सुप्रीम कोर्ट का फरमान, दूसरे धर्म में शादी करने पर बेटी को नहीं मिलेगी पिता की संपत्ति।

अगर दूसरे धर्म में शादी की तो नहीं मिलेगी पिता की संपत्ति। इसी सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा फैसला सुनाया है जिससे भारत भर के वसीयत यानी विल मामलों में नया सिद्धांत बन सकता है। इस विवाद में पिता ने अपनी बेटी को समुदाय से बाहर शादी यानी इंटरफेथ मैरिज करने केकारण वसीयत से बाहर रखा था।

अब अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि वसीयत कानून के मुताबिक विधिवत साबित हो जाती है तो किसी एक उत्तराधिकारी को उससे बाहर करना अपने आप में ना तो अवैध है और ना ही संदिग्ध। यह फैसला जस्टिसएहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने सुनाया।

जिसमें एक पिता द्वारा अपनी बेटी को समुदाय से बाहर शादी करने के कारण संपत्ति से वंचित करने का सवाल सीधे सुप्रीम कोर्ट के सामने था। सुप्रीम कोर्ट ने साफ बताया कि अगर एक वसीयत कानूनी रूप से सही तरीके से तैयार है और साक्ष्यों से साबित हो जाती है तो उसे केवल इसलिए गलत नहीं माना जा सकता कि किसी उत्तराधिकारी को छोड़ दिया गया है। भले ही वह उसीपरिवार की बेटी ही क्यों ना हो।

कोर्ट ने यह भी कहा कि पिता की इच्छा को अदालत बदल नहीं सकती। इस पूरे विवाद की नींव 1988 में पड़ी जब एन एस श्रीधरन ने 26 मार्च 1988 को एक रजिस्टर्ड वसीयत तैयार की और अपनी नौ संतानों में से आठको संपत्ति का वारस बनाया। जबकि बेटी शायला जोसेफ को पूरी तरह से बाहर कर दिया क्योंकि उसने दूसरेधर्म में शादी की थी। 1990 में शायला के भाइयों ने उसके खिलाफ इंजंक्शन सूट दायर की। यानी अदालत से यह आदेश मांगा कि शायला संपत्ति पर कोई दावाया हस्तक्षेप ना कर सके औरकि शला इस मुकदमे में ना तो पेश हुई और ना ही उसने कोई जवाब दाखिल किया इसलिए अदालत ने एक्स पार्टी फैसला सुना दिया।

मतलब एक पक्ष की गैर हाजिरीमें केवल सामने वाले मौजूद पक्ष की दलीलों के आधार पर निर्णय दे दिया। कई वर्षों बाद 2011 में शायला ने स्थितिपलटते हुए पार्टीशन सूट दायर किया और पिता की संपत्ति में अपने लिए बराबर हिस्सेदारीयानी 1/9 भाग की मांग की और वसीयत को चुनौती भी दी। ट्रायल कोर्ट और बाद में केरल हाईकोर्ट ने शायला के पक्ष में फैसला दिया। दोनों अदालतों ने भाइयों द्वारा पेश की गई वसीयत को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि वह कानूनी रूप से पर्याप्त सबूतों से सिद्ध नहीं हो पाई है।

मामला अंततः सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 63 सी और साक्षी अधिनियम की धारा 68 के प्रावधानों की बारीकी से जांच कीऔर एकमात्र जीवित गवाह की गवाही को पूरे संदर्भ में देखा। अदालत ने कहा कि वसीयत के गवाह की मुख्य जिरा में यदि कोई कमी रह जाती है तो वह क्रॉस एग्जामिनेशन में स्पष्ट हो सकती है। इस मामले में गवाह ने क्रॉस एग्जामिनेशन के दौरान यह पुष्टिकर दी कि सभी संबंधित लोगों ने उसी दिन वसीयत पर हस्ताक्षर किए थे। कोर्ट ने यह भी माना कि 24साल पुराने दस्तावेज के मामले में गवाही में मामूली विसंगतियां स्वाभाविक हैं और इससे वसीयत की विश्वसनीयता अपने आप खत्म नहीं हो जाती। खासकर तब जब टेस्टेटर यानी वसीयत लिखने वाले की मानसिक स्थिति पर कोई संदेह नहीं है। सबसे अहम टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने संदिग्ध परिस्थितियों के सिद्धांत को स्पष्ट किया। अदालत ने कहा कि किसी एक उत्तराधिकारी को वसीयत से बाहर कर देना अपने आप में कोई संदिग्ध परिस्थिति नहीं है।

जब तक धोखाधड़ी, जबरदस्ती, दबाव या फिर मानसिक अपक्षमता का ठोस सबूत ना हो तब तक अदालत वसीयत बनाने वाले की मंशा पर सवाल नहीं उठा सकती। कोर्ट ने यह भी कहा कि उसका नाम वसीयत की कानूनी औपचारिकताओं को परखना है ना कि यह तय करना कि पिता ने किसे क्यों संपत्ति दी और क्यों नहीं दी। इन्हीं आधारों पर सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट के फैसलों को पलट दिया। वसीयत को वैध ठहराया और शला जोसेफ का पार्टीशन सूट खारिज कर दिया।

अदालत ने दो टूक कहा कि टेस्टेटरी फ्रीडम यानी व्यक्ति की यह आजादी कि वो अपनी संपत्ति किसे देना चाहता है। कानून में सर्वोपरि है और अदालत अपनी सामाजिक या नैतिक राय थोपनहीं सकती। कानूनी हलकों में इस फैसले को वसीयत से जुड़े विवादों में एक मजबूत मिसाल माना जा रहा है। संदेश बिल्कुल साफ है। यदि वसीयत कानूनी रूप से सही ढंग सेबनाई और साबित की गई हो तो किसी वारिस को बाहर रखने का फैसला अदालत के हस्तक्षेप का कारण नहीं बनसकता। चाहे वजह कितनी ही विवादास्पद क्यों ना हो।

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