उजैर बलोच की असली कहानी, रहमान का चेला जो गुरू से भी आगे निकल गया

यह 2009 की बात है कि जब एक दिन कराची की सड़कों पर सन्नाटा और बड़ा ही अजीबोगरीब माहौल था। इस दिन कराची के लेरी के सबसे बड़े सबसे बड़े डॉन रहमान की मौत हो चुकी थी। लोगों के दिमाग में अब यही सवाल था कि की इतनी बड़ी दुनिया कि जो रहमान डकैत ने मरने से पहले खड़ी कर दी है। इसको अब कौन संभालेगा? मतलब रहमान की खाली होने वाली कुर्सी पर कौन बैठेगा? रहमान डकैत की मौत के बाद उसकी इस क्राइम की दुनिया के दो दावेदार थे। पहला बाबा लाडला और दूसरा उज़ैर बलोच। कहने को तो आखिरी सालों में यह दोनों ही लोग रहमान डकैत के काफी करीबी हुआ करते थे।

मगर इनमें से जहां एक तरफ यह जो बाबा लाडला था यह बिल्कुल रहमान की तरह ही काफी खतरनाक समझा जाता था। टॉर्चर टारगेट इन्हीं सारी चीजों के लिए मशहूर था। तो वहीं दूसरी तरफ यह जो उज़ैर बलोच था यह तो साफ-सुथरे कपड़े पहनने वाला बहुत काबिल और पढ़ा लिखा इंसान था। देखकर ऐसा ही महसूस होता कि यह तो कोई सीधा-साधा किसी कंपनी में जॉब करने वाला इंसान है। इसीलिए लोगों को उम्मीद थी कि शायद बाबा लाडला ही इस का सरदार चुना जाएगा।

मगर उस वक्त पूरा कराची हैरान रह गया कि जब यह पता चला कि उज़ैर बलोच को अगले सरदार के तौर पर चुन लिया गया है। हालांकि इस हैरानी में कराची के लोगों के लिए एक चैन की सांस भी थी क्योंकि उनको यह महसूस हुआ था कि क्राइम तो उनके शहर में ऑलरेडी फैल ही चुका है। कम से कम यह तो बेहतर हुआ कि उज़ैर बलोच जैसा एक पढ़ा लिखा इंसान इस क्राइम की दुनिया की कुर्सी पर बैठ चुका है। जिससे हो ना हो पहले के मुकाबले में अब काफी सुधार ही आएगा।

लेकिन दोस्तों अफसोस यह सारे के सारे लोग ही गलत सोच रहे थे क्योंकि उज़ैर बलोच तो वो करने जा रहा था कि यह लोग रहमान डकैत को भी भूल जाएं। रहमान डकैत के जो उज़ैर बलोच की तरह पढ़ा लिखा तो नहीं था। मगर उसके बावजूद भी उसके अपने बनाए हुए कुछ रूल्स थे, कुछ नियम थे। लेकिन उज़ैर बलोच के सिस्टम में तो वो रूल्स भी गायब हो चुके थे। जिसकी वजह से फिर उज़ैर बलोच के गद्दी पर बैठते ही कराची की सड़कों ने वो सब कुछ देखा था कि जिनको इतिहास में कभी भी नहीं भुलाया जा सकेगा। शुरुआत अरशद पप्पू के उस कत्ल से हुई कि जिसको आज भी कराची में एक फुटबॉल गेम के तौर पर याद किया जाता है। जैसा कि हम रहमान वाली वीडियो में ऑलरेडी जान ही चुके हैं कि उज़ैर बलोच एक सादा सीधा पढ़ा लिखा इंसान था और शुरुआती दिनों में उसका की दुनिया से कोई भी लेना देना नहीं था।

