पाकिस्तान में क्यों मिलती है मोहम्मद रफी के गाने सुनने वालों को मरने की सजा।

एक ऐसे महान संगीतकार स्वर सम्राट की जिसकी आवाज का पूरी दुनिया में वो जादू था कि इस महान गायक का गाना सुने बिना नहीं होती थी लाखों करोड़ों लोगों की खूबसूरत सुबह से उसके आए बहार जाने तो वहीं इस महान गायक की आवाज सुनते ही लोग भूल जाते थे अपनी जिंदगी के सारे दर्द और गम चाहूंगा मैं तुझे साझ सवेरे दोस्तों आज बात होगी उस शहंशाह तरन्नुम की जो मोहब्बत के पहले एहसास से लेकर बिछड़ने के दर्द तक हर एक धड़कते दिल की आवाज बना जिनके नगमों ने रोते को हंसाया और बन गए दर्द दिल का मरहम।

दर्दे दिल दर्द जिगर दिल में। दोस्तों क्या आप जानते हैं कि जब हिंदी सिनेमा का ये पार्श्व गायक संगीत में इतना डूब कर गाना गाता था कि उसके गले से निकल आता था खून और आ जाते थे आंखों से आंसू। तेरे दर पे आया हूं कुछ करके जाऊंगा झोली। दोस्तों बात एक ऐसे गायक की जिसकी शहद और मिश्री सी खुली मीठी आवाज में ऐसी कशिश थी कि जेल में की सजा पाए एक कैदी ने मरने से पहले अपनी आखिरी इच्छा में कह दिया था कि एक बार इनका गाना सुना दो फिर मुझे लटका देना के पर। ये दुनिया ये महफिल यह महान गायक भारतीय हिंदी सिनेमा के इतिहास का इकलौता ऐसा गायक था जो हर हीरो के हिसाब से उन्हीं के अंदाज में गाना गाता था। जिसकी वजह से इस गायक की आवाज और गला बन गया था। कई हीरो की जिंदगी भर की पहचान।

बहारों फूल बरसा मेरा महबूब तो वहीं उस दौर के स्टार और सुपरस्टार हिट होने के लिए अपना गाना इस गायक से गवाने को करते थे हजारों मिन्नतें। जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा। पाकिस्तान में जन्मा यह सिंगर अपनी दमदार आवाज और शानदार लहजे की वजह से कहलाया था हिंदुस्तान की धड़कन। और वहीं भारत के लिए गा दिया था ऐसा देशभक्ति गीत जिसकी वजह से इस गायक को पूरे पाकिस्तान में कर दिया गया था हमेशा के लिए बैन। कश्मीर है भारत का कश्मीर है भारत का।

अपनी गायकी से लाखों करोड़ों दिलों पर राज करने और शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचने के बाद भी यह गायक हमदर्दी मोहब्बत और शराफत की ऐसी मिसाल बना कि अपने ड्राइवर के नौकरी छोड़ने पर उसको कर दी थी महंगी चमचमाती गाड़ी गिफ्ट। खुश रहे तू सदा ये दुआ है दोस्तों और क्या आप यह जानते हैं कि इस महान गायकी की आवाज में वो जादू था कि इस दौर के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू इनका एक गाना सुनकर नहीं रोक पाए थे अपनी आंखों से आंसू और उस गाने को सुनने के बाद दे डाली थी.

इस गायक को अपनी सबसे कीमती चीज। सुनो सुनो ए दुनिया वालों बापू की ये अमर कहानी। आज बात एक ऐसे महान गायक की जिसको अपनी फिल्म में गाने के लिए उनके विरोधी भी करते थे। बड़े प्यार और इज्जत के साथ मिन्नतें। तारीफ तेरी निकली है दिल से आई है। आज बात होगी सुरों के उस शहंशाह की जिसको एक दिग्गज अभिनेता ने अपनी फिल्म में गाना गाने को लेकर लगा दी थी पाबंदी। लेकिन इस पाबंदी की गलती से उस अभिनेता का हुआ था ऐसा नुकसान कि माफी मांगते हुए उसे बदलना पड़ा था अपना वो फैसला। मैं तेरे दर पे आया हूं। कुछ करके जाऊंगा झोली भर के।

लेकिन दोस्तों क्या आप जानते हैं कि इस अभिनेता की जिंदगी में ऐसा क्या हुआ था कि 45 हजार से ज्यादा गाने गाने वाले इस लेजेंड्री सिंगर के साथ भरी महफिल में सबके सामने लता मंगेशकर ने इनके साथ कभी ना गाना गाने की खा ली थी कसम। जिसके लिए सबको छोड़ा उसी ने मेरे दिल को और एक म्यूजिक डायरेक्टर ने इनका करियर तबाह करने के लिए लगा दिया था।

एड़ी चोटी का जोर। क्या मिलिए ऐसे लोगों से जिनकी फितरत चुपी रहे। दोस्तों क्या आप जानते हैं कि कैसे इस गायक की l पर बड़े से बड़ा अभिनेता, राजनेता, बिजनेसमैन के साथ-साथ कुदरत भी आसमान से बहा रहा था आंसू। जिंदगी तो बेवफा है। और इस गायक के जनाजे में आखिरी दर्शन के लिए उमड़ पड़ी थी लाखों लोगों की ऐसी भीड़ जिसे काबू करने में छूट गए थे शासन प्रशासन के पसीने। मर के जीने की अदा जो और दोस्तों क्या आप यह जानते हैं कि इस गायक की मौत के बाद हिंदुस्तान के लोग इस गायक के कब्र से मिट्टी उठाकर खाने के लिए ले जाते थे अपने घर।

जाने वालों जरा मुड़ के देखो। दोस्तों लाखों करोड़ों लोगों के दिलों पर आज तक राज करने वाला यह सिंगर अपनी मौत के बाद तरसता रहा उस सम्मान को जो इनको कभी मिला ही नहीं। वहीं इस महान गायक जिसकी निधन के बाद रिलीज हुए एक अधूरे गाने ने तोड़ दिए थे हिंदी सिनेमा के संगीत के सारे रिकॉर्ड्स। बताएंगे और भी बहुत कुछ ऐसा जिसे सुनकर आप सभी की आंखों से निकल आएंगे आंसू। तो दोस्तों पूरा सच जानने के लिए आप बने रहिए हमारे साथ इस वीडियो के अंत तक। तेरी गलियों में ना रखेंगे कदम।

