अरावली पर केंद्र सरकार का बड़ा फैसला आया है और बताया जा रहा है अब से कोई नया खनन पट्टा जारी नहीं होगा। अरावली पर आप देख रहे हैं इतने दिनों से लगातार विवाद चल रहा था और अब केंद्र सरकार ने इस पूरे विवाद पर यह बड़ा फैसला दिया है। एनवायरमेंट मिनिस्ट्री ने कहा है कि अब कोई भी नया खनन पट्टा अरावली की पूरी रेंज पर जारी नहीं होगा।
कोई भी नई माइनिंग लीज़ जारी नहीं होगी। एनवायरमेंट मिनिस्ट्री का यह फैसला आ गया है। अभी तक के जो वहां पर माइनिंग चल रही है, उसको भी लेकर स्पष्ट कर दिए गए हैं प्रावधान और वो यह हैं कि जो माइनिंग अभी चल रही है, उनको सख्त से सख्त तरीके से जितने भी प्रोटोकॉल हैं खासकर पर्यावरण को लेकर उनको फॉलो करना होगा। लगातार एक हफ्ते से अरावली को लेकर यह कंट्रोवर्सी चल रही थी और उस पर यह अब यह फैसला आया है। इसकी कुछ लाइन है जो आदेश आया है उसको मैं आपको पढ़कर सुनाता हूं। अ इसमें साफ-साफ लिखा है कि पूरे जो अरावली लैंडस्केप है उसकी इंटीग्रिटी को प्रोटेक्ट करने के लिए यह फैसला लिया जा रहा है। क्योंकि अरावली का ये विवाद सिर्फ पर्यावरण का नहीं रह गया था। यह तमाम सांस्कृतिक अरावली की रेंज के आसपास जो लोग रहते हैं उनकी सांस्कृतिक धरोहर भी इससे जुड़ गई थी। इसीलिए इससे संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार का यह फैसला आया है। इसके अलावा यह भी कहा है सरकार ने कि अरावली के पास फॉरेस्ट्री रिसर्च एंड एजुकेशन आईसीएफआरई इनका काम होगा कि वो अरावली की पूरी रेंज पर जितने भी राज्यों से होकर अरावली की पहाड़ियां गुजरती हैं। वहां पूरी रेंज पर जाकर यह देखें कि कहां-कहां कुछ लूप होल्स बाकी हैं जिनका फायदा उठाकर अरावली को नुकसान पहुंचाया जा सकता है। किसी भी तरीके से माइनिंग के लिहाज से या अलग-अलग तरीकों से। तो यह निर्देश दिए गए हैं। इसकी भी रिपोर्ट कुछ दिन में केंद्र सरकार के पास होगी। तो ये दो-तीन बड़े पॉइंट हैं। बड़े फैसले हैं जो अरावली को लेकर आज केंद्र सरकार ने लिए हैं। अभिषेक जो ये वीडियो पहली बार देख रहे हैं उन्हें अगर थोड़ा बैकग्राउंडर बता दिया जाए। बरावली की जब डेफिनेशन तय की जाती है, उस डेफिनेशन को सुप्रीम कोर्ट भी एक्सेप्ट करता है। उसके बाद से अगर कुछ पॉइंटर्स बताते हैं।
अरावली पर सुप्रीम कोर्ट का जो फैसला था वो एक लाइन में यह था कि अब उन स्ट्रक्चर्स को ही पहाड़ी माना जाएगा जिनकी ऊंचाई 100 मीटर या उससे ज्यादा होगी। इसके बाद इस पर विवाद शुरू हुआ था। यह आशंका जताई गई थी कि यह फैसला आने के बाद अह खनन को बढ़ावा मिलेगा। अशोक गहलोत ने कहा था कि अवैध खनन के लिए यह एक किस्म का रेड कारपेट होगा। उसी के बाद सारे राज्यों में जहां-जहां से अरावली पर्वतमाला होकर गुजरती है वहां पर यह प्रोटेस्ट शुरू हुआ था।
कहां से गुजरती है ये भी बता देते हैं। ये चार राज्यों को कवर करती है। गुजरात, राजस्थान, दिल्ली और हरियाणा। पूरी रेंज जो है वो 692 कि.मी. की है। तीन भागों में बंटी हुई है। जरगा, हर्षनाद और दिल्ली। अलग-अलग राज्यों से गुजरते हुए अरावली की ये श्रंखला दिल्ली तक भी आती है। जो आप दिल्ली में तमाम बड़े सरकारी स्ट्रक्चर देखते हैं। यह अरावली के तमाम रेंज में ही बने हुए हैं। अब वो वैसी पहाड़ स्ट्रक्चर्स नहीं है क्योंकि उनका काफी हद तक समतलीकरण हो चुका है।
इन सारी बातों के बाद यह कंट्रोवर्सी जो पिछले एक हफ्ते से आप अलग-अलग रिपोर्ट्स में देख रहे हैं। हमारे यहां अभी आपने उस पे तमाम कवरेज देखी। वो सब छिड़ा हुआ था। हालांकि एक दिन पहले इस पर भूपेंद्र यादव का बयान भी आया था। उन्होंने कहा था कि 22 दिसंबर की शाम को प्रेस कॉन्फ्रेंस की कहा था कि कुछ लोग गलत प्रचार कर रहे हैं कि 100 मीटर का मतलब पहाड़ी के ऊपर से नीचे तक की खुदाई की अनुमति है। यह भी कहा था कि अगर दो पहाड़ियां 500 मीटर के दायरे में है तो बीच का क्षेत्र भी अरावली रेंज का हिस्सा होगा।
यह भी आश्वासन दिया था कि दिल्ली एनसीआर में कोई माइनिंग की अनुमति नहीं होगी और नई परिभाषा आने का यह मतलब नहीं है कि इसके बाद 100 मीटर से छोटी रेंज के जो स्ट्रक्चर्स हैं जिनको परिभाषा के मुताबिक पहाड़ी नहीं माना जा रहा है उनको खनन के लिए बिल्कुल खुला छोड़ दिया जाएगा और कमोबेश इसी बात को आगे बढ़ाते हुए अब आज केंद्र सरकार का यह फैसला आया है जो हमने आपको बताया बिल्कुल और जब से अरावली की डेफिनेशन तय हुई थी .
तब से लगातार बवाल हो रहा था उसी बीच भूपेंद्र यादव जो पर्यावरण मंत्री हैं उनकी सफाई आती है और उसके बाद केंद्र सरकार का यह फैसला है कि अब से कोई भी खनन पट्टा जारी नहीं होगा और जो पहले से खनन चल रहा है वहां पर भी एनवायरमेंट की जो सुरक्षा से जुड़े प्रोटोकॉल्स हैं उन्हें फॉलो किया जाएगा।
