हिंदी सिनेमा में अगर किसी एक शख्स के लिए स्टाइल आइकॉन शब्द का इस्तेमाल किया जा सकता था तो वो थे देवानंद दिल तोरा जाने किस पे आएगा झुकझुक कर चलना अपने एक अलग अंदाज में बोलना गले में स्कार्फ और सर पर एक बड़ी सी कैप ये थे देवानंद देवानंद साह यह कहते थे कि वह भारतीय सिनेमा के लिए ता उम्र जवान रहेंगे और इसे वह साबित भी कर गए कंपटीशन जो है मेरे खुद से है
जैसे कि बचपन की जरूरत से ज्यादा संकोच करने की आदत को इनके पिता ने कैसे छुड़वाया ऐसे महज ₹ लेकर अपने करियर की शुरुआत करने वाला धर्मदेव पिशोरी मल बन गया हम सबका सदा बहार सुपरस्टार देवानंद इसमें मेरे बहुत से कपड़े हैं इसे रखकर अगर कहीं से 10 का इंतजाम हो सके तो देवानंद साहब जो कभी महज चंद पैसों के लिए अंग्रेजों की चिट्ठियां पढ़ने का काम करते थे उनकी जिंदगी किस एक चिट्ठी को पढ़कर एकदम से पलट गई दद ना ठिकाना जमी से बेगाना फल वैसे तो आपको पता ही होगा कि बॉलीवुड की सबसे अच्छी लव स्टोरी देवानंद और सुरैया की कही जाती है तो आखिर ऐसा क्या हुआ कि बॉलीवुड की सबसे मशहूर लव स्टोरी इनकंप्लीट लव स्टोरी बनकर ही रह गई और फिर जब देवानंद साह अपने जीवन के एक पढ़ाव पर जीन तमान से प्यार किया तो उसमें किसने भांजी मार दी
देवानंद का जन्म 26 सितंबर 1923 को गुरदासपुर शहर पंजाब में हुआ इनके पिता का नाम पिशोरी मल आनंद था जो कि पैसे से एक वकी थे मां का नाम रजनी आनंद था जो कि एक कुशल ग्रहणी थी देवानंद के जन्म के कुछ ही दिनों बाद इनका परिवार लाहौर चला गया तो लाहौर के ही सरकारी कॉलेज से इन्होंने अपनी पढ़ाई लिखाई पूरी की वहीं पर उन्होंने अंग्रेजी साहित्य से बीए किया वैसे देवानंद का असली नाम धर्मदेव पिशोरी मल आनंद था उन्हें साहित्य पढ़ना और फिल्में देखना बहुत पसंद था मैं एक लड़का हूं ये आप क्या करें आप लड़का कैसे हो सकती है वो अक्सर रद्दी वाले की दुकान पर जाते और उससे पुरानी पत्रिकाएं लेकर पढ़ा करते थे लाइ टू बिग फ कपल ऑफ नहीं समझे .
पंडित जी रोज-रोज पत्रिकाएं खरीद कर लाने से दुकान वाले से अच्छी दोस्ती हो गई थी दुकानदार उनके लिए अक्सर उनके आने से पहले पत्रिकाएं छाट कर रख लेता था दोस्ती इतनी अच्छी हो गई थी कि कभी कदार वह दुकान दार इन्हें पत्रिकाएं मुफ्त में दे दिया करता था इसी दौरान उस पत्रिका वाले की दुकान पर देवानंद ने सुना कि फिल्म बंधन की शूटिंग के लिए अशोक कुमार उस समय उनके शहर में आ रहे हैं देवानंद साहब को फिल्में देखने का तो शौक था ही और उस समय के सबसे मशहूर हीरो अशोक कुमार को प्रत्यक्ष आंखों से देखना उनके लिए किसी सपने से कम नहीं था सो बगैर देर करे देवानंद साहब पहुंच गए अपने चहते हीरो अशोक को कुर को देखने के लिए पर जब देवानंद साहब वहां पहुंचे तो देखा भारी भीड़ है लोग ऑटोग्राफ लेने के लिए उतावले खड़े हैं देवानंद साहब दूर खड़े होकर बस देख रहे थे और भारी भीड़ में बगैर ऑटोग्राफ लिए वह चुपचाप घर चले आए शायद ही उस समय किसी को पता हो किय शर्मीला लड़का एक दिन खुद सबको ऑटोग्राफ देगा कोई हमें प्यार कर ले समय धीरे धीरे गुर रहा था देवानंद के सभी दोस्त पढ़ने के लिए इंग्लैंड जा रहे थे उनका भी मन विदेश में पढ़ाई करने का था पर घर की माली हालत ठीक नहीं थी पिताजी उन्हें विदेश नहीं भेज सके जो मिल गया उसी तो मुकद्दर समझ लिया जो खो गया मैं उसको बुलाता चला गया फिर देवानंद साहब ने य नेवी में जाने का मन बना लिया उन्होंने खूब मन लगाकर तैयारी की पर दुर्भाग्य के वस उनका सिलेक्शन नहीं हो सका.