यह गायक हर दिल अजीज था। लाखों के दिलों की धड़कन था। और अपनी गायकी से मुर्दा दिलों में जान फूंक देने वाला हिंदुस्तान का पहला गायक था। अपनी इन्हीं खूबियों और लोकप्रियता की वजह से यह बना महान लेजेंड्री सिंगर मोहम्मद रफी जिन्हें सिर्फ देश ही नहीं बल्कि दुनिया ने अपनी दिलकश आवाज के जादू के रूप में जाना और पहचाना। लिखे जो खत तुझे वो तेरी याद में इस महान गायक का सितारा जितना बुलंदी पर गया उससे कहीं ज्यादा इनकी जिंदगी में उतार-चढ़ाव रहा। कौन था लाहौर की गलियों में खेलने वाला फिक्को जो आज चलकर बन गया भारत का चहीता मोहम्मद रफी। कैसे शुरू हुआ उनका संगीत का सफर? और कैसे नाई की दुकान पर काम करने वाला बच्चा एक फकीर की वजह से बन गया सुरों का बेताज बादशाह।

आपको सब कुछ बताएंगे। लेकिन उससे पहले बात करते हैं मोहम्मद रफी साहब की पढ़ाई लिखाई और उनके शुरुआती जीवन के बारे में। मेरा नाम करेगा रोशन। जग में मेरा राज नमस्कार आप सभी का स्वागत है बॉलीवुड नवेल के इस एपिसोड में। चांद मेरा दिल चांदनी हो तुम। मोहम्मद रफी साहब का जन्म 24 दिसंबर 1924 को पंजाब के कोटला सुल्तान सिंह में हुआ था। इनके पिता हाजी अली और मां अल्लाह रखी बेहद विनम्र स्वभाव के थे और बेहद इज्जतदार लोगों में गिने जाते थे।

भाई-बहनों में रफी दूसरे सबसे बड़े भाई थे। उनके अलावा भाई मोहम्मद शफी, मोहम्मद दीन, मोहम्मद इस्माइल, मोहम्मद इब्राहिम और बहनें चिराग बीबी और रेशमा बीबी थी। मोहम्मद रफी को सब प्यार से फिक को कहकर बुलाते थे। रफी साहब का परिवार बेहद रूढ़िवादी था।

मेहनत से काम करना और खुदा की इबादत करना यह हमेशा से इन्हें सिखाया गया था। नाच गाने से यह परिवार कोसों दूर रहता था। लेकिन कहते हैं ना कि पूत के पांव तो पालने में ही दिख जाते हैं। ऐसा ही कुछ उस छोटे बच्चे फिकों के साथ भी था। घर पर तमाम पाबंदियों के बाद भी फिकको यानी मोहम्मद रफी को बचपन से ही गाना सुनकर ऐसा महसूस होता था जैसे यह संगीत उन्हें अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। हालांकि उस उम्र में गायकी और शब्दों की जानकारी उन्हें नहीं थी।

बावजूद इसके जैसे ही कोई गाना उनके कानों में गूंजता वो सीधे उनके दिल से होता हुआ जुबां पर चढ़ जाता। हालांकि छोटे से रफी साहब इस बात का भी पूरा ख्याल रखते कि वो गाना कहीं उनके वालिद यानी उनके पिता ना सुन ले। इसलिए रफी साहब गाने को चुपके से गुनगुनाया करते थे। मोहम्मद रफी जब महज 9 साल के थे तभी उनका परिवार लाहौर शिफ्ट हो गया।

रफी को शुरुआत से ही पढ़ाई लिखाई में कोई दिलचस्पी नहीं थी और यही वजह थी कि उनके पिता ने उन्हें बड़े भाई के साथ खानदानी नाई की दुकान में लगा दिया। 9 साल के मासूम रफी नूर मोहल्ले के भाटी गेट की दुकान पर नाई बन चुके थे। घर वालों को भले ही मोहम्मद रफी में एक बेहतर हजाम नजर आता हो लेकिन किस्मत उनके लिए सुनहरी स्याही से तकदीर लिख रही थी। उस वक्त किसी ने भी नहीं सोचा था कि भाटी गेट पर बाल काटने वाला यह छोटा सा बच्चा जिसे आज मोहल्ले के चंद लोग ही जानते हैं। आने वाले समय में उसे पूरी दुनिया जानेगी और वो पूरी दुनिया पर छा जाएगा। सवार जन्म लेंगे।

रफी लग तो गए थे हजाम की दुकान पर लेकिन इसी बीच उनके साथ कुछ ऐसा हुआ कि जिसने उनकी आने वाली जिंदगी बदल कर रख दी। दरअसल मोहम्मद रफी जहां रहते थे वहां उनके घर के सामने से एक फकीर गाना गाता हुआ और मांगता हुआ निकलता था। जब पहली बार उस गाते हुए फकीर की आवाज इस छोटे से मोहम्मद रफी के कानों में गई तो उसे कुछ ऐसा हुआ मानो किसी ने कोई जादू कर दिया हो। फकीर की उस आवाज से रफी साहब ऐसे मंत्रमुग्ध हुए कि वह इसके पीछे-पीछे गाना सुनते हुए दूर तक निकल गए। इस घटना के बाद अब यह सिलसिला चल पड़ा।

वो फकीर आता और गाना गाता हुआ निकलता। उसके पीछे-पीछे मोहम्मद रफी भी अपने छोटे-छोटे कदमों के साथ चलते जाते। बाजार से होते हुए जब वो फकीर गांव की सरहद से बाहर निकल जाता तो मोहम्मद रफी वहीं से वापस आ जाते। यहां एक दिलचस्प बात और है कि मोहम्मद रफी सिर्फ उस फकीर का पीछा करके गाना ही नहीं सुनते थे बल्कि वापस आकर उस गाने को गुनगुनाया भी करते थे। जब वो नाई की दुकान पर बाल काटते तो उसी गाने को प्यारी सी आवाज में दोहराया करते।

जिसको सुनकर कटिंग कराने वाला व्यक्ति भी बहुत इत्मीनान से हजामत बनवाता था। सर जो तेरा चकराए या दिल डूबा जाए आजा प्यारे। बात है साल 1933 की जब पंडित जीवन लाल बाल कटवाने उनके पास पहुंचे। आदतन रफी साहब यहां काम करते हुए अमृतसर स्टाइल में वारिस शाह का हीर गुनगुना रहे थे और बाल काटते जा रहे थे। भले ही रफी साहब अभी तक एक नौसिखिया बच्चे हो लेकिन उस वक्त भी उनकी आवाज में वो जादू था कि पंडित जीवन लाल बहुत ही प्रभावित हुए। वो समझ गए कि यह बच्चा कोई मामूली बच्चा नहीं है बल्कि इसके गले में कुदरत ने अनोखी कला देकर भेजा है। जीवन लाल ने मोहम्मद रफी से बात की और उनको ऑडिशन के लिए बुलाया। हालांकि उस वक्त रफी साहब को ऑडिशन का मतलब भी ठीक से नहीं पता था हालांकि मोहम्मद रफी के लिए यह सब इतना आसान नहीं था क्योंकि उनके घर में संगीत से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था और ऊपर से रफी साहब अपनी दुकान का काम भी देखते थे।

