70 – 80 के दशक के वो चाइल्ड आर्टिस्ट जिनको मरने के बाद दुनिया भूल गई।

हम बहुत कोशिश करते हैं। कोई भीख नहीं मांगता। पैसा उठाकर हाथ में दो। फिल्मों में चाइल्ड आर्टिस्ट की भूमिका निभाने वाले ये बच्चे फिल्मों में इतनी दमदार एक्टिंग करते थे कि बड़े-बड़े अभिनेता, अभिनेत्री और फिल्म निर्माता इनके हुनर और अभिनय के कायल हो जाते थे। मुझे बेटा मत कहो। तुम अगर मेरी मां होती तो हमारे साथ रहती। तुमने मेरे डैडी के साथ शादी की है। तुम उन्हें प्यार करती हो। 80 के दशक में हिंदी सिनेमा की फिल्मों में अक्सर इन चाइल्ड आर्टिस्ट के जीवन की शुरुआत बड़े ही दुखों के साथ होती थी। हिंदी फिल्मों के खलनायक यानी विलेन के द्वारा इनके परिवार को तबाह कर दिया जाता था और मां-बाप की हत्या हो जाती थी और ये बच्चे बड़े होकर उस जुल्म और हत्या का बदला लेते थे जो उनके साथ बचपन में घटी होती थी। बापू जिस हत्यारे ने आपकी जान लेकर अम्मा के माथे से सिंदूर मिटा दिया।

मैं उस को जिंदा नहीं छोडूंगा बापू कभी नहीं छोडूंगा। हिंदी फिल्मों में एक अच्छी फिल्म की नीव कुछ ऐसे ही हादसे या घटना के साथ रखी होती थी और इन फिल्मों में चाइल्ड आर्टिस्ट की भूमिका निभाने वाले बाल कलाकारों की बहुत जरूरत और कीमत होती थी। हर हर महादेव। दोस्तों आप सभी ने भी उस दौर की फिल्मों में इन कुछ चाइल्ड आर्टिस्ट्स को जरूर देखा होगा। लेकिन शायद लोग आज भी इनके नाम से अनजान हैं। लोग इनके चेहरों को तो याद रखते हैं लेकिन इनके असली नाम हमेशा उनकी पहुंच से दूर रहे। लेकिन आज हम अपने स्पेशल शो में बात करने जा रहे हैं ऐसे ही कुछ बेहद चर्चित बाल कलाकारों की जो बड़े होकर हिंदी सिनेमा से बिल्कुल गायब हो गए या फिर हिंदी सिनेमा के उस अंधकार में डूब गए जहां सिर्फ यह एक याद बनकर ही रह गए या फिर सच का आईना देखें तो इन महान चाइल्ड आर्टिस्ट को हिंदी सिनेमा में काम मिलना लगभग बंद हो गया। तो वो पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट कर सकता था।

रिपोर्ट करने का था? किया। वो भी किया मैंने। पर क्या किया तुम लोगों? हां? कुछ नहीं। इसीलिए मैं किया। तो आज के इस शो में हम बात करने वाले हैं कुछ ऐसे बाल कलाकारों की जिन्होंने हिंदी फिल्मों में अपने अभिनय की वो छाप छोड़ी जिसे आज तक लोग अपने जेहन में बसा कर बैठे हैं। देख सकता हूं मैं कुछ भी होते हुए नहीं मैं। बचपन से जवानी में आने वाली यह चाइल्ड आर्टिस्ट आज कहां है?

किन हालातों में है? जिंदा है या नहीं यह सब मैं आपको बताऊंगी लेकिन इन मासूम बच्चों का पूरा सच जानने के लिए आपको बने रहना होगा हमारे स्पेशल शो के अंत तक लकड़ी की काटी का पे घोड़ा घोड़े की धूम पे जो नमस्कार आदाब आभार दोस्तों एक वक्त था जब हिंदी सिनेमा के 70 और 80 के दशक में पारिवारिक फिल्मों का चलन बहुत ज्यादा था और इन फिल्मों में परिवार के रिश्तों और मोहब्बत को दिखाया जाता था।

दादी अम्मा दादी अम्मा मान जाओ। दादी अम्मा दादी अम्मा मान जाओ। हिंदी सिनेमा की यह फिल्म एक्शन, रोमांस, कॉमेडी और सस्पेंस से भरी होती थी। और इन फिल्मों में परिवार के रिश्तों को हर रंग रूप के साथ सजा कर दिखाया जाता था। और इन्हीं पारिवारिक रिश्तों पर बनी फिल्मों की खासियत या आकर्षण का केंद्र यह चाइल्ड आर्टिस्ट ही होते थे। और यही वो वक्त था हिंदी सिनेमा का जब फिल्मों के हीरो और हीरोइन की तरह इन बाल कलाकारों का भी ऐसा ही जलवा हुआ करता था। और इनमें से ही कुछ चाइल्ड आर्टिस्ट ऐसे भी थे जिनकी लोकप्रियता किसी भी बड़े सुपरस्टार अभिनेता या अभिनेत्री से कम नहीं होती थी और इन चाइल्ड आर्टिस्ट को दुनिया बड़े ही मान सम्मान के साथ तवज्जो देती थी।

बच्चे मन के सच्चे सारे जग की आंख के तारे। तो चलिए दोस्तों आज जानते हैं ऐसे ही कुछ चाइल्ड आर्टिस्ट्स के बारे में जिनकी जिंदगी के संघर्ष सुख दुख और अंत की कहानी के बारे में। यादों की बारात निकली है । आज मास्टर बिटू उर्फ विशाल देसाई से। अमर बेटे ये क्या कर रहे हो बेटे? पिस्तौल छुपा रहा हूं। छोटे ने देख लिया तो मांग लेगा। फिल्मी पर्दे पर दिखने वाले इस बच्चे यानी मास्टर बिटू ने अपने फिल्मी सफर की शुरुआत साल 1970 में आई फिल्म पतिप और वो से की थी।

