विनोद खन्ना के बारे में क्या बोले सनी देओल ?

सनी लेकिन विनोद खन्ना भी पंजाब से मेंबर ऑफ पार्लियामेंट थे। वो मंत्री भी रहे। उन्होंने बहुत काम किया। उन्होंने तो कभी ऐसी शिकायतें नहीं की। देखिए हर आदमी अलग होता है। उन्होंने तो वो रूट ले ही लिया था। वो पॉलिटिक्स में ही थे। वो वही करना चाह रहे थे। मेरा मेरा रुख नहीं था कभी भी। बट मुझे कहा गया था आने को तो मैंने कहा चलो एक दफा देखें तो सही। पापा भी आकर गए हैं। पापा ने भी कहा बेटा तेरे से नहीं हो पाएगा।

मैंने दी की गल है। फिर जब आया तो मुझे समझ में आया वाकई में यह उनके लिए है जो पॉलिटिक्स में अपने आप को अंदर डाल सकते हैं और उसे ही अपना प्रोफेशन लेके आगे ले जा सकते हैं। और मुझे सूट नहीं मुझे मैं मुझे नहीं लगता कि मैं आई विल बी एबल टू बी जैसे मैं एज एन एक्टर हूं। मैं पहले डायरेक्टर भी बना, प्रोड्यूसर भी बना लेकिन मैंने सब कुछ छोड़ दिया क्योंकि आई कैन ओनली बी अ गुड एक्टर। ये आपकी बात सही है। आपको तो प्रोड्यूसर नहीं बनना चाहिए था क्योंकि प्रोड्यूसर बनके जो लोन लिया उसके बदले ऑफिस नीलाब होने की बारी आ गई। देखिए वो तो होता ही है। बिजनेस में होता तो नहीं है लेकिन जब बिजनेस में शॉर्ट कमिंग हो जाती है आप पिक्चरें बना रहे हो बना रहे हो और रिकवरी नहीं होती

तो फिर ऑब्वियसली आपने अपनी प्रॉपर्टी दी होती है। तो प्रॉब्लम्स आती हैं। तो मुझे भी बहुत प्रॉब्लम्स आई हुई हैं। तो ये सब चीजें चल रही हैं। लेकिन अक्सर जब भी हम लोग कुछ भी बनाते हैं हमारे पास प्रॉपर्टीज होती हैं। तो जब प्रॉब्लम आती है उस वक्त हम लोग उसको डाइलट कर देते हैं ताकि पैसे दे दिए जाए और आगे बढ़े और पैसे हमारे ही हैं। हमने ही मेहनत करके बनाया है। पापा ने बनाया है। सनी ये तो सबको समझ आया कि 56 करोड़ का लोन लिया था। प्रॉपर्टी गिरवी रखी थी। नहीं दे पाए। बैंक ने नोटिस अखबार में छाप दिया। लेकिन 24 घंटे में नोटिस वापस कैसे हो गया? कहीं टेक्निकल प्रॉब्लम थी वहां पे। देयर वाज़ अ जेन्युइन प्रॉब्लम बिकॉज़ उन्होंने मैंने लेटर्स भी भेजे थे उनको जाने से पहले जब मैं गदर की ये प्रमोशन कर रहा था 17 और 18 या 19 तारीख को दो दफा भेजे थे कि मैं आके 24 25 को आके सब सॉर्ट आउट करूंगा लेकिन उन्होंने पता नहीं देखिए क्या बोलूं बदमाशियां तो लोग करते ही रहते हैं। किसने किया क्यों किया करना नहीं चाहिए था। हां उनके पास राइट है करने का लेकिन आई हैव ऑलरेडी गिवेन अ लेटर कि मैं आके सब सेटल करने वाला हूं जो आप तो बहुत कमाई कर ली है दे देंगे एक तो अभी तो दे दूंगा क्यों नहीं मैं अपनी जगह को जरूर अपने पापा की बनाई हुई जगह उसे वापस जरूर रखना चाहूंगा अपने पास क्यों नहीं लेकिन आप फिल्म प्रोड्यूस नहीं करेंगे फिल्म कभी प्रोड्यूस बिकॉज़ मुझे क्योंकि मैं मैं उसके लायक ही नहीं हूं बिकॉज़ क्या है मैं क्रिएटिव आदमी हूं मैं सोचता सोचता नहीं कि कितना खर्चा हो रहा है, क्यों हो रहा है, नहीं हो रहा। और जिन लोगों को मैं वो रिस्पांसिबिलिटी देता हूं वो पता नहीं क्यों नहीं उसे अच्छी तरह से निभा पाए और मैं तो बस हम क्रिएटिव लोगों का काम है कि चीजें करना और बिनेस को कैसे संभालना हम नहीं कर पाते। इसी वजह से मेरे ऊपर इतने कर्जे हुए नहीं तो फिर क्यों होते?

