। बॉम्बे में बैन होने के बावजूद बाकी पूरे हिंदुस्तान में यह गाना और गीता निजामी की बोल्ड अदाएं घर-घर में चर्चा का विषय बन गई। अभी मन की जीत का शोर थमा भी नहीं था कि उसी साल उनकी दूसरी फिल्म आई पन्ना।

यह एक प्रोपगेंडा फिल्म थी जिसे ब्रिटिश भारत की सरकार ने बनवाया था। गीता ने इस फिल्म में इतनी जानदार एक्टिंग की कि सरकार उनकी मुरीद हो गई। इनाम के तौर पर उन्हें ₹9,000 दिए गए। यह वह दौर था जब चवन्नी अठन्नी में दुनिया चलती थी। ऐसे में ₹9,000 पाकर गीता रातों-रात अमीर भी हो गई और मशहूर भी। 1945 में उनकी अगली बड़ी फिल्म आई गांव की गोरी जिसमें वह नूरजहां के साथ दिखाई दी। यह फिल्म उस साल की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर साबित हुई और इसने गीता को स्टार बना दिया। पर्दे पर गीता निजामी जितनी हसीन और साफ सुथरी दिखती थी, असल जिंदगी में उनका मिजाज एकदम उल्टा था। फिल्म इंडस्ट्री के पुराने लोग और कई लेखकों ने अपनी किताब में इस राज से पर्दा उठाया है कि गीता अपनी साफ सफाई का रत्ती भर भी ख्याल नहीं रखती थी। उनके बारे में यह मशहूर हो गया था कि वह हफ्ते में बस एक बार नहाती थी। उनके सिर में जुओं का ऐसा साम्राज्य था कि कैमरामैन और लाइटमैन भी उनके पास जाने से बचते थे। सबसे ज्यादा मुसीबत तो उन हीरोज़ को होती थी जिन्हें उनके साथ क्लोज अप या रोमांस वाले सीन करने होते थे। जिसमें की बदबू ऐसी कि सांस लेना मुश्किल हो जाए। कई हीरोज़ ने तो डायरेक्टर को साफ कह दिया कि भाई हम इसके साथ चिपकने वाले सीन नहीं करेंगे। इसी अजीबोगरीब आदत की वजह से धीरे-धीरे बड़े बैनर्स ने उन्हें लीड रोल देना बंद कर दिया। यही कारण है कि अपने करियर की 13 फिल्मों में से वह सिर्फ साथ में हीरोइन बन पाई। गीता की निजी जिंदगी तो किसी सस्पेंस फिल्म से ज्यादा पेचीदा थी। पहले पति बरकत निजामी से अनबन हुई तो उनकी जिंदगी में एंट्री हुई फिल्म डायरेक्टर ब डी वेदी की। वेदी साहब के प्यार में गीता ऐसी डूबी कि उन्होंने अपने मजहब की दीवार भी गिरा दी। उन्होंने इस्लाम छोड़कर हिंदू धर्म अपनाया और अपना नाम रखा गीता वेदी। 1946 में कोल्हापुर में इन दोनों की शादी हुई। पतिवेदी साहब ने उनके करियर को सहारा देने के लिए रूम नंबर नौ जैसी थ्रिलर फिल्म बनाई। इस फिल्म ने अच्छा कारोबार किया और गीता की एक्टिंग को भी सराहा गया। लेकिन यह खुशियां ज्यादा दिन नहीं टिकी।

1948 आते-आते वेदी साहब और गीता के बीच दरारें इतनी गहरी हो गई कि दोनों अलग हो गए। मगर कहानी में असली ट्विस्ट अब आने वाला था। गीता निजामी ने अभी वेदी साहब से कानूनी रूप से तलाक लिया भी नहीं था कि उनका दिल एक बिजनेसमैन मिस्टर जलाल पर आ गया। उन्होंने आओ देखा ना ताव जलाल साहब से तीसरा निकाह पढ़ लिया। बॉम्बे पुलिस की नजरें तो सितारों पर रहती ही थी। जैसे ही पुलिस को पता चला कि मोहतरमा ने बिना तलाक लिए दूसरी शादी कर ली है। उन्हें बायगमी यानी दो शादियां एक साथ करने के जुर्म में धर लिया गया। यह उस वक्त का बहुत बड़ा स्कैंडल था। जब गीता को हथकड़ी लगाकर अदालत ले जाया गया तो वहां उन्होंने ऐसे बयान दिया कि सबका माथा चकरा गया। गीता ने जज के सामने बड़े आत्मविश्वास से कहा कि उनकी तो कभी बरकत निजामे या बी डी बेदी से शादी हुई ही नहीं है। वह अपनी पिछली दोनों शादियों से भरे कोर्ट में मुकर गईं। यह खबर अगले दिन अखबारों की सबसे बड़ी सुर्खी बनी। हालांकि बाद में उन्हें बेल मिल गई। पर इस कांड ने उनकी साख को मिट्टी में मिला दिया। करियर के मोर्चे पर 1947 में उनकी फिल्म पारो आई जिसमें उन्होंने समाज में फैली जातिवाद और छुआछूत पर गहरी चोट की थी।

फिल्म को रिव्यु तो अच्छे मिले पर गीता की विवादित इमेज उन पर भारी पड़ने लगी। 1948 में आई फिल्म गजरे के गाने आज भी पुराने गानों के विवानों को याद हैं। अनिल विश्वास के संगीत में सजे इस फिल्म के गीतों में लता मंगेशकर की आवाज में बरस बरस बदली भी बिखर गई और सुरैया का गाया रह-रह के तेरा ध्यान रुलाता है और ओ दुपट्टा रंग दे मेरे रंगरेज जबरदस्त हिट हुई। फिल्मों में गीता ने तारा का किरदार निभाया था। पर अब वह मुख्य हीरोइन की रेस से बाहर हो चुकी थी। 1949 में बी आर चोपड़ा ने अपनी फिल्म करवट बनाई जिसे गीता के पति वि डी बेदी ने ही डायरेक्ट किया था। सबको उम्मीद थी कि यह फिल्म गीता के डूबते करियर को बचा लेगी पर अफसोस फिल्म बॉक्स ऑफिस पर ओंधे मुंह गिर गई।

इसके बाद 1950 में बेकसूर और 1951 में हलचल जैसी बड़ी फिल्मों में वो नजर तो आई पर साइड रोल्स में। 1951 की फिल्म एक था लड़का गीता निजामी की भारत में आखिरी फिल्म साबित हुई। देश आजाद तो हो चुका था और बंटवारे की लकीरें भी खींच चुकी थी। 1952 के अप्रैल महीने में गीता ने फैसला किया कि वह अब भारत छोड़कर पाकिस्तान चली जाएंगी। पाकिस्तान पहुंचकर उन्होंने फिल्मों में अपनी जगह बनाने की कोशिश तो की पर वहां का माहौल अलग था। फिल्मों में बात नहीं बनी तो उन्होंने अपना एक डांस ट्रूप तैयार किया।

वह पाकिस्तान के अलग-अलग शहरों में जाकर स्टेज शो करने लगी। लोग उन्हें देखने आते तो थे, पर अब वह पहले वाली बात नहीं रही थी। अपनी जिंदगी के आखिरी सालों में वह पूरी तरह गुमनामी के अंधेरे में खो गई। पुराने विवादों की यादें और कोर्ट कचहरी के किस्से भी उनके साथ रह गए थे। आखिरकार 28 अप्रैल 2008 को कराची में इस सनसनीखेज अदाकारा ने अपनी आखिरी सांस ली। गीता

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