WhatsApp हम सब इस्तेमाल करते हैं। दिन रात बिना सोचे कि इसके पीछे क्या चल रहा है। इसकी नई प्राइवेसी पॉलिसी में साफ-साफ लिखा है कि वह आपसे जुड़ी जानकारियां यानी किससे बात हुई, कब हुई, कितनी बार हुई यह सारी डिटेल्स मेटा की बाकी कंपनियों खासतौर पर फेसबुक और इंस्टाग्राम के साथ शेयर कर सकता है। अब WhatsApp कहता है कि मैसेज तो एंड टू एंड इंक्रिप्टेड है।
कोई तीसरा शख्स या हम खुद भी मैसेज नहीं पढ़ सकते। लेकिन यहां सवाल मैसेज का नहीं बल्कि डाटा का है। WhatsApp आपका डाटा खुले तौर पर बाकी कंपनीज के साथ शेयर कर सकता है। इसी प्राइवेसी पॉलिसी को लेकर 3 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। जहां कोर्ट ने WhatsApp को फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा, हम आपको एक भी जानकारी शेयर करने की इजाजत नहीं देंगे।
आप देशवासियों के अधिकारों के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकते। यह मामला साल 2021 की प्राइवेसी पॉलिसी से जुड़ा है। जिसमें सीसीआई यानी कंपटीशन कमीशन ऑफ इंडिया ने नवंबर 2024 में मेटा पर 213 करोड़ 14 लाख का जुर्माना लगाया था। यह कहते हुए कि WhatsApp अपनी ताकत का गलत इस्तेमाल कर रहा है और यूजर के पास कोई असली विकल्प नहीं छोड़ता है ही नहीं। जब WhatsApp की पैरेंट कंपनी मेटा इस जुर्माने के खिलाफ गई तो एनक्लेट यानी राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण ने भी सीसीआई के फैसले को सही ठहरा दिया। अब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा जहां सीजीआई सूर्यकांत, जस्टिस जय माल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच मेटा की याचिका पर सुनवाई कर रही है। लाइव लॉ की एक रिपोर्ट के मुताबिक मामले पर सीजीआई सूर्यकांत ने कहा कि WhatsApp की स्थिति एकाधिकार जैसी है और यूज़र्स के पास कोई वास्तविक विकल्प कोई ऑप्शन है ही नहीं।
आप देश के संवैधानिक मूल्यों का मजाक बना रहे हैं। लोगों के निजता के अधिकार के साथ आप कैसे खेल सकते हैं? मेटा की ओर से सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी और WhatsApp की ओर से सीनियर एडवोकेट अखिल सिब्बल सुनवाई में पेश हुए थे। सीजीआई की टिप्पणी पर जवाब दिया गया कि WhatsApp की इस पॉलिसी से बाहर निकलने यानी ऑप्ट आउट का भी ऑप्शन है।
इस पर सीजीआई ने कहा कि क्या सड़क पर फल बेचने वाली गरीब महिला आपकी ये शर्तें समझ पाएगी? यह निजी जानकारी की चोरी का एक सभ्य तरीका है और हम इसकी अनुमति नहीं देंगे। सीजीआई ने स्पष्ट किया कि जब तक मेटा और WhatsApp ये लिखित आश्वासन नहीं देता रिटर्न में नहीं दे देता कि यूज़र्स का निजी डाटा इस्तेमाल नहीं किया जाएगा तब तक अदालत मामले की सुनवाई आगे नहीं बढ़ाएगी। इस पर सीनियर एडवोकेट रौतेगी ने बताया कि एक संविधान पीठ के सामने चल रहे दूसरे मामले में यह भरोसा दिया जा चुका है। यकीन दिलाया जा चुका है कि 2021 की पॉलिसी ना मानने पर किसी यूजर को WhatsApp से बाहर नहीं किया जाएगा। उन्होंने डिजिटल पर्सनल डाटा प्रोटेक्शन एक्ट 2023 का हवाला दिया। लेकिन इस पर जस्टिस बागची ने तुरंत टोका और कहा कि यह कानून अभी लागू ही नहीं हुआ है। तो आप भविष्य के कानून की ढाल लेकर आज का सवाल कैसे टाल सकते हैं? इसी दौरान सॉललीिसिटर जनरल तुषार मेहता ने एक पॉइंट रखा कि व्यक्तिगत डाटा सिर्फ बेचा नहीं जाता बल्कि उसका व्यावसायिक शोषण किया जाता है। यानी लोगों की आदतें, पसंद नापसंद, डर, बीमारी, जरूरत सब कुछ एक प्रोडक्ट बन जाता है। जस्टिस बाची ने कहा कि अदालत यह समझना चाहती है कि डाटा को कैसे किराए पर दिया जाता है और कैसे यूजर के व्यवहार के आधार पर विज्ञापन दिखाए जाते हैं।
इसी बीच सीजीआई सूर्यकांत ने अपना निजी अनुभव भी साझा किया। उन्होंने बताया कि WhatsApp पर डॉक्टर से बातचीत के बाद तुरंत उसी बीमारी या दवा से जुड़े विज्ञापन दिखने लगते हैं। इस पर मेहता और WhatsApp की ओर से यह दोहराया गया कि संदेश एंड टू एंड एंक्रिप्टेड है और कंपनी मैसेज नहीं पढ़ सकती। इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि यूरोप में डाटा शेयरिंग और उसकी कीमत को लेकर नियम बहुत सख्त है। जबकि भारतीय कानून अभी इस सवाल पर पूरी तरह साफ नहीं है।
सीसीआई की ओर से सीनियर एडवोकेट समर बंसल ने कहा इनकी पूरी कमाई विज्ञापनों से होती है। हम ही उत्पाद है यानी हम ही प्रोडक्ट हैं। सेवा मुफ्त है क्योंकि कीमत हम अपने डाटा से चुका रहे हैं।
अदालत के सवालों के बाद मेटा ने हलफनामा यानी एफिडेविट दाखिल करने का प्रस्ताव रखा। इसे स्वीकार करते हुए अदालत ने मामला अगले सोमवार यानी 9 फरवरी तक के लिए स्थगित कर दिया है।
