18 अक्टूबर 2007 की तारीख आप याद कीजिए। पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो निर्वसन काटकर वतन वापस आ रही थी। कराची के एयरपोर्ट पर लाखों का हुजूम उनको रिसीव करने पहुंचा और तभी वहां एक जोरदार बम ब्लास्ट हो गया। कार बम 140 लोगों की मौत हुई। अफरातफरी मच गई। हर तरफ बिछ गई। लेकिन बेनजीर को वहां से सुरक्षित निकालने की जिम्मेदारी किसे मिली? पाकिस्तान की फौज या कराची पुलिस के किसी आला अफसर को नहीं मिली।
बेनजीर भुट्टो की बुलेट प्रूफ गाड़ी का स्टीयरिंग जिसके हाथ में था वो था रहमान डकैत। रहमान उस वक्त बेनजीर के सिक्योरिटी ऑफिसर की शक्ल में वहां मौजूद था। उसी ने बेनजीर को सही सलामत बिलावल हाउस पहुंचाया और कोई था नहीं कराची में जो सेफ्टी की गारंटी ले लेता।
सोचिए एक तरफ पुलिस उसके सर पर इनाम रख रही थी। दूसरी तरफ वो मुल्क की सबसे बड़ी लीडर का सारथी था। तो यह किस्सा आपको उसकी पहुंच और पावर का अंदाजा दे देता है। लेकिन हर शेर को सवा शेर तो मिल ही जाता है। कराची पुलिस में भी एक अफसर था एसएसपी चौधरी असलम। इधर फिल्म बनी तो लोग उसे रऊडी राठौड़ भी कहने लगे। 2012 में अपने यहां रऊडी राठौड़ आई थी तो चौधरी असलम को भी रऊडी राठौड़ कहा गया। क्यों कहा गया आपको आगे समझ में आ जाएगा
स्पेशलिस्ट थे आप। जुर्म का खात्मा करने का इनको टास्क मिला हुआ था। चौधरी असलम को पता था कि रहमान को पकड़ना लोहे के चने चबाने जैसा होगा। लेकिन 2006 में उसे एक मौका मिला। एक सटीक टिप मिली। चौधरी असलम ने अपनी टीम के साथ जाल बिछाया। बलूचिस्तान के इलाके विधर में रहमान तब छिपा हुआ था। एक जबरदस्त ऑपरेशन हुआ और आखिरकार पुलिस ने रहमान डकैत को गिरफ्तार कर भी लिया।
अब यह पुलिस के लिए बहुत बड़ा अचीवमेंट था। रहमान सलाखों के पीछे। पुलिस ने खूब खातिरदारी की। कहते हैं कि पुलिस का डंडा पड़ता है तो अच्छे-अच्छों की हेकरी निकलती है। यहां भी वही हुआ। रहमान ने भी रो-रो कर अपने सारे गुनाह कबूले। लेकिन कहानी में ट्विस्ट बाकी था। रहमान डकैत सिर्फ ताकतवर नहीं था। बहुत अमीर भी था। बहुत अमीर। उसने जेल के अंदर ही खेल किया। उसने चौधरी असलम के ही टीम के कुछ भ्रष्ट पुलिस वालों को खरीद लिया और रकम दी ₹ करोड़। ₹5 करोड़ में तब पुलिस वालों का ईमान खरीदा गया।
अगली सुबह खबर आई कि रहमान तो फरार हो गया और वह जेल तोड़कर नहीं भागा था कि बना के या सेन लगा के इज्जत से मेहमान की तरह थाने से बाहर निकला। यह चौधरी असलम और पूरी कराची पुलिस के मुंह पर एक जोरदार तमाचे की तरह था। रहमान दो बार इसी तरह जेल से फरार हुआ। यह चौधरी असलम के लिए सिर्फ ड्यूटी नहीं बल्कि फिर इज्जत का सवाल बना। उसने कसम खाई कि अब वो रहमान को गिरफ्तार नहीं करेगा। उसका काम तमाम करेगा।