अब देवानंद साहब बहुत टूट गए थे उन्हीं दिनों उनकी मां बीमार रहने लगी उन्होंने मां की खूब सेवा की तुम्हारी आवाज है ये तुम्हारा ही स्पर्श है तुम आ ग मेरे लाल पर ऊपर वाले की मर्जी के बिना कहां कुछ हो सकता है देवानंद की मां जिसे वह सबसे ज्यादा चाहते थे व बीमारी के चलते उन्हें छोड़कर चली गई अब देवानंद अकेले पड़ गए थे मन मेरे सुन मेरा कहना काफी सोच विचार के बाद उन्हें जब कुछ सुझा नहीं दिया तो वह सीधे बम्बे चले आए पर जेब में सिर्फ ₹ थे और दिल में अशोक कुमार की तरह एक एक्टर बनने की ख्वाहिश है किसी तरह एक चौल में रहने के लिए जगह मिली दिन भर स्टूडियो स्टूडियो चक्कर लगाते और शाम को थक हार कर उसी चाल में वापस आ जाते कौन है तेरा मुसाफिर जाएगा कहां जहां एक छोटे से कमरे में तीन लोग रहा करते थे उस एक फ्लोर में 20 लोग रहते और उन 20 लोगों के बीच में एक वॉशरूम हुआ करता सुबह उठते ही उस भरी दोपहरी में काम की तलाश फिर शुरू कर देते कई दिन स्टूडियोज के चक्कर लगाने के बाद भी काम मिलने की कोई उम्मीद नहीं थी देवानंद साहब अब हताश हो रहे थे काम की जद्दोजहद के बीच घर से लाए हुए ₹ अब खत्म हो गए थे पैसों की तलाश में जब उन्होंने अपने कपड़े के बैग में खोजना शुरू किया तो उन्हें उसमें कुछ नहीं मिला बस मिला तो उनके बचपन में बनाया हुआ स्टार्म कलेक्शन का एल्बम बचपन के शौक पर पेट की भूख भारी पड़ रही थी उन्होंने वह एल्बम बेच दिया उन्हें उस एल्बम के ₹ मिले अगर कहीं से इंतज हो सके तो अब उन ₹ को लेकर स्टूडियो के चक्कर लगाते साथ ही साथ कुछ और भी काम तलाश करते दरवाजे दरवाजे चक्कर लगाने के बाद उन्हें एक जगह ₹ महीने की एक क्लर्क की नौकरी मिल गई पर कुछ ही दिन बीत पाए थे कि यह नौकरी भी उनके हाथ से जाती रही इसकी वजह थी कि उनका हाथ गणित में तंग था और फिर शुरू हो गई नए काम की तलाश और इसके बाद उन्हें ब्रिटिश सेंसर ऑफिस में काम मिल गया यहां इनका काम था कि सेना के अधिकारियों के लिखे पत्र पोस्ट से पहले पढ़ने का ब्रिटिश सरकार अपने सेना के अधिकारियों के पत्रों को भी सेंसर रखते थे जिससे कि कोई भी खुफिया जानकारी बाहर ना जा पाए.