गाना आए या ना आए गाना चाहिए। हां गाना आए। और इस फिल्म के हीरो थे संजीव कुमार और हीरोइन थी खूबसूरत विद्या सिन्हा। इस फिल्म में बड़े अभिनेता और अभिनेत्री के साथ मास्टर बिटू भी शानदार अभिनय करते हुए नजर आए। इस फिल्म में इनकी डायलॉग डिलीवरी और मासूम से चेहरे को दर्शकों ने खूब पसंद किया। मम्मी को भी अंदर बुलाना चाहिए। तेरी मम्मी और देखते ही देखते मास्टर बिटू ने हिंदी सिनेमा और लोगों के दिलों में अपनी एक खास जगह बना ली। कालीचरण द बर्निंग ट्रेन अमर अकबर एंथनी अमर प्रेम नटवरलाल नागिन याराना और फकीर जैसी फिल्म मास्टर बिटू की शानदार फिल्मों में से एक है। जिनमें मास्टर बिटू ने उम्मीद से बढ़कर काम किया और इनका अभिनय देखने को मिला। नहीं पता है नहीं बचेगा। मास्टर बिट्टू जिनका असली नाम विशाल देसाई था। उन्होंने हिंदी फिल्मों में फिल्म के हीरो के सामने ऐसे अभिनय किया कि सब इनकी एक्टिंग के दीवाने हो गए।

नहीं ग्रैंड पापा आप हमारी जान की परवाह मत कीजिए। हम भी अपने पापा के बच्चे हैं। हां ग्रैंड पापा। और धीरे-धीरे समय गुजरा और विशाल देसाई अब बड़े हो गए और बड़े होने के बाद भी यह फिल्मों से ही जुड़े रहे। लेकिन बड़े होने के बाद रंग रूप बदला और इनकी जगह भी। अब विशाल देसाई फिल्मी पर्दे पर नहीं बल्कि फिल्म निर्माण के क्षेत्र में काम करते हैं। और इसी फिल्म निर्माण के क्षेत्र में विशाल ने हेमा मालिनी बी आर चोपड़ा के साथ बतौर सहायक फिल्म निर्माता के तौर पर काम किया और उन्होंने सहायक निर्माता के तौर पर भूतनाथ विरासत बागवान जैसी सुपरहिट फिल्मों में वह काम कर चुके हैं। साथ ही विशाल देसाई एक बड़े मनोरंजन चैनल के क्रिएटिव डायरेक्टर भी हैं। तो दोस्तों, यह थे मास्टर बिटू उर्फ विशाल देसाई। वो गुस्सा करेगी तो अभी सामने जवाब दे दूंगा। पर तुम मुझे छोड़कर जाने की बात कभी मत करना भाभी मां। कभी मत करना। भाभी मां। चलिए अब बात करते हैं दूसरे चाइल्ड आर्टिस्ट जूनियर महमूद यानी नईम सईद की। हमें काले हैं तो क्या हुआ दिल वाले हैं। हमें काले हैं तो क्या हुआ? और इनका रुतबा भी किसी बड़े सुपरस्टार से कम नहीं होता था। अपनी-अपनी बीवी पे सबको गुरूर है। अपनी जूनियर महमूद के अभिनय का ऐसा जादू था कि वो अपने दौर की लगभग हर फिल्म में नजर आते थे। उस दौर में इनकी कमाई और लोकप्रियता का अंदाजा आप और हम इसी बात से लगा सकते हैं कि महज 16 साल की नाबालिक उम्र में ही इन्होंने अपने लिए विदेश से एक लग्जरी कार मंगवाई थी।

और मैंने ये भी सुना है कि आप उस जमाने में बाला गाड़ी जो थी 10-12 आर्टिस्टों के पास या पूरे बॉम्बे में 10-12 थी। उसमें एक आपके पास ये तो मां-बाप की दुआएं थी। मेरे मां-बाप की दुआएं और यह कार इतनी महंगी थी कि इनको मिलाकर उस वक्त यह कार सिर्फ 12 लोगों पर ही हुआ करती थी। और आप यकीन कीजिए कि मैं 1969 में उस दौर में ₹3000 पर डे मांगता था। हम एंड आई गॉट टू बिलीव मी। प्लीज जूनियर महमूद की हिंदी सिनेमा में शुरुआत भी बड़े अलग अंदाज में हुई। दरअसल जूनियर महमूद के भाई फिल्मों में फोटोग्राफर थे। वो फिल्म के सेट पर फोटो खींचने का काम करते थे। और बड़ा भाई मेरा वो स्टील फोटोग्राफी करते हैं ना? जी जी।

आप तो वाकिफ ही हैं। हां। तो वो करते थे। फिल्म लाइन से ताल्लुक ही उनका था। उन्हीं के साथ ये फिल्म के सेट पर चले जाया करते थे। एक बार एक फिल्म दिल कितना नाजुक है कि शूटिंग चल रही थी। बेसिकली अगर आप देखा जाए तो मेरी पहली फिल्म थी। कितना नाजुक है दिल। और वहां एक चाइल्ड आर्टिस्ट फिल्म के डायलॉग बोल ही नहीं पा रहा था। यह सब देखकर जूनियर महमूद ने उसका मजाक उड़ाया। मैंने डायरेक्टर की पीछे की कुर्सी से बोल दिया डायलॉग बोलने को आता नहीं। चल आया है पिक्चर में काम करने को। हां। मैंने ऐसे कुछ बोल दिया। और यह सब फिल्म के निर्माता ने देख लिया। और फिर गुस्से में फिल्म निर्माता ने वही डायलॉग जूनियर महमूद को बोलने के लिए कहा। एक हाई स्पीड में डायरेक्टर ने यूं टर्न करके मुझे देखा। हां। नोटिस करके मुझे बोले क्या आप यह डायलॉग बोल सकते हैं क्या? हां। हालांकि जूनियर महमूद को यह सब अच्छा नहीं लगा और यही वो वक्त था जब ये कैमरे का पहली बार सामना कर रहे थे। जिसका नतीजा यह हुआ कि उस फिल्म में जूनियर महमूद को चाइल्ड आर्टिस्ट के तौर पर रख लिया गया। लोगों ने तालियां वालियां बजा दी। मैं तो उस दिन का हीरो हो गया साहब।