लिहाजा रफी साहब चोरी छिपे पहुंच गए ऑडिशंस देने। लेकिन बड़ी हैरानी की बात रही कि रफी साहब इस ऑडिशन में बहुत आसानी से सफल हो गए। इसके बाद जीवन लाल ने रफी साहब को संगीत की ट्रेनिंग और पंजाबी गीत सिखाने का फैसला किया। धीरे-धीरे मोहम्मद रफी संगीत में पारंगत होते चले गए। जाने कहां मेरा जिगर जी अभी-अभी यहीं था किधर जैसे-जैसे दिन बीत रहे थे, कुदरत भी इस बाल काटने वाले छोटे से फिक्कों को सुरों का शहंशाह मोहम्मद रफी बनाने में लगी हुई थी। जीवन लाल से दुकान पर मुलाकात होने के ठीक 4 साल बाद मोहम्मद रफी साहब के लिए कुदरत ने एक बार फिर ऐसा संयोग बनाया कि इससे रफी साहब का सितारा चमक गया। लेकिन रफी साहब की आवाज का दीवाना पूरा गांव था सिवाय एक शख्स के।

जिसे यह गाना बिल्कुल पसंद नहीं था। और वह थे मोहम्मद रफी साहब के पिता जो उनके गाना गाने के खिलाफ थे। वो इन्हें इन सब चीज से दूर रहने के लिए कहते। अजी ये तो मत पूछिए। ये तो इतने खिलाफ थे। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि हमको मारते भी थे। कुछ गीत जाए इतने खिलाफ थे गाने के। लेकिन इनके बड़े भाई मोहम्मद दीन इनका सपोर्ट करते थे। बड़े भाई के एक दोस्त थे हमीद जिन्हें मोहम्मद रफी की आवाज बहुत पसंद थी। वह भी चाहते थे कि मोहम्मद रफी में जो गाने की सलाहियत और हुनर है वो उसे और निखारे। यही वजह थी कि वह अपने दोस्त के साथ मोहम्मद रफी को हर उस जगह लेकर जाते जिसका नाता संगीत से होता था।

साल 1937 की बात है जब कुदरत ने खुद रफी साहब को ऐसी जगह पहुंचा दिया जहां से उनके सपनों की खिड़की खुलती है। लाहौर में ऑल इंडिया एग्बिशन था जहां उस समय के जानेमाने सिंगर कुंदन लाल सहगल गाना गाने वाले थे। मोहम्मद दीन और उनके दोस्त हमीद भी वहां पहुंच गए। मोहम्मद रफी को साथ लेकर। लेकिन किसको पता था कि यहां एक संयोग से मोहम्मद रफी को गाना गाने का मौका मिल जाएगा। दरअसल जब कुंदनलाल सहगल गाना गा रहे थे तभी अचानक से लाइट चली गई।

चारों ओर अंधेरा फैल गया। ऐसे में उन्होंने अंधेरे में गाना गाने से इंकार कर दिया। उनके इंकार से वहां बैठे लोगों का सब्र का बांध टूट गया। दर्शक चिल्लाने लगे। शोर मचाने लगे। ऐसे में रफी साहब के भाई ने आयोजकों से बात की कि जब तक लाइट नहीं आ जाती मोहम्मद रफी गाना गा देगा। इससे लोग भी शांत रहेंगे। आयोजकों को भी यह बात पसंद आई और वो मोहम्मद रफी को गाना गाने देने के लिए राजी हो गए। बस फिर क्या था? रफी साहब चढ़ गए स्टेज पर और उन्होंने अपनी बेहद दिलकश आवाज से वो समा बांधा कि अंधेरे में मानो सुरों की शमा जल गई हो। हर कोई वाहवाह कर रहा था और यह सब कमाल था बिना माइक के क्योंकि लाइट नहीं थी।

नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है? नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में केएल सहगल को सुनने के लिए उस वक्त के बहुत बड़े म्यूजिक डायरेक्टर श्याम सुंदर भी आए हुए थे। और जब उन्होंने इस 13 साल के बच्चे की आवाज सुनी तो वह बहुत प्रभावित हुए। शो के बाद उन्होंने मोहम्मद रफी को बुलाया और उनका नाम पूछा। यहां से जाने के बाद रफी साहब श्याम सुंदर से मिलते रहे।

वो म्यूजिक भी सीख रहे थे। तो वहीं श्याम सुंदर जिन्होंने मोहम्मद रफी साहब को पहला मौका दिया। इन्हीं की मदद से मोहम्मद रफी फिल्मों में आए। जब वो 20 साल के थे तो उन्हें पहला ब्रेक गुल बलोच नाम की पंजाबी फिल्म में मिला। मैं जट पंजाब दा मेरा धरती जिसमें उन्होंने सोनिए और हीरे गाना गाया। यह वो समय था जब मोहम्मद रफी साहब छोटी-मोटी फिल्मों के साथ रेडियो पर भी गाना गाने लगे थे। आवाज मैं ना दूंगा। और उनकी लाइफ धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। रफी साहब अपने भाई के दोस्त हमीद को भी अपना बड़ा भाई मानने लगे। वो हमेशा उन्हें अच्छी सलाह दिया करते। सिर्फ भाई ही नहीं वो रफी साहब के गाइड भी बन चुके थे।

रफी साहब जब धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे तो एक बार फिर हमीद ने उन्हें एक सलाह दी। उन्होंने रफी साहब को बंबई जाने के लिए कहा। उनका मानना था कि अगर आगे बेहतर करियर बनाना है तो तुम्हें बंबई जाना चाहिए। यह साल था 1944 का। रफी साहब हमीद के साथ बंबई पहुंच गए थे और भिंडी बाजार के एक छोटे से मकान जिसे खोली कहते हैं, वहां रहने लगे। यह भी कहा जाता है कि मोहम्मद रफी साहब को एक्टर और प्रोड्यूसर नज़र ने ₹100 और एक टिकट भेजकर बंबई बुलाया था। जिसमें उन्होंने फिल्म पहले आपका गाना हिंदुस्तान के हम हैं, रिकॉर्ड किया था। इस गाने को लेकर भी एक दिलचस्प वाक्या पेश आया था जो रफी साहब का गाने के प्रति अथाह प्रेम को दर्शाता है।