हालांकि ज्यादातर पत्र वह होते थे जो जवान अपनी पत्नी और प्रेमिकाओं को लिखते इस काम में देवानंद साहब को खूब मजा भी आता और इस म रंजक काम के देवानंद साहब को 165 महीना मिलते वैसे देव साहब के लिए यह रकम उनकी जरूरतों से कहीं अधिक थी पर कुछ ही समय बाद देवानंद साहब को यह लगने लगा कि वह अपने पैसों के आगे सपनों को क्यों भूल रहे हैं उन्हें अब यह लगने लगा था कि वह इस पत्र को पढ़ने के चक्कर में सिर्फ एक सरकारी बाबू ही तो बनकर रह गए हैं ही उलझनों के बीच उनके सामने एक ऑफिसर का पत्र आया जो उस ऑफिसर ने अपनी पत्नी को लिखा था पत्र में लिखा हुआ था कि काश मैं अपनी नौकरी छोड़ सकता तो मैं सीधे तुम्हारे पास तुम्हारी बाहों में होता खद में लिखी वो कास वाली लाइन देवानंद के मन में घर कर गई देवानंद साहब को उस खत के माध्यम से एक नई उड़ान मिल गई.
देवानंद ने अगले ही दिन वो नौकरी छोड़ दी और निकल पड़े हीरो बनने और उसी दौरान वह जब लोकल ट्रेन में सफर कर रहे थे तो किसी को बात करते हुए सुना कि प्रभा फिल्म कंपनी अपनी आने वाली फिल्म के लिए एक सुंदर लड़के की तलाश कर रही है फिर क्या था देवानंद साहब सब कुछ छोड़कर अगले ही दिन पहुंच गए प्रभात फिल्म कंपनी वहां उनकी मुलाकात कंपनी के मालिक बाबूराव पाई से हुई और बाबूराव पाई देवानंद के बेबाक बात करने के अंदाज से बेहद प्रभावित हुए और देवानंद से चलते वक्त कहा कि आज तुम जाओ कल आकर डायरेक्टर पीएल संतोषी से मिल लेना और अगले ही दिन देवानंद साहब बेहद ऊर्जा के साथ पीएल संतोषी से मिलने पहुंच गए पीएल संतोषी देवानंद की पर्सनालिटी से बहुत प्रभावित हुए और पीएल संतोषी साहब ने तुरंत देवानंद को 3 साल के कांट्रैक्ट पर प्रभात फिल्म स्टूडियो का हिस्सा बना लिया.
इस बैनर के तले उनकी पहली फिल्म आई हम एक हैं यह फिल्म वैसे कुछ ज्यादा कमाल तो नहीं कर पाई यह भी कोई चोट है आप उस गरीब किसान का ख्याल कीजिए जो बेचारा कितने प्रेम से फूलों का हार लेकर पर इस दौरान उन्हें 00 महीना मिलता था अब उस छोटे से चौल में रहने वाले देवानंद साहब ने अपना घर बना लिया था तेरे घर के सामने एक घर बनाऊंगा प्रभात स्टूडियो जहां कई लड़के अपनी किस्मत आजमाने आते कुछ की चलती तो कुछ रह जाते वैसे प्रभात स्टूडियो के बगल में ही एक छोटी सी लौंडी थी जहां देव साहब अक्सर अपने सूट टू लवाते थे एक दिन जब वह अपना सूट लेने पहुंचे तो उनका सूट वहां से गायब था ल्री वाले ने बोला कि आपका सूट धोखे में किसी और के पास चला गया है देव साहब उस दिन बगैर सूट के सिर्फ शर्ट पैट में ही स्टूडियो पहुंच गए वहीं पर उन्हें स्टूडियो में ही एक लड़के पर नजर पड़ी और देवानंद साहब उसे देखकर आश्चर्य चकित थे क्योंकि उसने वही सूट पहना था जो देवानंद साहब का लॉन्ड्री से गायब हो गया था देवन तुरंत उस लड़के के पास पहुंच गए और बोले हेलो लड़के ने भी बड़े अनमने अंदाज में हेलो बोलकर जवाब दिया देव साहब ने फिर कहा यार तुम्हारे कपड़े तो बहुत अच्छे लग रहे हैं कहां से लिया फिर उस लड़के ने झकते हुए कहा यार ये मेरे कपड़े नहीं है लेकिन किसी को बताना नहीं आज मैं ल्री में जब अपने कपड़े लेने गया.
