गांधी को जिन्ना से बेहतर बताने वाला पाकिस्तानी मौलाना क्यों हुआ अरेस्ट।

एक यूबर, 31 लाख से ज्यादा फॉलोअर्स, बेबाक अंदाज और अब जेल की सलाखों के पीछे। पाकिस्तान के सबसे विवादास्पद और मशहूर धार्मिक स्कॉलर इंजीनियर मोहम्मद अली मिर्जा को गिरफ्तार कर लिया गया है। वजह पैगंबर मोहम्मद पर एक ऐसी टिप्पणी जिसने पूरे पाकिस्तान में बवाल काट दिया है।

लेकिन क्या मिर्जा ने सच में ऐसा कुछ कहा या फिर यह एक बड़ी साजिश है एक ऐसी आवाज को दबाने की जो सालों से कट्टरपंथियों की आंखों में चुभ रही थी। आखिर कौन है यह यूट्यूबर मौलाना? पहले भी इन पर कितने हमले हो चुके हैं और इस गिरफ्तारी का असली मकसद क्या है? सब कुछ आसान भाषा में।

तो खबर यह है कि पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में इंजीनियर मोहम्मद अली मिर्जा को एमपीओ कानून के सेक्शन थ्री के तहत 30 दिनों के लिए हिरासत में ले लिया गया है। अब आप पूछेंगे कि यह एमपीओ क्या है? यह एक तरह का प्रिवेंटिव डिटेंशन कानून है। मतलब अगर सरकार को लगता है कि किसी व्यक्ति की वजह से पब्लिक ऑर्डर या शांति व्यवस्था भंग हो सकती है तो उसे बिना किसी ट्रायल के हिरासत में लिया जा सकता है। सरकार का कहना है कि मिर्जा के एक बयान जो पैगंबर मोहम्मद को लेकर था वो वायरल हो गया। इसके बाद कई धार्मिक गुटों ने शिकायतें दर्ज कराई और माहौल बिगड़ने का खतरा पैदा हो गया। इसलिए एक्शन लेना जरूरी था। लेकिन यहीं पर कहानी में आता है एक बड़ा ट्विस्ट। मिर्जा के समर्थक कह रहे हैं कि उनके बयान को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया है।

उनका दावा है कि मिर्जा साहब किसी और समुदाय की किताबों का हवाला देकर उनकी शब्दावली समझा रहे थे और क्लिप को बीच में से काटकर ऐसा दिखाया गया मानो यह उनके अपने शब्द हो। मतलब पूरा मामला आउट ऑफ कॉन्टेक्स्ट का है। तो एक तरफ है धार्मिक भावनाएं आहत होने का आरोप और दूसरी तरफ है बयान को गलत तरीके से पेश करने का दावा। सच क्या है यह तो जांच के बाद पता चलेगा। लेकिन यह जनाब है कौन? जो एक बयान देते हैं और पूरे देश में भूचाल आ जाता है।

इंजीनियर मोहम्मद अली मिर्जा कोई आम मौलवी नहीं है। वो एक मैकेनिकल इंजीनियर हैं जो सरकारी नौकरी करते थे और फिर बन गए फुल टाइम यूबर और धार्मिक स्कॉलर। उनका स्टाइल बिल्कुल अलग है। वो अपने लेक्चर्स में सीधे कुरान और हदीस का हवाला देते हैं और बड़े-बड़े मौलवियों और फिरकों को सीधे-सीधे चैलेंज कर देते हैं। उनका यह बेबाक और बिंदास अंदाज ही उनकी यूएसपी है। इसी वजह से उनके चाहने वाले भी लाखों में हैं और दुश्मन भी हजारों में। और दुश्मनी भी कोई छोटी-मोटी नहीं। रिपोर्ट के मुताबिक मिर्जा साहब पर अब तक चार जानलेवा हमले हो चुके हैं। हाल ही में मोहम्मद अली मिर्जा का एक वीडियो इंटरनेट पर वायरल हुआ था जिसमें उन्होंने जिन्ना से बेहतर नेता महात्मा गांधी को बताया था और जैसा मैंने कहा यह कोई पहली बार नहीं है जब मिर्जा साहब कानूनी पचड़े में फंसे हो। इनका और विवादों का तो चोली दामन का साथ रहा है। 2021 में उन पर एक धार्मिक अकादमी में जानलेवा हमला हुआ जिसमें वो बाल-बाल बचे।

2023 में उन पर पाकिस्तान के सबसे खतरनाक कानून यानी ईश निंदा कानून के तहत केस दर्ज हुआ। आरोप था कि उन्होंने पैगंबर का अपमान किया और अहमदिया समुदाय पर पाकिस्तान के कानून को कमतर बताया। यही नहीं मुफ्ती तारिक मसूद और मुफ्ती हनीफ कुरैशी जैसे बड़े-बड़े मौलवियों से उनके डिबेट और झगड़े तो पब्लिक में चलते ही रहते हैं। मतलब अखाड़े में हर तरफ से पहलवान मौजूद हैं। अब आते हैं सबसे बड़े सवाल पर। क्या यह गिरफ्तारी वाकई में पब्लिक ऑर्डर के लिए है या फिर इसके पीछे कोई और खेल है? लाहौर के एक वकील जे सज्जल शहीदी ने एक्स पर एक बहुत बड़ी बात कही। उन्होंने लिखा कि इंजीनियर मोहम्मद अली मिर्जा की गिरफ्तारी पब्लिक ऑर्डर के लिए नहीं है। यह उन स्वतंत्र आवाजों को चुप कराने के लिए है जो कट्टरपंथी मौलवियों पर सवाल उठाने की हिम्मत करते हैं। वहीं दूसरी तरफ टीएलपी जैसे हिंसक गुटों को सरकार पुचकारती है। उन पर से बैन हटाती है और चुपचाप पैसे भी देती है। यह एक बहुत गंभीर आरोप है। वकील साहब सीधे-सीधे इशारा कर रहे हैं कि पाकिस्तान में दोहरा मापदंड चल रहा है। जो लोग सड़कों पर उतर कर हिंसा करते हैं उन्हें छूट मिलती है और जो व्यक्ति YouTube पर बैठकर वैचारिक बहस करता है उसे जेल में डाल दिया जाता है। यह मामला अब सिर्फ एक मौलवी की गिरफ्तारी का नहीं रह गया है।

यह पाकिस्तान में फ्रीडम ऑफ स्पीच, धार्मिक कट्टरता और सत्ता के खेल से जुड़ गया है। तो कहानी साफ है। एक मशहूर विवादास्पद और बेबाक यूट्यूबर अब जेल में है। सरकार कह रही है शांति के लिए जरूरी था। समर्थक कह रहे हैं साजिश है और आलोचक कह रहे हैं यह आवाज दबाने की कोशिश है।

इस पूरे मामले पर आपको क्या लगता है? क्या सरकार का कदम सही है? क्या मिर्जा को उनके बेबाक अंदाज की कीमत चुकानी पड़ रही है या फिर धार्मिक मामलों में बोलते हुए एक लक्ष्मण रेखा होनी ही चाहिए?

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