लेकिन दुर्भाग्यवश वो फिल्म कभी रिलीज नहीं हुई। लेकिन इस फिल्म के बाद जूनियर महमूद की फिल्म की गाड़ी चल पड़ी। मां ने नाम लिया था मंसब अली। यहां पहुंच के हो गया हूं महमूद अली। पर किस्मत सी ऐसी गड़बड़ ढाली कि हर काम में सुनने पड़े है गाली। इसने मेरा भेजा बिल्कुल है खाली। इसके बाद इनकी फिल्म ब्रह्मचारी की अपार लोकप्रियता और कामयाबी ने इनको भी लोकप्रिय कर दिया था। तुम लोग ऐसा करो। उन्हें बाहर लेके आओ। फिर मैं उनका मूड ठीक करता हूं। और इसी फिल्म में इन्होंने मशहूर फिल्म निर्माता और अभिनेता महमूद की शानदार एक्टिंग करके सभी का दिल जीत लिया। हम तेरे तेरे तेरे चाहने वाले हैं। हम काले हैं तो क्या हुआ? इसी गाने को देखकर अभिनेता महमूद ने इनको जूनियर महमूद का नाम दिया था। मैं इसे चेला बनाऊंगा अपना नाम दूंगा।

अच्छा तो आपका नाम नईम था तो जूनियर महमूद साहब ने मुझे बाकायदा चेला बनाया। जूनियर महमूद ने अपने दौर में कई फिल्में जैसे दो रास्ते हरे रामा हरे कृष्णा कारवा आन मिलो सजना कटी पतंग। हाथी मेरे साथी जैसी फिल्मों में बड़े-बड़े सुपरस्टार्स के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया था। मेरे भाई के लिए मेरी जान चली जाए। इससे अच्छी मौत और क्या हो सकती है? और यह भी हो सकता है कि तुम्हारी वजह से तुम्हारे भाई की जान जाए। इन फिल्मों के बाद जब जूनियर महमूद बड़े हुए तो 80 और 90 के दशक में भी यह फिल्मों में काम करते देखे गए और इन्होंने जैसी करनी वैसी भरनी। करिश्मा कुदरत का आज का अर्जुन दौलत की जंग और जुदाई जैसी लोकप्रिय फिल्मों में शानदार काम करते हुए इन्हें देखा गया। अरे घर को मत गोदाम बनाना तू ना अकेले-अकेले खाना औरों का लेकिन समय एक जैसा नहीं रहता है। जूनियर महमूद को जो काम पहले मिलता था वो अब इनसे दूर होने लगा और नतीजेतन यह अब इक्का-दुक्का फिल्मों में सपोर्टिंग अभिनय करने लगे।

जूनियर महमूद ने फिल्मों में काम करने के अलावा कुछ मराठी फिल्मों को भी प्रोड्यूस किया था। जूनियर महमूद को आखिरी बार साल 2011 में राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म जाना पहचाना में यह नजर आए थे। इसके बाद जूनियर महमूद को जब फिल्में राज नहीं आई, तो इन्होंने छोटे पर्दे यानी टीवी की तरफ रुख किया और साल 2012 में टीवी सीरियल प्यार का दर्द है मीठा-मीठा प्यारा प्यारा से शुरुआत की और इसके बाद यह एक रिश्ता साझेदारी का तेनाली रामा जैसी सीरियल्स में नजर आए। फिल्मों और टीवी में काम करते-करते अब जूनियर महमूद की तबीयत खराब रहने लगी। इलाज हुआ तो पता चला कि इनको कैंसर हो गया है और साल 2023 में इसी बीमारी के चलते बेहद दुखद स्थिति में इस शानदार और लोकप्रिय अभिनेता और चाइल्ड आर्टिस्ट ने दुनिया को अलविदा कह दिया और अपने पीछे छोड़ गए वो फिल्में जिनको हमेशा लोग इनके ही नाम से याद करेंगे। एंड वेस्टर्न एक्टर जूनियर महमूद हैज़ डाइड दिस इज़ आफ्टर फाइटिंग कैंसर। हमारे लिए बहुत दुख की बात है के हमारे हमने एक भाई को खोया है और बहुत बड़े आर्टिस्ट हमारे बीच में नहीं थे। वरवाला उनकी आत्मा को शांति दे और उनके परिवार वालों को शांति दे। तो जूनियर महमूद साहब जो हमारे आज हमारे बीच में नहीं है लेकिन काम तो उनका हमेशा महान है। हमारे उस्ताद हैं। हम सबके प्रेरणा स्रोत है। ना इतना बड़ा चाइल्ड आर्टिस्ट सुपरस्टार पैदा हुआ है ना होगा। हमें काले हैं तो क्या हुआ? दिल वाले हैं। हम काले हैं तो क्या हुआ?