कि मेरे पास अकल होती और इसीलिए फिर मैंने डिसाइड किया एक्टिंग करनी है। नो प्रोडक्शन नो डायरेक्शन ओनली एक्टिंग एंड आई थिंक दैट्स व्हाट यू ऑल वांट या चिंताम में से लास्ट राउंड। आपकी मूवीस तो बहुत हिट होती है। पर आपको कभी अवार्ड क्यों नहीं मिला? नहीं मेरा मुझे अवार्ड मिले हैं। कब मिले? हां मुझे मुझे मिले थे मेरी फिल्म में इनिशियली जब मैंने घायल के लिए मुझे मिला था दामिनी के लिए मिला था मुझे और उसके बाद नहीं मिले और जब वो दो मिले मुझे समझ में नहीं आया क्यों मिले और फिर मुझे अच्छा लगने लग गया तो मतलब अभी अगली बार मेरी घातक आई है इसमें भी मुझे मिलेगा.

लेकिन फिर मिलने बंद हो गए ये सवाल इसलिए भी उठता है क्योंकि जब अवार्ड के फंक्शनंस होते हैं उसमें आप स्टेज पर डांस करते हुए नजर नजर नहीं आते। नहीं। खैर आई मीन मैं अगेन यू नो फिर बोलेंगे मैं क्रिटिसाइज कर रहा हूं। आई डोंट टू क्रिटिसाइज द इंस्टट्यूट ऑफ़ अवार्ड्स एंड ऑल दीज़ थिंग्स। बट उसकी अहमियत अभी वैसे रही नहीं है। यू नो के कैसे भी किसी को भी कुछ भी मिल सकता है। और तो वो उसका स्वाद नहीं है।

यू नो किसी ने कैसे करके ले लिया फिर बोलेगा देखा मुझे मिल गया। और उसको खुद को पता है कैसे मिला। नॉट बिकॉज़ ऑफ योर जॉब वर्क जो आपने किया है बट देन लोग खुश हो जाते हैं उसी में तो फिर नहीं लगता है सबसे बड़ा अवार्ड तो आपको जो जनता का जो जनता देती है यही तो है इससे बढ़कर अवार्ड क्या है इसलिए इसलिए जब भी फिल्म करता हूं तो मैं हमेशा वही बिकॉज़ मैं भी खुद जनता ही हूं।

जब मैं पिक्चर देखता हूं तो मैं उसमें खो जाना चाहता हूं। तो इसलिए मैं चाहता हूं कि फिल्में भी वैसी हो जहां हम लोग जाएं दो घंटे के लिए खो जाएं। हमें रियलिटी नहीं चाहिए उधर बिकॉज़ रियलिटी तो हमारी तरफ है और बहुत सिर दर्द देती है रियलिटी। हम वहां अपने को खोने के लिए जाते हैं। एंजॉय करने के लिए जाते हैं दो-ती घंटों के लिए। तो सिनेमा मैं हमेशा वही समझता हूं। फिर हम बात करते हैं क्रिटिक्स की। मैं बोलता हूं मैंने फिल्म क्रिटिक्स के लिए नहीं बनाई। मैंने जनता के लिए बनाई है। क्रिटिक्स को जिसको जो बोलना बोलता रहे हमें उससे क्या लेना देना है? बिकॉज़ वो कभी पिक्चर को उस तरह से पिक्चर की तरह देखते नहीं है। जैसे आप किसके पास भी चले जाओ सलाह लेने तो उसको पता है मेरे को उसको सलाह देनी है। मेरे को इसको बताना क्या है? तो होता ही ऐसा है।

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