तो मैंने ल्री वाले को चकमा देकर उसे धोखे से यह सूट ले आया मैं उसे ये सूट कल वापस कर दूंगा देव साहब उसकी सच्चाई से बहुत खुश हुए देव साहब बोले यह कपड़े मेरे हैं मेरा नाम देवानंद है और तुम्हारा फिर वह लड़का बोला मेरा नाम गुरुदत्त है देव साहब ने फिर पूछा क्या करते हो गुरुदत्त ने जवाब दिया असिस्टेंट कोरियोग्राफर हूं देव साहब ने हंसते हुए बोला यहां पर बनने क्या आए हो जवाब मिला मैं डायरेक्टर बनना चाहता हूं फिर क्या था इन्हीं सभी बातचीत के साथ-साथ देव और गुरुदत्त एक अच्छे दोस्त बन गए फिर देवानंद साहब ने गुर्दतपुरा दत साहब ने बड़े भरोसे भरे अंदाज में बोला कि जब कभी भी मैं अपनी पहली फिल्म डायरेक्ट करूंगा तो उसमें तुम्हें हीरो रखूंगा कहते हैं देवानंद साहब ने अपना वादा निभाया अपनी प्रोडक्शन में जब देवानंद साहब ने पहली फिल्म बाजी बनाई तो डायरेक्टर गुरुदत्त थे बिगड़ी तकदीर बना ले तकदीर बना.
हालांकि गुरदित साहब ने अपना वादा क्यों नहीं निभाया यह तो नहीं पता हां गुरुदत्त साहब ने देवानंद को लेकर सीआईडी फिल्म बनाई लेकिन उसे अपने असिस्टेंट राज घोसला से डायरेक्ट करवाया ही आंखों में इशारा हो गया बैठ बैठ जीने का देव साहब समय के साथ-साथ लगातार हिट फिल्में दे रहे थे अरे मैं पथर को मोम कर उस समय जाल काला पानी सीआईडी काला बाजार हम दोनों गाइड जैसी न जाने कितनी सुपरहिट फिल्में देव साहब ने दी सभी महिला प्रधान फिल्में थी और उन सभी फिल्मों में उस समय की जानी मानी एक्ट्रेस हुआ करती थी हमने बहुत तुझको छुप छुप के देखा 1948 में फिल्म विद्या में देवानंद साहब ने उस समय की सबसे महंगी और मशहूर एक्ट्रेस और सिंगर सुरैया के साथ काम किया उन दिनों सुरैया शिखर पर थी कहते हैं उन दिनों सुरैया की कमाई साल में ₹ लाख के करीब थी जो उन दिनों की एक बहुत बड़ी रकम थी पर देवानंद साहब उन दिनों नवोदित कलाकार थे.
जब फिल्म की शूटिंग के दौरान डायरेक्टर ने देवानंद का परिचय कराते हुए बोला कि यह फिल्म के हीरो हैं और इनका का नाम देवानंद है डायरेक्टर साहब आगे कुछ कह पाते कि देवानंद साहब ने अपना परिचय खुद ही दे दिया यहां सभी लोग मुझे देव कहकर पुकारते हैं आप क्या कहेंगी सुरैया बोली देव ही कहूंगी देव साहब लगातार सुरैया को देखे जा रहे थे फिर क्या था सुरैया को टोकना ही था सुरैया ने बोला क्या देख रहे हो देव साहब बोले आप में कुछ है पर बाद में बताऊंगा मैं कह दूं तुमको चोर तो बोलो तो बोलो क्या करोगे छोटी सी मुलाकात के बाद दोनों शूटिंग में बिजी हो गए लेकिन यह मुलाकात शायद कई मुलाकातों और उसके बाद एक गहरे रिश्ते में तब्दील हो रही थी दोनों ने एक दूसरे के नाम भी रख दिए थे देवानंद साहब सुरैया को नोजी कहते थे और सुरैया देव साहब को स्टीव कहक पुकारती थी हती हुई.