हिंदुस्तान के हम है गाना देशभक्ति गीत था जिसे नौशाद ऐसे बैकग्राउंड म्यूजिक के साथ रिकॉर्ड करना चाहते थे कि जिसे सुनने वाले को ऐसी फीलिंग आए कि यह गीत खुद सेना गा रही है। इस गीत में साउंड इफेक्ट देने के लिए सभी सिंगर्स और कोरस गाने वालों को मिलिट्री वालों के जूते पहनाए गए थे। इन जूतों की आवाज से निकले साउंड को बैकग्राउंड म्यूजिक के तौर पर उस गाने में डाला गया था। लेकिन जब रिकॉर्डिंग पूरी हुई तो मोहम्मद रफी के पैरों से खून निकल रहा था। हालांकि मोहम्मद रफी के चेहरे पर शकन के बजाय एक अलग सी चमक थी और वो चमक थी।

उनके पहले हिंदी गाने की रिकॉर्डिंग पूरी होने की। हिंदुस्तान के हम है हिंदुस्तान हमारा हिंदू मुस्लिम दोनों की आंखों रवि साहब का गाने के प्रति लगन और जज्बा कमाल का था। यह बात बायोग्राफी नौशादनामा में देखने को मिलती है। फिल्म बैजू बाबरा के ओ दुनिया के रखवाले गीत को मोहम्मद रफी को बहुत ऊंचे स्केल में रिकॉर्ड करना था। गाने में कोई कमी ना रहे। इसके लिए उन्होंने कई दिनों तक घंटों रियाज किया। लेकिन जब गाने की रिकॉर्डिंग हुई तो कुछ ऐसा हुआ कि जिसने सबको हैरान कर दिया।

गाने की फाइनल रिकॉर्डिंग के बाद मोहम्मद रफी साहब के गले से खून निकल आया था और उन्हें इतनी तकलीफ हुई थी कि इसके बाद उन्होंने कई महीनों तक कोई गाना नहीं गाया। ओ दुनिया के रखवाले सुन गए। जिस तरह से रफी साहब ने इस गाने में अपना सारा दमखम लगा दिया। ठीक उसी तरह यह गाना लोगों के दिलों पर ऐसा उतर गया कि लोग इसे मरते दम तक भी याद रखते थे। ऐसा ही एक वाक्या तब पेश आया जब फांसी पर चढ़ने जा रहे कैदी ने मरने से पहले मोहम्मद रफी का गाना सुनने की फरमाइश कर दी। संगीतकार नौशाद ने एक कार्यक्रम के दौरान यह खुलासा किया। वह बताते हैं कि उनके निर्देशन में मोहम्मद रफी की आवाज में गाया गया गाना ओ दुनिया के रखवाले को एक कैदी ने पर चढ़ने से पहले आखिरी ख्वाहिश के रूप में सुनने की इच्छा जाहिर की। जेल अधिकारियों ने भी उसे निराश ना करते हुए उस कैदी की यह आखिरी ख्वाहिश पूरी करने के लिए जेल में रिकॉर्डर बजाकर पूरा गाना सुनवाया। और उसके बाद उसे फांसी दी। ओ दुनिया के रखवाले सुन दर मोहम्मद रफी और नौशाद की जोड़ी ने कुल 41 फिल्मों में एक साथ काम किया।

70 के दशक में नौशाद ने एक रेडियो इंटरव्यू में कहा था मैंने बड़े से बड़े गायक को सुरों से हटते हुए देखा है। एक तन्हा मोहम्मद रफी हैं जिनको कभी सुरों से हटते हुए नहीं देखा। रफी साहब के इस दुनिया से रुखसत होने के बाद नौशाद इतना टूट गए थे कि वो कहते थे कि रफी और मैं हमेशा एक हुआ करते थे। उनके जाने के बाद मैं सिर्फ 50% बचा रहा हूं। मैं अल्लाह से दुआ मांगूंगा कि वह रफी को इस दुनिया में सिर्फ एक घंटे के लिए दोबारा भेज दे ताकि मैं अपनी बेहतरीन संगीत रचना कर सकूं। याद ना जाए बीते दिन मोहम्मद रफी की जिंदगी अब रफ्तार पकड़ चुकी थी। 1960 में राग हमीर पर आधारित फिल्म कोहिनूर का गीत मधुबन में राधिका नाचे ने मोहम्मद रफी को गायकी की बुलंदियों पर पहुंचा दिया। मधुबन में राधिका नाचे रे नौशाद के अलावा मोहम्मद रफी शंकर जयकिशन एसडी बर्मन ओपी नयर और मदन मोहन जैसे म्यूजिक डायरेक्टर्स की पहली पसंद बन चुके थे।

अनमोल गुड़िया, शहीद, दीदार और कोहिनूर जैसी फिल्मों में बेहतरीन गाने गाते हुए रफी साहब स्टार बन गए थे। तुझे जीवन की डोर से बांध लिया है। बांध लिया है। वो ना सिर्फ एक से बढ़कर एक बेहतरीन गाने गाते जा रहे थे बल्कि सुपरस्टार दिलीप कुमार, राजेंद्र कुमार, धर्मेंद्र, शम्मी कपूर और राजेश खन्ना की आवाज भी बन गए थे। गुलाबी आंखें जो तेरी देखी शराबी ये दिल साहिब ने बुलवाया हाजिर हूं मैं आया हूं यारों का मोहम्मद रफी के गानों में मोहब्बत की सौधी खुशबू तो बखूबी मिल ही जाती है। लेकिन उनके देशभक्ति से भरे गाने सुनने पर पूरे बदन में एक बिजली सी कौंध जाती है। सरफरोश की तमन्ना अब हम और यह देशभक्ति सिर्फ उनके गानों में ही नहीं बल्कि उनके अंदर भी कूट-कूट कर भरी थी। मोहम्मद रफी का बचपन लाहौर में बीता जो पहले भारत का ही हिस्सा था। इसके बाद वो गाने के सिलसिले में मुंबई आ गए। लेकिन जब देश में पाकिस्तान के रूप में विभाजन हुआ तो उन्होंने अपनी जन्मभूमि के बजाय अपनी कर्मभूमि में रहना पसंद किया। उस समय वो उन लोगों में से एक थे जिन्होंने पाकिस्तान को चुनने के बजाय भारत को अपना घर माना। इतना ही नहीं उन्होंने अपने परिवार को भी मुंबई बुला लिया था। तू हिंदू बनेगा, ना मुसलमान बनेगा, इंसान की आल। रफी साहब अपने गानों से किसी की भी बेरौनक जिंदगी में रंग भर सकते थे। लेकिन अफसोस कि उनकी शादीशुदा जिंदगी ब्लैक एंड वाइट ही रह गई। मुझे तेरी मोहब्बत का सहारा। बंटवारे से पहले ही साल 1938 में मोहम्मद रफी की शादी बशीरा बीवी से हुई थी। जिससे उन्हें एक बेटा हुआ। लेकिन जब भारत और पाकिस्तान के बीच की आग फैली तो उसकी तपिश में मोहम्मद रफी का परिवार भी आया।