2009 पुलिस के लिए सिर दर्द बन गया था वो रिमांड डकैत चौधरी असलम कसम खा चुका था कि इस बार वो अरेस्ट नहीं करेगा सीधे करेगा एनकाउंटर अगस्त की एक उमस भरी रात आई फिर क्राइम रिपोर्टर जिले के फोन की घंटी बजी उधर एक पुलिस ऑफिसर तक कहा एक बड़ी खबर है रहमान डकैत हमको मिल गया हम उसे घेरने जा रहे हैं एक बड़ा एनकाउंटर होगा जिले का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा ये अब तक के उसके करियर की सबसे बड़ी खबर थी 5 घंटे बाद फिर से फोन आया कि काम हो चुका है।
जिले अपनी टीम के साथ भागा। जगह उसे मालूम पड़ी बिन कासिम यानी कराची के बाहर का एक इलाका है। वहां पुलिस की गाड़ियां थी और जमीन पर खून से लथपथ एक लाश पड़ी थी और चेहरा वही था रहमान डकैत का जो कभी बेनजीर भुट्टो की गाड़ी चला रहा था। आज धूल में पड़ा था। पुलिस ने इसे एक एनकाउंटर बताया लेकिन सब जानते थे कि यह बदला था। रहमान का अंत हो गया। इसी तरह लेरी की ये कहानी गैंग वॉर्स की कहानी है। लेकिन इसके पीछे स्टेट की नाकामी भी थी और इस नाकामी का सबसे बड़ा सबूत था अप्रैल 2012 का ऑपरेशन। पुलिस को ऊपर से हुकुम मिला कि लयारी को अब साफ करो। बहुत हो गया। जिम्मेदारी फिर उसी राउड़ी राठौड़ पर पड़ी। यानी चौधरी असलम।
27 अप्रैल 2012 चौधरी असलम अपनी पूरी फौज लेकर पहुंचा। 3000 पुलिस वाले थे। बख्तरबंद गाड़ियां थी। आर्मड पर्सनल कैरियर्स, एपीसीस, स्नाइपर साथ में लाए गए। ऐसा लग रहा था जैसे कोई युद्ध अब होकर रहेगा। लहरी भी किला बन गया था। जैसे ही पुलिस अंदर घुसी उसका स्वागत गोलियों से नहीं हुआ। उनका स्वागत हुआ रॉकेट प्रोपेल ग्रेनेड आरपीजी से। गैंगस्टर्स ने पुलिस की वक्तबंद गाड़ियों पर रॉकेट दागे और यह गाड़ियां खिलौनों की तरह उड़ने लगी। पुलिस को अपनी जान बचाकर भागना पड़ा। यह ऑपरेशन 8 दिन चला। फिर भी 8 दिन तक लेरी को सीज में रखा गया। घेराबंदी थी। ना कोई अंदर जा सकता था, ना बाहर आ सकता था। बिजली काटी गई, पानी बंद कर दिया गया। लोगों के घरों में राशन खत्म हो गया। बच्चे भूख से बिलखते रहे। लोग प्यास से तड़पते रहे। इसी बात ने इस ऑपरेशन को सिर्फ गैंगस्टर्स के खिलाफ नहीं लारी के आम लोगों के खिलाफ जंग बना दिया। इसी घेराबंदी के बीच एंबुलेंस ड्राइवर सफदर अपनी गाड़ी लेकर पहुंचता है। उसकी एंबुलेंस में लाशें नहीं थी। चावल और आटे की बोरियां थी। ईदी फाउंडेशन ने फैसला किया था कि भूखे लोगों तक खाना तो पहुंचाना ही पड़ेगा ना।
सबदर ने अपनी गाड़ी बैरिकेड्स की तरफ बढ़ाई। जहां खड़ा था चौधरी असलम हाथ में पिस्तल, होठों पर सिगरेट ये स्टाइल था। उसने सबदर को रोका और पूछा कि कहां जा रहा है? सबदर ने कहा कि साहब राशन लेकर जा रहा हूं। लोग मर रहे हैं। अब चौधरी असलम को लगा कि राशन की आड़ में गैंगस्टर को हथियार सप्लाई किए जा रहे हैं। उसने आओ देखा ना ताव चाकू निकाला और सफदर की एंबुलेंस पर रखी चावल और आटे की बोरियों को चीरना शुरू कर दिया। दूध के पैकेट्स को फाड़ना शुरू कर दिया। जब बोरियां कटी तो सफेद चावल और जो मिल्क पाउडर था कीचड़ और खून के साथ मिल गया। सबदर सिर्फ देखता रह सकता था तो देखता रहा। चौधरी असलम ने सबदर को कॉलर से पकड़ा। उसे और उसके साथी को पुलिस जीप में ठूसा और फिर इनको थाने ले गया। थाने के अंदर उस मसीहा एंबुलेंस ड्राइवर को पट्टों से पीटा गया। 