बेटी की अर्थी को नहीं मिला कंधा फिर… लाचार पिता को देख नहीं रुकेंगे आंसू।

गांव की उस कच्ची पगडंडी पर आज अजीब सी खामोशी थी। हवा चल रही थी। पेड़ों की पत्तियां सरसराती थी। लेकिन इंसानी आवाजें कहीं सुनाई नहीं दे रही थी। उसी रास्ते पर एक अर्थी रखी थी। लाल ऊनी से ढकी हुई। वह उड़नी जो आमतौर पर शादी ब्याह और खुशियों का प्रतीक मानी जाती है। आज एक बेटी की अंतिम पहचान बन चुकी थी। उस ओढ़नी के नीचे एक शव था। एक बेटी जिसने इसी गांव में आंखें खोली थी। यही खेली थी। यही सपने देखे थे। और आज उस अर्थी को उछाने के लिए सिर्फ दो लोग खड़े थे। एक बूढ़ा पिता जिसकी कमर उम्र और दुख दोनों की बोझ सेझुक चुकी थी। और एक जवान भाई जिसकी आंखों में आंसू नहीं बल्कि सन्नाटा भरा था। ना कोई पड़ोसी, ना कोई रिश्तेदार, ना गांव का कोई बुजुर्ग, ना दोस्त, कोई नहीं। यह दृश्य सिर्फ एक अंतिम संस्कार का नहीं था।

यह उस समाज का आईना था जो खुद को सभ्य, संस्कारी और मानवीय कहता है। लग रहा है कलयुग धीरे-धीरे आ रहा है। आज के दौर में लगातार मानवता शर्मसार हो रही है। सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर एक ऐसा वीडियो वायरल हुआ है जिसे देखकर आपकी रूह कांप जाएगी। आप यह सोचने पर मजबूर हो जाएंगे कि दुनिया किस दिशा में जा रही है। इस वीडियो में एक गांव में बेटी की निधन के बाद उसकी अर्थें उठाने के लिए सिर्फ उसका बूढ़ा पिता और जवान भाई खड़े नजर आए। ना कोई पड़ोसी, ना कोई रिश्तेदार, ना ही गांव का कोई शख्स कंधा देने आगे आया।

जिस बेटी ने इसी गांव में सांस ली उसी गांव ने आखिरी विदाई में मुंह मोड़ लिया। कांपते हाथों से अर्थी उठाता पिता और सुनी आंखों से सब देखता भाई समाज से सवाल पूछ रहा है। क्या यही हमारी इंसानियत है? वीडियो में देखा जा सकता है कि बेटी की अर्थी उठाने के लिए केवल उसके पिता और भाई ही मौजूद है।

गांव के बाकी लोग या तो घरों में बंद रहे हैं या फिर किसी ना किसी बहाने से दूरी बनाए रहे। किसी ने कहा कि शादी में जाना है। किसी ने काम का हवाला दिया तो किसी ने चुप्पी साध ली। यह दृश्य बताता है कि दुख की घड़ी में भी लोग साथ खड़े होने से कतराने लगे। जिस समाज में अंतिम संस्कार जैसे संस्कार सामूहिक जिम्मेदारी माने जाते थे। आज वही एक परिवार को अकेले ही यह बोझ उठाना पड़ा। यह नजारा इंसानियत की गिरती तस्वीर को साफ दिखाता

है।

अर्थी उठाते पिता के कांपते हाथ और भाई की आंखों में भरा सन्नाटा दिल को झकझोर देता है। यह सिर्फ एक बेटी की विदाई नहीं थी बल्कि समाज की संवेदनशीलता की परीक्षा भी थी। जिसमें लोग फेल होते नजर आए। दुख के इस पल में एक कंधा भी ना मिलना उस परिवार के जख्मों को और गहरा कर गया। वीडियो देखने वालों का कहना है कि इस दृश्य ने उन्हें अंदर तक हिला दिया।

लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या अब इंसानियत इतनी कमजोर हो गई है कि दुख के समय साथ खड़ा होना भी बोझ लगने लगा है? वीडियो देख लोग भावुक होकर कमेंट कर रहे थे। एक यूजर कमेंट करते हुए लिखामृत समाज का एकमात्र लाश है जिससे मोक्ष की प्राप्ति हुई। उन्हें दो कंधे तो मिले बाकी लोग तो मृत है, जिंदा है।

यह घटना सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं बल्कि पूरे समाज के लिए चेतना है। रिश्ते, रीति-रिवाज और व्यवस्थाएं अपनी जगह है। लेकिन इंसानियत उनसे कहीं ऊपर होनी चाहिए।

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