जवानी एक दिन विद्या फिल्म की शूटिंग चल रही थी शूटिंग के दौरान पानी के सीन में नाव पलट जाती है सुरैया सही में डूबने लगती हैं देव साहब तुरंत कूदकर सुरैया की जान को बचा लेते हैं सुरैया कहती हैं कि देव आज तुमने मेरी जान बचा ली वरना आज मैं नहीं बचती देव साहब ने बड़े रोमांटिक अंदाज में कहा कि अगर आपको लगता है कि मैंने आपकी जिंदगी बचाई है तो बाकी की जिंदगी आप मेरे नाम कर दीजिए इधर सुरैया के घर वालों को यह पता लग गया था कि देवानंद साहब ने सुरैया की जान बचाई इस नाते देवानंद के सुरैया के घर वालों से भी अच्छे संबंध हो गए थे अक्सर देवानंद साहब को घर पर खाने के लिए बुलाया जाता सुरैया अपनी मां मामा और नानी के साथ रहती थी पर जब नानी को सुरैया और देवानंद के रिश्ते के बारे में पता लगा तो वह इसके सख्त खिलाफ थी नानी को यह बिल्कुल मंजूर नहीं था कि सुरैया की शादी किसी गैर धर्म के लड़के से से हो यह 1950 का समय था जब देवानंद और सुरैया ने साथ में सनम और जीत फिल्म साइन की लेकिन पूरी शूटिंग के दौरान नानी हमेशा साथ में रहती देवानंद और सुरैया खाली वक्त में एक दूसरे से बात भी नहीं कर सकते थे अब दोनों के बीच में बातचीत होती तो सिर्फ खतों के जरिए सारे खतों का आदान प्रदान सुरैया के ही मित्र और एक्ट्रेस दुर्गा खोटे और कामनी कौशल करते एक दिन शूटिंग के दौरान नानी को किसी काम से घर जाना पड़ा देवानंद तुरंत सुरैया के मेकअप रूम में घुस आए.
करीब 45 मिनट तक देवानंद सुरैया से बात करते रहे देवानंद साहब ने सुरैया के सामने शादी का प्रस्ताव रखा और एक हीरे की अंगूठी उन्हें दी पर यह सारा वाक्य यह सारी कहानी जब सुरैया की नानी को पता लगी तो वह गुस्से से आग बबूला हो गई उन्होंने वह अंगूठी सुरैया से छीन ली और उसे समुद्र में फेंक दिया देवानंद साहब चाहते थे कि सुरैया हिम्मत करें और परिवार वालों का विरोध करें पर सुरैया ऐसा नहीं कर सकी देव साहब सुरैया को बुला नहीं पा रहे थे वे अंदर ही अंदर टूट गए थे फिर देव साहब ने बाजी फिल्म की इस फिल्म की अभिनेत्री थी कल्पना कार्तिक बिग ई तकर ब और फिर न जाने क्या ऐसा हुआ कि उन्होंने कल्पना कार्तिक से विवाह कर लिया भले ही परिवार के दबा में सुरैया देवानंद से विवाह नहीं कर पाई पर देवानंद के प्यार में सुरैया ने आजीवन विवाह किया ही नहीं कल्पना कार्तिक और देवानंद की शादी का किस्सा भी बड़ा मजेदार है कल्पना को बाजी के बाद अन्य बैनर के तले फिल्में ऑफर हुई कल्पना ने किसी और बैनर के तले फिल्में करने से मना कर दिया कहा कि मैं सिर्फ अब फिल्में करूंगी तो देवानंद साहब के साथ ही करूंगी देवानंद साहब को कल्पना कार्तिक का अंदाज बहुत पसंद आया और जब अगली फिल्म टैक्सी ड्राइवर देवानंद और कल्पना कार्तिक ने साथ-साथ की तभी शूटिंग के दौरान देवानंद साहब ने कल्पना कार्तिक से कहा मैं तुमसे शादी करना चाहता हूं रता है .
जमाने की निगाहों से भला कल्पना तो पहले से ही तैयार थी उन्होंने तुरंत हां कर दी और दोनों ने फिल्म की शूटिंग में ब्रेक के दौरान ही शादी कर ली ब्रेक के दौरान ही पंडित को बुलवाया गया और दोनों विवा बंधन में बन गए जीवन कीर से बांध लिया है हालांकि शादी के कुछ सालों बाद दोनों का पारिवारिक जीवन कुछ बहुत अच्छा नहीं रहा वरिष्ठ पत्रकार पीटर अली जॉन देवानंद के अच्छे दोस्त और एक बहुत बड़े फैन थे वे लिखते हैं कि देव मुझसे कहते थे कि काश हमारी कहानी का अंत कुछ और होता काश हम और सुरैया मिल पाते पर ऐसा हो ना सका जन्म हमें कई कई बार जॉन साहब उन दिनों स्क्रीन सस्था में कार्यरत थे और स्क्रीन ने सुरैया को लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड देने का फैसला किया सुरैया को आना था तो सुरैया ने जॉन के सहयोगी पिरोज से पूछा क्या आज देवानंद साहब भी आएंगे तब पिरोज ने कहा कि देवानंद साहब स्क्रीन के किसी भी समारोह को कभी मिस नहीं करते जिंदगी के उजाले तुम्हारी मोहब्बत यही सभी को लग रहा था कि आज देवानंद साहब भी आएंगे देवानंद ने अपने दोस्त जॉन से कहा कि जॉन यह सब अच्छा नहीं लगेगा.