इस l में उन्होंने अपने सास सससुर को खो दिया। यह दुख आया ही था कि अब उनकी बीवी ने भारत में रहने से इंकार कर दिया। लेकिन मोहम्मद रफी साहब को तो भारत में ही रहना था। रफी साहब का फैसला सुनकर उनकी बीवी वापस लाहौर लौट गई। और ऐसे में उनका तलाक हो गया। जिसके बाद उन्होंने दूसरी शादी कर ली जिससे उनके छह बच्चे हुए। उस समय बंटवारे की आग में सिर्फ मोहम्मद रफी ने ही अपनों को नहीं खोया था बल्कि पूरा देश ही आग की तपिश में झुलस रहा था। उसी दौरान राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की गोली मारकर हत्या कर दी गई। जिससे पूरे देश में गम और गुस्सा देखने को मिल रहा था। ऐसे में राजेंद्र कृष्ण ने एक गीत लिखा जिसे हुस्न राम भगत राम ने संगीत में ढाला। लेकिन इस गीत को अमर कर दिया मोहम्मद रफी की आवाज ने। यह गाना था बापू की ये अमर कहानी। सुनो सुनो ए दुनिया वालों बापू की ये अमर कहानी। गाना जैसे ही रिलीज हुआ पूरे देश में इसकी चर्चा होने लगी। महज एक महीने के अंदर ही इस गाने के 1 मिलियन यानी 10 लाख से ज्यादा रिकॉर्ड्स बिक गए थे। यह वो समय था जब 3 मिनट 20 सेकंड की अधिकतम रिकॉर्डिंग हुआ करती थी। क्योंकि उस समय स्टोरेज की दिक्कत सामने आती थी। यह गाना 12 मिनट लंबा था। इसीलिए इसे चार पार्ट्स में रिलीज किया गया। इस गाने में मोहम्मद रफी ने वो दर्द डाला कि जिसने भी सुना वो अपने आंसू ना रोक पाया। ठीक कुछ ऐसा ही तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के साथ भी हुआ। मोहम्मद रफी का बापू पर यह गाना सुनकर उनकी आंखों से आंसू बह निकले।

नेहरू ने रफी को खासकर अपने घर बुलाकर यह गाना सुना था। लेकिन बात सिर्फ यहीं खत्म नहीं होती है। पंडित जवाहरलाल नेहरू मोहम्मद रफी के इस गाने से इतना प्रभावित हुए थे कि उन्होंने 1948 में आजादी की पहली वर्षगांठ पर उन्हें सिल्वर मेडल देकर सम्मानित किया। इतना ही नहीं देश के पहले गणतंत्र दिवस पर नेहरू ने मोहम्मद रफी को लहराओ तिरंगा गाने के लिए भी बुलाया था। नगर-नगर और टकर टकर लहराओ तिरंगा लहराओ साल 1971 में भी भारत पाकिस्तान युद्ध के दौरान एक ऐसा ही देशभक्ति से लबरेज गाना रिलीज किया गया था। रफी द्वारा गाए गए गीत कश्मीर है भारत का। कश्मीर ना देंगे को खूब सराहा गया। लेकिन यह बात पड़ोसी देश पाकिस्तान को नागवार गुजरी और पाकिस्तान ने अपने देश में मोहम्मद रफी को बैन कर दिया और यह बैन कभी नहीं हटा। लेकिन मोहम्मद रफी को प्यार और उनके संगीत से प्यार करने वाले लोग पाकिस्तान में मोहम्मद रफी के संगीत को चोरी छुपे सुना करते थे। जन्नत की है तस्वीर यह तस्वीर ना देंगे। जन्नत की है तस्वीर। रवि साहब की आवाज में वो दीवानगी थी कि जो उन्हें पल भर के लिए सुनता, वो वहीं बैठकर सारे कामकाज छोड़कर बस सुनता ही रह जाता।

उनकी मखमली आवाज कब सुनने वाले के कानों से होकर दिल में उतर जाती थी पता ही नहीं लगता था। उनके इसी गाने के मुरीद थे उनके प्रतिद्वंदी किशोर कुमार। मेरे महबूब कयामत होगी। हालांकि किशोर कुमार और मोहम्मद रफी को एक दूसरे का कड़ा मुकाबला वाला दिखाया जाता है। लेकिन असल में वो एक दूसरे के अच्छे दोस्त थे। मोहम्मद रफी में वो काबिलियत थी कि वह भारत ही नहीं बल्कि विश्व में अकेले ऐसे गायक थे जिन्होंने दूसरे प्लेबैक सिंगर को अपने स्वर दिए हैं। उन्होंने दो फिल्मों रागिनी और शरारत में किशोर कुमार के लिए गाने गाए। मन मोरा बावरा मन किशोर कुमार का मोहम्मद रफी के प्रति प्रेम और आदर का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक शो के दौरान जिसमें रफी और किशोर दोनों शामिल थे। किसी फैन ने किशोर कुमार से ऑटोग्राफ देने का अनुरोध किया।किशोर ने रफी की तरफ इशारा करते हुए कहा अरे मेरे से क्यों ऑटोग्राफ ले रहे हो बंधु? संगीत तो उधर है। मेरी दोस्ती मेरा प्यार मेरी दोस्ती। मोहम्मद रफी के गानों में एक से बढ़कर एक विविधता और अनोखापन होता था। वो शास्त्रीय संगीत, रोमांटिक गाने, दुखी गाने, खुशी वाले पैपी गाने, देशभक्ति वाले गीत, रॉक एंड रोल, डिस्को नंबर्स, भजन, शब्द और कबाली से लेकर नातिया कलाम तक हर तरह के गीत गाने के माहिर थे। हमें काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं। हमें काले हैं तो क्या हुआ दिल? इन सब से बढ़कर उनमें एक ऐसी काबिलियत थी जो उन्हें बाकी सिंगर्स से अलग बनाती थी। दरअसल मोहम्मद रफी हिंदी सिनेमा के इकलौते ऐसे गायक थे जो फिल्म की सिचुएशन, एक्टर के हावभाव और म्यूजिक डायरेक्टर की सोच को मिलकर अपने गाने में उतार देते थे।

