चुपके से पाकिस्तानी वैज्ञानिकों के बाल काटकर भारत क्यों भेजें थे? अजीत डोभाल

1970 का दशक था। भारत के उत्तर पूर्व में मिजोरम की पहाड़ियों में बगावत की आग धधक रही थी। लालेंगा के नेतृत्व में मिजो नेशनल फ्रंट एक अलग राष्ट्र की मांग कर रहा था। चारों तरफ हिंसा का माहौल था और भारत की एकता को सीधी चुनौती दी जा रही थी। मिजोरम के बिगड़ते हुए हालात देख ने अपने एक सीक्रेट एजेंट को वहां भेजने का निर्णय लिया था जो थे अजित डोभाल।

अजीत की हाल ही में शादी हुई थी। लेकिन वह अपनी पहचान बदलकर बीवी अरुणी डोभाल को भी साथ लेकर मिजोरम पहुंच गए। जहां उन्होंने पता लगाया कि लालेंगा अपने सात कमांडर्स के दम पर आतंक फैला रहा है। यह कमांडर्स लालेंगा की ताकत के साथ उनकी सबसे बड़ी कमजोरी भी थे। और अगर इन सातों को तोड़ दिया जाए तो पूरा विद्रोह खत्म हो जाएगा। तभी अजीत ने एक ऐसा प्लान बनाया जिसके बारे में सुनकर ही किसी की भी रूह कांप जाए। उन्होंने इन अलगाववादी कमांडरों को अपने ही घर खाने पर बुला लिया और अपनी पत्नी अरुणी से कहा मेरे ऑफिस के कुछ दोस्त खाने पर आने वाले हैं।

उनके लिए खास मीजो खाना पोर्क यानी सूअर का मांस बनाना। खाना तैयार हुआ। लेकिन जब दरवाजा खुला तो अरुणी का दिल दहल उठा। क्योंकि हाथ में ऑटोमेटिक बंदूक लिए नकाबपोश अजित के घर में दाखिल हुए। क्योंकि उन्हें अजित पर भरोसा नहीं था इसलिए वह बंदूक भी साथ लाए थे और घर के बाहर पहरा देने के लिए एक दर्जन भी। मगर अजीत डोभाल ने मुस्कुराते हुए उनका स्वागत किया और खाने की मेंज पर अपनी बातों से उन पर ऐसा जादू चलाया कि सात में से छह कमांडर भारत सरकार की तरफ आ गए और लालेंगा को सरकार के सामने घुटने टेकने पड़े जिसके बाद शांति समझौता हुआ और यह मिजोरम के को खत्म करके वहां चुनाव करवाया गया और अजित डोभाल का मिशन कामयाब रहा। लेकिन यह तो सिर्फ एक मिशन था।

असली कहानी अभी बाकी थी। भारत के नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर अजित डोभाल जिन्हें भारत का जेम्स बॉन्ड, स्पाई मास्टर, सुपर कॉप और 21वीं सदी का चाणक्य भी कहा जाता है। उनकी कहानी किसी स्पाई थ्रिलर फिल्म से कम नहीं है। आज भी सिर्फ उनके नाम से ही पाकिस्तान थर-थर कांपने लगता है। अमेरिका की सीआईए और रूस की केजीबी और इजराइल की मोसाद से लेकर दुनिया की हर स्पाई एजेंसी में उनके नाम की तूती बोलती है। अगर किसी दुश्मन देश या आतंकवादी संगठन को पता चल जाए कि उनके सामने भारत की तरफ से अजीत डोभाल खड़े हैं तो लड़ाई की शुरुआत से ही उन्हें हार का डर सताने लगता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भिखारी बनकर पाकिस्तान गए अजीत डोभाल ने कैसे दुश्मन के न्यूक्लियर मिशन का पर्दाफाश कर दिया था। पाकिस्तान में 7 साल पहले के दौरान कैसे वो कई बार पकड़े जाने से बचे थे और चाहे बात में से निपटने की हो, 2016 की की हो, 2019 की बालकोट एयर की हो या फिर 2025 ऑपरेशन सिंदूर की।

