क्या आपने कभी सोचा है कि इस्लाम धर्म के सबसे पवित्र स्थल काबा के अंदर एक भी बल्ब या लाइट क्यों नहीं है? जी हां, मक्का मदीना में स्थित काबा शरीफ जहां हर साल करोड़ों मुसलमान हज और उमरा के लिए आते हैं। उस काबा के अंदर कोई भी इलेक्ट्रिक बल्ब नहीं लगाया गया है। लेकिन क्यों? असल में काबा के अंदर अंधेरा नहीं होता बल्कि वहां एक अलग ही रूहानी नूर होती है। माना जाता है कि यह जगह खुद अल्लाह का घर है।
यहां का माहौल इतना पाक और नूरानी है कि इंसान उस रोशनी को किसी कृत्रिम रोशनी से बदल नहीं सकता। काबा के अंदर कुल तीन लकड़ी के खंभे हैं और एक छोटा सा मेहराब जिसे मेहराब तौबा कहा जाता है। दीवारें सुगंधित कपड़ों से ढकी रहती है। अंदर हर चीज बेहद सादगी से रखी जाती है ताकि इंसान की नजर चीजों पर नहीं सिर्फ अल्लाह पे रहे। यहां रोशनी सिर्फ दिल के नूर से महसूस की जाती है ना कि बिजली के बल्ब से और यही इसका सबसे बड़ा संदेश है।
काबा एक ऐसा स्थान है जहां दुनिया की चकाचौंध, रोशनी और दिखावे की कोई जगह नहीं। सिर्फ सच्ची आस्था और सादगी ही यहां की पहचान है। लेकिन अगर इसके साइंटिफिक चीजों की बात की जाए तो काबा शरीफ को 683 ईवी में बनवाया गया था और उस दौर में बल्ब या लाइट नहीं हुआ करते थे। तब से लेकर आज तक काबा की उन्हीं सदियों पुरानी परंपराओं को निभाया जा रहा है। ऐसे में जब काबा शरीफ की सफाई करने की बात होती है तो साल में दो बार साफ सफाई और खुशबू के लिए काबा शरीफ का दरवाजा खोला जाता है जिसे गुल ए काबा कहा जाता है। इस दौरान काबा के दरवाजे के बाहर ही एक बल्ब टांग दिया जाता है और सफाई के बाद इसे उतार दिया जाता है। मक्का शहर के बीचों-बीच स्थित एक घनाकार इमारत जिसे बैतुल्लाह यानी अल्लाह का घर कहा जाता है।
कुरान और हदीस के अनुसार सबसे पहले काबा को हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम और उनके बेटे हजरत इस्माइल अलैहिस्सलाम ने अल्लाह के हुक्म पर बनवाया था। यह वही जगह है जहां पूरी दुनिया के मुसलमान पांच वक्त की नमाज में अपना रुख करते हैं। इसे ही क़िबला कहा जाता है। काबा शरीफ सिर्फ एक इमारत नहीं एक केंद्र है एकता का जहां अमीर गरीब राजा गुलाम गोरे काले का कोई भेद नहीं। हर साल लाखों लोग हज करने यहां आते हैं और एक ही लिबास पहनकर तवाफ करते हैं।
सात बार कावा के चारों ओर घूमते हैं। यह तवाफ सिर्फ एक रस्म नहीं बल्कि उस यकीन का इजहार है कि अल्लाह एक है और वही सबसे बड़ा है।