मैंने 40 सालों से उसे नहीं देखा है ना आज तक फोन में बात की है जॉन इस बार रहने दो हम दोनों ही इसे सहन नहीं कर पाएंगे देवानंद साहब नहीं गए रो मत मरेंगे एक साथ कर वादा करता हूं पर बाद में जब वो जॉन साहब से मिले तो पूछते हैं सुरैया कैसी दिख रही थी कैसी साड़ी पहनी हुई थी सुरैया क्या सुरैया ने बालों में फूल लगाए हुए थे शायद यह सभी प्रश्न बता रहे थे कि सुरैया को देवानंद साहब आज भी भूल नहीं पाए हैं फिर एक समय वह आया जब सुरैया की मौत हुई सुरैया की अंतिम यात्रा उठ रही थी सभी की आंखें सिर्फ देवानंद साहब को ढूंढ रही थी पर देवानंद साहब नहीं पहुंचे वो अपनी टेरेस पर अकेले पूरा दिन बैठे रहे उनकी आंखों में बस आंसू थे और शायद यह गाना उन्हीं पर यथार्थ होता है कि मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया इधर देवानंद साहब लगातार कामयाबी के घोड़े पर सवार थे वो लगातार हिट फिल्में दे रहे थे नफरत करने वालों के सीने में प्यार भर दू कहते हैं कभी ₹ लेकर लाहौर से मुंबई आया लड़का धर्मदेव से जब देवानंद बना तो उसने अपनी पहली फिल्म के बाद ही अपने प्रोडक्शन हाउस नौ केतन बैनर की स्थापना की इस दौर में वह एक अच्छे लेखक निर्देशक निर्माता और एक अच्छे अभिनेता के रूप में खुद को साबित किया .
मगर जब तक उनकी इन सभी फिल्मों के बीच गाय फिल्म का नाम नहीं आएगा तब तक देवानंद का फिल्मी सफर अधूरा रह जाएगा वैसे यह फिल्म उनकी ही नहीं पूरे भारतीय सिनेमा की माइल स्टोन कही जाती है वैसे आपको बता दें कि आज हम जिस गाइड फिल्म की गिनती भारत की सर्वकालिक फिल्मों में करते हैं वह फिल्म देव साहब ने पहले अंग्रेजी में बनाई इ कन अब य आरंग हर ऑफ ट यह फिल्म अंग्रेजी में बुरी तरह फ्लॉप रही फिर इसे हिंदी वर्जन में बनाया गया और फिर जो हुआ वह इतिहास बन गया आज फिर जीने की तमना है आज फिर मरने का इरादा है गाइड फिल्म को वर्ल्ड की टॉप 100 मूवीज में कंसीडर्ड किया जाता है कहीं बीते ना ये रातें कहीं बीते ना ये दिन इसे 38 वें ऑस्कर अवार्ड के लिए भारत की तरफ से चयन किया गया दिन ढल जाए हर रात फिल्मों के साथ ही देवानंद नेशनल क्रश बन गए थे उनकी काली कमीज अनगिनत हसीनाओं की आह का सबब बनती जा रही थी कहते हैं मीडिया में कई सालों तक य बाद फैली रही कि देव साहब इतने खूबसूरत थे कि उन्हें काली शर्ट में लड़कियां देखकर बेहोश हो जाती थी इसलिए कोर्ट ने उन्हें काली शर्ट पहनने पर रोक लगा दी थी.