भारत के हर सीक्रेट मिशन की जिम्मेदारी अजित डोभाल को ही क्यों दी जाती है। जानेंगे 21वीं सदी के चाणक्य अजीत डोभाल की इस अनसुनी अनकही कहानी में। लेकिन उसके पहले अगर आपको इंडिया की सीक्रेट एजेंसी पर गर्व है तो वीडियो को लाइक करके कमेंट बॉक्स में जय हिंद जरूर लिखें। कहानी की शुरुआत होती है 20 जनवरी 1945 में जब उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल में रहने वाले मेजर जी एन डोभाल के घर अजीत डोभाल का जन्म होता है। जब उनके पिता आर्मी में थे इसलिए आगे चलकर उनका ट्रांसफर राजस्थान में होता है। जहां अजमेर के इंडियन मिलिट्री बोर्ड स्कूल से अजीत अपनी स्कूलिंग पूरी करते हैं। और साल 1967 में आगरा यूनिवर्सिटी से इकोनॉमिक्स में मास्टर्स की पढ़ाई पूरी करते हैं। जिसके अगले ही साल वो यूपीएससी का पहला अटेम्प्ट देते हैं और यूपीएससी क्रैक भी कर लेते हैं और पुलिस ऑफिसर के तौर पर उनकी पहली पोस्टिंग केरला के कोयटम में होती है।

मगर उनकी पोस्टिंग के कुछ समय बाद ही केरला में कुछ ऐसा होता है जिससे अजीत डोभाल मैच 26 साल की उम्र में फेमस हो जाते हैं। दरअसल 28 दिसंबर 1971 के दिन केरला के थालासेरी गांव में हिंदू मुस्लिम के बीच दंगे छिड़ जाते हैं जो कुछ ही दिनों में इतने हिंसक रूप पकड़ लेते हैं। यहां पुलिस भी वहां जाने से डर रही थी। लोग एक दूसरे की दुकानें जला रहे थे, लूटपाट कर रहे थे और दंगे रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ने लगा और गृह मंत्री के करुणाकरण एक ऐसे पुलिस ऑफिसर की तलाश में लग जाते हैं जो इन दंगों को रोक पाए। तभी कुछ सीनियर ऑफिसर अजीत डोभाल का नाम सजेस्ट करते हुए कहते हैं कि यह नौजवान किसी से नहीं डरता और बहुत शातिर है। तभी गृह मंत्री इन दंगों को शांत करने की जिम्मेदारी अजित डोभाल को सौंपते हैं और अजय 2 जनवरी के दिन थालासेरी पहुंच जाते हैं। जहां वह कई दिनों तक पूरा इलाका घूमते हुए जानकारी इकट्ठा करते हैं कि आखिर दंगे भड़क क्यों रहे हैं। तब उन्हें पता चलता है कि दोनों कम्युनिटीज द्वारा एक दूसरे का सामान जो लूटा गया है उसको लेकर लोगों में बहुत गुस्सा है।

फिर वह इन दोनों कम्युनिटीज के लीडर्स के साथ एक मीटिंग करते हैं जिसमें वह इन्हें एक दूसरे का सामान लौटाकर हाथ मिलाने के लिए राजी कर लेते हैं और दंगे शांत हो जाते हैं। अजीत डोभाल ने बिना लाठी चलाए अपनी स्ट्रेटेजिक थिंकिंग से इतनी बड़ी समस्या का हल निकाला था। ऐसे में ये खबर दिल्ली तक पहुंच जाती है और इंटेलिजेंस ब्यूरो ने उन्हें दिल्ली बुलाकर अपनी डायरेक्ट ऑपरेशन विंग में उन्हें शामिल कर दिया और यहीं से शुरू हुआ आज डोबाहाल का ग्रेट इंडियन स्पाई बनने का सफर। अब जासूसी की ट्रेनिंग देने के बाद शुरुआत में कुछ समय के लिए कुछ डेक्स वॉक सौंपा जाता है। जिसके बाद जब इंटेलिजेंस ब्यूरो को मिजोरम में अपना एक एजेंट भेजना था तभी अजीत खुद वहां जाने का प्रपोजल देते हैं और किस तरह उन्होंने मिजोरम को भारत से अलग होने से बचाया वो किस्सा हमने वीडियो की शुरुआत में सुना और इस उपलब्धि के बाद उन्हें प्रेसिडेंट पुलिस मेडल से नवाजा जाता है। मिजोरम की तरह ही वह सिक्किम में भी एक बड़े मिशन को अंजाम देते हैं।

दरअसल उस वक्त सिक्किम इंडियन यूनियन का हिस्सा नहीं बना था। वहां के राजा नामगयाल भारत के साथ मीटिंग तक नहीं करना चाहते थे। लेकिन एक बार फिर अजित डोभाल ने अपनी चाणक्य नीति से सिक्किम को इंडियन यूनियन के साथ सफलता से जोड़ने में कामयाबी हासिल की। अब कहानी में आगे बढ़ते हैं और चलते हैं सीधा हमारे पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में। तो साल 1972 में जब भारत ने अपना पहला परमाणु परीक्षण किया तो पाकिस्तान तलमला उठा। वहां के न्यूक्लियर साइंटिस्ट डॉक्टर ए क्यूओ खान ने चीन और नॉर्थ कोरिया की मदद से न्यूक्लियर टेस्ट की और अपने कदम बढ़ाने शुरू किए। इसकी भनक लगते ही प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान में भारत की खुफिया एजेंसी रॉ यानी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग के नेटवर्क को फैलाना शुरू किया और पाकिस्तान जाने वाले भारतीय जासूसों में से एक थे अजीत डोभाल जिन्होंने इस्लामिक रीति रिवाज सीखे।