मगर उज़ैर बलोच के जो फादर हुआ करते थे फैजू जो कराची के एक व्यापारी थे उनको अरशद पप्पू ने कत्ल कर दिया था और अपने बाप के इस कत्ल के बाद ही उज़ैर बलोच की जिंदगी में एक टर्निंग पॉइंट आया था और उसने अरशद पप्पू के सबसे बड़े दुश्मन रहमान डकैत की शरण ले ली थी। उज़ैर बलोच ने रहमान डकैत की सरपरस्ती में रहना शुरू किया और फिर एक वक्त वो आया कि जब वह रहमान डकैत का राइट हैंड बन गया था। कहा जाता था कि रहमान डकैत अगर मसल पावर है तो जो उज़ैर बलोच है वह उसका माइंड है मतलब उसका दिमाग है। उसकी वजह यह थी कि जहां एक तरफ रहमान डकैत का कब्जा पूरी क्राइम की दुनिया पर था।

तो वहीं दूसरी तरफ आम लोगों पर आम सड़कों पर और तो और पॉलिटिकल पार्टीज वगैरह पर सब पर उज़ैर बलोद का कब्जा था। वो एक खूनी गैंगस्टर से कहीं ज्यादा नेताओं की तरह रहता था और काफी डिप्लोमेसी से काम लेता था। तो अब किस्सा मुख्तसर यह है कि रहमान डकैत के बाद जब इस दुनिया की कमान उज़ेर बलोच के हाथों में आई थी तो उसका निशाना सबसे पहले अरशद पप्पू ही बना था। जिसने किसी दौर में उसके बाप को कत्ल किया था या फिर रहमान डकैत के बाप की कब्र को भी तोड़ा था। हुआ यह था कि साल 2013 में एक दिन अरशद पप्पू कराची के डिफेंस के इलाके में छिपा हुआ था।

यह कराची का वही इलाका है कि जिसको अमीरों का इलाका कहा जाता है और काफी सिक्यर्ड समझा जाता है। मगर उज़ैर बलोच के बंदों को जैसे ही यह खबर मिली कि अरशद पप्पू डिफेंस में है तो उसके बंदों ने फौरन ही पुलिस की वर्दी पहनी और वहां जाकर अरशद पप्पू को उठाकर लेरी ले आए। न सिर्फ अरशद पप्पू को बल्कि उसके भाई यासिर रफ को भी लाया गया। रात का वक्त था। कराची की गलियों में भीड़ लग चुकी थी। लोग अरशद पप्पू और उसके भाई यासर रफ का तमाशा देख रहे थे और उन दोनों के सामने खड़े हुए थे उज़ैर बलोच और उसका जो कमांडर था मतलब कि बाबा लाडला। सबसे पहले तो काफी देर तक इन लोगों को टॉर्चर किया गया और इनके चीखने चिल्लाने की आवाजें लारे की गलियों में गूंजती रहीं।

उसके बाद अरशद पप्पू के सर को काट दिया गया और जब यहीं पर इन लोगों का मन नहीं भरा तो इन लोगों ने उसका कटा हुआ जो सर था उसको जमीन पर रखा और ठोकरें मार-मार कर मानो फुटबॉल खेलना शुरू कर दिया। सर के अलावा जो बची हुई बॉडी थी उसको गधा गाड़ी पर डालकर लेरी की तमाम गलियों में घुमाया गया। उसके बाद उस बॉडी के टुकड़े कर दिए गए। उनको जलाया गया और जलाने के बाद जो राख बची थी उसको सभी के सामने गटर में बहा दिया गया। साथियों साफ है यह कुछ ऐसा हो रहा था कि जो रहमान डकैत के दौर में भी नहीं देखा गया था। 2009 में रहमान डकैत की गद्दी संभालने के बाद से ही उज़ैर बलोच का इन्फ्लुएंस बड़ी तेजी के साथ बढ़ना शुरू हो चुका था। क्राइम की दुनिया पर तो उसकी पकड़ थी ही मगर पॉलिटिक्स में भी अब उसका दबदबा कम नहीं था। उसके अस्रो रुसूख की वजह से ही अब पाकिस्तान की एक बड़ी और अहम पार्टी उसको पूरी तरीके से सपोर्ट दे चुकी थी। कराची की राजनीति में तो उसकी इजाजत के बगैर मानो पत्ता भी नहीं हिलता था।