वो ऐसे गायक थे जिन्हें इस चीज की समझ थी कि स्टेज पर गाने और फिल्मों में गाने के बीच क्या अंतर है। उन्हें पता था कि फिल्मों में दर्शक ऐसा महसूस करते हैं कि यह गाना एक्टर ही गा रहा है। इसीलिए वो इस बात का ख्याल रखते कि यह गाना किस एक्टर पर फिल्माया जाना है। क्या हुआ तेरा वादा वो कसम एक बार तो अभिनेता शमी कपूर उनका एक गाना सुनकर इतना हैरान हो गए कि उन्हें लग रहा था कि यह गाना उन्हीं ने गाया है। चांद सा रोशन चेहरा जुल्फों का रंग सुनहरा ये झील सी नीली आंखें। हालांकि एक किस्सा और मशहूर है जब अभिनेता ऋषि कपूर ने अपनी फिल्म में मोहम्मद रफी से गाना गवाने को लेकर इंकार कर दिया था। दरअसल उन दिनों किशोर कुमार बेहद हिट गाने दे रहे थे और बड़े सुपरस्टार के लिए गाने गा रहे थे। ऋषि कपूर को भी लगता था कि किशोर कुमार से गाना गवाना उनके लिए बेहतर रहेगा। तो वहीं दूसरी ओर वजह यह भी थी कि यह ऋषि कपूर को पता था कि मोहम्मद रफी ने कपूर खानदान की पीढ़ी पृथ्वीराज कपूर, राज कपूर और शम्मी कपूर के लिए गाना गाया है।

ऐसे में उनकी आवाज इन पर फिट नहीं बैठती। इसीलिए उन्होंने पूरा जोर लगा दिया कि उनके गाने में मोहम्मद रफी की आवाज ना हो। लब पे दुआएं आंखों में आंसू दिल में हो। यह वो समय था जब अमिताभ एंग्री यंग मैन बनकर उभर रहे थे। उनकी एक्शन मूवी धमाल मचा रही थी। [संगीत] ऐसे में ऋषि कपूर की फिल्म लैला मजनू के सामने बड़ी चुनौती थी। क्योंकि यह एक म्यूजिक लव स्टोरी थी। इस फिल्म के डायरेक्टर हरनाम सिंह रवेल ने मदन मोहन को म्यूजिक डायरेक्टर के रूप में चुना। मदन मोहन उस समय का वो नाम थे जो फ्लॉप फिल्मों में भी हिट संगीत दे रहे थे। हरनाम सिंह ने जब मदन मोहन को लेने का फैसला किया तो उन्होंने दो शर्तें रखी। पहली यह कि उनके गाने साहिल लुधियानवी लिखेंगे और दूसरी शर्त यह कि इसे सिर्फ और सिर्फ मोहम्मद रफी गाएंगे। लेकिन फिल्म के हीरो ऋषि कपूर की सोच कुछ और थी। उन्होंने कहा कि सब जगह किशोर कुमार ही छाए हुए हैं। ऐसे में गाने उन्हीं से गवाने चाहिए। लेकिन मदन मोहन साहब नहीं राजी हुए। जिसके बाद इस फिल्म में मोहम्मद रफी साहब की एंट्री हुई। तू सब कुछ जाने है, हर गम पहचाने हैं। जो दिल की उलझ फिल्म जब रिलीज हुई तो रफी साहब के सारे गाने यादगार बन गए। इन गानों ने ऐसा जादू किया कि आगे चलकर मोहम्मद रफी साहब ने ऋषि कपूर के लिए कई गानों में आवाज दी।

पर्दा है पर्दा, पर्दा है पर्दा। पर्दे के इसके बाद ऋषि कपूर मोहम्मद रफी के मुरीद हो गए। रफी साहब के मरने के बाद ऋषि कपूर उन्हें याद करते हुए धन्यवाद देते हैं और कहते हैं कि मैं उनका हमेशा शुक्रगुजार रहूंगा। हम तो चले परदे हम परदेसी हो गए। रफी साहब के फिल्मी गानों में भले ही एक से बढ़कर एक विविधता और उतार-चढ़ाव हो लेकिन निजी जिंदगी में वो बेहद नेक दिल, विनम्र, कम बोलने वाले और जमीन से जुड़े हुए व्यक्ति थे। उनकी नेक दिली का सबूत उनके ड्राइवर के एक किस्से से सामने आता है। मोहम्मद रफी साहब लग्जरी गाड़ियों के बेहद शौकीन थे। उन्होंने अमेरिकी कार इमाला खरीदी थी। यह राइट हैंड ड्राइव वाली वो कार थी जो भारत में चंद लोगों के पास ही थी। रवि साहब के ड्राइवर को यह कार समझने में बड़ी दिक्कत आ रही थी। जिसके लिए वो नया ड्राइवर ढूंढने लगे। हालांकि इस बीच उन्हें इस बात की भी फिक्र थी कि उनके पुराने ड्राइवर सुल्तान का घर कैसे चलेगा।

जब मोहम्मद रफी ने नया ड्राइवर रखा तो अपने पुराने ड्राइवर को ₹000 की टैक्सी खरीद कर दी ताकि वो अपना घर चला सकें। खुश रहे तू सदा ये दुआ है रफी साहब की यह दरिया दिल्ली सुल्तान के काफी काम आई। आगे चलकर इस ड्राइवर को उस टैक्सी से इतना फायदा हुआ कि एक समय सुल्तान के पास 12 टैक्सियां मौजूद थी। रफी साहब में शोहरत का घमंड दूर-दूर तक ना था। वो राह चलते किसी भूखे को देखते तो घर लाकर खाना खिला देते। कोई नंगे पैर होता तो उसे अपने जूते दे देते थे। यह कुछ ऐसी बातें थी जो सामने आ सकीें। रफी साहब ऐसे बहुत से लोगों की मदद उन्होंने चोरी छुपे की कि उनके घर वालों तक को इसकी खबर ना होती थी। एक इंसान हूं। मैं तुम्हारा ऐसा ही एक किस्सा उनकी मृत्यु के बाद सामने आया। मोहम्मद रफी साहब की मौत के कुछ दिनों बाद एक फकीर उनके घर आया और रफी साहब से मिलने की जिद करने लगा। जब लोगों ने बताया कि अब वह इस दुनिया में नहीं है तो फकीर फूट-फूट कर रोने लगा। उसने बताया कि रफी साहब उसे हर महीने खर्च के लिए कश्मीर भेजते थे। इस बार जब पैसे नहीं आए तो उसे किसी अनहोनी की आशंका सताने लगी क्योंकि रफी साहब कितने भी व्यस्त क्यों ना हो वो उसे खर्च जरूर भेजते थे। रफी साहब के सेक्रेटरी ने इस बात की पुष्टि करते हुए बताया कि रफी साहब बिना किसी को बताए कई लोगों का घर चलाया करते थे। परदेियों से ना अंखियां मिलाना। पर रवि साहब इतने मिलनसार थे कि उनके विरोधी भी उनसे जलन नहीं रख पाते थे। लेकिन उनकी जिंदगी में एक वाक्या ऐसा गुजरा जो उनकी सफेद पन्ने सी जिंदगी में एक स्याही की छींट जैसा नजर आने लगा। दरअसल साल 1961 की फिल्म माया के गाने, तस्वीर तेरी दिल में की रिकॉर्डिंग के दौरान स्टूडियो में लता मंगेशकर और रफी साहब के बीच गायकों की रॉयल्टी को लेकर ऐसी बहस छिड़ गई कि फिर उन दोनों ने अपने-अपने रास्ते अलग कर लिए।