जूनियर महमूद के बाद तीसरा नंबर आता है 70 के दशक के इस मासूम से चेहरे का जिसको आप सभी ने ओल्ड इज गोल्ड फिल्मों में देखा होगा। मासूम से दिखने वाले इस चेहरे ने छोटी सी उम्र में ही बड़ी कामयाबी हासिल कर ली थी और ये चेहरा अक्सर हर दूसरी फिल्म में चाइल्ड आर्टिस्ट के तौर पर नजर आता था। इस चेहरे की पहचान थी मास्टर राजू उर्फ फहीम अजानी। करना है। करना क्या? करना है। क्या करना है? मास्टर जी करना है। जिनको हिंदी सिनेमा में बेशुमार कामयाबी और लोकप्रियता मिली थी। मास्टर राजू ने 100 से ज्यादा हिंदी फिल्मों में काम किया। इन्होंने महज 5 साल की छोटी सी उम्र में ही सिनेमा में कदम रख दिया था। मुझे मत छुओ। क्यों बेटा? मेरी मां को दुख दिया है। मेरी मां रोते-रोते मर गई। नहीं। मास्टर राजू ने हिंदी सिनेमा के सफर में नेशनल अवार्ड भी अपने नाम किया है। मास्टर राजू उर्फ फहीम अजानी का जन्म 15 अगस्त 1966 को डोंगरी मुंबई में हुआ था।

इनके पिता यूसुफ जी एक अकाउंटेंट थे। तो वहीं इनकी मां एक टीचर थी। मां अरे मां तुम फिल्मों में गाना क्यों नहीं गाती? तू जाग रहा है अभी। इतना अच्छा गाना सुनकर कोई सोता है? मास्टर राजू का कोई भी फिल्मी बैकग्राउंड नहीं था। लेकिन जहां ये रहते थे डोंगरी में वहां हिंदी फिल्मों के कई जूनियर आर्टिस्ट, चाइल्ड आर्टिस्ट और कास्टिंग डायरेक्टर्स रहते थे। उन दिनों मशहूर फिल्म निर्माता गुलजार साहब, अपनी फिल्म परिचय बना रहे थे। जिसके लिए उनको चाइल्ड आर्टिस्ट की तलाश थी जिसने पहले किसी फिल्म में काम ना किया हो। तो ऐसे में गुलजार साहब की तलाश मास्टर राजू के द्वार पर आकर खत्म हुई। परिवार से बातचीत की गई। लेकिन शुरुआत में परिवार ने आपत्ति जताई। लेकिन कोशिश करने पर मंजूरी मिल गई।

मास्टर राजू को ऑडिशन के लिए बुलाया गया। जहां और भी बच्चे आए थे। इसी ऑडिशन में किसी बच्चे से डांस कराया गया तो किसी बच्चे से किसी फिल्म के डायलॉग्स बुलवाए गए। लेकिन जब गुलजार साहब राजू के पास आए तो वो बड़ी मासूमियत से रोने लगे और राजू के उस ऑडिशन में रोने के बाद परिवार को लगा कि राजू अब रिजेक्ट हो गए हैं। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। दो दिन बाद गुलजार साहब का फोन गया और राजू को फिल्म परिचय में बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट चुन लिया गया। छोटे से राजू को फिल्म में बहुत पसंद किया गया था। बाबा जी। जीते रहो बेटा। जीते रहो। इस फिल्म में संजीव कुमार और जितेंद्र भी मुख्य भूमिका में थे। और इसी फिल्म में इनकी मासूमियत को देखते हुए अभिनेता संजीव कुमार ने इनका नाम मास्टर राजू रख दिया और हमेशा इसी नाम से यह पहचाने गए। आप कहां जा रहे हैं सर? हमें जाना है बेटा। कहां है? फिर कब आएंगे सर? इस फिल्म के बाद मास्टर राजू की चाइल्ड आर्टिस्ट के तौर पर लोकप्रियता बढ़ी और देखते ही देखते इन्होंने अभिमान दाग बावर्ची चितचोर अखियों के झरोखे से खट्टा मीठा जैसी लगभग 100 फिल्मों में बाल कलाकार की भूमिका निभाई। दीदी दीदी ये देखो तुम्हारे लिए खेल लाया हूं। मेरे लिए लाया है?

हां। किचन में बिल्ली एक खीर चाट गई थी। मम्मी ने कहा फेंक दूं। मैंने सोचा क्यों ना दीदी को ही दे दूं। और इन्हीं फिल्मों में से एक फिल्म चितचोर के लिए इनको इनकी जिंदगी का पहला बेस्ट चाइल्ड आर्टिस्ट के तौर पर नेशनल अवार्ड भी मिला। मतलब जब नेशनल अवार्ड मिला था उस वक्त मीडिया इतना स्ट्रांग नहीं था। 1977 में मुझे नेशनल अवार्ड मिला था। तो उस वक्त तो कहां ना कोई इंटरनेट था ना कोई पेपर में आ जाता था। मास्टर राजू का यह फिल्मी सफर यहीं नहीं रुका। समय के साथ-साथ यह भी अपने पैर हिंदी सिनेमा में जमाते चले गए। बड़े अभिनेताओं की फिल्मों में यह कैरेक्टर आर्टिस्ट के तौर पर खूब काम करते चले गए। बस वापस करके आओ, वापस करके आ। कंगन वापस करने से सब कुछ वापस हो जाएगा क्या? मार खाकर नील पड़े जो बदन पर वो भी वापस हो जाएंगे। मिट जाएंगे चोटों के निशान। और इन्होंने अपनी इसी कामयाबी में दीवार इंकार आतिश साथी नास्तिक बागी दिल जले अफसाना प्यार का वो सात दिन खुददार बलवान अनाड़ी साजन जले ससुराल आग जैसी शानदार फिल्मों में इन्होंने जबरदस्त भूमिका निभाई और काबिले तारीफ के हकदार बने। तुम रो मत दीदी। भाग गई मेरी पढ़ाई मैं नौकरी करूंगा दीदी अपने लिए नहीं तुम्हारे लिए तुम्हें तुम्हें इस नर्क से बाहर निकालने के लिए नौकरी करूंगा मैं दीदी धीरे-धीरे हिंदी सिनेमा का रंग रूप बदला और अब नए-नए कलाकार हास्य कलाकार एक्शन हीरो आए तो मास्टर राजू कहीं उस भीड़ में कुछ पीछे रह गए और ब्लैक फ्राइडे फिल्म इनकी आखिरी फिल्म बनी। अरे चल हट। नंदू। ला बच्चा दे दे मुझे। आगे आए तो बच्चे को नीचे फेंक दूंगा मैं। नंदू मैं बोल रहा हूं बच्चा दे दे मुझे। अगर आगे आए तो बच्चे को नीचे फेंक दूंगा। रुक जा। फिल्मों के बाद मास्टर राजू ने छोटे पर्दे यानी टीवी पर भी कई धारावाहिकों में काम किया।