हालांकि यह बात सच नहीं थी थी मगर हम यह कह दें कि बेबुनियाद थी तो यह भी सच नहीं है पुलिस की जांच पड़ताल से जो नतीजा निकला है असल वाक्या यह है कि ओपरा हाउस में काला बाजार फिल्म का प्रीमियर था देवानंद साहब काले सूट में दाखिल हुए उन्हें देखने के चक्कर में बहुत लड़कियां गिरते-गिरते बची अगर वह गिर जाती तो शायद मर भी सकती थी मैं अदालत के सामने साबित करूंगा कि सच्चाई क्या थी और इसी के बाद से यह मित चल पड़ा कि कोर्ट ने देवानंद साहब को काले कपड़े पहनने के लिए मना कर रखा है और लोग आज भी इस बात को सच समझते हैं वैसे देव साहब ने इस बात का खंडन खुद अपनी आत्मकथा में किया वैसे तो देवानंद साहब ने जिन फिल्मों में काम किया वह सुपर डुपर हिट रही पर आपको जानकर हैरानी होगी कि जिन फिल्मों को देवानंद साहब ने छोड़ा वह भी सुपर डुपर हिट रही देवानंद साहब को 1961 में जंगली और 1966 में तीसरी मंजिल फिल्म में मुख्य अभिनेता के लिए चुना गया पर देवानंद ने अपनी व्यस्तता के कारण इन फिल्मों में काम करने से मना कर दिया और यह फिल्में देवानंद की जगह मिली सम्मी कपूर साहब को और सम्मी कपूर यहीं से सुपरस्टार बन गए.
इसी तरह 1970 में जंजीर फिल्म सबसे पहले देवानंद साहब को ऑफर हुई और उनके मना करने के बाद यह फिल्म मिली अमिताभ बच्चन को और इस फिल्म के बाद अमिताभ बच्चन जी का डूबता कैरियर एकदम से परवान चढ़ गया था देवानंद साहब को फिल्म मेकिंग का जुनून था वे लगातार निर्देशन निर्माण में लगे रहते उन्हें फिल्मों में हमेशा नए प्रयोग करने की ललक बनी रहती इसी तरह उन्होंने एक और फिल्म बनाई जिसका नाम था हरे रामा हरे कृष्णा यह एक हिप्पी कल्चर की फिल्म थी देवानंद हरे रामा हरे कृष्णा के लिए एक हीरोइन की तलाश में थे हरे कृष्णा हरे राम हरे कृष्णा हरे राम हरे कृष्णा हरे रा जो फिल्म में उनकी बहन का किरदार निभा सके देवानंद साहब की फिल्म में सभी बड़ी से बड़ी हीरोइन काम करने को तो तैयार थी पर कोई भी देवानंद की बहन नहीं बनना चाहता था इस रोल के लिए तैयार हुई जीनत अमान लो का तारों का सबका कहना है एक हजारों में मेरी बहना है और हरे रामा हरे कृष्णा फिल्म के रिलीज के बाद जीनत की प्र सद्दी में चार चांद लग गए थे इस फिल्म की शूटिंग के दौरान देव साहब और जीनत में नजदीकियां बढ़ गई थी.
दोनों के अफेयर की चर्चाएं भी बॉलीवुड में खूब गर्म थी देव साहब ने भी कई इंटरव्यू में कहा कि वह जीनत से प्यार करने लगे थे एक पार्टी के दौरान वे अपने प्यार का इजहार करने जा रहे थे उसी दौरान जीनत ने देव साहब को इग्नोर किया और राज कपूर के साथ ज्यादा समय बिताने लगी तब राज साहब जीनत को लेकर सत्यम शिवम सुंदरम फिल्म बना रहे थे देवानंद साहब ने यह सब देखकर अपने कदम पीछे खींच लिए वैसे आपको बता दें कि देवानंद साहब उस समय शादीशुदा थे पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले देव साहब की पूरे जीवन भर एक रोमांटिक इमेज रही कहते हैं कि फिल्मों में ही नहीं असल जिंदगी में भी वे बेहद रोमांटिक थे जाऊ मैं दूर तुझसे उतनी ही तू पास लेकिन बचपन में देवानंद साहब इतने संकोची और सरमले थे कि लड़कियों को देखकर घबरा जाते थे आज मालूम होता है साथ आने की नियत नहीं नियत तो ठीक थी साथ नहीं आ उनका परिवार उनकी इस आदत से बेहद परेशान हो गया था तब उनके पिता ने देवानंद साहब की घबराहट को दूर करने के लिए एक तरीका ढूंढ निकाला देव के पिता ने उन का एडमिशन गर्ल्स स्कूल में करा दिया ये तमाशा करना जरूरी है जो खुद तमाशा बन गए वो तमाशा क्या करें देव साहब कई सालों तक गर्ल्स स्कूल में ही पढ़ते रहे धीरे-धीरे उनकी झिझक शर्मीला पन और संकोच जाता रहा देवानंद साहब को लेकर एक बहुत चर्चित किस्से की बात हमेशा होती है यहां उस किस्से की बात ना हुई तो देवानंद की बात अधूरी रह जाएगी यह उस समय की बात है जब भारत के स्वर्णम काल में आपात का का काला अध्याय जुड़ गया था तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 को आपातकाल की घोषणा कर दी पूरा देश आग की लपटों में जल रहा था.