हम भूल गए रे हर बार मगर तेरा प्यार नहीं। उस समय एक्टर्स को रॉयल्टी मिलती थी। ऐसे में लता ने इंडस्ट्री में सभी सिंगर्स की आवाज उठाते हुए उनके लिए भी रॉयल्टी की मांग कर दी। हालांकि मोहम्मद रफी ने इस बात का सपोर्ट नहीं किया। इसके बाद रफी साहब ने लता से कहा कि अब वो उनके साथ गाना नहीं गाएंगे। रफी साहब की यह बात सुनकर गुस्से की तेज लता ने जवाब में कहा आप क्या मेरे साथ गाना नहीं गाएंगे? मैं खुद कभी आपके साथ गाना नहीं गाऊंगी। इस घटना के बाद दोनों ने ना ही साथ में गाना गाया और ना ही कोई मंच साझा किया। दिन जो पखेरू होते पिंजरे में मैं हालांकि साल 1967 में रिलीज हुई फिल्म ज्वेल थीफ के गाने दिल पुकारे आरे आरे आरे को लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी ने अपनी सुरीली आवाज दी और दोनों फिर एक साथ नजर आए।

यह झगड़ा तब खत्म हुआ जब संगीतकार जय किशन के कहने पर रफी साहब ने लता से चिट्ठी लिखकर माफी मांगी। दिल पुकारे आ रे आ रे आ रे लता मंगेशकर के अलावा ओपी नयर के साथ भी उनकी तनातनी का किस्सा मशहूर है। संगीतकार नौशाद के अलावा ओपी नयर भी मोहम्मद रफी के बहुत करीब थे। लेकिन ओपी नयर वक्त के बहुत पाबंद थे और एक निश्चित समय पर अपने रिकॉर्डिंग स्टूडियो का दरवाजा बंद कर देते थे। हालांकि रफी साहब भी समय के बहुत पाबंद थे लेकिन एक बार उन्हें आने में 1 घंटे की देरी हो गई। आते ही उन्होंने माफी मांगते हुए कहा। मैं शंकर जयकिशन की रिकॉर्डिंग में फंस गया था। रफी साहब का यह जवाब नयर को पसंद नहीं आया। उन्होंने चिढ़कर जवाब दिया।

आपके पास शंकर जयकिशन के लिए समय था। ओपी नयर के लिए नहीं। आज से ओपी नयर के पास रफी के लिए समय नहीं रहेगा। इसके बाद रिकॉर्डिंग रद्द कर दी गई और अकाउंटेंट से कहा गया कि वह रफी का हिसाब कर दे। रफी साहब में जरा भी घमंड नहीं था। वो सब कुछ भुलाकर 3 साल बाद नयर के घर चले गए। रफी को अपने घर देखकर ओपी नयर जितना हैरान हुए, उतना ही खुश भी थे। उन्होंने कहा रफी यहां आकर तुमने सिद्ध कर दिया है कि तुम ओपी से कहीं बेहतर इंसान हो। तुमने अपने अहम पर काबू पा लिया जो मैं नहीं कर सका। गम उठाने के लिए मैं तो जिए जाऊं। रफी साहब जितना गाने के शौकीन थे, उतना ही अच्छा खाने के भी। एक शो के लिए वह ब्रिटेन के कोवेंट्री गए थे। यहां खाना रफी साहब की पसंद का नहीं था तो उनका मिजाज खराब हो गया। इत्तेफाक से लंदन में उनकी बेटी भी रहती थी। रफी साहब ने अपने बेटे और बहू से पूछा कि लंदन यहां से कितना दूर है? जवाब मिला सिर्फ 3 घंटे। इतना सुनते ही उन्होंने अपनी बेटी यासमीन को फोन घुमा दिया और पूछा कि क्या तुम घंटे भर में दाल, चावल और चटनी बना सकती हो? जब जवाब हां में आया तो रफी साहब फौरन निकल गए लंदन की ओर। यहां उन्होंने भारतीय खाना खाया और दोबारा शाम 7:00 बजे तक ब्रिटेन वापस लौट आए। लोगों ने जब इसका कारण जाना तो हर कोई हैरान रह गया। रवि साहब फिल्मी दुनिया के वो तानसेन थे जिन्होंने दुनिया को यह बताया कि प्लेबैक सिंगिंग होती क्या है? या यह कहना बेहतर होगा कि उन्होंने प्लेबैक सिंगिंग को एक नई पहचान दी। रफी साहब को अपने करियर में 14वीं का चांद हो तुम। तेरी प्यारीप्यारी सूरत को चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे। बहारों फूल बरसाओ। दिल के झरोखे में तुझको बिठाकर और क्या हुआ तेरा वादा गीत के लिए कुल छह फिल्म फेयर अवार्ड मिले। यहां मैं अजनबी हूं।

मैं जो हूं बस। 1977 में आई फिल्म हम किसी से कम नहीं के एक गीत क्या हुआ तेरा वादा के लिए रफी को पहली बार सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला। क्या हुआ तेरा वादा वो कसम रफी साहब ने कड़ी मेहनत के दम पर अपनी पूरी जिंदगी संगीत को समर्पित कर दी। लेकिन रफी साहब जब वो गाना यम्मा यम्मा रिकॉर्ड कर रहे थे उन्हें भी नहीं पता था कि यह उनकी जिंदगी का आखिरी गाना होगा। मशहूर म्यूजिक कंपोजर आर डी बर्मन बताते हैं कि मुझे याद है एक गाना जो गाया था रवि साहब के साथ वो यम्मा यम्मा। इस गाने की जिस दिन रिकॉर्डिंग हो रही थी उस दिन मेरा गला थोड़ा खराब सा था। तो रफी साहब ने कहा कोई बात नहीं आज शूटिंग जरूरी है तो गाना मैं गा दूंगा और फिर रफी साहब ने शूटिंग के लिए गा दिया। शूटिंग हो गई। अमिताभ बच्चन शशि कपूर के ऊपर पिक्चराइज हो गया यह गाना सब कुछ बढ़िया हो गया। जब रिकॉर्ड रिलीज का समय आया तो रफी साहब मुझसे बोले बर्मन भाई मैंने दोबारा रिकॉर्डिंग होगी यह सोचकर बेसुरा गा दिया है तो चलो अच्छे से रिकॉर्डिंग कर लेते हैं। फिर मैंने कहा हां जरूर और हमने एक डेट फिक्स की लेकिन आरटी बर्मन को क्या पता था कि जिंदगी में वो होने वाला था जो शायद ही किसी ने सपने में सोचा था। दरअसल गाने की वो डेट आने से बहुत पहले दुख भरी खबर आ गई कि मोहम्मद रफी साहब अब इस दुनिया में नहीं रहे।