इन धारावाहिकों में इनका सबसे लोकप्रिय टीवी शो था जय हनुमान। जिसमें मास्टर राजू ने नारायण की भूमिका निभाई थी। प्रणाम मुनिवर देवी पुंजिक स्थला स्वर्ग की अप्सरा होते हुए भी तुम्हारी आंखों में आंसू मास्टर राजू हिंदी सिनेमा में बड़े होकर बतौर एक फिल्म के हीरो की पहचान नहीं बना पाए और धीरे-धीरे यह फिल्मों से गायब हो गए। जिसका नतीजा यह हुआ कि आगे चलकर इनको कोई काम नहीं मिला। अपने कई इंटरव्यूज में यह अपनी जिंदगी के बारे में बताते हैं कि यह एक फिल्म निर्माता बनना चाहते थे और इन्होंने पंजाबी फिल्म का डायरेक्शन भी किया। फिल्म डायरेक्ट करना चाहता हूं। तो ग्रो करना चाहता हूं। अपने करियर को एक अलग दिशा में ले जाना चाहता हूं। कुछ अलग करना चाहता हूं। लेकिन कामयाबी हासिल नहीं हुई। और आज एक लंबा समय गुजर जाने के बाद मास्टर राजू गुमनामी की जिंदगी जीने को मजबूर हैं। और लाइट कैमरा एक्शन के शोर से कोसों दूर है। तो वो एक एक मिस्टेक हुई है बट नो रिग्रेट्स मतलब आदमी सीखता है और गलतियां होती रहती है। आज भले ही मास्टर राजू फिल्मों में नहीं दिखते हैं। लेकिन जब-जब पुरानी फिल्मों को लोग देखेंगे और जब उन फिल्मों में यह मासूम सा चेहरा सामने आएगा तो लोग मास्टर राजू को हमेशा याद करेंगे। ये बंबई है मेरी जान यहां झूठ के बगैर गुजारा नहीं होने का। हां। मास्टर राजू के बाद चौथा नंबर आता है 70 के दशक के एक और बाल कलाकार का। जिन्होंने हिंदी सिनेमा में कदम रखा था।

इनको हिंदी सिनेमा की कई शानदार फिल्मों में काम करते हुए देखा गया। इनका नाम था मास्टर अलंकार उर्फ़ अलंकार जोशी। साहब हम कोशिश करता है। कोई भीख नहीं मांगता। पैसे उठाकर हाथ में दो। अलंकार जोशी मशहूर अभिनेत्री पल्लवी जोशी के छोटे भाई थे। मास्टर अलंकार की हिंदी सिनेमा में साल 1975 की सुपर डुपर हिट फिल्म दीवार में अमिताभ बच्चन के बचपन का किरदार निभाकर शुरू हुई थी। विजय ये क्या हुआ? ये क्या हुआ विजय? किसने मारा तुझे? किसने मारा तुझे? बोल विजय विजय तू बोलता क्यों नहीं? फिल्म की कामयाबी ने जहां अमिताभ बच्चन को आसमान की ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया, और भरपूर लोकप्रियता दी, तो वहीं अलंकार भी खूब लोकप्रिय हुए, जिसका नतीजा यह हुआ कि इनकी फिल्मों में मांग तेजी के साथ बढ़ गई और इन्होंने कई बेहतरीन फिल्मों में काम किया। हां, फर्क है। बहुत फर्क है। और सबसे बड़ा फर्क तो यह है। और इन्हीं में से कुछ फिल्म सीता और गीता, ड्रीम गर्ल, डॉन, शोले, मजबूर, सितमगर, महबूबा जैसी फिल्मों में, यह सुपरस्टार के बचपन का रोल निभाते हुए देखे गए। एक दिन बिगड़ी किस्मत जाएगी। लेकिन चाइल्ड आर्टिस्ट हमेशा चाइल्ड आर्टिस्ट नहीं रहता है। वो बड़ा भी होता है और बड़े होने पर इन चाइल्ड आर्टिस्टों की दुनिया बदल जाती है। क्योंकि इनकी पहचान तो वही होती है बाल कलाकार की। लिहाजा फिल्म निर्माता उस तरह की फिल्मों का निर्माण नहीं करते हैं और इनको इनके हिसाब का काम मिलना बंद हो जाता है।

