सुनीता विलियम नासा से रिटायर हुई तो वो सबसे पहले श्री रामसनेही यादव डिग्री कॉलेज गाजीपुर के पूर्व प्रधानाचार्य प्रकाश राज जी से मिली। एक शिष्य कभी अपने गुरु को नहीं भूलता। क्यों भी भूलता ? आइए इसके पीछे की कहानी पर प्रकाश राज डालते हैं।
बहुत साल पहले एक गांव में अमीर ब्राह्मण रहता था जो ews कोटे से बाहर जनरल केटेगरी में आता था। वो अमीर इसलिए था क्योंकि गांव का इकलौता ब्राह्मण था। गांव में किसी भी राजपूत, कुशवाहा, यादव, कुर्मी, बनिया के घर में किसी का लग्नपत्री देखना हो, जन्मकुंडली देखना हो आदि सब उसी से दिखवाते थे बदले में 52 किलो गेहूं चावल और 501 रुपया नकदी देते थे।
उसी दौरान औरतों को पढ़ने लिखने का अधिकार दिलाने वाले एक महापुरुष को भारत रत्न मिला आजादी के चालीस साल बाद लगभग। गांव में सब पटाखे फोड़ रहे थे लेकिन उस पटाखों की आवाज से दूर बैठे उस पंडे की गान जल रही थी। तभी एक छोटी बच्ची पंडित जी के घर आई और बोली ” बाबा जी एक दिन मैं भी अपने गांव का नाम रोशन करूंगी वैज्ञानिक बनकर ” एक कुटिल मुस्कान के साथ पंडी जी बोले, बहुत खूब बेटा जीती रहो। कल अपने पिताजी के साथ आना कुंडली देखूंगा तुम्हारी।
रामसजीवन भारती अपनी बेटी को लेकर पंडी जी के पास गए। पंडी जी उस मासूम बिटिया की कुंडली देखते ही समझ गए कि ये तो वाकई में देश का नाम रोशन करेगी। ये जान कर पंडी जी की गान और जल गई। अब उन्होंने तिकड़म लगा कर रामसजीवन को राजपूत,यादवों के खेतों में काम करने से रोक लगा दिया। उधर पैसे के अभाव में बिटिया का नाम कट गया स्कूल से। फिर एक दिन गुलाम भारत में उदार लार्ड रिपन की एंट्री हुई, उसी तरह रामसजीवन के जीवन में उदार प्रकाश राज मास्टर साहब की एंट्री हुई।
प्रकाश जी ने अपने दोस्त गयासुद्दीन अंसारी के अंग्रेजी मीडियम स्कूल सेंट मुहम्मदबर्ग में दाखिला करवा दिया। बिटिया पढ़ लिख कर आगे बढ़ती रही और पंडी जी की गान जलती रही। एक दिन वो बिटिया हॉयर एजुकेशन के लिए अमेरिका स्थित सेंट नालंदाबर्ग विश्विद्यालय चली गई। वहां पर उसने उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा हासिल की और वैज्ञानिक बन गई। उस बिटिया का नाम अब सब समझ गए होंगे क्या था।
( पंडी जी आज भी अपने गांव में अंधविश्वास फैला रहे हैं और प्रकाश राज मास्टर साहब और गयासुद्दीन अंसारी जी इल्म की रोशनी से पूरी दुनिया को रोशन कर रहे हैं)