पाकिस्तानियों के लहजे में उर्दी बोलना सीखा और सीधा पहुंच गए पाकिस्तान के कहूता शहर में। क्योंकि उन्हें शक था कि यहां मौजूद खान रिसर्च सेंटर में पाकिस्तान का न्यूक्लियर प्रोग्राम चल रहा है। अजित डोभाल कई महीने तक एक भिखारी के बेस में उस रिसोर्ट सेंटर के बाहर बैठे रहे और भीख मांगतेमांगते वहां काम कर रहे सभी साइंटिस्ट की कुंडली निकाल ली। उन्होंने वहां के गार्ड से लेकर छोटे कर्मचारियों तक से दोस्ती कर ली थी। भीख मांगते वक्त वह छोटी-छोटी बातें करते लोगों से सवाल पूछते और अपनी समझ के दम पर उन छोटे-छोटे जवाबों से बड़े-बड़े राज निकालते। अब अजीत यह तो जान चुके थे कि अंदर कुछ बड़ा हो रहा है, लेकिन भारत सरकार और मित्र राष्ट्रों को उसका सबूत देना जरूरी था। ऐसे में अजीत डोभाल को एक तरकीब सूची। दरअसल न्यूक्लियर फैसिलिटी में काम करने वाले वैज्ञानिक की त्वचा और बालों में रेडिएशन का स्तर ज्यादा होता है। ऐसे में अजीत ने सोचा कि अगर उनकी टेस्टिंग की जाए तो यह पक्का हो जाएगा कि वह न्यूक्लियर रिएक्टर पर ही काम कर रहे हैं। ऐसे में उन्होंने वैज्ञानिकों का पीछा करना शुरू किया और वह वैज्ञानिक जहां बाल कटवाते अजित उस नाई को बातों में बहला फुसलाकर वह बाल उठा लेते। इस तरह कई वैज्ञानिकों के बाल भारत भेजे गए, जिनकी टेस्टिंग यह कंफर्म करती थी कि खान रिसोर्स सेंटर में पाकिस्तान परमाणु बम बना रहा है। जिसके बाद अजीत डोभाल ने उनमें से एक वैज्ञानिक को उनकी माशुका के साथ पकड़ लिया और दी कि यह खबर मैं तुम्हारी बीवी को बता दूंगा। अगर तुम चाहो कि ऐसा ना हो तो तुम मुझे पाकिस्तान के न्यूक्लियर वेपन की ब्लूप्रिंट दे दो। वह वैज्ञानिक भी मान गया, लेकिन उसने एक शर्त रखी कि भारत उसे पाकिस्तान से बाहर निकालने का वादा करे और $0,000 दे ताकि वह नए सिरे से अपना जीवन शुरू कर सके। अजीत डोभाल ने यह खबर प्राइम मिनिस्टर ऑफिस तक पहुंचाई मगर उस समय भारत में पोस्ट इमरजेंसी का दौर चल रहा था।

सरकार बदल चुकी थी और मोरारजी देसाई भारत के प्रधानमंत्री बन चुके थे जो रॉ से नाख रहते थे। इसलिए उन्होंने कहा कि हमारे पास बजट नहीं है। लेकिन अजित डोभाल पाकिस्तान की न्यूक्लियर फैसिलिटी को तबाह करने की तरकीबें खोजने की कोशिश में लगे रहे। उन्होंने इजराइल की स्पाई एजेंसी मुसाद से कहा देख लो पाकिस्तान और नॉर्थ कोरिया मिलकर बना रहे हैं। जो बन गया तो फिर इजराइल की सेफ्टी भी खतरे में पड़ेगी। तब इजराइली सरकार ने अजित डोभाल से कहा कि चलो हम इजराइल से फाइटर जेट को भेजकर खान रिसर्च सेंटर ही उड़ा देते हैं। लेकिन हमें इराक से होते हुए नहीं बल्कि पूरा गोल घूम कर आना पड़ेगा। इसलिए आप सिर्फ अपने गुजरात के मिलिट्री एयरबेस पर का इंतजाम करवा दो। बाकी हम देख लेंगे। अजीत डोभाल के इस मास्टर प्लान से रॉ के चीफ आर्यन काऊ काफी खुश थे और वह तुरंत प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की मंजूरी लेने पीएमओ पहुंच गए। लेकिन मोरारजी देसाई बोले हमें ऐसा करने की क्या जरूरत है? पाकिस्तान जो कर रहा है वह अपनी धरती पर कर रहा है और उन्होंने इजराइल के साथ इस टॉप सीक्रेट प्लान को रिजेक्ट कर दिया।