और धीरे-धीरे जैसे ही वह बड़े होने लगे एक ऑकवर्ड एज आ जाती है। वो बच्चे नहीं मूछे निकलने लगी। तो उस ऑकवर्ड एज में फिर काम भी बंद हो गया। ठीक ऐसे जब 90 का दशक आया तो मास्टर अलंकार को काम मिलना बंद हो गया और बड़ी मजबूरी के साथ अलंकार ने फिल्मों को अलविदा कह दिया। मां मैं मंदिर नहीं जाऊंगा। अरे ये तू कैसी बातें कर रहा है? मुझे भगवान से कुछ नहीं चाहिए। मैं मंदिर के अंदर नहीं जाऊंगा। फिल्मों से रुखसत होने के बाद अलंकार ने आईटी के क्षेत्र में अपना भविष्य देखा। तो दादा ने बहुत कोशिश की लेकिन और फिर उस वक्त फिर देन ही गॉट इनू कंप्यूटरटर्स एंड वो कुछ लैंग्वेजेस वगैरह शुरू की उसने और अपनी मेहनत के दम पर यह आज एक बड़े व्यापारी के रूप में जाने जाते हैं। इनकी आज खुद एक बहुत बड़ी आईटी कंपनी है और यह भारत देश को छोड़कर अमेरिका में बस गए हैं। सो देन ही टूक अ डिसीजन कि मैं अमेरिका चला जाऊंगा। एंड दैट्स हाउ ही लेफ्ट एंड ही जस्ट लेफ्ट एवरीथिंग। शादीशुदा जिंदगी में इनका एक बेटा और एक बेटी है। इनकी बेटी अनुजा जोशी हिंदी सिनेमा का हिस्सा हैं और वो भी ओटीटी प्लेटफार्म पर हेलो मिनी नाम की वेब सीरीज से अपना डेब्यू कर चुकी हैं। तू कभी मशहूर हो जाएगी ना और अपने गांव आएगी तो तुझे एकदम याद आ जाएगा। अरे भाई एक गोपाल हुआ करता था ना उसका क्या हुआ? तुम फौरन नगाड़ा बजाते बजाते तेरे सामने आ जाएंगे। अलंकार जोशी के बाद पांचवें नंबर पर एक और लोकप्रिय चाइल्ड आर्टिस्ट का चेहरा हम सबके सामने आता है। फूलों का तारों का सबका कहना है [संगीत] इस चेहरे को भी हम सब कई फिल्मों में देख चुके हैं। जी हां, हम बात कर रहे हैं हिंदी फिल्मों के बाल कलाकार मास्टर सत्यजीत उर्फ सत्यजीत पुरी की। फिर चाचा के खिलौने भेजे थे।

मैंने सोचा मां के इलाज के लिए मैं भी कुछ पैसे कमा लाऊं। मास्टर सत्यजीत ने हिंदी सिनेमा में अपने करियर की शुरुआत साल 1966 में आई फिल्म मेरे लाल से की थी। साइकिल लेके दोगी? हां बेटे। बहुत बड़ी सी साइकिल लेके दूंगी। एक बार मां बोल। मां। फिर बोल मां। इस फिल्म के बाद यह कई हिट और सुपरहिट फिल्मों में अभिनय करते हुए देखे गए। मेरे बाबू खिलौने ले जा तेरे नन्हे मुन्ने के सत्यजीत ने खिलौना संसार हरे रामा हरे कृष्णा शोर समाधि प्यार का रिश्ता चाचा भतीजा जैसी फिल्मों में मनमोहक अभिनय किया। नहीं सीता भाभी की कसम ये मुझे मारना चाहती थी। पे लगा रहा है। आने दीजिए। मास्टर सत्यजीत जैसे-जैसे बड़े हुए तो इन्होंने चाइल्ड आर्टिस्ट की भूमिका से बाहर निकलते हुए साइड एक्टर और कैरेक्टर रोल करना शुरू कर दिया था। और इन्हीं साइड रोल में डकैत, अर्जुन, खून भरी मांग, त्रिदेव, शोला और शबनम, हथियार जैसी हिट और सुपरहिट फिल्मों में काम किया था।

इस लड़की को बचा ले। यह मासूम है। मां बनने वाली है। तीन दिन से प्यासी है। इसे तू ही बचा सकता है। हिंदी फिल्मों में मास्टर सत्यजीत साल 2016 में सनी देओल की फिल्म घायल वंस अगेन में नजर आए थे। जब जब बड़े हम रुकते नहीं के आगे भी झुकते नहीं। सत्यजीत आज फिल्मों से जरूर दूर हैं। लेकिन यह आजकल हॉकी खेल के जादूगर मेजर ध्यानचंद के ऊपर एक फिल्म बनाने में लगे हैं। और इस फिल्म में मुख्य अभिनेता शाहरुख खान होंगे। जिंदगी और कुछ भी नहीं तेरी मेरी। सत्यजीत के बाद छठे नंबर पर आती है हिंदी सिनेमा की वो चाइल्ड आर्टिस्ट जिनको हिंदी फिल्मों में बड़ी-बड़ी अभिनेत्रियां लेना चाहती थी। मैं इतनी बड़ी यहां बैठी हूं। आप मुझसे आशीर्वाद नहीं लेंगे? इधर आइए। आप भी आइए बेटे। और इस बेहद मासूम और प्यारे से चेहरे को आपने भी कई फिल्मों में बड़े भावुक अभिनय करते हुए देखा होगा। दादी, मैं तुझे नहीं जाने दूंगी। नहीं जाने दूंगी। इन्हें जाने दो सुनीता। इस चेहरे को देखकर आपने इस बच्ची को पहचान ही लिया होगा। यह है हिंदी फिल्मों की फीमेल चाइल्ड आर्टिस्ट बेबी गुड्डू उर्फ शाहिदा बेग। पता है? आज हमारा हैप्पी बर्थडे है।

अच्छे अंकल और अच्छी आंटी ने बताया। पापा आएंगे तो उन्हें भी नहीं पता। मैं उन्हें बताऊंगी। बेबी गुड्डू के नाम से हिंदी सिनेमा में लोकप्रिय यह चाइल्ड आर्टिस्ट अपने दौर में बेहद खूबसूरत और आकर्षित चेहरा हुआ करती थी। इनको देखकर फिल्म के अभिनेता और अभिनेत्री काफी आकर्षित होते थे और अपनी-अपनी फिल्मों में उनके बचपन का रोल या फिर बेटी के किरदार के लिए इनकी फिल्म निर्माता से डिमांड करते थे। इतनी सारी चीजें अंकल अब बहुत अच्छे हैं। मैंने मम्मी से कहा था कि पापा जैसे अंकल मेरे थे। लेकिन उन्होंने कहा कि दुनिया में कोई भी अंकल तुम्हारे पापा जैसे नहीं हो सकते। बेबी गुड्डू फिल्म निर्माता एमएम बेग की बेटी थी। बेबी गुड्डू ने महज 3 साल की छोटी सी उम्र में कई बड़े-बड़े ब्रांड के एडवरटाइजमेंट करने शुरू कर दिए थे। आई लव इट फ्रेश के। स्टॉप बैड ब्रेथ फाइट टू स्टिक। एडवर्टाइजमेंट में काम करने के बाद यह साल 1984 में शशि कपूर और शर्मिला टैगोर की फिल्म पाप और पुण्य से हिंदी सिनेमा में अपना पहला कदम इन्होंने रखा।