मगर साथियों 2012 आते-आते जब पाकिस्तानी गवर्नमेंट को यह महसूस हुआ कि पानी अब सर से ऊपर जा रहा है तो उसने एक ऑपरेशन लांच किया। इस ऑपरेशन की जिम्मेदारी दी गई थी मशहूर एसएसपी चौधरी असलम को। वह लगभग अपने 3000 पुलिस वालों को लेकर लेरी पहुंच गए। चौधरी असलम और उनकी इतनी बड़ी फौज को देखकर उनकी गाड़ियों को देखकर उनके जिस तरह के हथियार थे उन सबको देखकर ऐसा महसूस हो ही नहीं रहा था कि यह किसी या फिर क्रिमिनल्स वगैरह से लड़ने के लिए आए हैं। बल्कि ऐसा लग रहा था कि मानो यह किसी बड़ी ताकत से एक पूरी जंग करने के लिए आए हैं। और दोस्तों हैरानी की बात यह है कि बिल्कुल हुआ भी ऐसा ही। यह लोग जैसे ही लेरी के इलाके में पहुंचे तो दूसरी तरफ से इनका स्वागत वगैरह से नहीं बल्कि रॉकेट से हुआ था। जी हां, उज़ैर बलोच के लड़ाकों ने फौरन इनके ऊपर रॉकेट्स छोड़े और इन लोगों की गाड़ियां ऐसे उड़ने लगी कि मानो कोई फिल्म चल रही हो। मगर चौधरी असलम भी भला कहां पीछे हटने वाला था।

इन चीजों के बावजूद भी चौधरी असलम ने यह ऑपरेशन अगले 8 दिन तक लगातार जारी रखा। अगले 8 दिन तक पूरे लिया इलाके की इस तरह से घेराबंदी करके रखी गई कि ना तो कोई अंदर से बाहर आ सकता था और ना ही बाहर से अंदर जा सकता था। पुलिस और उज़ैर बलोच के गैंग्स के बीच जो जंग चलनी थी वह तो चल ही रही थी मगर इन सबके बीच सबसे ज्यादा नुकसान आम लोगों को हो रहा था। ज्यादातर लोगों का खाने-पीने का सामान या तो खत्म हो चुका था या फिर खत्म होने वाला था। हालात हद से ज्यादा बुरे हो चुके थे। उज़ैर बलोच के बारे में यहां पर यह जिक्र करना भी जरूरी होगा कि उज़ैर बलोच ने कराची के अंदर अपनी एक रॉबिन हुड की छवि भी बना ली थी। या यह कह सकते हैं कि वह छवि बनाने की कोशिश कर रहा था। उज़ैर बलोच की तरफ से आम गरीब और कमजोर लोगों की काफी मदद की जाती थी।

सोशल वेलफेयर का काफी काम होता था। इसके अलावा पीपल्स अमन कमेट नाम का एक संगठन कि जिसको किसी दौर में रहमान डकैत ने बनाया था। उसको भी उजैर बलोच चला रहा था। यह तमाम चीजें उसको पॉलिटिकली काफी फायदा पहुंचाती थी। मगर जाहिर है सभी अकलमंद लोगों को मालूम था कि सफेद दुनिया के पीछे का काला सच क्या है। उज़ैर बलोच के बारे में मशहूर है कि उसका वो आलीशान महल कि जहां पर वो एक राजा की तरह बैठता था और जहां पर एक झरना हुआ करता था कि जो देखने में काफी खूबसूरत लगा करता था। मगर हैरानी की बात यह थी कि वो झरना भी दरअसल सिर्फ इसीलिए चलाया जाता था ताकि पीछे जो टॉर्चर रूम था उससे इंसानों की चीखने और चिल्लाने की आवाजों को दबाया जा सके। उज़ैर बलोच के महल के पीछे अपना एक पर्सनल ज़ूबी था।

