ये कैसी मजबूरी… जब कोई नहीं आया…बेटियों ने दिया मां की अर्थी को कंधा।

और बिहार के छपरा में कुछ ऐसा हुआ जिससे पूरे समाज पर प्रश्न चिन्ह लग गया। आखिर किसी के अंतिम संस्कार में भी लोग कितने मतलबी हो सकते हैं? यह तस्वीर इसका जीता जागता उदाहरण है। बिल्कुल। एक मां की मौत के बाद उनकी बेटियों को कंधा देना पड़ा क्योंकि गांव का कोई भी शख्स अंतिम संस्कार के लिए आया नहीं। जब किसी ने मदद नहीं की तो फिर दोनों बेटियों ने सिर्फ बेटी होने का फर्ज निभाया बल्कि समाज को आईना भी दिखा दिया।

पापा बीमार नहीं थे वो अचानक तबीयत खराब हो गया था उनको तो उनको भर्ती किया गया तो वो भी छ सात दिनों में वो भी डेट कर गए और मम्मी का इलाज चल रहा था टीवी था पापा के डेथ के बाद घर वाले साथबिहार में इंसानियत शर्मसार मां की मौत पर गांव ने मुंह मोड़ा। मां की अर्थी को दो बेटियों ने दिया कंधा। दिल दहला देने वाली इस तस्वीर ने समाज की [संगीत] संवेदनहीनता को उजागर कर दिया है। एक मां की मौत के बाद पूरे गांव ने मानो मोह ही फेर लिया। परिवार के सामने सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हुआ कि अर्थी को कंधा कौन देगा और मुखाग्नि कौन देगा। जब कोई आगे नहीं आया तो अंत में दोनों बेटियों ने ही मां कोपूरे गांव के सामने कंधा दिया और उनका अंतिम संस्कार किया। गांव देखता रहा। दोनों बेटियों ने अपना फर्जनिभाया।

परिवार में कोई बेटा नहीं था। सिर्फ दो बेटियां थी जो शादी के बाद अपने-अपने ससुराल में रहती थी। मां की मौत की खबर मिलते ही दोनों बेटियां गांव पहुंची और अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेने का फैसला किया।

मेरी मम्मी का तबीयत खराब था। उनको ले गया छोटी छोटी वाली बहन फोन की मेरे को। मैं बाहर थी कि तबीयत खराब है। आप जल्दी आ जाइए। फिर पटना भर्ती किया गया उनको। पटना भर्ती थी। हम आए दो तीन तीसरे दिन वो डेट कर गई। उसके बाद से घर पे लेकर आए हम लोग। घर पर कोई नहीं था और बाहर भी गए तो कोई मदद के लिए नहीं आया। इसीलिए हम लोगों ने कंधा दिया। बबीता देवी की मौत के बाद ना तो कोई रिश्तेदार पहुंचा और ना ही गांव वालों ने अंतिम संस्कार में सहयोग किया। शव को शशान घाट तक ले जाने के लिए भी कोई कंधा देने को तैयार नहीं हुआ। समाज में प्रचलित परंपराओं के बावजूद जहां मुखाग्नि मुख्य रूप से पुत्रों द्वारा दी जाती है। यहां कोई पुरुष सदस्य नहीं होने के कारण पूरी जिम्मेदारी दो बेटियों पर आ गई। दोनों बहनों ने हिम्मत जुटाकर मां की अर्थी उठाई और श्मशान तक पहुंचाई। एक बेटी ने कहा, “यह कोई समाज सुधार का कदम नहीं था। यह हमारी मजबूरी थी। मां ने हमें पाला, हमें बड़ा किया तो आखिर जिम्मेदारी भी हमारी ही थी। ये रील्स बनाने वाली कोई बात नहीं है।

रील्स बनाने के लिए हम लोग करेंगे। करेंगे ऐसी कोई बात नहीं। फैलाई जा रही है। क्या करेंगे? क्या कोई गरीबी की कोई बात है? क्या मतलब गांव वाले लोग आप लोगों का साथ क्यों नहीं? क्या अभी तो गांव वाले ही बताएंगे क्यों साथ नहीं दिए। हम नहीं बता सकते कि आप क्यों नहीं आए? ये तो हम नहीं बता पाएंगे कि गांव वाले क्यों नहीं। [संगीत] स्थानीय लोगों ने बताया कि परिवार का गांव के [संगीत] कई लोगों से बोलचाल नहीं रहा। इसलिए सहयोग की कमी रही। अगर रिश्ते बेहतर [संगीत] होते तो शायद हालात कुछ और होते। लेकिन यहां मामला पहले से ही उलझा हुआ था। एक सामाजिक कार्यकर्ता [संगीत] बेटियों के घर पहुंचे और परिजनों से मिले। उनका कहना है कि गांव वालों का कुछ जमीनी विवाद चल रहा था और हो सकता है यही वजह हो जिसके कारणकोई अंतिम संस्कार में नहीं गया।

अब देखिए अब गांव वाले का मैटर है कि आपसी विवाद है कुछ। ठीक है। हम गए थे आज तो पता चला है कुछ आपसी विवाद भी है पारिवारिक विवाद भी है। ठीक है। हो सकता है इस विवाद को लेकर गांव वाले भी नहीं जो जब घर फूटा तो जवार लूटने वाला कहावत जो हम लोग सुनते हैं वही हाल था। आज भी वही हाल हुआ है वहां पे और घर में क्या विवाद था? कुछ घरेलू डिस्प्यूट है पटीदारी का अपना घरेलू जमीन उनका घर का लोगों ने बताया कि हम लोग घर पे नहीं थे तो ऐसा तो भी नहीं हो सकता है कि पूरा गांव ही एक समय पे गांव पूरा गांव ही खाली ना हो ठीक है खेतीबाड़ी है नौकरी है रोजगार है।

लेकिन किसी का दुख में सम्मिलित जरूर होना चाहिए ठीक है अगर उसे कुछ मतभेद है आपका ठीक है तो मतभेद का जब आदमी का देहांत हो जाता है तो हम लोग के यहां कहावत है कि जो मर जाता है उसकी सारी गलतियों को माफ कर दिया जाता है ठीक है और उसका सहायता कीजिए तन मन धन से ठीक है बोलचाल नहीं है नहीं है लेकिन किसी के सुख में नहीं जाते हैं लेकिन दुख में जरूर जाना चाहिएहालांकि इन सबके बावजूद किसी के आखिरी [संगीत] समय में आपसी मतभेद भुला दिए जाते हैं लेकिन गांव का कोई भी शख्स आगे नहीं आया और बेटियों ने ही अपनी मां को अंतिम विदाई दी।

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