जिससे गुस्सा होकर आन काऊ ने रिजाइन दे दिया। लेकिन अजीत डोबाल कुल सात वर्षों तक पाकिस्तान में रहे। उन्होंने वहां की सरकार और मिलिट्री की और भी बहुत जानकारी भारत सरकार तक पहुंचाई जिसमें कई बार वो पकड़े जाने से बचे। जैसे कि एक बार भीड़ में उनकी नकली दाढ़ी उखड़ गई। वहीं एक बार जब वो कुछ सरकारी अधिकारियों के बीच बैठे थे तब एक स्थानीय मुस्लिम व्यक्ति ने शक जताते हुए कहा, “तुम मुसलमान नहीं हो सकते क्योंकि तुम्हारे कान छिदे हुए हैं।”

ऐसी परिस्थितियों में वो शांत रहे और वहां से बहाना बनाकर निकल कर पाकिस्तान के किसी और शहर में गायब हो गए। इस तरह सालों बाद वो भारत वापस आए। यहां वो पहले पंजाब में ख़स्तान के रूप में एक अलग देश की मांग करने वालों के बीच पाकिस्तानी एजेंट बनकर रहे। उन्हें यकीन दिलाया कि वो उनकी मदद करने आए हैं और हमेशा की तरह पूरी इंफॉर्मेशन निकाल ली जिसका इस्तेमाल करके इंडियन आर्मी ने ऑपरेशन ब्लैक थंडर लॉन्च किया। फिर 90 के दशक में वह जम्मू कश्मीर पहुंचे जो उस वक्त आतंकवादियों का गढ़ माना जाता था। अजीत डोभाल ने वहां आते ही पाकिस्तान सरकार से जुड़े एक मिलिटेंट कूकापारे को अपनी तरफ कर लिया। कुकापारे ने पाकिस्तान के खिलाफ भारत की खूब मदद की और खुद ने भी आतंक छोड़ दिया। जिसके बाद 1996 में चुनाव में कुकापारे जम्मू कश्मीर का एमएलए बन गया। दोस्तों अजित डोभाल की शानदार नेगोशिएशन स्किल्स का एक नमूना हमें कांधार हाईजैक के दौरान भी देखने को मिला था। दरअसल साल 1999 में नेपाल से दिल्ली आ रही इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट IC841 को आईएसआई से जुड़े पांच आतंकवादियों ने हाईजैक कर लिया था। वो चाहते थे कि प्लेन में सवार 176 यात्रियों के बदले पाकिस्तान के 100 आतंकवादियों को भारत रिहा करें और 2 बिलियन डॉलर्स भी दे। तभी इस हाईजेक की नेगोशिएशन की जिम्मेदारी अजित डोभाल को सौंपी गई। इसी दौरान उन्होंने अपनी चाणक्य बुद्धि का इस्तेमाल करके बातचीत के दौरान हाईजैकर्स के दिमाग में अपना डर बिठा दिया। जिसके बाद 100 की जगह उन्हें सिर्फ तीन आतंकवादी दिए गए और एक पैसेंजर के अलावा उस फ्लाइट के सभी पैसेंजर्स को सही सलामत रेस्क्यू करके वापस लाया गया।

इस तरह 1971 से 1999 तक उन्होंने इंडियन एयरलाइंस की 15 हाई जैकिंग्स में आतंकवादियों के साथ नेगोशिएशन की थी या फिर क्या करना उसका प्लान बताया था। आगे चलकर 2004 में वो के डायरेक्टर बने और 2005 में 30 साल के जासूसी करियर के बाद उन्होंने रिटायरमेंट ले ली। जिसके बाद अगले 9 सालों तक उन्होंने नेशनल सिक्योरिटी को लेकर कई सेक्टर्स में काम किया। मगर फिर 2014 में जैसे ही भाजपा की सरकार बनी तभी प्रधानमंत्री बनते ही नरेंद्र मोदी ने अजित डोभाल को भारत का पांचवा नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर बना लिया। इसके बाद जो हुआ वो इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज है।

2016 की 2019 की बालकोट एयर स्ट्राइक और 2025 की टॉप सीक्रेट मिशन ऑपरेशन सिंदूर इन सभी के पीछे जो दिमाग था वह एक ही था अजित डोभाल का। कहा जाता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी डोबाल साहब की सलाह के बिना कोई बड़ा कदम नहीं उठाते और पाकिस्तान वह तो सिर्फ़ अजित डोभाल का नाम सुनते ही कांप उठता है। तो

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