देवभूमि हिमाचल जो अपनी शांत वादियों और खूबसूरत नजारों के लिए जानी जाती है। आज कराह रही है। यहां के पहाड़ दरक रहे हैं। नदियां कहर बनकर गांव को निकल रही हैं और आसमान से बरसती आफत ने हजारों जिंदगियों पर विराम लगा दिया है। कुदरत के इस कहर के सामने इंसानियत बेबस नजर आ रही है। हर तरफ तबाही का मंजर है और इस तबाही के बीच गूंज रही है हिमाचल की एक ही पुकार। इसे राष्ट्रीय आपदा घोषित करो।
इस मुश्किल घड़ी में जब पहाड़ रो रहे हैं तो हिमाचल की विधानसभा एक सुर में बोली। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष सभी ने मिलकर एक प्रस्ताव पारित किया कि इस त्रासदी को राष्ट्रीय आपदा का दर्जा दिया जाए। यह एक ऐसी लड़ाई है जिसमें कोई सियासत नहीं सिर्फ हिमाचल को बचाने की ज़िद है और जमीन पर यह ज़िद एक जंग में बदल चुकी है। चंबा, कुल्लू और लाहौर स्पीति जैसे इलाकों में सड़कें बह चुकी हैं। गांव का संपर्क दुनिया से कट गया है। बिजली, पानी और मोबाइल नेटवर्क सब ठप है। लेकिन उम्मीद की लव अभी बुझी नहीं। चंबा में मणि महेश यात्रा पर गए 3000 श्रद्धालुओं की अटकी सांसों को जब रेस्क्यू टीमों ने राहत दी तो लगा कि हौसले अभी जिंदा हैं। सरकार कह रही है कि हालात नियंत्रण में है।

चंबा में चार हेलीकॉप्टर तैनात है। जरूरत पड़ी तो सेना को भी बुलाया जाएगा। लेकिन जब आसमान में बादल गरजते हैं तो हेलीकॉप्टर की हर उड़ान मौसम की मोहताज हो जाती है। फिर भी प्रशासन की हर सांस फंसे हुए 8000 लोगों को सुरक्षित निकालने में अटकी है। लेकिन यह तबाही अपने पीछे जो जख्म छोड़ गई वो बेहद गहरे हैं। कल एकदम फ्लैश फ्लड आया है। जिसकी चारप वेव आई है। जिससे भारी नुकसान हुआ है।
आंशिक व पूर्ण रूप से कई घरों को नुकसान हुआ है। लोगों ने भाग के अपनी जान बचाई है। यहां पे ऊपर डुला नामक जगह है। वहां पे कई लिंक रोड बने हैं और रोड का काम लगा है। उनका सारा मलवा जो है डंप किया गया था इस नाने में। उस मलवे के आने से ही यह भारी नुकसान हुआ है।
अब हमारी प्रशासन से विनती है कि जल्द से जल्द भारी हैवी मशीनरी भेज के इसका कुछ समाधान किया जाए क्योंकि अभी भी बारिश हो रही है और यह दोबारा से किसी समय भी दोबारा से यह फ्लैश फ्लड फिर से आ सकता है। रात होती तो बहुत ज्यादा कैजुअल्टी होती। कई लोग मारे जाते इसमें। यह दिन का समय था। लोगों ने एक दूसरे की हेल्प करते हुए निकाल के सबको सुरक्षित जगह बनाया। अगर रात का समय होता तो बहुत ज्यादा नुकसान हो सकता था। आंकड़े दिल दहला देते हैं।

इस मानसून ने 300 से ज्यादा जिंदगियां हमेशा के लिए खामोश कर दी। 38 लोग अब भी लापता हैं। जिनके परिवार हर पल किसी चमत्कार की उम्मीद में जी रहे हैं। 350 से ज्यादा घायल, हजारों घर और दुकानें जमींदोज हो चुकी हैं। और ना जाने कितने बेजुबान मवेशी इस सैलाब में बह गए। यह सिर्फ आंकड़े नहीं यह उजड़ चुके परिवारों की अधूरी कहानियां हैं।
बहरहाल इस आपदा ने एक बड़ा सवाल भी खड़ा किया है। विकास और प्रकृति के बीच संतुलन का सवाल। मामले को लेकर विधानसभा अध्यक्ष कुलदीप सिंह पठानिया ने सही कहा है कि पहाड़ी राज्यों की अपनी चुनौतियां हैं और उनके लिए एक अलग नीति की जरूरत है ताकि विकास विनाश की वजह ना बन सके।