इस फिल्म में बेबी गुड्डू का किरदार और अभिनय दोनों लोगों को खूब पसंद आए और यह बहुत जल्दी ही सिनेमा और घर-घर में प्रसिद्ध हो गई। बेबी गुड्डू दिखने में बहुत क्यूट बाल कलाकार थी। इनका अभिनय काबिले तारीफ होता था। यह अपनी एक्टिंग से बड़े-बड़े अभिनेताओं और अभिनेत्रियों को दंग कर देती थी और अपने इसी अभिनय से सजी कुछ फिल्म परिवार आज का अर्जुन औलाद नगीना घर-घर की कहानी मुलजिम जैसी लगभग 30 फिल्मों में बेबी गुड्डू ने शानदार काम किया जिसके लिए इनको आज तक याद किया जाता है। तुम्हारी भाभी भाभी तुम नहीं हो मैं भी तेरी मैं तेरी पाने वाली हूं नहीं मम्मी मैं नहीं जाऊंगा बेबी गुड्डू ने उस दौर के अमिताभ बच्चन जितेंद्र धर्मेंद्र मिथुन राजेश खन्ना शशि कपूर श्रीदेवी स्मिता पाटिल जया प्रदा रेखा शत्रुघ्न सिन्हा पूनम ढिल्लन सनी देओल जैसे सुपरस्टार स्टार्स के साथ काम किया। मेरे पापा मुझे ढूंढते होंगे। बहुत चिल्लाते होंगे। तुम लोग एक छोटे से बच्चे वाले संभाल सकते क्या? राजेश खन्ना बेबी गुड्डू को इतना पसंद करते थे कि खास बेबी गुड्डू को लेकर आधा सच आधा झूठ फिल्म का निर्माण भी कर डाला। फिल्म में इनका करियर अच्छा चल रहा था।

लेकिन 11 साल की उम्र में इन्होंने अचानक से हिंदी सिनेमा को अलविदा कह दिया और अपनी आगे की पढ़ाई करने में लग गई। इसके बाद यह नजर नहीं आई। लेकिन अब बेबी गुड्डू उर्फ शाहिदा बेग दुबई में रहती हैं और वह अमीरात एयरलाइंस में नौकरी करती हैं और अब बेबी गुड्डू 40 साल की हो चली हैं। हिंदी सिनेमा से वो हमेशा के लिए अलग हो गई हैं और अब वो कभी-कभी भारत देश आती हैं। आज भले ही बेबी गुड्डू बड़ी हो गई है लेकिन जब-जब 80 और 90 के दशक की बेबी फीमेल चाइल्ड आर्टिस्ट की बात होगी तो इनका नाम हमेशा सम्मान के साथ लिया जाएगा और याद किया जाएगा। नहीं नहीं मैं नहीं आऊंगा। मैं नहीं आऊंगा। आओ बेटे। मैं नहीं आऊंगा। मां अब बाल कलाकार की कड़ी में सातवां नंबर आता है मास्टर रवि उर्फ रवि बालीचा का। छोटू तुझे भूख लगी है? मैं अभी से कुछ खाने को लाता हूं। तू यहीं रहना। कहीं जाना मत। मास्टर रवि के इस चेहरे से तो आप परिचित होंगे ही। इनको आपने कई हिंदी फिल्मों में देखा होगा। मास्टर रवि ने अपने फिल्मी सफर की शुरुआत साल 1976 में आई फिल्म फकीरा से की थी। मत मारो बाबूजी। अरे क्या इसकी जगह तू मार खाएगा? हां बाबूजी मुझे मारो। नहीं बाबू नहीं मेरी मां भी मारो। मेरी मारो। लेकिन मास्टर रवि को उनकी असली पहचान मिली। साल 1977 में आई फिल्म अमर अकबर एंथनी से। फादर मैं कन्फ्यूजन के लिए आया हूं। यस। फादर आज मैंने अपने स्कूल की किताबें भेज दी। व्हाट? स्कूल की किताबें भेज दी। इस फिल्म में मास्टर रवि ने अमिताभ बच्चन के बचपन का रोल किया था। मास्टर रवि के अंदर एक जबरदस्त अभिनेता था।

जिसके चलते इन्होंने अमिताभ बच्चन के बचपन का रोल कई फिल्मों जैसे देश प्रेमी, कुली, शक्ति, नास्तिक, नटवर लाल में शानदार काम किया। विजय मेरे में कोई नहीं आपके होते हुए मेरे जैसे मां-बाप के उठ गया। इन फिल्मों के अलावा भी मास्टर रवि ने सीता और गीता, परिचय, रोटी, कर्ज, खुददार, यादों की बारात जैसी सुपरहिट फिल्मों में अपने अभिनय का लोहा मनवाया। घबराओ मत मामू। आज से मैं तुम्हारा दाया हाथ हूं। हम दोनों मिलकर दुनिया का बोझ उठाएंगे। अल्लाह रखा आज से कूड़ियों की हिफाजत करना हम दोनों का फर्ज है। मास्टर रवि ने हिंदी सिनेमा के अलावा कई और भाषाओं के सिनेमाओं में काम किया और लगभग 300 फिल्मों का हिस्सा बने। मां जी आप अजमेर शरीफ जा रही हैं। अगर जा रही हैं तो मेरी तरफ से ₹1 की चादर गरीब नवाज पे चढ़ा देना। और दुआ करना कि मुझे मेरे बीच में हुई मां मिल जाए। तो वहीं यह कई छोटे-बड़े टीवी सीरियल्स में काम करते हुए भी देखे गए। लेकिन कुछ समय बाद इन्होंने अपने आप को इस लाइमलाइट से दूर कर दिया। इन्होंने अहमदाबाद जाकर हॉस्पिटलिटी में एमबीए की डिग्री हासिल की और इसी क्षेत्र में आज मास्टर रवि का बहुत नाम है।

