सोचिए आपके परिवार का कोई सदस्य खो जाता है। आप सालों तक उसे ढूंढते हैं। हर जगह तलाशते हैं। लेकिन वह नहीं मिलता। थक हार कर आप मान लेते हैं कि अब वह इस दुनिया में नहीं रहा। पति दूसरी शादी कर लेता है और फिर ठीक 9 साल बाद एक फोन कॉल आता है। आपकी पत्नी जिंदा है।
यह कहानी है उम्मीद की, पिछड़ने के दर्द की और फिर सालों बाद हुए एक ऐसे मिलन की जिसने सबकी आंखों में आंसू ला दिए। यह कहानी है छत्तीसगढ़ की तारा की जिसे उसके परिवार ने 9 साल पहले मृत मान लिया था। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।
कैसे एक मानसिक रूप से बीमार महिला गलत ट्रेन में बैठकर गायब हो गई। कैसे उसके पति ने दूसरी शादी कर ली और कैसे 9 साल बाद वो अपने परिवार से मिली वो भी एक 9 साल के बेटे के साथ जिसे उसका परिवार जानता तक नहीं था।
बात आज से करीब 9 साल पहले की है। छत्तीसगढ़ के नौरंगपुर गांव में रहने वाली तारा अपने पति कमलेश पात्रे और बच्चों के साथ रहती थी। उनका एक 9 साल का बेटा अरिन और तीन बेटियां थी। परिवार बिल्कुल सामान्य था। लेकिन तारा की मानसिक स्थिति कुछ ठीक नहीं रहती थी। एक दिन तारा घर के पास लगे एक मेले में घूमने गई। लेकिन वहां से वह घर वापस नहीं लौटी।
मानसिक संतुलन ठीक ना होने के कारण वह भटक कर एक गलत ट्रेन में बैठ गई और अपने परिवार से हमेशा के लिए बिछड़ गई। या कम से कम उस वक्त तो सबको यही लगा। परिवार ने उन्हें हर जगह ढूंढा। रिश्तेदारों से पूछा। पुलिस में रिपोर्ट लिखवाई। हर मुमकिन कोशिश की। महीने सालों में बदल गए। लेकिन तारा का कोई सुराग नहीं मिला। आखिरकार थक हारकर परिवार ने सबसे मुश्किल फैसला लिया। उन्होंने तारा को मरा मान लिया।
कुछ समय बाद पति कमलेश पात्रे ने बच्चों की परवरिश के लिए दूसरी शादी कर ली और काम के सिलसिले में अपनी दूसरी पत्नी के साथ पुणे चले गए। और इधर छत्तीसगढ़ में तारा का बड़ा बेटा अरिन और उसकी बहनों ने खुद खेतीबाड़ी करके अपना पालन पोषण किया। वक्त के साथ वह बड़े हुए। उनकी शादियां हुई और अरिन खुद एक बच्चे का पिता बन गया। मां की यादें अब बस धुंधली हो चुकी थी। अब कहानी में आता है सबसे बड़ा ट्विस्ट। तारा उस ट्रेन से कहां पहुंची? वो पहुंची राजस्थान के हिंडोन शहर।
27 मार्च 2016 को पुलिस को एक लाचार और मानसिक रूप से विक्षिप्त महिला मिली जो गर्भवती भी थी। पुलिस ने उन्हें भरतपुर के अपना घर आश्रम में भर्ती करा दिया। अपना घर आश्रम वो जगह है जहां बेसहारा लोगों की सेवा और देखभाल की जाती है। यहां तारा का इलाज शुरू हुआ। उनकी देखभाल की गई और अगस्त 2016 में उन्होंने आश्रम में ही एक स्वस्थ बेटे को जन्म दिया।
आश्रम के लोगों ने प्यार से उस बच्चे का नाम रखा हर्ष। पिछले 9 साल से मां-बेटे इसी आश्रम में पल रहे थे। तारा का इलाज चल रहा था और हर्ष आश्रम के स्कूल में पढ़ रहा था। वो चौथी क्लास का स्टूडेंट था। कहते हैं ना दुआएं कभी खाली नहीं जाती। लगातार इलाज और देखभाल से तारा की मानसिक स्थिति में सुधार होने लगा। उनकी याददाश्त धीरे-धीरे वापस आने लगी और एक दिन उन्होंने आश्रम की पुनर्वास टीम को अपना पता बताया।
नौरंगपुर छत्तीसगढ़। बस फिर क्या था? आश्रम की टीम तुरंत एक्शन में आई। उन्होंने उस पते पर संपर्क किया और परिवार को यह खबर दी। सोचिए जरा उस परिवार पर क्या बीती होगी। जब उन्हें फोन पर बताया गया कि जिसे वह 9 साल से मरा हुआ समझ रहे थे वो जिंदा है और उनका एक 9 साल का भाई भी है। उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। खबर मिलते ही तारा का बड़ा भाई आर्यन, भाई अर्जुन और दामाद रामू कुमार तुरंत भरतपुर के लिए निकल पड़े। जब वो अपना घर आश्रम पहुंचे तो वहां का मंजर देखने लायक था। 9 साल बाद एक मां अपने बड़े बेटे से मिल रही थी। एक बड़ा भाई अपने उस छोटे भाई से मिल रहा था जिसके होने की उसे खबर तक नहीं थी। वो मिलन, आंसुओं और खुशियों का सैलाब लेकर आया।
तारा ने अपने बड़े बेटे को पहचाना और अरिन ने अपनी मां को इतने सालों बाद देखकर गले से लगा लिया। आश्रम में पूरी कानूनी प्रक्रिया के बाद तारा और उनके बेटे हर्ष को परिवार के साथ विदा किया। हर्ष को स्कूल से ट्रांसफर सर्टिफिकेट भी दिया गया ताकि उसकी आगे की पढ़ाई ना रुके। तो यह थी तारा की कहानी। एक ऐसी कहानी जो हमें सिखाती है कि उम्मीद कभी नहीं छोड़नी चाहिए।
यह कहानी अपना घर, आश्रम जैसे उन गुमनाम नायकों को भी सलाम करती है जो बिना किसी स्वार्थ के इंसानियत की सेवा कर रहे हैं। तारा अब अपने परिवार के साथ छत्तीसगढ़ लौट चुकी है। उनके पति पुणे में अपनी नई जिंदगी जी रहे हैं। लेकिन तारा को उनका पुराना परिवार वापस मिल गया।