मतलब चिड़ियाघर था जिसके अंदर उसने मगरमच्छ पाल रखे थे, भालू पाल रखे थे। और माना जाता है कि कभी-कभी वह अपने दुश्मनों को के लिए या उनको खौफनाक मौत देने के लिए इन जानवरों का इस्तेमाल किया करता था। कुल मिलाकर उज़ैर बलोच बहुत जल्द ही हर तरीके से काफी पावरफुल हो चुका था और कराची का मानो मालिक बन चुका था। मगर तभी इस कहानी में एक बड़ा मोड़ आया। वह मोड़ यह था कि वह बाबा लाडला कि जो उज़रै बलोच का अभी तक कमांडर था और किसी दौर में बिल्कुल उज़ैर बलोच की तरह ही रहमान डकैत का करीबी हुआ करता था। उससे उज़ैर बलोच का झगड़ा हो गया। पैसों वगैरह को लेकर होने वाली नोकझोंक का नतीजा यह हुआ कि यह दोनों अलग-अलग हो गए। कराची भी दो टुकड़ों में बट गया। मतलब आधे पर अब बाबा लाडला का कब्जा और आधे पर उज़ैर बलोच का कब्जा। नतीजा यह हुआ कि इन दोनों ग्रुप्स के बीच अब गैंग वॉर शुरू हो गई।

आए दिन अब कराची के लोगों को किदरी ना किदरी से गोलियों की आवाें सुनाई देने ही लगती थी। हालात यहां पहुंच गए कि उज़ैर बलोच ने अब बाबा लाडला को ही निपटाने का फैसला कर लिया। एक फुटबॉल मैच कि जिसको बाबा लाडला देखने के लिए गया था उसमें बम ब्लास्ट करवाया गया ताकि बाबा लाडला को खत्म किया जा सके। उस बॉम ब्लास्ट में बाबा लाडला तो बच गया मगर सात से आठ ऐसे आम लोग कि जिनका इन चीजों से कोई लेना देना नहीं था। उनकी हो गई। बाबा लाडला बच चुका था। गुस्से से खौल उठा था। उसने भी बदला लिया और उज़ैर के करीबी साथी जफर बलोच को गोलियों से भून डाला। यह अब और भी ज्यादा खूनी हो गई थी और रिपोर्ट बताती है कि सिर्फ एक साल के अंदर इस गैंग वॉर की वजह से कराची के अंदर लगभग 800 लोगों की मौत हुई थी। अब यहां पर ध्यान देने वाली बात यह है कि यह वो दौर आ चुका था कि जब कराची के अंदर धीरे-धीरे तालिबान ने भी पैर जमा लिए थे। ना सिर्फ पैर जमा लिए थे बल्कि अब तो उन्होंने पाकिस्तानी हुकूमत की नाक में दम कर रखा था। खासतौर से एयरपोर्ट पर होने वाले एक अटैक ने तो पूरी पाकिस्तानी हुकूमत को ही हिला कर रख दिया था।

जिसकी वजह से अब पाकिस्तानी हुकूमत ने न सिर्फ रेंजर्स को खुली छूट दे दी बल्कि एक बड़ा ऑपरेशन भी लॉन्च किया जिसका नाम था ऑपरेशन कराची। ये एक ऐसा ऑपरेशन था कि जिसका मकसद था कराची को बिल्कुल क्लीन कर दिया जाए। मतलब चाहे तालिबान हो या उज़ैर बलोच का गैंग हो या बाकी कोई गैंग हो। मतलब कोई चाहे क्रिमिनल हो या आतंकवादी हो सबको एक ही हिसाब से ट्रीट किया जाए और सभी का सफाया किया जाए। अब क्योंकि कराची के अंदर शुरू होने वाला गवर्नमेंट का यह जो सफाई अभियान था इसमें एसएसपी चौधरी असलम काफी इनवॉल्व थे। तो इसीलिए उनको टारगेट किया जाने लगा। खासतौर से तालिबान ने तो एसएसपी चौधरी असलम को खत्म करने के लिए कई कातिलाना हमले करवाए थे जिसमें चौधरी असलम बचने में कामयाब रहे थे।