आई विल गो बैक टू एक्टिंग। आई आई एम मिसिंग। एक फिल्म इंडस्ट्री का एक कीड़ा होता है। जी। वो कीड़ा आपके अंदर से कभी जाता नहीं है। बट एज अ कैरेक्टर बट जाऊंगा जरूर। अब बाल कलाकार की लिस्ट में आठवां नंबर आता है एक ऐसे चाइल्ड आर्टिस्ट का जिन्होंने हिंदी सिनेमा में बहुत कम काम किया। लेकिन कन्नड़ फिल्मों में यह एक बड़ा नाम बने। जी हां, हम बात कर रहे हैं अग्निपथ में अमिताभ बच्चन के बचपन का किरदार निभाने वाले बाल कलाकारी मंजूनाथ की। इसीलिए मैं किया जला डाला। जला डाला पेट्रोल पंप को। क्या नाम क्या है तुम्हारा? विजय दीनानाथ चौहान। पूरा नाम। मास्टर मंजूनाथ ने भले ही हिंदी सिनेमा में उतना काम नहीं किया हो लेकिन जितनी भी हिंदी फिल्मों में उन्होंने काम किया वो सभी शानदार रही और इनका अभिनय भी किसी सुपरस्टार से कम नहीं रहा है। जब बापू गीता का पाठ पढ़ाया करते थे तो हमेशा कहते थे जो धर्म के लिए लड़ते हैं उनकी आंखों में आंसू नहीं हाथों में शस्त्र होना चाहिए। बात करें इनके फिल्मी सफर की तो इन्होंने साल 1984 में आई फिल्म उत्सव से हिंदी सिनेमा में कदम रखा। नहीं मैं ये गांव कभी नहीं भूलूंगा। एक दिन ये गांव मैं मां को जरूर दूंगा। हां जरूर दूंगा।

लेकिन हिंदी सिनेमा में इनको असली पहचान मिली टेलीविज़ सीरीज मालगुड़ी डेज से। सच कहूं तो इमेज मेरी नहीं पिताजी की है। जब मैं बाहर होता हूं वो अपने मुंह अकेलों को यहां मिलते हैं। इस सीरियल को हिंदी और इंग्लिश भाषा दोनों में बनाया गया। और इस सीरियल में काम करने और शानदार अभिनय के लिए इनको छह इंटरनेशनल अवार्ड, एक नेशनल अवार्ड और एक स्टेट अवार्ड भी मिला था। अगर नहीं थे तो उन्हें मारा क्यों गया? मेरा मतलब है अगर वो सच्चे भगवान थे तो मां मच्छी क्यों खाते थे? शराब क्यों पीते थे? आ मालगुड़ी डेज के बाद मास्टर मंजूनाथ ने एक टीवी सीरियल स्टोन बॉय में काम किया और इसके बाद ये हिंदुस्तान के घर-घर में लोकप्रिय हो गए। यू उसे क्या समझा रहे हो? मुझे समझाओ। यस, व्हाट? क्या? भैया, मम्मी ने मना किया था ना गंदे बच्चों से बात करने के लिए? मास्टर मंजूनाथ ने हिंदी सिनेमा में अग्निपथ, बेनाम बादशाह, उत्सव, विश्वात्मा जैसी कई फिल्मों में काम किया था।

हिंदी और साउथ की फिल्मों में मशहूर होने के बाद भी मास्टर मंजूनाथ ने 19 साल की उम्र में सिनेमा को अलविदा कह दिया था और अपना पूरा ध्यान पढ़ाई पर लगा दिया। और आज मास्टर मंजूनाथ बोर में एक पब्लिक रिलेशन एजेंसी को चलाते हैं कि जो भी करता हूं इन आगे वो इतना पैशन लगा के अगर किया तो सक्सेस होगा। तो दोस्तों ये थे वो बाल कलाकार जो भारतीय हिंदी सिनेमा के गुजरे गोल्डन वक्त के सुपरस्टार्स थे जो हमेशा चाइल्ड आर्टिस्ट की भूमिका में हिंदी सिनेमा की पहचान बने। एक से बढ़कर एक भूमिकाएं निभाई और अपना नाम हिंदी सिनेमा के इतिहास में दर्ज किया। नानी तेरी मोनी को मो गई बाकी जो बचा लेकिन तेजी से दौड़ती जिंदगी और बदलते सिनेमा के रंग रूप में यह कलाकार कहीं खो से गए और फिर कभी भी यह वापस लौट कर नहीं आ पाए। रोते रोते हंसना सीखो हंसते हंसते आज कुछ जिंदा है तो कुछ का जिंदगी का चिराग बुझ चुका है। बॉलीवुड नवेल इन महान चाइल्ड आर्टिस्ट को दिल से सलाम करता है। तो कुछ को भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करता है। हम तेरे तेरे तेरे चाहने वाले हैं। हम काले हैं तो क्या हुआ दिल? तो दोस्तों, यह थे 70 से लेकर 90 के दशक के कुछ लोकप्रिय चाइल्ड आर्टिस्ट जिनको हमने हिंदी सिनेमा में देखा।

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