चमेली के फूलों में लिपटी नन्हीं एलिन को राजकीय सम्मान, अंतिम विदाई में उमड़ा जनसैलाब |

क्या 10 महीने की उम्र में कोई अमर हो सकता है? क्या कोई इतना छोटा बच्चा पांचप लोगों को नई जिंदगी दे सकता है? सुनने में यह नामुमकिन सा लगता है। लेकिन केरल की नन्ही आलेन शेरन अब्राहम ने इसे सर्च कर दिखाया है। आलन आज केरल की सबसे कम उम्र की ऑर्गन डोनर बन चुकी हैं। पर इस महान फैसले के पीछे एक पिता का वो संकल्प था जो उन्होंने सालों पहले कॉलेज लेक्चर के दौरान लिया था। आइए जानते हैं मानवता की इस अटूट मिसाल को। 5 फरवरी का दिन आलिन अपनी मां और नाना-नानी के साथ कार से जा रही थी।

तभी सामने से आ रही एक कार ने उन्हें जोरदार टक्कर मार दी। ताज्जुब की बात यह थी कि आलिन के शरीर पर बाहर से खरोच तक नहीं आई थी। लेकिन अंदरूनी चोटें बहुत गंभीर थी। डॉक्टरों की तमाम कोशिशों के बाद भी उसे बचाया नहीं जा सका। 6 फरवरी को डॉक्टरों ने उसे ब्रेन डेड घोषित कर दिया। एक साल से कम उम्र के बच्चों को ब्रेन डेड घोषित करने की प्रक्रिया बहुत मुश्किल भरी होती है। जिसमें लगभग 12 से 24 घंटे का समय लगता है। जब घर में मातम छाया था तब पिता अरुण इब्राहिम को साल 2013 की एक बात याद आई जब वो बीकॉम कर रहे थे। तब किडनी फाउंडेशन के फादर डेविस के एक लेक्चर ने उन्हें झोर दिया था। उसी दिन उन्होंने अंगदान करने का संकल्प लिया था। तो आइए जानते हैं डॉक्टरों के फैसले के बाद उस बच्ची के पिता ने क्या कहा। जब डॉक्टरों ने कहा कि वह ब्रेन डेड है तो उन्हें गहरा सदमा लगा। फैसला लेना मुश्किल था। लेकिन जब उन्होंने अपनी पत्नी शेरन से पूछा तो उन्होंने तुरंत कहा कि हमें दूसरी जिंदगियां बचाने के लिए अंगदानकरना चाहिए।

आलिमन के जाने से एक परिवार का दुख कई परिवारों के लिए उम्मीद बन गया। कैसे? बच्ची का लीवर 6 महीने की नन्ही ध्रिया को दिया गया जो लीवर फेलर से जूझ रही थी। उसकी किडनी तिरुवनंतपुरममेडिकल कॉलेज के एक 10 साल के बच्चे को डोनेट की गई। हार्ट वाल्व और दूसरी किडनी तिरुवनंतपुरम के दूसरे हॉस्पिटल में भेजे गए। उसकी आंखेंकोटरी के आई बैंक को सौंपी गई। यहां एक जरूरी बात समझने वाली है कि अक्सर लोग सोचते हैं कि अंगदान के लिए उम्र मायने रखती है। लेकिन डॉक्टर्स का कहना है कि डोनर की उम्र अहम नहीं होती।

हाल ही में 91 इयर्स के आनंदवल्ली अंबाल ने भी अपनी स्किन और कॉर्निया दान की थी। क्या आप जानते हैं कि दान की गई स्किन को -6° टेंपरेचर पर महीनों तक सेफ रखा जा सकता है और यह गंभीर रूप से जले हुए मरीजों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। वेल, अब आते हैं नन्ही आलिन के अंतिम संस्कार की ओर। तो आखिर में नन्ही आलिन का शव सुबह करीब 7:45 पर उनके घर लाया गया और चमेली के फूलों से सजे एक छोटे से ताबूत में रखा गया।

इससे पहले सुबह बड़ी संख्या में लोग मल्लापल्ली के पास उनके घर पहुंचे ताकि आलिन को श्रद्धांजलि दी जा सके। एक विशाल जनसूह एकत्र हुआ। हर किसी की आंखें नम थी। बच्ची को पूरे राजकीय सम्मान के साथ विदा किया गया। वहां आलिन के दादा रेज़ सैमुअल ने एक ऐसी बात कही जो सबके [संगीत] दिल को छू गई। उन्होंने कहा कि दर्द तो है लेकिन हमें संतोष है कि हमें चार और बच्चे मिल [संगीत] गए। हमारी बच्ची 10 महीने के गर्भ में रही और 10 महीने धरती पर वो अपना कर्तव्य पूरा करके लौट गई।

आलिन अब हमारे बीच नहीं है लेकिन उसकी आंखों से कोई दुनिया देख रहा हैऔर उसकी धड़कनें किसी और के सीने में धड़क रही हैं। क्या आलिन और उसके माता-पिता की यह कहानी आपको भी ऑर्गन डोनेशन के लिए इंस्पायर करती है?

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