मगर आखिरकार 2014 में आरडीएक्स के जरिए से उनकी गाड़ी को उड़ाकर तालिबान एसएसपी चौधरी असलम को कत्ल करने में कामयाब रहा। मगर ऑपरेशन कराची चौधरी असलम की मौत के बाद भी नहीं रुका बल्कि इसने और तेजी पकड़ ली। लेरी जैसे इलाके अब छावनी में बदल चुके थे। हर तरफ रेंजर्स ही रेंजर्स नजर आते थे। नतीजा यह हुआ कि उज़ैर बलोच और बाबा लाडला जैसे कराची के बड़े-बड़े गैंगस्टर्स के जिनका कभी शहर पर राज हुआ करता था। अब अपनी जान बचाने की खातिर इधर-उधर भागने लगे। सबसे पहले बात करें बाबा लाडला की तो वह कराची से खुफिया तौर पर भागा और बलूचिस्तान के इलाके में जो ईरान का बॉर्डर था वहां पर जाकर छिपा।

मगर 2017 में ही रेंजर्स वहां भी पहुंच गई और एक एनकाउंटर में उसको खत्म कर डाला। दूसरी तरफ जो उज़ैर बलोच था जाहिर है उसका नेटवर्क काफी बड़ा था तो इसीलिए वह बार-बार बचने में कामयाब हो जाता था। कभी इधर से उधर पहुंचता और रेंजर्स जब उधर पहुंचते तो वह वहां से भी गायब हो चुका होता था।

आखिर में उसने यह किया कि एक नकली पासपोर्ट बनवाया। स्पीड बोट के जरिए से वह पहले मस्कट पहुंचा और वहां से दुबई चला गया। लेकिन दुबई पहुंचकर भी बच ना सका क्योंकि वहीं पर ही उसको गिरफ्तार कर लिया गया और गिरफ्तार करके पाकिस्तान लाया गया और पाकिस्तान आने के बाद उज़ैर बलोच ने जो खुलासे किए उससे तो पूरा पाकिस्तान हिल गया क्योंकि उसने कबूला कि वो सिर्फ एक गैंगस्टर ही नहीं था बल्कि उसने तो पाकिस्तानी आर्मी की कई खुफिया जानकारियां ईरान को दी। इसके अलावा उसने फेक डॉक्यूमेंट्स पर ईरान की नागरिकता भी हासिल की।

बाकी लगभग 198 लोगों को कत्ल करने की बात भी कबूली थी। मगर हां पाकिस्तानी लोगों के लिए अब यह क्लियर हो चुका था कि उज़ैर बलोच के जो अभी तक लेरी और कराची का सरदार था वो दरअसल उनके देश का गद्दार भी था। दिसंबर 2025 के जब यह वीडियो रिकॉर्ड हो रही है उस वक्त भी उज़ैर बलोच जेल के अंदर बंद है। 2020 में जासूसी के जुर्म में एक कोर्ट इसको 12 साल की सजा भी सुना चुका है। वैसे यहां पर एक और भी वर्थ नोटिसिंग चीज है और वो यह है कि आपको कुलभूषण यादव का केस तो जरूर याद होगा। जी हां, वही भारतीय नागरिक के जिनको 2017 में पाकिस्तान के मुताबिक उसने बलूचिस्तान से गिरफ्तार किया था। जबकि इंडिया के मुताबिक उनको ईरान से किडनैप किया गया था।

पाकिस्तान की तरफ से कुलभूषण यादव के ऊपर एक जासूस होने का इल्जाम लगाया जाता रहा है। जबकि इंडिया हमेशा से ही इसको डिनाई करता आया है। मगर आज की इस वीडियो में हमारे लिए जो चीज जानना जरूरी है वो यह कि गल्फ न्यूज़ की एक रिपोर्ट में यह दावा किया गया था कि कुलभूषण यादव की जो इंसान मदद कर रहा था वो कोई और नहीं बल्कि यही उज़ैर बलोच था। जी हां उज़ैर बलोच।

वैसे कुलभूषण यादव का जो टॉपिक है वह अपने आप में ही काफी लंबा है। जिसको एक कंप्लीट सेपरेट वीडियो में ही एक्सप्लेन करना बेहतर रहेगा।

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