उनकी के बाद फिर उनका वो गाना अधूरा रह गया और इस गाने को जैसे का तैसा ही फिल्म में रिलीज किया गया और यह गाना ही मोहम्मद रफी की आखिरी आवाज बना इस फिल्म में। यम्मा यम्मा यम्मा यमा है खूबसूरत समा 12 दिसंबर 1980 को फिल्म शान रिलीज हुई थी लेकिन उससे पहले ही 31 जुलाई 1980 को ही भारतीय हिंदी सिनेमा की सुरीली आवाज हमेशा के लिए खामोश हो गई कर चले हम फिदा जानत साथियों अब तुम यूं तो फिल्म शान के लगभग सभी गाने हिट हुए थे। लेकिन यमा यम्मा उस दौर की पार्टीज की शान बन गया था और इस गाने ने खूब धूम मचाई। रफी साहब के निधन से कुछ दिन पहले ही कोलकाता से कुछ लोग उनसे मिलने पहुंचे। यह लोग चाहते थे कि रफी साहब काली पूजा के लिए भजन गाएं। हालांकि उस समय रफी साहब की तबीयत थोड़ी नासाज थी। लेकिन उन्होंने इन लोगों को निराश नहीं किया। जिस दिन रिकॉर्डिंग थी उस दिन उनके सीने में काफी दर्द हो रहा था। लेकिन उन्होंने किसी को कुछ नहीं बताया और गाना गाने के लिए पहुंच गए। वो दिन उनकी जिंदगी का आखिरी दिन था। 55 साल की उम्र में हार्ट अटैक से उनका निधन हो गया। जिंदगी तो बेवफा है। रफी साहब की मौत की खबर आग की तरह पूरी दुनिया में फैल गई। जिसने भी सुना उसको यकीन नहीं हुआ। जिसने भी सुना वो अपने आंसुओं को भी नहीं रोक सका। हर तरफ हर कोई गमगीन था।

जिसे पता चलता उसे अपने कानों पर यकीन नहीं होता। लेकिन भगवान की मर्जी के आगे भला किसकी चली है। भारतीय फिल्म उद्योग के इतिहास में पहली बार मोहम्मद रफी के सम्मान में दो दिन का शोक घोषित किया गया। मुंबई की मूसलाधार बारिश के बावजूद मोहम्मद रफी के इंतकाल की खबर आग की तरह फैल चुकी थी। जो भी इस खबर को सुनता उसी हाल में दौड़ा दौड़ा बांद्रा स्थित उनके घर रफी विला की ओर दौड़ा चला जाता। कुछ ही देर में रफी विला के सामने लाखों की तादाद में लोग इकट्ठा हो गए। बारिश इतनी तेज हो रही थी कि चारों ओर सिर्फ छाते ही छाते नजर आ रहे थे। ऐसा लग रहा था कि मानो कुदरत भी आवाज के जादूगर के इस तरह से दुनिया छोड़ने पर गमगीन नजर आ रही है। घर के हॉल जहां रबी साहब का शरीर रखा था वो फिल्मी दुनिया के लोगों से खचाखच भर गया था। घर के बरामदे में रफी साहब को लटाया गया। हमेशा मुस्कुराते रहने वाले रफी साहब का शरीर बेजान होने के बावजूद मुस्कुरा रहा था। किशोर कुमार मोहम्मद रफी के पैरों को पकड़ कर जोर-जोर से रो रहे थे।

तलत महमूद, राखी, हेमलता, सुलक्षणा पंडित हर एक की आंख से आंसू रुक नहीं रहे थे। और आखिरकार शाम पौ:45 बजे रफी साहब को सांता क्रूस पश्चिम स्थित कब्रिस्तान में सुपुर्दे खाक किया गया। मंदिर में मस्जिद में तू और तू ही है ईमानों में। अब लोगों का चहेता गायक उनके बीच नहीं था। कई दिनों तक तो लोग इस बात पर यकीन ही नहीं कर पाए कि अब उन्हें मोहम्मद रफी की जादुई आवाज नहीं सुनाई देगी। जिंदाबाद जिंदाबाद ऐ मोहब्बत जिंदाबाद। हालांकि अब मोहम्मद रफी उनके बीच नहीं थे तो उनके चाहने वाले उनकी कब्र तक पहुंचने लगे। आज भी मोहम्मद रफी के कई फैंस ऐसे हैं जो उनकी कब्र पर आते हैं और मिट्टी उठाकर ले जाते हैं। इनमें से कुछ तो ऐसे भी हैं जो कब्र की मिट्टी खा भी लेते हैं। यह बात यह दर्शाती है कि मोहम्मद रफी अपने चाहने वालों के बीच क्या अहमियत रखते थे। आज भले ही मोहम्मद रफी हम सबके बीच ना हो लेकिन उनके द्वारा गाए गए तकरीबन 4000 से ज्यादा गीत आज भी लोगों को उनके पास होने का एहसास दिला जाते हैं। रवि साहब आज भले ही इस दुनिया में नहीं रहे हैं लेकिन उनका संगीत और गीत हमेशा उनको जन्मों जन्मांतर तक जिंदा रखेंगे। लोग बदलेंगे, दौर बदलेगा, युग बदलेगा। लेकिन मोहम्मद रफी की आवाज हमेशा सुनी जाएगी एक पीढ़ी से लेकर दूसरी पीढ़ी तक और ऐसे महान गायक को बॉलीवुड नवेल की पूरी टीम इस संगीत सम्राट को दिल से श्रद्धांजलि देती है। तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे। दोस्तों, यह तो था महान गायक मोहम्मद रफी साहब की जिंदगी का वो रंग रूप जिसको हमने आपके सामने रखा। दोस्तों, हमने इस वीडियो को बनाकर मोहम्मद रफी के नाम पर जो धूल सी जम गई थी, उसे हटाने का काम किया है। मोहम्मद रफी की आवाज हमेशा लोगों के दिलों में जिंदा रहेगी। आज भले ही संगीत की दुनिया का पूरा रंग रूप बदल गया हो लेकिन जो दौर मोहम्मद रफी किशोर कुमार मुकेश लता मंगेशकर आशा भोसले अनुराधा पौडवाल कुमार शानू उदित नारायण अलका याग्निक कविता कृष्णमूर्ति और सोनू निगम का रहा है। वो दौर कभी वापस नहीं आएगा।

यह उस अमर युग के संगीत के वह योद्धा हैं जिनकी जगह शायद ही कभी हिंदी सिनेमा में भर पाएगी। तू इस तरह से मेरी जिंदगी में शाम दोस्तों आप मोहम्मद रफी जी की जिंदगी को लेकर क्या सोचते हैं? मोहम्मद रफी साहब को

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