2009 के बाद पाकिस्तानी फौज ने में और जो बाकी उसकी वेस्टर्न बॉर्डर्स है वहां आतंकवादियों पर एरियल बमार्डमेंट शुरू किया। हवाई जहाज से बम गिराते थे। तो अपनी जान बचाने के लिए तालीबानी वहां से भागे। अब इन आतंकवादियों को छिपने के लिए एक ऐसे शहर की तलाश थी जो वन बहुत बड़ा हो ताकि वहां कोई उन्हें बॉम्ब ना कर सके। टू इतना बड़ा हो कि वहां जाकर कोई गुंबे हो सके और ऐसा शहर एक ही था पाकिस्तान में कराची। यह आतंकवादी कराची के पख्तून इलाकों जैसे सोहरा गोट में आकर बसने लगे। शुरुआत में इन्होंने की तरह बैंक्स लूटे और फिरौती मांगी। लेकिन इनका मकसद सिर्फ पैसा तो नहीं था। इनका असली मकसद था पाकिस्तानी स्टेट को घुटनों पर लाना। 8 जून 2014 की रात 10 तालीबानी आतंकवादी जो अत्याधुनिक हथियारों जैसे ग्रेनेड्स और रॉकेट लांचर से लैस थे। कराची के जिना इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर हमला करते हैं। ने एयरपोर्ट सिक्योरिटी फोर्स यानी एएसएफ की नकली वर्दियां पहनी थी। रात को 11:00 बजे इन्होंने हिट किया था। अब यह हमला किसी सड़क या बाजार पर तो था नहीं। यह हमला पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की गर्दन पर था। रनवे जंग का मैदान बना। फौज और आतंकवादियों के बीच सीधी लड़ाई हुई। सुबह 4:00 बजे तक खूनी खेल चला।
सभी 10 मारे गए। लेकिन सरकार की नींद हराम हो गई। एयरपोर्ट हमले ने इस्लामाबाद को हिलाया और फिर फैसला हुआ जीरो टॉलरेंस का। पैरामिलिट्री फोर्सेस जैसे रेंजर्स को कराची में खुली छूट दी गई और एक नया ऑपरेशन लॉन्च हुआ ऑपरेशन कराची। अब निशाना सिर्फ नहीं थे। लारी के गैंगस्टर्स भी थे। सरकार समझ चुकी थी कि जुर्म और आतंकवाद एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और इन दोनों को यहां से साफ करना पड़ेगा तभी कराची रहने लायक बनेगा। इस सफाई अभियान में सबसे पहले उस सुल्तान का अंत होना था जो खुद कोरी का शेर समझता था। एसएसपी चौधरी असलम वही पुलिस वाला जिसने रहमान डकैत को मारा था।
चौधरी असलम का एक अपना अलधा स्टाइल था। हमेशा कड़क स्टार्च वाली सफेद सलवार कमीज़ पहनता। एक हाथ में सिगरेट होती उसके और दूसरे में पिस्तल। मौत से खेलने का शौकीन एक नहीं दो नहीं नौ बार जानलेवा हमले हुए थे। नौ बार बच गया था। एक बार तालिबान ने उसके घर को ही बम से उड़ा दिया था और तब वो मलबे से जिंदा बाहर निकला और उसने अपनी वर्दी की धूल झाड़कर मीडिया के सामने कहा था मैं इन दहशतगर्दों को जहन्नुम में भी नहीं छोडूंगा। मैं शहीदों को दफन नहीं करता। मैं को दफन करता हूं।
इस एक लाइन ने चौधरी असलम को पूरे पाकिस्तान में फेमस कर दिया। सुपर कॉप बना दिया। तालिबान हालांकि इसे बखशने वाला था नहीं। 2014 में एक दिन उसकी गाड़ी पर एक ने हमला किया। 200 किलो आरडीएक्स से भरी हुई थी गाड़ी। कराची पुलिस का सबसे खूंखार चेहरा इसी तरह धुएं में गायब हो गया।