कहते हैं उस समय की सरकार बॉलीवुड के अभिनेताओं को सरकार की प्रशंसा करने पर मजबूर कर रही थी जिनमें से देवानंद साहब किशोर कुमार साहब मनोज कुमार साहब जैसे अभिनेताओं ने सरकार के आदेशों का पालन करने से इंकार इ कर दिया था मैं मर जाऊंगा लेकिन यहां से हिलंग नहीं उचा वैसे सरकार का विरोध करने पर इन सभी अभिनेताओं को इसके दुष्परिणाम भी भुगतने पड़े इन सभी कलाकारों के गानों को ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन पर प्रतिबंधित कर दिया गया और उनकी फिल्मों की शूटिंग पर लगातार बाधा डाली जाने लगी पर इसका परिणाम यह भी हुआ कि देवानंद ने 14 सितंबर 1979 में ने ल पार्टी ऑफ इंडिया के नाम से खुद की एक पार्टी बना डाली इस पार्टी का मुख्यालय व सांता राम के मुंबई परेल स्थित राजकमल स्टूडियो को बनाया गया हालांकि इसका सक्रिय संचालन देवानंद साहब अपने दफ्तर से ही करते इस पार्टी में देवानंद के भाई विजयानंद वी शांताराम जीपी सिप्पी श्रीराम बोरा आईएस जोहर रामानंद सागर शत्रुगन सिन्हा धर्मेंद्र मा मालिनी और संजीव कुमार जैसे कई बड़े सितारे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए थे पार्टी की रैलियों में हुजूम उठता था और यह सब देखकर मुख्य धारा की पार्टी की परेशानियां बढ़ने लगी थी सब कुछ ठीक चल रहा था.
लेकिन तभी कांग्रेस के बड़े नेताओं ने जीपी सिपी और रामानंद सागर जैसे असरदार फिल्मी हस्तियों को यह नसीहत दी चुनाव के बाद होने वाली मुश्किलों का अगर फिल्म उद्योग से बचाना है तो यह सब तमाशे वे सभी फिल्म उद्योग की हस्तियां बंद कर दें धीरे-धीरे देव साहब की पार्टी में सक्रीय फिल्मी कलाकार किनारा करने लगे देव साहब लगभग अकेले रह गए और देवानंद के पास लगभग पांच-छह सप्ताह का समय ही बचा था क्योंकि चुनाव लगभग कुछ ही दिनों बाद था उन्हें लगा सब इतने कम समय में नहीं हो सकता देवानंद साहब को लगा कि मैं जिस चीज के लिए बना हूं मुझे वही करना है और वह अपनी फिल्मी दुनिया में फिर लौट गए और वहीं से समाज को सुधार ने की कोशिश करते रहे आप कर सकते हैं मैं भी कर सकता हूं लेकिन मेरी मां ने मुझे बड़ों का आदल करना सिखाया उनकी फिल्में हमेशा समाज को कुछ ना कुछ प्रेरणा देकर जाती फिर चाहे वह फिल्में फ्लॉप हो जाएं या सुपर डुपर हिट हो जाए और उम्र के आखिरी पड़ाव तक वो फिल्म बनाते रहे उनकी आखिरी फिल्म चार्ज सीट थी वे उस समय 88 साल के थे मैं मिनी का गला घोट कर उसकी जान भी ले सकता था तो फिर हम यह मान ले कि आप भी शक के दरे में और 88 साल की उम्र में भारतीय सिनेमा का यह सितारा हमें छोड़कर चला गया उन्होंने हमेशा समय से आगे सोचा और समय से आगे की फिल्में बनाई आज की इस उथल-पुथल जिंदगी में भी अगर हम जब भी खाली बैठकर देवानंद साहब की फिल्में देख लेते हैं आज भी हमारा मन मानो बसंत की बहार में चला जाता है.
